देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 572, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 572
| अ० ७ ] | पञ्चम स्कन्ध | ५६३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| श्रान्ताः सर्वे तदा राजन् ब्रह्माणं शरणं ययुः।<br>प्रजापतिं जगन्नाथं रजोरूपं चतुर्मुखम्॥ २५<br>पद्मासनं वेदगर्भं सेवितं मुनिभिः स्वजैः।<br>मरीचिप्रमुखैः शान्तैर्वेदवेदाङ्गपारगैः॥ २६<br>किन्नरैः सिद्धगन्धर्वैश्चारणोरगपन्नगैः।<br>तुष्टुवुर्भयभीतास्ते देवदेवं जगद्गुरुम्॥ २७ | हे राजन्! तब थके हुए सभी देवतागण ब्रह्माजीकी शरणमें गये। उस महिषासुरके भयसे त्रस्त वे सभी देवता समस्त वेद-वेदांगोंके पारगामी विद्वान्, शान्त स्वभाववाले और स्वयं ब्रह्माके मनसे उत्पन्न मरीचि आदि प्रमुख मुनियों एवं सिद्धों, किन्नरों, गन्धर्वों, चारणों, उरगों तथा पन्नगोंद्वारा निरन्तर सेवित, रजोगुणसे सम्पन्न, चार मुखवाले, जगन्नाथ, प्रजापति, वेदगर्भ, कमलके आसनपर विराजमान तथा समस्त संसारके गुरु देवाधिदेव ब्रह्माजीकी स्तुति करने लगे॥ २५—२७॥ |
| देवा ऊचुः<br>धातः किमेतदखिलार्तिहराम्बुजन्म<br>जन्माभिवीक्ष्य न दयां कुरुषे सुरान् यत्।<br>सम्पीडितान् रणजितानसुराधिपेन<br>स्थानच्युतान् गिरिगुहाकृतसन्निवासान्॥ २८ | देवता बोले—हे सम्पूर्ण दुःख दूर करनेवाले पद्मयोनि ब्रह्माजी! इस समय सभी देवता संग्राममें दानवेन्द्र महिषासुरसे पराजित होकर गिरि-कन्दराओंमें कालक्षेप कर रहे हैं। स्थानच्युत हो जानेके कारण उन्हें महान् कष्ट उठाना पड़ रहा है। हमारी ऐसी दशा देखकर भी क्या आपको दया नहीं आती, यह कैसी विचित्र बात है!॥ २८॥ |
| पुत्रान्विता किमपराधशतैः समेता-<br>न्सन्त्यज्य लोभरहितः कुरुतेऽतिदुःखान्।<br>यस्त्वं सुरांस्तव पदाम्बुजभक्तियुक्ता-<br>न्दैत्यार्दितांश्च कृपणान् यदुपेक्षसेऽद्य॥ २९ | क्या निर्लोभी पिता सैकड़ों अपराधोंसे युक्त अपने पुत्रोंको त्यागकर उन्हें कष्टमें पड़े रहना देख सकता है? तब फिर दैत्योंद्वारा सताये गये असहाय देवताओंकी, जो आपके चरणकमलकी भक्तिमें लगे रहते हैं, उपेक्षा आज आप क्यों कर रहे हैं?॥ २९॥ |
| अमरभुवनराज्यं तेन भुक्तं नितान्तं<br>मखहविरपि योग्यं ब्राह्मणैराददाति।<br>सुरतरुवरपुष्पं सेवतेऽसौ दुरात्मा<br>जलनिधिनिधिभूतां गामसौ सेवते ताम्॥ ३० | [दुष्ट] महिषासुर देवलोकका साम्राज्य भोग रहा है। ब्राह्मणोंद्वारा यज्ञमें दी हुई पवित्र हविको वह स्वयं ले लेता है। वह दुष्टात्मा असुर स्वर्गके पारिजातपुष्पोंको अपने उपभोगमें लाता है तथा समुद्रकी निधिस্বরূপा उस कामधेनु गौका भी उपयोग कर रहा है॥ ३०॥ |
| किं वा गृणीमः सुरकार्यमद्भुतं<br>जानासि देवेश सुरारिचेष्टितम्।<br>ज्ञानेन सर्वं त्वमशेषकार्यवि-<br>त्तस्मात्प्रभो ते प्रणताः स्म पादयोः॥ ३१ | हे देवेश! हमलोग देवताओंकी विषम स्थितिका वर्णन कहाँतक करें? आप तो अपने ज्ञानसे दैत्योंकी सारी कुचेष्टा जानते हैं; आप सम्पूर्ण कार्योंको जाननेवाले हैं। अतः हे प्रभो! हम सभी देवता आपके चरणोंमें आ पड़े हैं॥ ३१॥ |
| यत्रापि कुत्रापि गतान्सुरानसौ<br>नानाचरित्रः खलु पापमानसः।<br>पीडां करोत्येव स दुष्टचेष्टित-<br>स्त्रातासि देवेश विधेहि शं विभो॥ ३२ | हे देवेश! देवता जहाँ कहीं भी जाते हैं [वहीं पहुँचकर] विविध चरित्रोंवाला, पापमय विचारोंवाला तथा दुष्ट आचरणवाला वह महिषासुर उन्हें पीड़ित करने लगता है। हे विभो! अब आप ही हमारे रक्षक हैं; हमारा कल्याण कीजिये॥ ३२॥ |