भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 578, कुल 889 में से

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पृष्ठ 578
अ० ८ ]पञ्चम स्कन्ध५६१
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अद्य सर्वसुराणां वै तेजोभी रूपसम्पदा।<br>उत्पन्ना चेद्वरारोहा सा हन्यात्तं रणे बलात्॥ २८<br><br>ह्यारिं वरदृप्तञ्च मायाशतविशारदम्।<br>हन्तुं योग्या भवेन्नारी शक्त्यंशैर्निर्मिता हि नः॥ २९अब एक ही उपाय है कि यदि सभी देवताओंके तेजसे कोई श्रेष्ठ रूपवती सुन्दरी उत्पन्न की जाय तो वही समरांगणमें उसे अपने पराक्रमसे मार सकती है। हम सबकी शक्तिके अंशोंसे निर्मित कोई वीर नारी ही सैकड़ों प्रकारकी माया रचनेमें निपुण और वरप्राप्तिके कारण अभिमानमें चूर उस महिषासुरका वध करनेमें समर्थ होगी॥ २८-२९॥
प्रार्थयन्तु च तेजोंऽशान्स्त्रियोऽस्माकं तथा पुनः।<br>उत्पन्नैस्तैश्च तेजोंऽशैस्तेजोराशिर्भवेद्यथा॥ ३०अब आप सभी देवतागण तेजांशोंसे प्रार्थना करें; साथ ही हमारी स्त्रियाँ भी प्रार्थना करें, जिससे कि उन आविर्भूत तेजांशोंके द्वारा एक तेजोराशि उत्पन्न हो जाय॥ ३०॥
आयुधानि वयं दद्मः सर्वे रुद्रपुरोगमाः।<br>तस्यै सर्वाणि दिव्यानि त्रिशूलादीनि यानि च॥ ३१<br><br>सर्वायुधधरा नारी सर्वतेजःसमन्विता।<br>हनिष्यति दुरात्मानं तं पापं मदगर्वितम्॥ ३२उस समय रुद्र आदि हम सब मुख्य देवतागण त्रिशूल आदि जो भी दिव्य आयुध हैं, वह सब उसे दे देंगे। तत्पश्चात् सभी प्रकारके आयुध धारण करनेवाली तथा सम्पूर्ण तेजसे सम्पन्न वह देवी उस दुराचारी, पापी तथा मदोन्मत्त दानवको मार डालेगी॥ ३१-३२॥
व्यास उवाच<br>इत्युक्तवति देवेशे ब्रह्मणो वदनात्ततः।<br>स्वयमेवोद्बभौ तेजोराशिश्चातीव दुःसहः॥ ३३<br><br>रक्तवर्णं शुभाकारं पद्मरागमणिप्रभम्।<br>किञ्चिच्छीतं तथा चोष्णं मरीचिजालमण्डितम्॥ ३४<br><br>निःसृतं हरिणा दृष्टं हरेण च महात्मना।<br>विस्मितौ तौ महाराज बभूवतुरुरुक्रमौ॥ ३५व्यासजी बोले— भगवान् विष्णुके ऐसा कहते ही ब्रह्माजीके मुखसे अपने आप एक अत्यन्त असह्य तेजःपुंज निकल पड़ा। वह तेज लाल रंगका था, उसकी आकृति सुन्दर थी, वह पद्मराग मणिके समान प्रभावाला था। उसमें कुछ शीतलता एवं ऊष्णता भी थी और वह अनेक किरणोंसे सुशोभित था। हे महाराज! भगवान् विष्णु और शिवने भी उस निःसृत तेजको देखा। [उसे देखकर] अमित पराक्रमवाले वे दोनों आश्चर्यचकित हो गये॥ ३३-३५॥
शङ्करस्य शरीरात्तु निःसृतं महदद्भुतम्।<br>रौप्यवर्णमभूत्तीव्रं दुर्दर्शं दारुणं महत्॥ ३६<br><br>भयङ्करञ्च दैत्यानां देवानां विस्मयप्रदम्।<br>घोररूपं गिरिप्रख्यं तमोगुणमिवापरम्॥ ३७तत्पश्चात् शंकरजीके शरीरसे भी चाँदीके सदृश वर्णवाला, अत्यन्त अद्भुत, तीव्र, देखनेमें असह्य तथा महाप्रचण्ड तेज निकला जो दैत्योंको भयभीत कर देनेवाला तथा देवताओंको आश्चर्यमें डाल देनेवाला था। वह भयानक रूपवाला, पर्वतके समान विशाल तथा साक्षात् दूसरे तमोगुण जैसा था॥ ३६-३७॥
ततो विष्णुशरीरात्तु तेजोराशिमिवापरम्।<br>नीलं सत्त्वगुणोपेतं प्रादुरास महाद्युति॥ ३८तदनन्तर भगवान् विष्णुके शरीरसे सत्त्वगुण-सम्पन्न, नीलवर्ण और अत्यन्त दीप्तिमान् दूसरी तेजोराशि प्रकट हुई॥ ३८॥
ततश्चेन्द्रशरीरात्तु चित्ररूपं दुरासदम्।<br>आविरासीत्सुसंवृत्तं तेजः सर्वगुणात्मकम्॥ ३९इसके बाद इन्द्रके शरीरसे विचित्र आकारवाला, असह्य, पूर्ण गोलाकार और सर्वगुणात्मक तेज प्रादुर्भूत हुआ॥ ३९॥