देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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| ५७० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ८ | | :--- | :--- |
| Sanskrit Shloka | Hindi Meaning |
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| कुबेरयमवह्नीनां शरीरेभ्यः समन्ततः।<br>निश्चक्राम महत्तेजो वरुणस्य तथैव च॥ ४०<br><br>अन्येषां चैव देवानां शरीरेभ्योऽतिभास्वरम्।<br>निर्गतं तन्महातेजोराशिरासीन्महोज्ज्वलः॥ ४१ | कुबेर, यम, अग्नि तथा वरुणके भी शरीरोंसे सभी ओर महान् तेज निकलने लगा। इसी प्रकार अन्य देवताओंके शरीरोंसे भी अतिशय प्रदीप्त तेज निकला। वह महान् तेजोराशि अत्यन्त दीप्तिमान् थी॥ ४०-४१॥ |
| तं दृष्ट्वा विस्मिताः सर्वे देवा विष्णुपुरोगमाः।<br>तेजोराशिं महादिव्यं हिमाचलमिवापरम्॥ ४२ | दूसरे हिमालयपर्वतके सदृश उस महादिव्य तेजोराशिको देखकर विष्णु आदि सभी प्रधान देवता आश्चर्यचकित हो गये॥ ४२॥ |
| पश्यतां तत्र देवानां तेजःपुञ्जसमुद्भवा।<br>बभूवातिवरा नारी सुन्दरी विस्मयप्रदा॥ ४३ | उसी क्षण वहाँ सभी देवताओंके देखते-देखते उस तेजःपुंजसे अत्यन्त श्रेष्ठ, सुन्दर तथा सबको विस्मित कर देनेवाली एक स्त्री प्रकट हो गयी॥ ४३॥ |
| त्रिगुणा सा महालक्ष्मीः सर्वदेवशरीरजा।<br>अष्टादशभुजा रम्या त्रिवर्णा विश्वमोहिनी॥ ४४<br><br>श्वेतानना कृष्णनेत्रा संरक्ताधरपल्लवा।<br>ताम्रपाणितला कान्ता दिव्यभूषणभूषिता॥ ४५ | सभी देवताओंके शरीरसे आविर्भूत वह नारी त्रिगुणात्मिका, अठारह भुजाओंवाली, मनोहर, त्रिवर्णा तथा विश्वको मोहमें डाल देनेवाली साक्षात् महालक्ष्मी थीं। वे उज्ज्वल मुखवाली, कृष्णवर्णके नेत्रोंवाली, अत्यन्त लाल अधरोष्ठसे सुशोभित, ताम्रवर्णकी हथेलीसे सुन्दर लगनेवाली, कान्तिसे सम्पन्न तथा दिव्य आभूषणोंसे अलंकृत थीं॥ ४४-४५॥ |
| अष्टादशभुजा देवी सहस्रभुजमण्डिता।<br>सम्भूतासुरनाशाय तेजोराशिसमुद्भवा॥ ४६ | देवताओंके शरीरसे उत्पन्न तेजोराशिसे प्रकट वे अठारह भुजाओंवाली भगवती असुरोंका विनाश करनेके लिये हजारों भुजाओंसे सुशोभित हो गयीं॥ ४६॥ |
| जनमेजय उवाच<br>कृष्ण देव महाभाग सर्वज्ञ मुनिसत्तम।<br>विस्तरं ब्रूहि तस्यास्त्वं शरीरस्य समुद्भवम्॥ ४७<br><br>एकीभूतं च सर्वेषां तेजः किं वा पृथक् स्थितम्।<br>अङ्गानि चैव तस्यास्तु सर्वतेजोमयानि वा॥ ४८<br><br>भिन्नभागविभागेन जातान्यङ्गानि यानि तु।<br>मुखनासाक्षिभेदेन सर्वत्रैकभवानि च॥ ४९<br><br>ब्रूहि तद्विस्तरं व्यास शरीराङ्गसमुद्भवम्।<br>बभूव यस्य देवस्य तेजसोऽङ्गं यदद्भुतम्॥ ५० | जनमेजय बोले— हे कृष्णद्वैपायन! हे महाभाग! हे सर्वज्ञ! हे मुनिवर! अब आप उन भगवतीके शरीरकी उत्पत्तिका विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये। उन सब देवताओंके शरीरसे निकला हुआ तेज बादमें एकत्र हो गया अथवा पृथक्-पृथक् ही रहा? उनके अंग-प्रत्यंग विभिन्न देवताओंके तेजसे सम्पन्न थे अथवा नहीं? उनके शरीरके विभिन्न अंग—मुख, नासिका, नेत्र आदि अलग-अलग देवताओंके तेजसे निर्मित थे अथवा सब तेज एक साथ मिलकर बने थे? हे व्यासजी! उनके शरीरके अंगोंकी उत्पत्तिके विषयमें विस्तारपूर्वक बताइये। जिस देवताके तेजसे उनका जो-जो अद्भुत अंग बना, वह सब मुझे बताइये॥ ४७-५०॥ |
| आयुधाभरणादीनि दत्तानि यैर्यथा यथा।<br>तत्सर्वं श्रोतुकामोऽस्मि त्वन्मुखाम्बुजनिर्गतम्॥ ५१ | जिन-जिन देवताओंने उन भगवतीको जो-जो आयुध तथा आभूषण आदि समर्पित किये, आपके मुखारविन्दसे निकली सारी बात मैं सुनना चाहता हूँ। |