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देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

| अ० ८ ] | पञ्चम स्कन्ध | ५६७ | | :--- | :--- |

| प्रासादै रत्नखचितैः काञ्चनैश्चित्रमण्डितैः ।<br>अभ्रंलिहैर्विराजद्भिः संयुतं शुभसद्मकैः ॥ ६<br><br>गायद्भिर्देवगन्धर्वैर्नृत्यद्भिरप्सरोगणैः ।<br>रञ्जितं किन्नरैः शश्वद्रक्तकण्ठैर्मनोहरैः ॥ ७<br><br>मुनिभिश्च तथा शान्तैर्वेदपाठकृतादरैः ।<br>स्तुवद्भिः श्रुतिसूक्तैश्च मण्डितं सदनं हरेः ॥ ८ | त्याग-वृत्तिसम्पन्न अनन्य भक्त भगवान् विष्णुकी स्तुति कर रहे थे। वहाँ रत्नजटित महल बने हुए थे, जिनपर सुनहरे चित्र बने हुए थे; सुन्दर-सुन्दर कक्षोंसे सुशोभित वे महल ऊँचाईमें आकाशको छू रहे थे। वहाँ देवता और गन्धर्व गा रहे थे, अप्सराएँ नाच रही थीं और वह मनको मुग्ध करनेवाले तथा मधुर कण्ठध्वनिवाले किन्नरोंसे मण्डित था। वैदिक सूक्तोंके द्वारा आदरपूर्वक भगवान् विष्णुकी स्तुति करते हुए शान्त स्वभाववाले वेदपाठपरायण मुनियोंसे वह भवन अत्यन्त सुशोभित हो रहा था॥ १–८ ॥ | | ते च विष्णुगृहं प्राप्य द्वारपालौ शुभाकृती ।<br>वीक्ष्योचुर्जयविजयौ हेमयष्टिधरौ स्थितौ ॥ ९<br><br>गत्वैकोऽप्युभयोर्मध्ये निवेदयतु सङ्गतान् ।<br>द्वारस्थान् ब्रह्मरुद्रादीन्विष्णुदर्शनलालसान् ॥ १० | भगवान् विष्णुके भवनपर पहुँचकर देवताओंने सुन्दर स्वरूपवाले तथा हाथमें स्वर्णकी छड़ी धारण किये हुए जय-विजय नामक द्वारपालोंको देखकर उनसे कहा कि आप दोनोंमेंसे कोई एक जाकर भगवान् विष्णुसे कह दे कि आपके दर्शनकी अभिलाषासे ब्रह्मा, रुद्र आदि देवता द्वारपर खड़े हैं॥ ९-१०॥ | | व्यास उवाच<br>विजयस्तद्वचः श्रुत्वा गत्वाथ विष्णुसन्निधौ ।<br>सर्वान्समागतान्देवान्प्रणम्योवाच सत्वरः ॥ ११ | व्यासजी बोले— उनकी बात सुनकर विजयने तुरन्त भगवान् विष्णुके पास जाकर उन्हें प्रणाम करके सभी देवताओंके आगमनकी बात उनको बतायी ॥ ११॥ | | विजय उवाच<br>देवदेव महाराज रमाकान्त सुरारिहन् ।<br>समागताः सुराः सर्वे द्वारि तिष्ठन्ति वै विभो ॥ १२<br><br>ब्रह्मा रुद्रस्तथेन्द्रश्च वरुणः पावको यमः ।<br>स्तुवन्ति वेदवाक्यैस्त्वाममरा दर्शनार्थिनः ॥ १३ | विजयने कहा— हे देवाधिदेव ! हे महाराज ! हे दैत्योंका दमन करनेवाले लक्ष्मीकान्त ! हे विभो ! इस समय सभी देवता आये हुए हैं और वे द्वारपर खड़े हैं। आपके दर्शनके इच्छुक ब्रह्मा, रुद्र, इन्द्र, वरुण, अग्नि, यम आदि देवता वेदवाक्योंसे आपकी स्तुति कर रहे हैं॥ १२-१३॥ | | व्यास उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं विष्णुर्विजयस्य रमापतिः ।<br>निर्जगाम गृहात्तूर्णं सुरान्समधिकोत्सवः ॥ १४ | व्यासजी बोले— लक्ष्मीपति भगवान् विष्णु विजयकी बात सुनकर देवोंसे मिलनेहेतु अत्यधिक उत्साहित होकर शीघ्रतापूर्वक अपने भवनसे बाहर निकल आये॥ १४॥ | | गत्वा वीक्ष्य हरिर्देवान्द्वारस्थाञ्छ्रमकर्शितान् ।<br>प्रीतिप्रवणया दृष्ट्या प्रीणयामास दुःखितान् ॥ १५ | वहाँ जाकर भगवान् विष्णुने द्वारपर स्थित उन देवताओंको थकानसे व्याकुल तथा दुःखित देखकर अपनी प्रेमभरी दृष्टिसे उन्हें आनन्दित किया॥ १५॥ | | प्रणेमुस्ते सुराः सर्वे देवदेवं जनार्दनम् ।<br>तुष्टुवुश्च सुरारिघ्नं वाग्भिर्वेदविनिश्चितम् ॥ १६ | उन सभी देवताओंने दैत्योंका संहार करनेवाले तथा वेदोंके द्वारा सुनिश्चित किये गये (तत्त्वस्वरूप) देवाधिदेव भगवान् विष्णुको प्रणाम किया और मधुर वाणीमें उनकी स्तुति की॥ १६॥ |

५६८श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ८

| देवा ऊचुः<br>देवदेव जगन्नाथ सृष्टिस्थित्यन्तकारक।<br>दयासिन्थो महाराज त्राहि नः शरणागतान्॥ १७ | देवता बोले—हे देवदेव! हे जगन्नाथ! हे सृष्टि, पालन तथा संहार करनेवाले! हे दयासिन्धो! हे महाराज! हम शरणागतोंकी रक्षा कीजिये॥ १७॥ | | विष्णुरुवाच<br>विशन्तु निर्जराः सर्वे कुशलं कथयन्तु वः।<br>आसनेषु किमर्थं वै मिलिताः समुपागताः॥ १८<br>चिन्तातुराः कथं जाता विषण्णा दीनमानसाः।<br>ब्रह्मरुद्रेण सहिताः कार्यं प्रब्रूत सत्वरम्॥ १९ | विष्णु बोले—हे देवताओ! आप सभी लोग आसनोंपर बैठ जाइये और फिर अपना कुशल-क्षेम बताइये। आपलोग एक साथ मिलकर यहाँ किसलिये आये हुए हैं? ब्रह्मा तथा शिवसहित आप सभी देवता चिन्तामग्न, दुःखित और उदास क्यों हो गये हैं? आपलोग अपना प्रयोजन शीघ्र बताएँ॥ १८-१९॥ | | देवा ऊचुः<br>महिषेण महाराज पीडिताः पापकर्मणा।<br>असाध्येनातिदुष्टेन वरदृप्तेन पापिना॥ २० | देवता बोले—हे महाराज! पापकर्ममें संलग्न, अजेय, महादुष्ट, वरदान पाकर अभिमानमें चूर तथा पापी महिषासुरसे हमलोग पीड़ित हैं॥ २०॥ | | यज्ञभागानसौ भुंक्ते ब्राह्मणैः प्रतिपादितान्।<br>अमरा गिरिदुर्गेषु भ्रमन्ति च भयातुराः॥ २१ | ब्राह्मणोंद्वारा देवताओंको दिये गये यज्ञभागोंको वह स्वयं ग्रहण कर लेता है। हम सभी देवता उससे भयभीत होकर पर्वतोंकी कन्दराओंमें भटकते फिरते हैं॥ २१॥ | | वरदानेन धातुः स दुर्जयो मधुसूदन।<br>तस्मात्त्वां शरणं प्राप्ता ज्ञात्वा तत्कार्यगौरवम्॥ २२<br>समर्थोऽसि समुद्धर्तुं दैत्यमायाविशारद।<br>कुरु कृष्ण वधोपायं तस्य दानवमर्दन॥ २३ | हे मधुसूदन! ब्रह्माजीके वरदानसे वह अजेय बन गया है, अतः इस कार्यको अत्यन्त गुरुतर जानकर हमलोग आपकी शरणमें आये हैं। दानवोंकी मायाको जाननेवाले तथा दानवोंका वध करनेवाले हे कृष्ण! आप ही देवताओंका उद्धार करनेमें समर्थ हैं, अतः उसके वधका कोई उपाय कीजिये॥ २२-२३॥ | | धात्रा तस्मै वरो दत्तो ह्यवध्योऽसि नरैः किल।<br>का स्त्री त्वेवंविधा बाला या हन्यात्तं शठं रणे॥ २४ | विधाताने उसे वर दे दिया है कि तुम पुरुषमात्रसे सदा अवध्य रहोगे। तब ऐसी कौन स्त्री होगी जो रणमें उस शठको मार सके?॥ २४॥ | | उमा मा वा शची विद्या का समर्थास्य घातने।<br>महिषस्यातिदुष्टस्य वरदानबलादपि॥ २५<br>विचिन्त्य बुद्ध्या यत्सर्वं मरणस्यास्य कारणम्।<br>कुरु कार्यं च देवानां भक्तवत्सल भूधर॥ २६ | क्या भगवती पार्वती, लक्ष्मी, इन्द्राणी अथवा सरस्वती भी इस अत्यन्त दुष्ट तथा वरदानके कारण अत्यन्त अभिमानी महिषासुरका वध करनेमें समर्थ होंगी? अतएव हे भक्तवत्सल! हे भूधर! आप अपनी बुद्धिसे भलीभाँति विचार करके उसके मरणका जो भी उपाय हो उसके द्वारा हमलोगोंका यह कार्य सम्पन्न कर दीजिये॥ २५-२६॥ | | व्यास उवाच<br>श्रुत्वा तद्वचनं विष्णुस्तानुवाच हसन्निव।<br>युद्धं कृतं पुरास्माभिस्तथापि न मृतो ह्यसौ॥ २७ | व्यासजी बोले—यह बात सुनकर भगवान् विष्णु मुसकराते हुए उनसे कहने लगे—पहले भी हमलोगोंने महिषासुरसे युद्ध किया था, किंतु वह नहीं मारा जा सका॥ २७॥ |

