भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 574

अ० ७] पञ्चम स्कन्ध ५६५

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
शिव उवाच<br>किमत्रागमनं ब्रह्मन् कृतं देवैः सवासवैः।<br>भवता च महाभाग ब्रूहि तत्कारणं किल॥ ४४शिवजी बोले—हे ब्रह्मन्! इन्द्र आदि देवताओंके साथ आपके यहाँ आनेका क्या प्रयोजन है? हे महाभाग! वह कारण अवश्य बताइये॥ ४४॥
ब्रह्मोवाच<br>महिषेण सुरेशान पीडिताः स्वर्गनिवासिनः।<br>भ्रमन्ति गिरिदुर्गेषु भयत्रस्ताः सवासवाः॥ ४५ब्रह्माजी बोले—हे सुरेशान! महिषासुर स्वर्गमें रहनेवाले इन्द्रादि देवताओंको महान् कष्ट दे रहा है और उसके भयसे त्रस्त होकर ये देवगण पर्वतोंकी कन्दराओंमें घूम रहे हैं॥ ४५॥
यज्ञभुग्महिषो जातस्तत्स्थान्ये सुरशत्रवः।<br>पीडिता लोकपालाश्च त्वामद्य शरणं गताः॥ ४६<br><br>मया ते भवनं शम्भो प्रापिताः कार्यगौरवात्।<br>यद्युक्तं तद्विधत्स्वाद्य सुरकार्यं सुरेश्वर॥ ४७<br><br>त्वयि भारोऽस्ति सर्वेषां देवानां भूतभावन।महिषासुर यज्ञ-भाग स्वयं ग्रहण कर रहा है। अन्य अनेक दैत्य भी देवताओंके शत्रु बन गये हैं। उन सबसे पीड़ित होकर ये सभी लोकपाल आपकी शरणमें आये हुए हैं। हे शम्भो! इसी गुरुतर कार्यके लिये मैंने इन देवताओंको आपके भवनपर पहुँचा दिया है। अतः हे सुरेश्वर! अब इनके कार्यके विषयमें जो उचित जान पड़े, वह आप करें। हे भूतभावन! सम्पूर्ण देवताओंका भार अब आपपर है॥ ४६-४७ १/२॥
व्यास उवाच<br>इति तद्वचनं श्रुत्वा शङ्करः प्रहसन्निव॥ ४८<br>वचनं श्लक्ष्णया वाचा प्रोवाच पद्मजं प्रति।व्यासजी बोले—ब्रह्माजीका यह वचन सुनकर भगवान् शंकर मुसकराते हुए कोमल वाणीमें ब्रह्माजीसे यह वचन कहने लगे—॥ ४८ १/२॥
शिव उवाच<br>भवतैव कृतं कार्यं वरदानात्पुरा विभो॥ ४९<br><br>अनर्थदञ्च देवानां किं कर्तव्यमतः परम्।<br>ईदृशो बलवाञ्छूरः सर्वदेवभयप्रदः॥ ५०शिवजी बोले—हे विभो! आपने ही तो पूर्वकालमें [महिषासुरको] वरदान देकर देवताओंके लिये ऐसा अनर्थकारी कार्य किया है। अब इसके बाद हमें क्या करना चाहिये? [आपके वरके प्रभावसे ही] वह इतना बली, पराक्रमी तथा सभी देवताओंके लिये भयदायक हो गया है॥ ४९-५०॥
का समर्था वरा नारी तं हन्तुं मददर्पितम्।<br>न मे भार्या न ते भार्या संग्रामं गन्तुमर्हति॥ ५१<br><br>गत्वैव ते महाभागे युयुधाते कथं पुनः।<br>इन्द्राणी च महाभागा न युद्धकुशलास्ति हि॥ ५२<br><br>कान्या हन्तुं समर्थास्ति तं पापं मददर्पितम्।अभिमानमें चूर रहनेवाले उस दानवको मारनेमें कौन श्रेष्ठ स्त्री समर्थ हो सकती है? न तो मेरी भार्या ‘रुद्राणी’ और न आपकी भार्या ‘ब्रह्माणी’ ही संग्राममें जानेयोग्य हैं। महाभाग्यवती ये देवियाँ संग्रामभूमिमें जाकर भी भला युद्ध किस प्रकार करेंगी? इन्द्रकी पत्नी महाभागा इन्द्राणी भी युद्धकलामें कुशल नहीं हैं। तब दूसरी कौन-सी देवांगना उस मदोन्मत्त पापीको मारनेमें समर्थ है?॥ ५१-५२ १/२॥
ममेदं मतमद्यैव गत्वा देवं जनार्दनम्॥ ५३<br><br>स्तुत्वा तं देवकार्याय प्रेरयामः सुसत्वरम्।<br>सोऽतिबुद्धिमतां श्रेष्ठो विष्णुः सर्वार्थसाधने॥ ५४अतः मेरा तो यह विचार है कि हमलोग इसी समय भगवान् विष्णुके पास चलकर और उनकी स्तुति करके देवताओंका कार्य करनेके लिये उन्हींको