देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 573, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ें| ५६४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ७ |
|---|
| नो चेदद्यं दावमहाग्निपीडिताः<br>कं शान्तिकर्तारमनन्ततेजसम्।<br>यामः प्रजेशं शरणं सुरेष्टं<br>धातारमाद्यं परिमुच्य कं शिवम्॥ ३३ | यदि आप हमारी रक्षा नहीं करेंगे तो दैत्योंके भीषण अत्याचाररूपी दावानलसे पीड़ित हमलोग आप सदृश शान्तिदाता, अनन्त तेजस्वी, प्रजापति, देवताओंके पूज्य, आदिपिता तथा कल्याणकारी प्रभुको छोड़कर किसकी शरणमें जायँ? ॥ ३३ ॥ | | व्यास उवाच<br>इति स्तुत्वा सुराः सर्वे प्रणेमुस्तं प्रजापतिम्।<br>बद्धाञ्जलिपुटाः सर्वे विषण्णवदना भृशम्॥ ३४<br>तांस्तथा पीडितान्दृष्ट्वा तदा लोकपितामहः।<br>उवाच श्लक्ष्णया वाचा सुखं सञ्जनयन्निव॥ ३५ | व्यासजी बोले—इस प्रकार स्तुति करके सम्पूर्ण देवता हाथ जोड़कर प्रजापति ब्रह्माको प्रणाम करने लगे। उन सबके मुखपर अत्यन्त उदासी छायी हुई थी। तब उन्हें इस प्रकार दुःखी देखकर लोकपितामह ब्रह्माजी उन्हें सुख पहुँचाते हुए मधुर वाणीमें कहने लगे—॥ ३४-३५ ॥ | | ब्रह्मोवाच<br>किं करोमि सुराः कामं दानवो वरदर्पितः।<br>स्त्रीवध्योऽसौ न पुंवध्यो विधेयं तत्र किं पुनः॥ ३६<br>व्रजामोऽद्य सुराः सर्वे कैलासं पर्वतोत्तमम्।<br>शङ्करं पुरतः कृत्वा सर्वकार्यविशारदम्॥ ३७<br>ततो व्रजाम वैकुण्ठं यत्र देवो जनार्दनः।<br>मिलित्वा देवकार्यञ्च विमृशामो विशेषतः॥ ३८ | ब्रह्माजी बोले—हे देवताओ! मैं क्या करूँ? वर पानेके कारण वह दैत्य अभिमानी हो गया है। उसका वध कोई स्त्री ही कर सकती है, पुरुष नहीं। ऐसी परिस्थितिमें मैं क्या कर सकता हूँ? ॥ ३६ ॥<br>हे देवताओ! हम सबलोग पर्वतश्रेष्ठ कैलासपर चलें। [वहाँ विराजमान] सम्पूर्ण कर्मोंके ज्ञाता भगवान् शंकरको आगे करके वहाँसे वैकुण्ठधामको चलें, जहाँ भगवान् विष्णु रहते हैं। उनसे मिलकर हमलोग देवताओंके कार्यके विषयमें विशेषरूपसे विचार करेंगे॥ ३७-३८ ॥ | | इत्युक्त्वा हंसमारुह्य ब्रह्मा कार्यसमुच्चये।<br>देवांश्च पृष्ठतः कृत्वा कैलासाभिमुखो ययौ॥ ३९ | ऐसा कहकर ब्रह्माजी हंसपर सवार होकर कार्यसिद्धिके लिये देवताओंको साथ लेकर कैलासकी ओर चल पड़े॥ ३९ ॥ | | तावच्छिवोऽपि तरसा ज्ञात्वा ध्यानेन पद्मजम्।<br>आगच्छन्तं सुरैः सार्धं निर्गतः स्वगृहाद् बहिः॥ ४० | तभी शिवजी अपने ध्यानयोगसे सभी देवताओंसहित ब्रह्माजीको आता हुआ जानकर अपने भवनसे बाहर निकल आये॥ ४० ॥ | | दृष्ट्वा परस्परं तौ तु कृताभिवादनौ भृशम्।<br>प्रणतौ च सुरैः सर्वैः सन्तुष्टौ सम्बभूवतुः॥ ४१ | एक-दूसरेको देखकर उन्होंने परस्पर प्रणाम किया। उन सभी देवताओंने भी भगवान् शंकर तथा ब्रह्माको प्रणाम किया और वे दोनों अत्यन्त प्रसन्न हो गये॥ ४१ ॥ | | आसनानि पृथग्दत्त्वा देवेभ्यो गिरिजापतिः।<br>उपविष्टेषु तेष्वेव निषसादासने स्वके॥ ४२<br>कृत्वा तु कुशलप्रश्नं ब्रह्माणं वृषभध्वजः।<br>पप्रच्छ कारणं देवान्कैलासागमने विभुः॥ ४३ | शिवजी वहाँ सभी देवताओंको पृथक्-पृथक् आसन देकर सबके यथास्थान बैठ जानेपर स्वयं भी अपने आसनपर बैठ गये। तब ब्रह्माजीसे कुशल-प्रश्न करके भगवान् शिवने देवताओंसे कैलास आनेका कारण पूछा॥ ४२-४३ ॥ |