अ० ८ ]पञ्चम स्कन्ध५६१
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अद्य सर्वसुराणां वै तेजोभी रूपसम्पदा।<br>उत्पन्ना चेद्वरारोहा सा हन्यात्तं रणे बलात्॥ २८<br><br>ह्यारिं वरदृप्तञ्च मायाशतविशारदम्।<br>हन्तुं योग्या भवेन्नारी शक्त्यंशैर्निर्मिता हि नः॥ २९अब एक ही उपाय है कि यदि सभी देवताओंके तेजसे कोई श्रेष्ठ रूपवती सुन्दरी उत्पन्न की जाय तो वही समरांगणमें उसे अपने पराक्रमसे मार सकती है। हम सबकी शक्तिके अंशोंसे निर्मित कोई वीर नारी ही सैकड़ों प्रकारकी माया रचनेमें निपुण और वरप्राप्तिके कारण अभिमानमें चूर उस महिषासुरका वध करनेमें समर्थ होगी॥ २८-२९॥
प्रार्थयन्तु च तेजोंऽशान्स्त्रियोऽस्माकं तथा पुनः।<br>उत्पन्नैस्तैश्च तेजोंऽशैस्तेजोराशिर्भवेद्यथा॥ ३०अब आप सभी देवतागण तेजांशोंसे प्रार्थना करें; साथ ही हमारी स्त्रियाँ भी प्रार्थना करें, जिससे कि उन आविर्भूत तेजांशोंके द्वारा एक तेजोराशि उत्पन्न हो जाय॥ ३०॥
आयुधानि वयं दद्मः सर्वे रुद्रपुरोगमाः।<br>तस्यै सर्वाणि दिव्यानि त्रिशूलादीनि यानि च॥ ३१<br><br>सर्वायुधधरा नारी सर्वतेजःसमन्विता।<br>हनिष्यति दुरात्मानं तं पापं मदगर्वितम्॥ ३२उस समय रुद्र आदि हम सब मुख्य देवतागण त्रिशूल आदि जो भी दिव्य आयुध हैं, वह सब उसे दे देंगे। तत्पश्चात् सभी प्रकारके आयुध धारण करनेवाली तथा सम्पूर्ण तेजसे सम्पन्न वह देवी उस दुराचारी, पापी तथा मदोन्मत्त दानवको मार डालेगी॥ ३१-३२॥
व्यास उवाच<br>इत्युक्तवति देवेशे ब्रह्मणो वदनात्ततः।<br>स्वयमेवोद्बभौ तेजोराशिश्चातीव दुःसहः॥ ३३<br><br>रक्तवर्णं शुभाकारं पद्मरागमणिप्रभम्।<br>किञ्चिच्छीतं तथा चोष्णं मरीचिजालमण्डितम्॥ ३४<br><br>निःसृतं हरिणा दृष्टं हरेण च महात्मना।<br>विस्मितौ तौ महाराज बभूवतुरुरुक्रमौ॥ ३५व्यासजी बोले— भगवान् विष्णुके ऐसा कहते ही ब्रह्माजीके मुखसे अपने आप एक अत्यन्त असह्य तेजःपुंज निकल पड़ा। वह तेज लाल रंगका था, उसकी आकृति सुन्दर थी, वह पद्मराग मणिके समान प्रभावाला था। उसमें कुछ शीतलता एवं ऊष्णता भी थी और वह अनेक किरणोंसे सुशोभित था। हे महाराज! भगवान् विष्णु और शिवने भी उस निःसृत तेजको देखा। [उसे देखकर] अमित पराक्रमवाले वे दोनों आश्चर्यचकित हो गये॥ ३३-३५॥
शङ्करस्य शरीरात्तु निःसृतं महदद्भुतम्।<br>रौप्यवर्णमभूत्तीव्रं दुर्दर्शं दारुणं महत्॥ ३६<br><br>भयङ्करञ्च दैत्यानां देवानां विस्मयप्रदम्।<br>घोररूपं गिरिप्रख्यं तमोगुणमिवापरम्॥ ३७तत्पश्चात् शंकरजीके शरीरसे भी चाँदीके सदृश वर्णवाला, अत्यन्त अद्भुत, तीव्र, देखनेमें असह्य तथा महाप्रचण्ड तेज निकला जो दैत्योंको भयभीत कर देनेवाला तथा देवताओंको आश्चर्यमें डाल देनेवाला था। वह भयानक रूपवाला, पर्वतके समान विशाल तथा साक्षात् दूसरे तमोगुण जैसा था॥ ३६-३७॥
ततो विष्णुशरीरात्तु तेजोराशिमिवापरम्।<br>नीलं सत्त्वगुणोपेतं प्रादुरास महाद्युति॥ ३८तदनन्तर भगवान् विष्णुके शरीरसे सत्त्वगुण-सम्पन्न, नीलवर्ण और अत्यन्त दीप्तिमान् दूसरी तेजोराशि प्रकट हुई॥ ३८॥
ततश्चेन्द्रशरीरात्तु चित्ररूपं दुरासदम्।<br>आविरासीत्सुसंवृत्तं तेजः सर्वगुणात्मकम्॥ ३९इसके बाद इन्द्रके शरीरसे विचित्र आकारवाला, असह्य, पूर्ण गोलाकार और सर्वगुणात्मक तेज प्रादुर्भूत हुआ॥ ३९॥

| ५७० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ८ | | :--- | :--- |

Sanskrit ShlokaHindi Meaning
कुबेरयमवह्नीनां शरीरेभ्यः समन्ततः।<br>निश्चक्राम महत्तेजो वरुणस्य तथैव च॥ ४०<br><br>अन्येषां चैव देवानां शरीरेभ्योऽतिभास्वरम्।<br>निर्गतं तन्महातेजोराशिरासीन्महोज्ज्वलः॥ ४१कुबेर, यम, अग्नि तथा वरुणके भी शरीरोंसे सभी ओर महान् तेज निकलने लगा। इसी प्रकार अन्य देवताओंके शरीरोंसे भी अतिशय प्रदीप्त तेज निकला। वह महान् तेजोराशि अत्यन्त दीप्तिमान् थी॥ ४०-४१॥
तं दृष्ट्वा विस्मिताः सर्वे देवा विष्णुपुरोगमाः।<br>तेजोराशिं महादिव्यं हिमाचलमिवापरम्॥ ४२दूसरे हिमालयपर्वतके सदृश उस महादिव्य तेजोराशिको देखकर विष्णु आदि सभी प्रधान देवता आश्चर्यचकित हो गये॥ ४२॥
पश्यतां तत्र देवानां तेजःपुञ्जसमुद्भवा।<br>बभूवातिवरा नारी सुन्दरी विस्मयप्रदा॥ ४३उसी क्षण वहाँ सभी देवताओंके देखते-देखते उस तेजःपुंजसे अत्यन्त श्रेष्ठ, सुन्दर तथा सबको विस्मित कर देनेवाली एक स्त्री प्रकट हो गयी॥ ४३॥
त्रिगुणा सा महालक्ष्मीः सर्वदेवशरीरजा।<br>अष्टादशभुजा रम्या त्रिवर्णा विश्वमोहिनी॥ ४४<br><br>श्वेतानना कृष्णनेत्रा संरक्ताधरपल्लवा।<br>ताम्रपाणितला कान्ता दिव्यभूषणभूषिता॥ ४५सभी देवताओंके शरीरसे आविर्भूत वह नारी त्रिगुणात्मिका, अठारह भुजाओंवाली, मनोहर, त्रिवर्णा तथा विश्वको मोहमें डाल देनेवाली साक्षात् महालक्ष्मी थीं। वे उज्ज्वल मुखवाली, कृष्णवर्णके नेत्रोंवाली, अत्यन्त लाल अधरोष्ठसे सुशोभित, ताम्रवर्णकी हथेलीसे सुन्दर लगनेवाली, कान्तिसे सम्पन्न तथा दिव्य आभूषणोंसे अलंकृत थीं॥ ४४-४५॥
अष्टादशभुजा देवी सहस्रभुजमण्डिता।<br>सम्भूतासुरनाशाय तेजोराशिसमुद्भवा॥ ४६देवताओंके शरीरसे उत्पन्न तेजोराशिसे प्रकट वे अठारह भुजाओंवाली भगवती असुरोंका विनाश करनेके लिये हजारों भुजाओंसे सुशोभित हो गयीं॥ ४६॥
जनमेजय उवाच<br>कृष्ण देव महाभाग सर्वज्ञ मुनिसत्तम।<br>विस्तरं ब्रूहि तस्यास्त्वं शरीरस्य समुद्भवम्॥ ४७<br><br>एकीभूतं च सर्वेषां तेजः किं वा पृथक् स्थितम्।<br>अङ्गानि चैव तस्यास्तु सर्वतेजोमयानि वा॥ ४८<br><br>भिन्नभागविभागेन जातान्यङ्गानि यानि तु।<br>मुखनासाक्षिभेदेन सर्वत्रैकभवानि च॥ ४९<br><br>ब्रूहि तद्विस्तरं व्यास शरीराङ्गसमुद्भवम्।<br>बभूव यस्य देवस्य तेजसोऽङ्गं यदद्भुतम्॥ ५०जनमेजय बोले— हे कृष्णद्वैपायन! हे महाभाग! हे सर्वज्ञ! हे मुनिवर! अब आप उन भगवतीके शरीरकी उत्पत्तिका विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये। उन सब देवताओंके शरीरसे निकला हुआ तेज बादमें एकत्र हो गया अथवा पृथक्-पृथक् ही रहा? उनके अंग-प्रत्यंग विभिन्न देवताओंके तेजसे सम्पन्न थे अथवा नहीं? उनके शरीरके विभिन्न अंग—मुख, नासिका, नेत्र आदि अलग-अलग देवताओंके तेजसे निर्मित थे अथवा सब तेज एक साथ मिलकर बने थे? हे व्यासजी! उनके शरीरके अंगोंकी उत्पत्तिके विषयमें विस्तारपूर्वक बताइये। जिस देवताके तेजसे उनका जो-जो अद्भुत अंग बना, वह सब मुझे बताइये॥ ४७-५०॥
आयुधाभरणादीनि दत्तानि यैर्यथा यथा।<br>तत्सर्वं श्रोतुकामोऽस्मि त्वन्मुखाम्बुजनिर्गतम्॥ ५१जिन-जिन देवताओंने उन भगवतीको जो-जो आयुध तथा आभूषण आदि समर्पित किये, आपके मुखारविन्दसे निकली सारी बात मैं सुनना चाहता हूँ।
अ० ८ ]पञ्चम स्कन्ध५७१

