देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 577, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ें| ५६८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ८ |
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| देवा ऊचुः<br>देवदेव जगन्नाथ सृष्टिस्थित्यन्तकारक।<br>दयासिन्थो महाराज त्राहि नः शरणागतान्॥ १७ | देवता बोले—हे देवदेव! हे जगन्नाथ! हे सृष्टि, पालन तथा संहार करनेवाले! हे दयासिन्धो! हे महाराज! हम शरणागतोंकी रक्षा कीजिये॥ १७॥ | | विष्णुरुवाच<br>विशन्तु निर्जराः सर्वे कुशलं कथयन्तु वः।<br>आसनेषु किमर्थं वै मिलिताः समुपागताः॥ १८<br>चिन्तातुराः कथं जाता विषण्णा दीनमानसाः।<br>ब्रह्मरुद्रेण सहिताः कार्यं प्रब्रूत सत्वरम्॥ १९ | विष्णु बोले—हे देवताओ! आप सभी लोग आसनोंपर बैठ जाइये और फिर अपना कुशल-क्षेम बताइये। आपलोग एक साथ मिलकर यहाँ किसलिये आये हुए हैं? ब्रह्मा तथा शिवसहित आप सभी देवता चिन्तामग्न, दुःखित और उदास क्यों हो गये हैं? आपलोग अपना प्रयोजन शीघ्र बताएँ॥ १८-१९॥ | | देवा ऊचुः<br>महिषेण महाराज पीडिताः पापकर्मणा।<br>असाध्येनातिदुष्टेन वरदृप्तेन पापिना॥ २० | देवता बोले—हे महाराज! पापकर्ममें संलग्न, अजेय, महादुष्ट, वरदान पाकर अभिमानमें चूर तथा पापी महिषासुरसे हमलोग पीड़ित हैं॥ २०॥ | | यज्ञभागानसौ भुंक्ते ब्राह्मणैः प्रतिपादितान्।<br>अमरा गिरिदुर्गेषु भ्रमन्ति च भयातुराः॥ २१ | ब्राह्मणोंद्वारा देवताओंको दिये गये यज्ञभागोंको वह स्वयं ग्रहण कर लेता है। हम सभी देवता उससे भयभीत होकर पर्वतोंकी कन्दराओंमें भटकते फिरते हैं॥ २१॥ | | वरदानेन धातुः स दुर्जयो मधुसूदन।<br>तस्मात्त्वां शरणं प्राप्ता ज्ञात्वा तत्कार्यगौरवम्॥ २२<br>समर्थोऽसि समुद्धर्तुं दैत्यमायाविशारद।<br>कुरु कृष्ण वधोपायं तस्य दानवमर्दन॥ २३ | हे मधुसूदन! ब्रह्माजीके वरदानसे वह अजेय बन गया है, अतः इस कार्यको अत्यन्त गुरुतर जानकर हमलोग आपकी शरणमें आये हैं। दानवोंकी मायाको जाननेवाले तथा दानवोंका वध करनेवाले हे कृष्ण! आप ही देवताओंका उद्धार करनेमें समर्थ हैं, अतः उसके वधका कोई उपाय कीजिये॥ २२-२३॥ | | धात्रा तस्मै वरो दत्तो ह्यवध्योऽसि नरैः किल।<br>का स्त्री त्वेवंविधा बाला या हन्यात्तं शठं रणे॥ २४ | विधाताने उसे वर दे दिया है कि तुम पुरुषमात्रसे सदा अवध्य रहोगे। तब ऐसी कौन स्त्री होगी जो रणमें उस शठको मार सके?॥ २४॥ | | उमा मा वा शची विद्या का समर्थास्य घातने।<br>महिषस्यातिदुष्टस्य वरदानबलादपि॥ २५<br>विचिन्त्य बुद्ध्या यत्सर्वं मरणस्यास्य कारणम्।<br>कुरु कार्यं च देवानां भक्तवत्सल भूधर॥ २६ | क्या भगवती पार्वती, लक्ष्मी, इन्द्राणी अथवा सरस्वती भी इस अत्यन्त दुष्ट तथा वरदानके कारण अत्यन्त अभिमानी महिषासुरका वध करनेमें समर्थ होंगी? अतएव हे भक्तवत्सल! हे भूधर! आप अपनी बुद्धिसे भलीभाँति विचार करके उसके मरणका जो भी उपाय हो उसके द्वारा हमलोगोंका यह कार्य सम्पन्न कर दीजिये॥ २५-२६॥ | | व्यास उवाच<br>श्रुत्वा तद्वचनं विष्णुस्तानुवाच हसन्निव।<br>युद्धं कृतं पुरास्माभिस्तथापि न मृतो ह्यसौ॥ २७ | व्यासजी बोले—यह बात सुनकर भगवान् विष्णु मुसकराते हुए उनसे कहने लगे—पहले भी हमलोगोंने महिषासुरसे युद्ध किया था, किंतु वह नहीं मारा जा सका॥ २७॥ |