भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 576

| अ० ८ ] | पञ्चम स्कन्ध | ५६७ | | :--- | :--- |

| प्रासादै रत्नखचितैः काञ्चनैश्चित्रमण्डितैः ।<br>अभ्रंलिहैर्विराजद्भिः संयुतं शुभसद्मकैः ॥ ६<br><br>गायद्भिर्देवगन्धर्वैर्नृत्यद्भिरप्सरोगणैः ।<br>रञ्जितं किन्नरैः शश्वद्रक्तकण्ठैर्मनोहरैः ॥ ७<br><br>मुनिभिश्च तथा शान्तैर्वेदपाठकृतादरैः ।<br>स्तुवद्भिः श्रुतिसूक्तैश्च मण्डितं सदनं हरेः ॥ ८ | त्याग-वृत्तिसम्पन्न अनन्य भक्त भगवान् विष्णुकी स्तुति कर रहे थे। वहाँ रत्नजटित महल बने हुए थे, जिनपर सुनहरे चित्र बने हुए थे; सुन्दर-सुन्दर कक्षोंसे सुशोभित वे महल ऊँचाईमें आकाशको छू रहे थे। वहाँ देवता और गन्धर्व गा रहे थे, अप्सराएँ नाच रही थीं और वह मनको मुग्ध करनेवाले तथा मधुर कण्ठध्वनिवाले किन्नरोंसे मण्डित था। वैदिक सूक्तोंके द्वारा आदरपूर्वक भगवान् विष्णुकी स्तुति करते हुए शान्त स्वभाववाले वेदपाठपरायण मुनियोंसे वह भवन अत्यन्त सुशोभित हो रहा था॥ १–८ ॥ | | ते च विष्णुगृहं प्राप्य द्वारपालौ शुभाकृती ।<br>वीक्ष्योचुर्जयविजयौ हेमयष्टिधरौ स्थितौ ॥ ९<br><br>गत्वैकोऽप्युभयोर्मध्ये निवेदयतु सङ्गतान् ।<br>द्वारस्थान् ब्रह्मरुद्रादीन्विष्णुदर्शनलालसान् ॥ १० | भगवान् विष्णुके भवनपर पहुँचकर देवताओंने सुन्दर स्वरूपवाले तथा हाथमें स्वर्णकी छड़ी धारण किये हुए जय-विजय नामक द्वारपालोंको देखकर उनसे कहा कि आप दोनोंमेंसे कोई एक जाकर भगवान् विष्णुसे कह दे कि आपके दर्शनकी अभिलाषासे ब्रह्मा, रुद्र आदि देवता द्वारपर खड़े हैं॥ ९-१०॥ | | व्यास उवाच<br>विजयस्तद्वचः श्रुत्वा गत्वाथ विष्णुसन्निधौ ।<br>सर्वान्समागतान्देवान्प्रणम्योवाच सत्वरः ॥ ११ | व्यासजी बोले— उनकी बात सुनकर विजयने तुरन्त भगवान् विष्णुके पास जाकर उन्हें प्रणाम करके सभी देवताओंके आगमनकी बात उनको बतायी ॥ ११॥ | | विजय उवाच<br>देवदेव महाराज रमाकान्त सुरारिहन् ।<br>समागताः सुराः सर्वे द्वारि तिष्ठन्ति वै विभो ॥ १२<br><br>ब्रह्मा रुद्रस्तथेन्द्रश्च वरुणः पावको यमः ।<br>स्तुवन्ति वेदवाक्यैस्त्वाममरा दर्शनार्थिनः ॥ १३ | विजयने कहा— हे देवाधिदेव ! हे महाराज ! हे दैत्योंका दमन करनेवाले लक्ष्मीकान्त ! हे विभो ! इस समय सभी देवता आये हुए हैं और वे द्वारपर खड़े हैं। आपके दर्शनके इच्छुक ब्रह्मा, रुद्र, इन्द्र, वरुण, अग्नि, यम आदि देवता वेदवाक्योंसे आपकी स्तुति कर रहे हैं॥ १२-१३॥ | | व्यास उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं विष्णुर्विजयस्य रमापतिः ।<br>निर्जगाम गृहात्तूर्णं सुरान्समधिकोत्सवः ॥ १४ | व्यासजी बोले— लक्ष्मीपति भगवान् विष्णु विजयकी बात सुनकर देवोंसे मिलनेहेतु अत्यधिक उत्साहित होकर शीघ्रतापूर्वक अपने भवनसे बाहर निकल आये॥ १४॥ | | गत्वा वीक्ष्य हरिर्देवान्द्वारस्थाञ्छ्रमकर्शितान् ।<br>प्रीतिप्रवणया दृष्ट्या प्रीणयामास दुःखितान् ॥ १५ | वहाँ जाकर भगवान् विष्णुने द्वारपर स्थित उन देवताओंको थकानसे व्याकुल तथा दुःखित देखकर अपनी प्रेमभरी दृष्टिसे उन्हें आनन्दित किया॥ १५॥ | | प्रणेमुस्ते सुराः सर्वे देवदेवं जनार्दनम् ।<br>तुष्टुवुश्च सुरारिघ्नं वाग्भिर्वेदविनिश्चितम् ॥ १६ | उन सभी देवताओंने दैत्योंका संहार करनेवाले तथा वेदोंके द्वारा सुनिश्चित किये गये (तत्त्वस्वरूप) देवाधिदेव भगवान् विष्णुको प्रणाम किया और मधुर वाणीमें उनकी स्तुति की॥ १६॥ |