| न हि तृप्याम्यहं ब्रह्मन् सुधामयरसं पिबन्।<br>चरितञ्च महालक्ष्म्‍यास्त्वन्मुखाम्भोजनिःसृतम्॥ ५२ | हे ब्रह्मन्! आपके मुखकमलसे निकले महालक्ष्मीके चरित्ररूपी अमृतमय रसका पान करते हुए मैं तृप्त नहीं हो पा रहा हूँ॥ ५१-५२॥ | | सूत उवाच<br>इति तस्य वचः श्रुत्वा राज्ञः सत्यवतीसुतः।<br>उवाच मधुरं वाक्यं प्रीणयन्निव भूपतिम्॥ ५३ | सूतजी बोले—[हे मुनिवृन्द!] उन राजा जनमेजयका यह वचन सुनकर सत्यवतीपुत्र श्रीव्यासजी उन्हें प्रसन्न करते हुए यह मधुर वचन कहने लगे॥ ५३॥ | | व्यास उवाच<br>शृणु राजन्महाभाग विस्तरेण ब्रवीमि ते।<br>यथामति कुरुश्रेष्ठ तस्या देहसमुद्भवम्॥ ५४ | **व्यासजी बोले—**हे राजन्! हे महाभाग! हे कुरुश्रेष्ठ! सुनिये, मैं अपनी बुद्धिके अनुसार उनके शरीरकी उत्पत्तिके विषयमें विस्तारपूर्वक आपसे कहता हूँ॥ ५४॥ | | न ब्रह्मा न हरिः साक्षान्न रुद्रो न च वासवः।<br>याथातथ्येन तद्रूपं वक्तुमीशः कदाचन॥ ५५ | स्वयं ब्रह्मा, विष्णु, महेश और इन्द्र भी भगवतीके यथार्थ रूपको बता पानेमें कभी भी समर्थ नहीं हैं तब देवीका जो रूप है, जैसा है और जिस उद्देश्यसे बना है, उसे मैं कैसे जान सकता हूँ? | | कथं जानाम्यहं देव्या यद्रूपं यादृशं यतः।<br>वाचारम्भणमात्रं तदुत्पन्नेति ब्रवीमि यत्॥ ५६ | बस, मेरी वाणी इतना ही कह सकती है कि वे भगवती प्रकट हुईं॥ ५५-५६॥ | | सा नित्या सर्वदैवास्ते देवकार्यार्थसिद्धये।<br>नानारूपा त्वेकरूपा जायते कार्यगौरवात्॥ ५७ | वे देवी नित्यस्वरूपा हैं और सदा ही सर्वत्र विराजमान रहती हैं। वे एक होती हुई भी गुरुतर कार्य पड़नेपर देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये नाना प्रकारके रूप धारण कर लेती हैं॥ ५७॥ | | यथा नटो रङ्गगतो नानारूपो भवत्यसौ।<br>एकरूपस्वभावोऽपि लोकरञ्जनहेतवे॥ ५८ | जिस प्रकार नाटकका कोई नट एक होता हुआ भी रंगमंचपर जाकर लोगोंके मनोरंजनहेतु अनेक रूप धारण कर लेता है, उसी प्रकार रूपरहित तथा निर्गुणा होती हुई भी ये भगवती देवताओंका कार्य सम्पन्न करनेके लिये अपनी लीलासे अनेक सगुण रूप धारण कर लिया करती हैं और किये जानेवाले कर्मके अनुसार धात्वर्थ-गुणसंयुक्त उनके अनेक गौण नाम पड़ जाते हैं॥ ५८—६०॥ | | तथैषा देवकार्यार्थमरूपापि स्वलीलया।<br>करोति बहुरूपाणि निर्गुणा सगुणानि च॥ ५९ | | | कार्यकर्मानुसारेण नामानि प्रभवन्ति हि।<br>धात्वर्थगुणयुक्तानि गौणानि सुबहून्यपि॥ ६० | | | तद्वै बुद्ध्यनुसारेण प्रब्रवीमि नराधिप।<br>यथा तेजःसमुद्भूतं रूपं तस्या मनोहरम्॥ ६१ | हे राजन्! देवताओंके तेजसमूहसे उन भगवतीका मनोहर रूप जिस प्रकार उत्पन्न हुआ, उसे मैं अपनी बुद्धिके अनुसार बता रहा हूँ॥ ६१॥ | | शङ्करस्य च यत्तेजस्तेन तन्मुखपङ्कजम्।<br>श्वेतवर्णं शुभाकारमजायत महत्तरम्॥ ६२ | भगवान् शंकरका जो तेज था, उससे उन भगवतीका गौरवर्ण, सुन्दर आकारवाला तथा अत्यन्त विशाल मुखकमल निर्मित हुआ॥ ६२॥ | | केशास्तस्यास्तथा स्निग्धा याम्येन तेजसाभवन्।<br>वक्राग्राश्चातिदीर्घा वै मेघवर्णा मनोहराः॥ ६३ | यमराजके तेजसे उनके कोमल, घुँघराले, बहुत लम्बे, मेघके समान कृष्ण वर्णवाले और मनोहर केश बने॥ ६३॥ |

५७२श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ८

| नयनत्रितयं तस्या जज्ञे पावकतेजसा।<br>कृष्णं रक्तं तथा श्वेतं वर्णत्रयविभूषितम्॥ ६४ | अग्निके तेजसे उन भगवतीके तीनों नेत्र बने। तीन प्रकारके वर्णोंसे सुशोभित वे नेत्र काले, लाल तथा श्वेत थे॥ ६४॥ | | वक्रे स्निग्धे कृष्णवर्णे सन्ध्ययोस्तेजसा भ्रुवौ।<br>जाते देव्याः सुतेजस्के कामस्य धनुषीव ते॥ ६५ | उनकी भौंहें दोनों सन्ध्याओंके तेजसे बनीं। वे टेढ़ी, चिकनी, काले रंगकी, अत्यन्त तेजोमय तथा कामदेवके धनुषकी भाँति प्रतीत हो रही थीं॥ ६५॥ | | वायोश्च तेजसा शस्तौ श्रवणौ सम्बभूवतुः।<br>नातिदीर्घौ नातिह्रस्वौ दोलाविव मनोभुवः॥ ६६<br>तिलपुष्पसमाकारा नासिका सुमनोहरा।<br>सञ्जाता स्निग्धवर्णा वै धनदस्य च तेजसा॥ ६७ | उनके दोनों उत्तम कान वायुके तेजसे बने, जो न बहुत बड़े तथा न बहुत छोटे थे। वे कामदेवके झूलेके सदृश प्रतीत हो रहे थे। तिलके फूलके समान आकृतिवाली, अत्यन्त मनोहर और स्निग्ध नाक कुबेरके तेजसे उत्पन्न हुई॥ ६६-६७॥ | | दन्ताः शिखरिणः श्लक्ष्णाः कुन्दाग्रसदृशाः समाः।<br>सञ्जाताः सुप्रभा राजन् प्राजापत्येन तेजसा॥ ६८ | हे राजन्! उन देवीके नुकीले, चिकने, चमकीले, कुन्दके अग्रभागके सदृश तथा समान दाँत प्रजापतिके तेजसे उत्पन्न हुए॥ ६८॥ | | अधरश्चातिरक्तोऽस्याः सञ्जातोऽरुणतेजसा।<br>उत्तरोष्ठस्तथा रम्यः कार्तिकेयस्य तेजसा॥ ६९ | उनका रक्तवर्ण अधरोष्ठ अरुणके तेजसे उत्पन्न हुआ तथा ऊपरका अत्यन्त मनोहर उत्तरोष्ठ (ऊपरका ओष्ठ) कार्तिकेयके तेजसे उत्पन्न हुआ॥ ६९॥ | | अष्टादशभुजाकारा बाहवो विष्णुतेजसा।<br>वसूनां तेजसाङ्गुल्यो रक्तवर्णास्तथाभवन्॥ ७०<br>सौम्येन तेजसा जातं स्तनयोर्युग्ममुत्तमम्।<br>ऐन्द्रेणास्यास्तथा मध्यं जातं त्रिवलिसंयुतम्॥ ७१<br>जङ्घोरू वरुणस्याथ तेजसा सम्बभूवतुः।<br>नितम्बः स तु सञ्जातो विपुलस्तेजसा भुवः॥ ७२ | उन देवीकी अठारह भुजाएँ विष्णुके तेजसे प्रकट हुईं तथा उनकी रक्तवर्णकी अँगुलियाँ वसुओंके तेजसे उत्पन्न हुईं। उनके दोनों उत्तम स्तन चन्द्रमाके तेजसे आविर्भूत हुए तथा तीन रेखाओंसे युक्त उनका मध्यभाग इन्द्रके तेजसे उत्पन्न हुआ। उनकी जाँघें तथा ऊरु-प्रदेश वरुणके तेजसे उत्पन्न हुए तथा उनका विशाल नितम्ब पृथ्वीके तेजसे उत्पन्न हुआ॥ ७०–७२॥ | | एवं नारी शुभाकारा सुरूपा सुस्वरा भृशम्।<br>समुत्पन्ना तथा राजंस्तेजोराशिसमुद्भवा॥ ७३ | हे राजन्! इस प्रकार उस तेजोराशिसे सुन्दर आकारवाली, दिव्य रूपसे सम्पन्न तथा मधुर स्वरवाली भगवती नारी-रूपमें प्रकट हुईं॥ ७३॥ | | तां दृष्ट्वा सुष्ठुसर्वाङ्गीं सुदतीं चारुलोचनाम्।<br>मुदं प्रापुः सुराः सर्वे महिषेण प्रपीडिताः॥ ७४ | मनोहर अंग-प्रत्यंगवाली, सुन्दर दाँतोंवाली तथा भव्य नेत्रोंवाली उन देवीको देखकर महिषासुरसे पीड़ित समस्त देवता अत्यन्त आनन्दित हो उठे॥ ७४॥ | | विष्णुस्त्वाह सुरान्सर्वान्भूषणान्यायुधानि च।<br>प्रयच्छन्तु शुभान्यस्यै देवाः सर्वाणि साम्प्रतम्॥ ७५<br>स्वायुधेभ्यः समुत्पाद्य तेजोयुक्तानि सत्वराः।<br>समर्पयन्तु सर्वेऽद्य देव्यै नानायुधानि वै॥ ७६ | उसी समय भगवान् विष्णुने सभी देवताओंसे कहा—हे देवताओ! अब आपलोग अपने-अपने सभी शुभ भूषण एवं आयुध इन देवीको प्रदान करें। अपने-अपने आयुधोंसे नानाविध तेजस्वी शस्त्रास्त्र उत्पन्न करके सभी लोग शीघ्र ही देवीको अर्पित कर दें॥ ७५–७६॥ |

