भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

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पृष्ठ 575
५६६श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ८

| मिलित्वा वासुदेवं वै कर्तव्यं कार्यचिन्तनम्।<br>प्रपञ्चेन च बुद्ध्या स संविधास्यति साधनम्॥ ५५<br><br>व्यास उवाच<br>इति रुद्रवचः श्रुत्वा ब्रह्माद्याः सुरसत्तमाः।<br>उत्थितास्ते तथेत्युक्त्वा शिवेन सह सत्वराः॥ ५६<br><br>स्वकीयैर्वाहनैः सर्वे ययुर्विष्णुपुरं प्रति।<br>मुदिताः शकुनान्दृष्ट्वा कार्यसिद्धिकराञ्छुभान्॥ ५७<br><br>ववुर्वाताः शुभाः शान्ताः सुगन्धाः शुभशंसिनः।<br>पक्षिणश्च शिवा वाचस्तत्रोचुः पथि सर्वशः॥ ५८<br><br>निर्मलं चाभवद्व्योम दिशश्च विमलास्तथा।<br>गमने तत्र देवानां सर्वं शुभमिवाभवत्॥ ५९ | शीघ्रतापूर्वक प्रेरित करें। परम बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ वे विष्णु सम्पूर्ण कार्योंको सिद्ध करनेमें कुशल हैं। उन्हीं वासुदेवसे मिलकर इस कार्यके सम्बन्धमें विचार करना चाहिये। वे किसी प्रपंच अथवा बुद्धिसे कार्य सिद्ध होनेका उपाय बना देंगे॥ ५३-५५॥<br>व्यासजी बोले—भगवान् शंकरकी यह बात सुनकर ब्रह्मा आदि समस्त श्रेष्ठ देवता 'यह ठीक है'—ऐसा कहकर उठ खड़े हुए और वे सब अपने-अपने वाहनोंपर सवार हो शिवजीके साथ तुरन्त वैकुण्ठकी ओर चल दिये। उस समय कार्यसिद्धिके सूचक अनेक शुभ शकुन देखकर वे सब अत्यन्त प्रसन्न हुए। शुभ सूचना देनेवाली शीतल, मन्द तथा सुगन्धित हवाएँ चलने लगीं और पवित्र पक्षी सर्वत्र मार्गमें मंगलमयी बोली बोलने लगे। आकाश निर्मल हो गया और दिशाएँ स्वच्छ हो गयीं। इस प्रकार देवताओंकी यात्रामें मानो सब मंगल ही मंगल हो गया॥ ५६-५९॥ |

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्रयां संहितायां पञ्चमस्कन्धे पराजितदेवतानां शङ्करशरणगमनवर्णनं नाम सप्तमोऽध्यायः॥ ७॥


अथाष्टमोऽध्यायः

ब्रह्माप्रभृति समस्त देवताओंके शरीरसे तेजःपुंजका निकलना और उस तेजोराशिसे भगवतीका प्राकट्य

व्यास उवाचव्यासजी बोले
तरसा तेऽथ सम्प्राप्य वैकुण्ठं विष्णुवल्लभम्।<br>ददृशुः सर्वशोभाढ्यं दिव्यसद्माविराजितम्॥ १हे राजन्! उन देवताओंने शीघ्रतापूर्वक भगवान् विष्णुके प्रिय धाम वैकुण्ठमें पहुँचकर वहाँ उन श्रीहरिका विशाल सदन देखा, जो सम्पूर्ण शोभाओंसे युक्त तथा दिव्य महलोंसे सुशोभित था।
सरोवापीसरिद्भिश्च संयुक्तं सुखदं शुभम्।<br>हंससारसचक्राह्वैः कूजद्भिश्च विराजितम्॥ २सुन्दर तथा सुखदायक वह भवन सरोवर, बावली एवं नदियोंसे सुशोभित था, जिनमें हंस, सारस, चक्रवाक आदि पक्षी कलरव कर रहे थे।
चम्पकाशोककह्लारमन्दारबकुलावृतैः ।<br>मल्लिकातिलकाम्रातयुतैः कुरबकादिभिः॥ ३<br>कोकिलारावसन्नादैः शिखण्डैर्नृत्यराजितैः।<br>भ्रमरारावरम्यैश्च दिव्यैरुपवनैर्युतम्॥ ४उस भवनके चारों ओर सुशोभित हो रहे दिव्य उपवनोंमें चम्पा, अशोक, कह्लार, मन्दार, मौलसिरी, मालती, तिलक, आमड़ा और कुरबक आदि विविध प्रकारके वृक्ष लगे हुए थे। उपवनोंमें चारों ओर कोयलोंकी कूक सुनायी दे रही थी, मोर नृत्य कर रहे थे और भौंरे गुंजार कर रहे थे।
सुनन्दनन्दनाद्यैश्च पार्षदैर्भक्तितत्परैः।<br>संस्तुवद्भिर्युतं भक्तैरनन्यभववृत्तिभिः॥ ५नन्द-सुनन्द आदि भक्तिपरायण पार्षद तथा