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे
देव्याः स्वरूपोद्भववर्णनं नामाष्टमोऽध्यायः॥ ८॥

अ० ९] पञ्चम स्कन्ध ५७३

अ० ९] पञ्चम स्कन्ध ५७३


अथ नवमोऽध्यायः

देवताओंद्वारा भगवतीको आयुध और आभूषण समर्पित करना तथा उनकी स्तुति करना, देवीका प्रचण्ड अट्टहास करना, जिसे सुनकर महिषासुरका उद्विग्न होकर अपने प्रधान अमात्यको देवीके पास भेजना

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
व्यास उवाच<br>देवा विष्णुवचः श्रुत्वा सर्वे प्रमुदितास्तदा।<br>ददुश्च भूषणान्याशु वस्त्राणि स्वायुधानि च॥ १व्यासजी बोले—[हे राजन्!] तब भगवान् विष्णुका यह वचन सुनकर सभी देवता बहुत प्रसन्न हुए। वे तुरंत महालक्ष्मीको वस्त्र, आभूषण और अपने-अपने आयुध प्रदान करने लगे॥ १॥
क्षीरोदश्चाम्बरे दिव्ये रक्ते सूक्ष्मे तथाजरे।<br>निर्मलञ्च तथा हारं प्रीतस्तस्यै सुमण्डितम्॥ २<br><br>ददौ चूडामणिं दिव्यं सूर्यकोटिसमप्रभम्।<br>कुण्डले च तथा शुभ्रे कटकानि भुजेषु वै॥ ३<br><br>केयूरान्कङ्कणान्दिव्यान्नानारत्नविराजितान् ।<br>ददौ तस्यै विश्वकर्मा प्रसन्नेन्द्रियमानसः॥ ४<br><br>नूपुरौ सुस्वरौ कान्तौ निर्मलौ रत्नभूषितौ।<br>ददौ सूर्यप्रतीकाशौ त्वष्टा तस्यै सुपादयोः॥ ५क्षीरसागरने देवीको दिव्य, रक्तवर्णवाले, महीन तथा कभी भी जीर्ण न होनेवाले दो वस्त्र; निर्मल तथा मनोहर हार; करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाशमान दिव्य चूडामणि; दो सुन्दर कुण्डल तथा कड़े प्रसन्नतापूर्वक दिये। विश्वकर्माने भुजाओंपर धारण करनेके लिये बाजूबन्द और अनेक प्रकारके रत्नजटित दिव्य कंकण प्रसन्नचित्त होकर उन्हें प्रदान किये। साथ ही त्वष्टाने मधुर ध्वनिवाले, चमकीले, स्वच्छ, रत्नजटित और सूर्यके समान प्रकाशमान दो नूपुर पैरोंमें पहननेके लिये उन्हें प्रदान किये॥ २–५॥
तथा ग्रैवेयकं रम्यं ददौ तस्यै महार्णवः।<br>अङ्गुलीयरत्नानि तेजोवन्ति च सर्वशः॥ ६महासमुद्रने उन्हें गलेमें धारण करनेके लिये मनोहर कण्ठहार और रत्नोंसे निर्मित तेजोमय अँगूठियाँ प्रदान कीं॥ ६॥
अम्लानपङ्कजां मालां गन्धाढ्यां भ्रमरानुगाम्।<br>तथैव वैजयन्तीञ्च वरुणः सम्प्रयच्छत॥ ७वरुणदेवने कभी न मुरझानेवाले कमलोंकी माला, जो सुगन्धसे परिपूर्ण थी तथा जिसपर भौंरे मँडरा रहे थे और वैजयन्ती नामक माला भगवतीको प्रदान की॥ ७॥
हिमवानथ सन्तुष्टो रत्नानि विविधानि च।<br>ददौ च वाहनं सिंहं कनकाभं मनोहरम्॥ ८हिमवान्ने प्रसन्न होकर उन्हें नाना प्रकारके रत्न तथा सुवर्णके समान चमकीले वर्णवाला एक मनोहर सिंह वाहनके रूपमें प्रदान किया॥ ८॥
भूषणैर्भूषिता दिव्यैः सा रराज वरा शुभा।<br>सिंहारूढा वरारोहा सर्वलक्षणसंयुता॥ ९सभी लक्षणोंसे सम्पन्न तथा सुन्दर रूपवाली वे कल्याणमयी श्रेष्ठ भगवती दिव्य आभूषणोंसे विभूषित होकर सिंहपर आरूढ़ होकर अत्यन्त सुशोभित हो रही थीं॥ ९॥
विष्णुश्चक्रात्समुत्पाद्य ददावस्यै रथाङ्गकम्।<br>सहस्रारं सुदीप्तञ्च देवारिशिरसां हरम्॥ १०तत्पश्चात् भगवान् विष्णुने अपने चक्रसे उत्पन्न करके सहस्र अरोंवाला, तेजसम्पन्न और दैत्योंका सिर काट लेनेकी सामर्थ्यवाला एक चक्र उन्हें प्रदान किया॥ १०॥

| ५७४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ९ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
स्वत्रिशूलात्समुत्पाद्य शङ्करः शूलमुत्तमम्।<br>ददौ देव्यै सुरारीणां कृन्तनं भयनाशनम्॥ ११शंकरजीने अपने त्रिशूलसे उत्पन्न करके भगवतीको एक ऐसा उत्तम त्रिशूल अर्पण किया, जो दानवोंको काट डालनेकी शक्तिसे सम्पन्न तथा देवताओंके भयका नाश करनेवाला था॥ ११॥
वरुणश्च प्रसन्नात्मा ददौ शङ्खं समुज्ज्वलम्।<br>घोषवन्तं स्वशङ्खात्तु समुत्पाद्य सुमङ्गलम्॥ १२वरुणदेवने अपने शंखसे उत्पन्न करके प्रसन्नचित्त होकर देवीजीको एक ऐसा शंख प्रदान किया; जो मंगलमय, अत्यन्त उज्ज्वल तथा तीव्र ध्वनि करनेवाला था॥ १२॥
हुताशनस्तथा शक्तिं शतघ्नीं सुमनोजवाम्।<br>प्रायच्छत्तु प्रसन्नात्मा तस्यै दैत्यविनाशिनीम्॥ १३अग्निदेवने प्रसन्नचित्त होकर सैकड़ों शत्रुओंका संहार करनेवाली, मनके समान तीव्र गतिसे चलनेवाली तथा दैत्योंका विनाश करनेवाली एक शक्ति उन्हें प्रदान की॥ १३॥
इषुधिं बाणपूर्णञ्च चापं चाद्भुतदर्शनम्।<br>मारुतो दत्तवांस्तस्यै दुराकर्षं खरस्वरम्॥ १४पवनदेवने उन भगवती महालक्ष्मीको बाणोंसे भरा हुआ एक तरकस तथा देखनेमें अत्यन्त अद्भुत, कठिनाईसे खींचा जा सकनेवाला और कर्कश टंकार करनेवाला धनुष प्रदान किया॥ १४॥
स्ववज्राद्वज्रमुत्पाद्य ददाविन्द्रोऽतिदारुणम्।<br>घण्टामैरावतात्तूर्णं सुशब्दां चातिसुन्दराम्॥ १५देवराज इन्द्रने अपने वज्रसे उत्पन्न करके एक अत्यन्त भयंकर वज्र तथा ऐरावत हाथीसे उतारकर एक परम सुन्दर तथा तीव्र ध्वनि करनेवाला घण्टा तुरंत भगवतीको अर्पण किया॥ १५॥
ददौ दण्डं यमः कामं कालदण्डसमुद्भवम्।<br>येनान्तं सर्वभूतानामकरोत्काल आगते॥ १६यमराजने अपने कालदण्डसे आविर्भूत एक ऐसा दण्ड भगवतीको प्रदान किया, जिससे वे समय आनेपर सभी प्राणियोंका अन्त करते थे॥ १६॥
ब्रह्मा कमण्डलुं दिव्यं गङ्गावारिप्रपूरितम्।<br>ददावस्यै मुदा युक्तो वरुणः पाशमेव च॥ १७ब्रह्माजीने गंगाजलसे परिपूर्ण दिव्य कमण्डलु और वरुणदेवने अपना पाश उन्हें प्रसन्नतापूर्वक प्रदान किया॥ १७॥
कालः खड्गं तथा चर्म प्रायच्छत्तु नराधिप।<br>परशुं विश्वकर्मा च तीक्ष्णमस्यै ददावथ॥ १८हे राजन्! कालने महालक्ष्मीको खड्ग तथा ढाल दिये और विश्वकर्माने उन्हें तीक्ष्ण परशु अर्पण किया॥ १८॥
धनदस्तु सुरापूर्णं पानपात्रं सुवर्णजम्।<br>पङ्कजं वरुणश्चादाद्देव्यै दिव्यं मनोहरम्॥ १९कुबेरने भगवतीको एक सुवर्णमय पानपात्र तथा वरुणने उन्हें दिव्य तथा मनोहर कमल-पुष्प प्रदान किया॥ १९॥
गदां कौमोदकीं त्वष्टा घण्टाशतनिनादिनीम्।<br>अदात्तस्यै प्रसन्नात्मा सुरशत्रुविनाशिनीम्॥ २०<br><br>अस्त्राण्यनेकरूपाणि तथाभेद्यञ्च दंशनम्।<br>ददौ त्वष्टा जगन्मात्रे निजरश्मीन्दिवाकरः॥ २१प्रसन्न मनवाले त्वष्टाने सैकड़ों घण्टोंके समान ध्वनि करनेवाली और दानवोंका विनाश कर डालनेवाली कौमोदकी नामक गदा उन्हें प्रदान की। साथ ही उन त्वष्टाने जगज्जननी भगवती महालक्ष्मीको अनेक प्रकारके अस्त्र तथा अभेद्य कवच प्रदान किये और सूर्यदेवने उन्हें अपनी किरणें प्रदान कीं॥ २०-२१॥
अ० ९ ]पञ्चम स्कन्ध५७५
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
सायुधां भूषणैर्युक्तां दृष्ट्वा ते विस्मयं गताः।<br>तुष्टुवुस्तां सुरा देवीं त्रैलोक्यमोहिनीं शिवाम्॥ २२इस प्रकार सभी आयुधों तथा आभूषणोंसे युक्त उन भगवतीको देखकर देवतागण अत्यन्त विस्मित हुए और त्रैलोक्यमोहिनी उन कल्याणकारिणी देवीकी स्तुति करने लगे॥ २२॥
देवा ऊचुः<br>नमः शिवायै कल्याण्यै शान्त्यै पुष्ट्यै नमो नमः।<br>भगवत्यै नमो देव्यै रुद्राण्यै सततं नमः॥ २३देवता बोले— शिवाको नमस्कार है। कल्याणी, शान्ति और पुष्टि देवीको बार-बार नमस्कार है। भगवतीको नमस्कार है। देवी रुद्राणीको निरन्तर नमस्कार है॥ २३॥
कालरात्र्यै तथाम्बायै इन्द्राण्यै ते नमो नमः।<br>सिद्धयै बुद्धयै तथा वृद्धयै वैष्णव्यै ते नमो नमः॥ २४आप कालरात्रि, अम्बा तथा इन्द्राणीको बार-बार नमस्कार है। आप सिद्धि, बुद्धि, वृद्धि तथा वैष्णवीको बार-बार नमस्कार है॥ २४॥
पृथिव्यां या स्थिता पृथ्व्या न ज्ञाता पृथिवीञ्च या।<br>अन्तःस्थिता यमयति वन्दे तामीश्वरीं पराम्॥ २५पृथ्वीके भीतर स्थित रहकर जो पृथ्वीको नियन्त्रित करती हैं, किंतु पृथ्वी जिन्हें नहीं जान पातीं, उन परा परमेश्वरीकी मैं वन्दना करता हूँ॥ २५॥
मायायां या स्थिता ज्ञाता मायया न च तामजाम्।<br>अन्तःस्थिता प्रेरयति प्रेरयित्रीं नुमः शिवाम्॥ २६जो मायाके अन्दर स्थित रहनेपर भी मायाके द्वारा नहीं जानी जा सकीं तथा जो मायाके अन्दर विराजमान रहकर उसे प्रेरणा प्रदान करती हैं, उन जन्मरहित तथा प्रेरणा प्रदान करनेवाली भगवती शिवाको हम नमस्कार करते हैं॥ २६॥
कल्याणं कुरु भो मातस्त्राहि नः शत्रुतापितान्।<br>जहि पापं हयारिं त्वं तेजसा स्वेन मोहितम्॥ २७<br>खलं मायाविनं घोरं स्त्रीवध्यं वरदर्पितम्।<br>दुःखदं सर्वदेवानां नानारूपधरं शठम्॥ २८हे माता! आप हमारा कल्याण करें और शत्रुओंसे संत्रस्त हम देवताओंकी रक्षा करें। आप अपने तेजसे इस मोहग्रस्त पापी महिषासुरका वध कर डालें। यह महिषासुर दुष्ट, घोर मायावी, केवल स्त्रीके द्वारा मारा जा सकनेवाला, वरदान प्राप्त करनेसे अभिमानी, समस्त देवताओंको दुःख देनेवाला तथा अनेक रूप धारण करनेवाला महादुष्ट है॥ २७-२८॥
त्वमेका सर्वदेवानां शरणं भक्तवत्सले।<br>पीडितान्दानवेनाद्य त्राहि देवि नमोऽस्तु ते॥ २९हे भक्तवत्सले! एकमात्र आप ही सभी देवताओंकी शरण हैं; दानव महिषासुरसे पीड़ित हम देवताओंकी आप रक्षा कीजिये। हे देवि! आपको नमस्कार है॥ २९॥
व्यास उवाच<br>एवं स्तुता तदा देवी सुरैः सर्वसुखप्रदा।<br>नानुवाच महादेवी स्मितपूर्वं शुभं वचः॥ ३०व्यासजी बोले— इस प्रकार सब देवताओंके स्तुति करनेपर समस्त सुख प्रदान करनेवाली महादेवी मुसकराकर उन देवताओंसे यह मंगलमय वचन कहने लगीं॥ ३०॥
देव्युवाच<br>भयं त्यजन्तु गीर्वाणा महिषान्मन्दचेतसः।<br>हनिष्यामि रणेऽद्यैव वरदृप्तं विमोहितम्॥ ३१देवी बोलीं— हे देवतागण! आपलोग मन्दबुद्धि महिषासुरका भय त्याग दें। मैं वर पानेके कारण अभिमानमें चूर तथा मोहग्रस्त उस महिषासुरको आज ही रणमें मार डालूँगी॥ ३१॥
५७६श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ९

| व्यास उवाच<br>इत्युक्त्वा सा सुरान्देवी जहासातीव सुस्वरम्।<br>चित्रमेतच्च संसारे भ्रममोहयुतं जगत्॥ ३२<br>ब्रह्मविष्णुमहेशाद्याः सेन्द्राश्चान्ये सुरास्तथा।<br>कम्पयुक्ता भयत्रस्ता वर्तन्ते महिषात्किल॥ ३३ | व्यासजी बोले—देवताओंसे ऐसा कहकर वे भगवती अत्यन्त उच्च स्वरमें हँस पड़ीं। [वे बोलीं—] इस संसारमें यह बड़ी विचित्र बात है कि यह सारा जगत् ही भ्रम तथा मोहसे ग्रसित है। ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इन्द्र आदि तथा अन्य देवता भी महिषासुरसे भयभीत होकर काँपने लगते हैं॥ ३२-३३॥ | | अहो दैवबलं घोरं दुर्जयं सुरसत्तमाः।<br>कालः कर्तास्ति दुःखानां सुखानां प्रभुरीश्वरः॥ ३४<br>सृष्टिपालनसंहारे समर्था अपि ते यदा।<br>मुह्यन्ति क्लेशसन्तप्ता महिषेण प्रपीडिताः॥ ३५ | हे श्रेष्ठ देवताओ! दैवबल बड़ा ही भयानक और दुर्जय है। काल ही सुख और दुःखका कर्ता है। यही सबका प्रभु तथा ईश्वर है। सृष्टि, पालन तथा संहार करनेमें समर्थ रहते हुए भी वे ब्रह्मा आदि मोह-ग्रस्त हो जाते हैं, कष्ट भोगते हैं और महिषासुरके द्वारा सताये जाते हैं॥ ३४-३५॥ | | इति कृत्वा स्मितं देवी साट्टहासं चकार ह।<br>उच्चैः शब्दं महाघोरं दानवानां भयप्रदम्॥ ३६ | मुसकराकर ऐसा कहनेके पश्चात् देवी अट्टहास करने लगीं। उस अट्टहासका महाभयानक गर्जन दानवोंको भयभीत कर देनेवाला था॥ ३६॥ | | चकम्पे वसुधा तत्र श्रुत्वा तच्छब्दमद्भुतम्।<br>चेलुश्च पर्वताः सर्वे चुक्षोभाब्धिश्च वीर्यवान्॥ ३७<br>मेरुश्चचाल शब्देन दिशः सर्वाः प्रपूरिताः।<br>भयं जग्मुस्तदा श्रुत्वा दानवास्तत्स्वनं महत्॥ ३८<br>जय पाहीति देवास्तामूचुः परमहर्षिताः। | उस अद्भुत शब्दको सुनकर पृथ्वी काँपने लगी, सभी पर्वत चलायमान हो उठे और अगाध महासमुद्रमें विक्षोभ उत्पन्न होने लगा। उस शब्दसे सुमेरुपर्वत हिलने लगा और सभी दिशाएँ गूँज उठीं। उस तीव्र ध्वनिको सुनकर सभी दानव भयभीत हो गये। सभी देवता परम प्रसन्न होकर 'आपकी जय हो', 'हमारी रक्षा करो'—ऐसा उन देवीसे कहने लगे॥ ३७-३८ १/२॥ | | महिषोऽपि स्वनं श्रुत्वा चुकोप मदगर्वितः॥ ३९<br>किमेतदिति तान्दैत्यानपृच्छ स्वनशङ्कितः।<br>गच्छन्तु त्वरिता दूता ज्ञातुं शब्दसमुद्भवम्॥ ४०<br>कृतः केनायमत्युग्रः शब्दः कर्णव्यथाकरः।<br>देवो वा दानवो वापि यो भवेत्स्वनकारकः॥ ४१<br>गृहीत्वा तं दुरात्मानं मत्समीपं नयन्त्विह।<br>हनिष्यामि दुराचारं गर्जन्तं स्मयदुर्मदम्॥ ४२<br>क्षीणायुष्यं मन्दमतिं नयामि यमसादनम्।<br>पराजिताः सुराः कामं न गर्जन्ति भयातुराः॥ ४३<br>नासुरा मम वश्यास्ते कस्येदं मूढचेष्टितम्।<br>त्वरिता मामुपायान्तु ज्ञात्वा शब्दस्य कारणम्॥ ४४ | अभिमानमें चूर महिषासुर भी वह ध्वनि सुनकर क्रुद्ध हो उठा। उस ध्वनिसे सशंकित महिषासुरने दैत्योंसे पूछा—यह कैसी ध्वनि है? इस ध्वनिके उद्गम-स्थलको जाननेके लिये दूतगण तत्काल यहाँसे जायें। कानोंको पीड़ा पहुँचानेवाला यह अति भीषण शब्द किसने किया है? देवता या दानव जो कोई भी इस ध्वनिको उत्पन्न करनेवाला हो, उस दुष्टात्माको पकड़कर मेरे पास ले आयें। ऐसा गर्जन करनेवाले उस अभिमानके मदमें उन्मत्त दुराचारीको मैं मार डालूँगा। मैं क्षीण-आयु तथा मन्दबुद्धिवाले उस दुष्टको अभी यमपुरी पहुँचा दूँगा। देवता मुझसे पराजित होकर भयभीत हो गये हैं, अतः वे ऐसा गर्जन कर ही नहीं सकते। दानव भी ऐसा नहीं कर सकते; क्योंकि वे सब तो मेरे अधीन हैं, तो फिर यह |

अ० ९] पञ्चम स्कन्ध ५७७

अ० ९] पञ्चम स्कन्ध ५७७

अहं गत्वा हनिष्यामि तं पापं वितथश्रमम्।मूर्खतापूर्ण चेष्टा किसकी हो सकती है ? अब दूतगण इस शब्दके कारणका पता लगाकर मेरे पास शीघ्र आयें। तत्पश्चात् मैं स्वयं वहाँ जाकर ऐसा व्यर्थ कर्म करनेवाले उस पापीका वध कर दूँगा ॥ ३९—४४ १/२ ॥
व्यास उवाच<br>इत्युक्तास्तेन ते दूता देवीं सर्वाङ्गसुन्दरीम् ॥ ४५<br><br>अष्टादशभुजां दिव्यां सर्वार्भरणभूषिताम्।<br>सर्वलक्षणसम्पन्नां वरायुधधरां शुभाम् ॥ ४६<br><br>दधतीं चषकं हस्ते पिबन्तीं च मुहुर्मुधु।<br>संवीक्ष्य भयभीतास्ते जग्मुस्त्रस्ताः सुशङ्किताः ॥ ४७<br><br>सकाशे महिषस्याशु तमूचुः स्वनकारणम्।व्यासजी बोले—महिषासुरके ऐसा कहनेपर वे दूत [शब्दके कारणका पता लगाते-लगाते] समस्त सुन्दर अंगोंवाली, अठारह भुजाओंवाली, दिव्य विग्रहमयी, सभी प्रकारके आभूषणोंसे अलंकृत, सम्पूर्ण शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न, उत्तम आयुध धारण करनेवाली और हाथमें मधुपात्र लेकर बार-बार उसका पान करती हुई भगवतीके पास पहुँच गये। उन्हें देखकर वे भयभीत हो गये और व्याकुल तथा सशंकित होकर वहाँसे भाग चले। महिषासुरके पास आकर वे उससे ध्वनिका कारण बताने लगे॥ ४५—४७ १/२ ॥
दूता ऊचुः<br>देवी दैत्येश्वर प्रौढा दृश्यते काचिदङ्गना ॥ ४८<br><br>सर्वाङ्गभूषणा नारी सर्वरत्नोपशोभिता।<br>न मानुषी नासुरी सा दिव्यरूपा मनोहरा ॥ ४९<br><br>सिंहारूढायुधधरा चाष्टादशकरा वरा।<br>सा नादं कुरुते नारी लक्ष्यते मदगर्विता ॥ ५०<br><br>सुरापानरता कामं जानीमो न सभर्तृका।<br>अन्तरिक्षस्थिता देवास्तां स्तुवन्ति मुदान्विताः ॥ ५१दूत बोले—हे दैत्येन्द्र! वह कोई प्रौढा स्त्री और देवीकी भाँति दिखायी देती है। उस स्त्रीके सभी अंगोंमें आभूषण विद्यमान हैं तथा वह सभी प्रकारके रत्नोंसे सुशोभित है। वह स्त्री न तो मानवी है और न तो आसुरी है। दिव्यविग्रहवाली वह स्त्री बड़ी मनोहर है। अठारह भुजाओंवाली वह श्रेष्ठ नारी नानाविध आयुध धारण करके सिंहपर विराजमान है। वही स्त्री गर्जन कर रही है। वह मदोन्मत्त दिखायी दे रही है। वह निरन्तर मद्यपान कर रही है। हमें ऐसा जान पड़ता है कि वह अभी विवाहिता नहीं है॥ ४८—५० १/२ ॥
जयेति पाहि नश्चेति जहि शत्रूमिति प्रभो।<br>न जाने का वरारोहा कस्य वा सा परिग्रहः ॥ ५२<br><br>किमर्थमागता चात्र किं चिकीर्षति सुन्दरी।<br>द्रष्टुं नैव समर्थाः स्मस्तत्तेजःपरिकर्षिताः ॥ ५३<br><br>शृङ्गारवीरहासाढ्या रौद्राद्भुतरसान्विता।<br>दृष्ट्वैवंविविधां नारीमसम्भाष्य समागताः ॥ ५४<br><br>वयं त्वदाज्ञया राजन् किं कर्तव्यमतःपरम्।देवतागण आकाशमें स्थित होकर प्रसन्नतापूर्वक उसकी इस प्रकार स्तुति कर रहे हैं—'आपकी जय हो', 'हमारी रक्षा करो' और 'शत्रुओंका वध करो'। हे प्रभो! मैं यह नहीं जानता कि वह सुन्दरी कौन है, किसकी पत्नी है, वह सुन्दरी यहाँ किसलिये आयी हुई है और वह क्या करना चाहती है? उस स्त्रीके तेजसे चकाचौंध हमलोग उसे देखनेमें समर्थ नहीं हो सके। वह स्त्री शृंगार, वीर, हास्य, रौद्र और अद्भुत—इन सभी रसोंसे परिपूर्ण थी। इस प्रकारकी अद्भुत स्वरूपवाली नारीको देखकर हमलोग बिना कुछ कहे ही आपके आज्ञानुसार लौट आये। हे राजन्! अब इसके बाद क्या करना है?॥ ५१—५४ १/२ ॥

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ] — 19 A

५७८श्रीमद्देवीभागवत[ अ० ९ ]
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
महिष उवाच<br>गच्छ वीर मयादिष्टो मन्त्रिश्रेष्ठ बलान्वितः ॥ ५५<br><br>सामादिभिरुपायैस्त्वं समानय शुभाननाम्।<br>नायाति यदि सा नारी त्रिभिः सामादिभिस्त्विह ॥ ५६<br><br>अहत्वा तां वरारोहां त्वमानय ममान्तिकम्।<br>करोमि पट्टमहिषीं तां मरालभ्रुवं मुदा ॥ ५७<br><br>प्रीतियुक्ता समायाति यदि सा मृगलोचना।<br>रसभङ्गो यथा न स्यात्तथा कुरु ममेप्सितम् ॥ ५८<br><br>श्रवणान्मोहितोऽस्म्यद्य तस्या रूपस्य सम्पदा।महिषासुर बोला—हे वीर! हे मन्त्रिश्रेष्ठ! तुम मेरे आदेशसे सेना साथमें लेकर जाओ और साम आदि उपायोंसे उस सुन्दर मुखवाली स्त्रीको यहाँ ले आओ। यदि वह स्त्री साम, दान और भेद—इन तीन उपायोंसे भी यहाँ न आये तो उस सुन्दरीको बिना मारे ही पकड़कर मेरे पास ले आओ, यदि वह मृगनयनी प्रीतिपूर्वक आयेगी तो मैं हंसके समान भौंहोंवाली उस स्त्रीको प्रसन्नतापूर्वक अपनी पटरानी बनाऊँगा। मेरी इच्छा समझकर जिस प्रकार रसभंग न हो, वैसा करना। मैं उसकी रूपराशिकी बात सुनकर मोहित हो गया हूँ॥ ५५–५८ १/२ ॥
व्यास उवाच<br>महिषस्य वचः श्रुत्वा पेशलं मन्त्रिसत्तमः ॥ ५९<br><br>जगाम तरसा कामं गजाश्वरथसंयुतः।<br>गत्वा दूरतरं स्थित्वा तामुवाच मनस्विनीम् ॥ ६०<br><br>विनयावनतः श्लक्ष्णं मन्त्री मधुरया गिरा।व्यासजी बोले—महिषासुरकी यह कोमल वाणी सुनकर वह श्रेष्ठ मन्त्री हाथी, घोड़े और रथ साथ लेकर तुरंत चल पड़ा। वहाँ पहुँचकर कुछ दूर खड़े होकर वह सचिव कोमल तथा मधुर वाणीमें विनम्रतापूर्वक उस दृढ़ निश्चयवाली नारीसे कहने लगा॥ ५९–६० १/२ ॥
प्रधान उवाच<br>कासि त्वं मधुरालापे किमत्रागमनं कृतम् ॥ ६१प्रधान बोला—हे मधुरभाषिणि! तुम कौन हो और यहाँ क्यों आयी हो? हे महाभागे! मेरे मुखसे ऐसा कहलाकर मेरे स्वामीने तुमसे यह बात पूछी है॥ ६१ १/२ ॥
पृच्छति त्वां महाभागे मन्मुखेन मम प्रभुः।<br>स जेता सर्वदेवानाभवध्यस्तु नरैः किल ॥ ६२<br><br>ब्रह्मणो वरदानेन गर्वितश्चारुलोचने।<br>दैत्येश्वरोऽसौ बलवान्कामरूपधरः सदा ॥ ६३उन्होंने समस्त देवताओंको जीत लिया है और वे मनुष्योंसे अवध्य हैं। हे चारुलोचने! ब्रह्माजीसे वरदान पानेके कारण वे बहुत गर्वयुक्त रहते हैं। वे दैत्यराज महिष बड़े बलवान् हैं और अपनी इच्छाके अनुसार वे सदा विविध रूप धारण कर सकते हैं॥ ६२–६३॥
श्रुत्वा त्वां समुपायातां चारुवेषां मनोहराम्।<br>द्रष्टुमिच्छति राजा मे महिषो नाम पार्थिवः ॥ ६४<br><br>मानुषं रूपमादाय त्वत्समीपं समेष्यति।<br>यथा रुच्येत चार्वङ्गि तथा मन्यामहे वयम् ॥ ६५सुन्दर वेष तथा मनोहर विग्रहवाली आप यहाँ आयी हुई हैं—ऐसा सुनकर मेरे प्रभु महाराज महिषासुर आपको देखना चाहते हैं। वे मनुष्यका रूप धारण करके आपके पास आयेंगे। हे सुन्दर अंगोंवाली! आपकी जो इच्छा होगी, हम उसीको मान लेंगे॥ ६४–६५॥
तर्हीहि मृगशावाक्षि समीपं तस्य धीमतः।<br>नो चेदिहानयाम्येनं राजानं भक्तितत्परम् ॥ ६६हे बालमृगके समान नेत्रोंवाली! अब आप उन बुद्धिमान् राजा महिषके पास चलें और नहीं तो मैं स्वयं जाकर आपके प्रेममें लीन राजा महिषको यहाँ ले आऊँ॥ ६६॥

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]— 19 B

अथ दशमोऽध्यायः

अ० १० ]पञ्चम स्कन्ध५७९

| तथा करोमि देवेशि यथा ते मनसेप्सितम्।<br>वशगोऽसौ तवात्यर्थं रूपसंश्रवणात्तव ॥ ६७<br><br>करभोरु वदाशु त्वं संविधेयं मया तथा॥ ६८ | हे देवेशि! आपके मनमें जैसी इच्छा होगी, मैं वही करूँगा। आपके रूपके विषयमें सुनकर वे पूर्णरूपसे आपके वशवर्ती हो गये हैं। हे करभोरु! आप शीघ्र बताएँ; मैं उसीके अनुसार कार्य करूँगा॥ ६७-६८॥ |

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे महिषमन्त्रिणा देवीवार्तावर्णनं नाम नवमोऽध्यायः॥ ९॥


अथ दशमोऽध्यायः

देवीद्वारा महिषासुरके अमात्यको अपना उद्देश्य बताना तथा अमात्यका वापस लौटकर देवीद्वारा कही गयी बातें महिषासुरको बताना

व्यास उवाच<br>इति तस्य वचः श्रुत्वा प्रहस्य प्रमदोत्तमा।<br>तमुवाच महाराज मेघगम्भीरया गिरा॥ १व्यासजी बोले—हे महाराज! उसकी यह बात सुनकर नारीश्रेष्ठ भगवती जोरसे हँसकर मेघके समान गम्भीर वाणीमें उससे कहने लगीं॥ १॥
देव्युवाच<br>मन्त्रिवर्य सुराणां वै जननीं विद्धि मां किल।<br>महालक्ष्मीमिति ख्यातां सर्वदैत्यनिषूदिनीम्॥ २देवी बोलीं— हे मन्त्रिवर! मुझे देवमाताके रूपमें जानो। मैं सभी दैत्योंका नाश करनेवाली तथा महालक्ष्मी नामसे विख्यात हूँ॥ २॥
प्रार्थिताहं सुरैः सर्वैर्महिषस्य वधाय च।<br>पीडितैर्दानवेन्द्रेण यज्ञभागबहिष्कृतैः॥ ३<br><br>तस्मादिहागतास्म्यद्य तद्वधार्थं कृतोद्यमा।<br>एकाकिनी न सैन्येन संयुता मन्त्रिसत्तम॥ ४दानवेन्द्र महिषासुरसे पीड़ित और यज्ञभागसे बहिष्कृत सभी देवताओंने उसके संहारके लिये मुझसे प्रार्थना की है। हे मन्त्रिश्रेष्ठ! इसलिये उसके वधके लिये पूर्णरूपसे तत्पर होकर मैं बिना किसी सेनाके अकेली ही आज यहाँ आयी हूँ॥ ३-४॥
यत्त्वयाहं सामपूर्वं कृत्वा स्वागतमादरात्।<br>उक्ता मधुरया वाचा तेन तुष्टास्मि तेऽनघ॥ ५<br><br>नोचेद्धन्मि दृशा त्वां वै कालाग्निसमया किल।<br>कस्य प्रीतिकरं न स्यान्माधुर्यवचनं खलु॥ ६हे अनघ! तुमने जो शान्तिपूर्वक आदरके साथ मेरा स्वागत करके मधुर वाणीमें मुझसे बात की है, उससे मैं बहुत प्रसन्न हूँ; अन्यथा अपनी कालाग्निके समान दृष्टिसे तुम्हें भस्म कर देती। मधुरतासे युक्त वचन भला किसके लिये प्रीतिकारक नहीं होता!॥ ५-६॥
गच्छ तं महिषं पापं वद मद्द्वचनादिदम्।<br>गच्छ पातालमधुना जीवितेच्छा यदस्ति ते॥ ७<br><br>नोचेत्कृतागसं दुष्टं हनिष्यामि रणाङ्गणे।<br>मद्बाणक्षुण्णदेहस्त्वं गन्तासि यमसादनम्॥ ८अब तुम जाओ और मेरे शब्दोंमें उस पापी महिषासुरसे कह दो—यदि तुम्हें जीवित रहनेकी अभिलाषा हो तो अभी पाताललोकमें चले जाओ, नहीं तो मैं तुझ पापी तथा दुष्टको रणभूमिमें मार डालूँगी। मेरे बाणोंसे छिन्न-भिन्न शरीरवाले होकर तुम यमपुरी चले जाओगे॥ ७-८॥
दयालुत्वं ममेदं त्वं विदित्वा गच्छ सत्वरम्।<br>हते त्वयि सुरा मूढ स्वर्गं प्राप्स्यन्ति सत्वरम्॥ ९हे मूर्ख! इसे मेरी दयालुता समझकर तुम यहाँसे शीघ्र चले जाओ, नहीं तो तुम्हारे मार दिये जानेपर देवतागण निश्चय ही तत्काल स्वर्गका राज्य पा

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—19 C

५८०श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १०

| तस्माद् गच्छस्व त्यक्त्वैको मेदिनीञ्च ससागराम् ।<br>पातालं तरसा मन्द यावद् बाणा न मेऽपतन् ॥ ९० | जायँगे। इसलिये हे दुष्ट! जबतक मेरे बाण तुझपर नहीं गिरते, उसके पूर्व ही तुम शीघ्रतापूर्वक समुद्रसहित पृथ्वीका त्याग करके पाताललोक चले जाओ॥ ९-१०॥ | | युद्धेच्छा चेन्मनसि ते तर्होहि त्वरितोऽसुर ।<br>वीरैर्महाबलैः सर्वैर्नयामि यमसादनम् ॥ ९१ | हे असुर! यदि तुम्हारे मनमें युद्धकी इच्छा हो तो अपने सभी महाबली वीरोंको साथ लेकर शीघ्र आ जाओ। मैं सबको यमपुरी पहुँचा दूँगी॥ ९१॥ | | युगे युगे महामूढ हतास्त्वत्सदृशाः किल ।<br>असंख्यातास्तथा त्वां वै हनिष्यामि रणाङ्गणे ॥ ९२<br><br>साफल्यं कुरु शस्त्राणां धारणे तु श्रमोऽन्यथा ।<br>तद्युध्यस्व मया सार्धं समरे स्मरपीडितः ॥ ९३ | हे महामूढ! मैंने युग-युगमें तुम्हारे-जैसे असंख्य दैत्योंका संहार किया है, उसी प्रकार मैं तुम्हें भी रणमें मार डालूँगी। [मेरा सामना करके] तुम मेरे शस्त्र धारण करनेके परिश्रमको सफल करो, नहीं तो यह श्रम व्यर्थ हो जायगा। कामपीड़ित तुम रणभूमिमें मेरे साथ युद्ध करो॥ ९२-९३॥ | | मा गर्वं कुरु दुष्टात्मन् यन्मेऽस्ति ब्रह्मणो वरः ।<br>स्त्रीवध्यत्वे त्वया मूढ पीडिताः सुरसत्तमाः ॥ ९४ | हे दुरात्मन्! तुम इस बातपर अभिमान मत करो कि मुझे ब्रह्माका वर प्राप्त हो गया है। हे मूढ़! केवल स्त्रीके द्वारा वध्य होनेके कारण तुमने श्रेष्ठ देवताओंको बहुत पीड़ित किया है॥ ९४॥ | | कर्तव्यं वचनं धातुस्तेनाहं त्वामुपागता ।<br>स्त्रीरूपमतुलं कृत्वा सत्यं हन्तुं कृतागसम् ॥ ९५<br><br>यथेच्छं गच्छ वा मूढ पातालं पन्नगावृत्तम् ।<br>हित्वा भूसुरसद्माद्य जीवितेच्छा यदस्ति ते ॥ ९६ | अतः ब्रह्माजीका वचन सत्य करना है, इसीलिये स्त्रीका अनुपम रूप धारण करके मैं तुझ पापीका संहार करनेके लिये यहाँ आयी हूँ। हे मूढ़! यदि जीवित रहनेकी तुम्हारी इच्छा हो तो इसी समय देवलोक छोड़कर तुम सर्पोंसे भरे पाताललोकको अथवा जहाँ तुम्हारी इच्छा हो वहाँ चले जाओ॥ ९५-९६॥ | | व्यास उवाच<br>इत्युक्तः स ततो देव्या मन्त्रिश्रेष्ठो बलान्वितः ।<br>प्रत्युवाच निशम्यासौ वचनं हेतुगर्भितम् ॥ ९७ | **व्यासजी बोले—**देवीने उससे ऐसा कहा, तब उनकी बात सुनकर वह पराक्रमशाली मन्त्रिश्रेष्ठ उनसे सारगर्भित वचन कहने लगा— ॥ ९७॥ | | देवि स्त्रीसदृशं वाक्यं ब्रूषे त्वं मदगर्विता ।<br>क्वासौ क्व त्वं कथं युद्धमसम्भाव्यमिदं किल ॥ ९८ | हे देवि! आप अभिमानमें चूर होकर एक साधारण स्त्रीके समान बात कर रही हैं। कहाँ वे महिषासुर और कहाँ आप, यह युद्ध तो असम्भव ही दीखता है॥ ९८॥ | | एकाकिनी पुनर्बाला प्रारब्धयौवना मृदुः ।<br>महिषोऽसौ महाकायो दुर्विभाव्यं हि सङ्गतम् ॥ ९९ | आप यहाँ अकेली हैं और उसपर भी सद्यः युवावस्थाको प्राप्त सुकुमार बाला हैं। [इसके विपरीत] वे महिषासुर विशाल शरीरवाले हैं; ऐसी स्थितिमें उनकी और आपकी तुलना कल्पनातीत है॥ ९९॥ | | सैन्यं बहुविधं तस्य हस्त्यश्वरथसंकुलम् ।<br>पदातिगणसंविद्धं नानायुधविराजितम् ॥ २० | उनके पास हाथी-घोड़े और रथसे परिपूर्ण, पैदल सैनिकोंसे सम्पन्न तथा अनेक प्रकारके आयुधोंसे सज्जित अनेक प्रकारकी सेना है॥ २०॥ |

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ] — 19 D

| अ० १० ] | पञ्चम स्कन्ध | ५८१ | | :--- | :--- |

| कः श्रमः करिराजस्य मालतीपुष्पमर्दने।<br>मारणे तव वामोरु महिषस्य तथा रणे॥ २१ | मालतीके पुष्पोंको कुचल डालनेमें गजराजको भला कौन-सा परिश्रम करना पड़ता है। हे सुजघने! उसी प्रकार युद्धमें आपको मारनेमें महिषासुरको कुछ भी प्रयास नहीं करना पड़ेगा॥ २१॥ | | यदि त्वां परुषं वाक्यं ब्रवीमि स्वल्पमप्यहम्।<br>शृङ्गारे तद्विरुद्धं हि रसभङ्गाद् बिभेम्यहम्॥ २२ | यदि मैं आपको थोड़ा भी कठोर वचन कह दूँ तो वह शृंगाररसके विरुद्ध होगा; और मैं रसभंगसे डरता हूँ॥ २२॥ | | राजास्माकं सुररिपुर्वर्तते त्वयि भक्तिमान्।<br>साममेव मया वाच्यं दानयुक्तं तथा वचः॥ २३<br><br>नोचेद्धन्म्यहमद्यैव बाणेन त्वां मृषावदाम्।<br>मिथ्याभिमानचतुरां रूपयौवनगर्विताम्॥ २४ | हमारे राजा महिषासुर देवताओंके शत्रु हैं, किंतु वे आपके प्रति अनुरागयुक्त हैं। [मेरे राजाने कहा है कि] मैं आपसे साम तथा दाननीतियोंसे पूर्ण वचन ही बोलूँ, अन्यथा मैं झूठ बोलनेवाली, मिथ्या अभिमानमें भरकर चतुरता दिखानेवाली और रूप तथा यौवनके अभिमानमें चूर रहनेवाली आपको इसी समय अपने बाणसे मार डालता॥ २३-२४॥ | | स्वामी मे मोहितः श्रुत्वा रूपं ते भुवनातिगम्।<br>तत्प्रियार्थं प्रियं कामं वक्तव्यं त्वयि यन्मया॥ २५ | आपके अलौकिक रूपके विषयमें सुनकर मेरे स्वामी मोहित हो गये हैं। उनकी प्रसन्नताके लिये ही मुझे प्रिय वचन बोलना पड़ रहा है॥ २५॥ | | राज्यं तव धनं सर्वं दासस्ते महिषः किल।<br>कुरु भावं विशालाक्षि त्यक्त्वा रोषं मृतिप्रदम्॥ २६ | उनका सम्पूर्ण राज्य तथा धन आपका है; क्योंकि वे महाराज महिषासुर निश्चय ही आपके दास हो चुके हैं। अतः हे विशालनयने! इस मृत्युदायक रोषका त्याग करके उनके प्रति प्रेमभाव प्रदर्शित कीजिये॥ २६॥ | | पतामि पादयोस्तेऽहं भक्तिभावेन भामिनि।<br>पट्टराज्ञी महाराज्ञो भव शीघ्रं शुचिस्मिते॥ २७ | हे भामिनि! मैं भक्तिभावसे आपके चरणोंपर गिर रहा हूँ। हे पवित्र मुसकानवाली! आप शीघ्र ही महाराज महिषकी पटरानी बन जाइये॥ २७॥ | | त्रैलोक्यविभवं सर्वं प्राप्स्यसि त्वमनाविलम्।<br>सुखं संसारजं सर्वं महिषस्य परिग्रहात्॥ २८ | महिषासुरको स्वीकार कर लेनेसे आपको तीनों लोकोंका सम्पूर्ण उत्तम वैभव तथा समस्त सांसारिक सुख प्राप्त हो जायगा॥ २८॥ | | देव्युवाच<br>शृणु सचिव वक्ष्यामि वाक्यानां सारमुत्तमम्।<br>शास्त्रदृष्टेन मार्गेण चातुर्यमनुचिन्त्य च॥ २९ | देवी बोलीं—हे सचिव! सुनो, मैं बुद्धिचातुर्यसे सम्यक् विचार करके तथा शास्त्रप्रतिपादित मार्गसे निर्णय करके सारभूत बातें बताऊँगी॥ २९॥ | | महिषस्य प्रधानस्त्वं मया ज्ञातं धिया किल।<br>पशुबुद्धिस्वभावोऽसि वचनात्तव साम्प्रतम्॥ ३० | तुम्हारी बातोंसे मैंने अपनी बुद्धिद्वारा जान लिया कि तुम महिषासुरके प्रधानमन्त्री हो और तुम भी [उसीकी तरह] पशुबुद्धिस्वभाववाले हो॥ ३०॥ | | मन्त्रिणस्त्वादृशा यस्य स कथं बुद्धिमान्भवेत्।<br>उभयोः सदृशो योगः कृतोऽयं विधिना किल॥ ३१ | जिस राजाके तुम्हारे-जैसे मन्त्री हों, वह बुद्धिमान् कैसे हो सकता है? ब्रह्माने निश्चय ही तुम दोनोंका यह समान योग रचा है॥ ३१॥ |

५८२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १०

५८२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १०

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
यदुक्तं स्त्रीस्वभावासि तद्विचारय मूढ किम्।<br>पुमान्नाहं तत्स्वभावाभवं स्त्रीवेषधारिणी॥ ३२हे मूर्ख! तुमने जो यह कहा कि 'तुम स्त्रीस्वभाववाली हो', तो अब तुम इस बातपर जरा विचार करो कि क्या मैं पुरुष नहीं हूँ? वस्तुतः उसीके स्वभाववाली मैं इस समय स्त्रीवेषधारिणी हो गयी हूँ॥ ३२॥
याचितं मरणं पूर्वं स्त्रिया त्वत्प्रभुणा यथा।<br>तस्मान्मन्येऽतिमूढोऽसौ न वीररसवित्तमः॥ ३३तुम्हारे स्वामी महिषासुरने पूर्वकालमें जो स्त्रीसे मारे जानेका वरदान माँगा था, उसीसे मैं समझती हूँ कि वह महामूर्ख है। वह वीररसका थोड़ा भी जानकार नहीं है॥ ३३॥
कामिन्या मरणं क्लीबरतिदं शूरदुःखदम्।<br>प्रार्थितं प्रभुणा तेन महिषेणात्मबुद्धिना॥ ३४<br><br>तस्मात्स्त्रीरूपमाधाय कार्यं कर्तुमुपागता।<br>कथं बिभेमि त्वद्वाक्यैर्धर्मशास्त्रविरोधकैः॥ ३५स्त्रीके द्वारा मारा जाना पराक्रमहीनके लिये भले ही सुखकर हो, किंतु वीरके लिये यह कष्टप्रद होता है। महिषकी अपनी जो बुद्धि हो सकती है, उसीके अनुसार तुम्हारे स्वामीने ऐसा वरदान माँगा। इसीलिये मैं स्त्री-रूप धारण करके अपना कार्य सिद्ध करनेके लिये यहाँ आयी हूँ। मैं तुम्हारे धर्मशास्त्र-विरोधी वचनोंसे क्यों डरूँ?॥ ३४-३५॥
विपरीतं यदा दैवं तृणं वज्रसमं भवेत्।<br>विधिश्चेत्सुमुखः कामं कुलिशं तूलवत्तदा॥ ३६जब दैव प्रतिकूल होता है, तब एक तिनका भी वज्र-तुल्य हो जाता है और जब वह दैव अनुकूल होता है, तब वज्र भी तूल (रूई)-के समान कोमल हो जाता है॥ ३६॥
किं सैन्यैरायुधैः किं वा प्रपञ्चैर्दुर्गसेवनैः।<br>मरणं साम्प्रतं यस्य तस्य सैन्यैस्तु किं फलम्॥ ३७जिसकी मृत्यु सन्निकट हो उसके लिये सेना, अस्त्र-शस्त्र तथा किलेकी सुरक्षा, सैन्यबल आदि प्रपंचोंसे क्या लाभ!॥ ३७॥
यदायं देहसम्बन्धो जीवस्य कालयोगतः।<br>तदैव लिखितं सर्वं सुखं दुःखं तथा मृतिः॥ ३८<br><br>यस्य येन प्रकारेण मरणं दैवनिर्मितम्।<br>तस्य तेनैव जायेत नान्यथेति विनिश्चयः॥ ३९जब कालयोगसे देहके साथ जीवका सम्बन्ध स्थापित होता है, उसी समय विधाताके द्वारा सुख, दुःख तथा मृत्यु—सब कुछ निर्धारित कर दिया जाता है। दैवने जिस प्राणीकी मृत्यु जिस प्रकारसे निश्चित कर दी है, उसकी मृत्यु उसी प्रकारसे होगी, इसके विपरीत नहीं; यह पूर्ण सत्य है॥ ३८-३९॥
ब्रह्मादीनां यथा काले नाशोत्पत्ती विनिर्मिते।<br>तथैव भवतः कामं किमन्येषां विचार्यते॥ ४०<br><br>ये मृत्युधर्मिणस्तेषां वरदानेन दर्पिताः।<br>मरिष्यामो न मन्यन्ते ते मूढा मन्दचेतसः॥ ४१जिस प्रकारसे ब्रह्मा आदि देवताओंके भी जन्म और मृत्यु सुनिश्चित किये गये रहते हैं, समय आनेपर उसी प्रकारसे उनका भी जन्म-मरण होता है तब अन्य लोगोंके विषयमें विचार ही क्या! उन ब्रह्मा आदि मरणधर्माके वरदानसे गर्वित होकर जो लोग यह समझते हैं कि 'हम नहीं मरेंगे' वे मूर्ख तथा अल्पबुद्धिवाले हैं॥ ४०-४१॥

अ० १०] पञ्चम स्कन्ध ५८३

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तस्माद् गच्छ नृपं ब्रूहि वचनं मम सत्वरम्।<br>यदाज्ञापयते भूपस्तत्कर्तव्यं त्वया किल॥ ४२<br><br>मघवा स्वर्गमाप्नोतु देवाः सन्तु हविर्भुजः।<br>यूयं प्रयात पातालं यदि जीवितुमिच्छथ॥ ४३<br><br>अन्यथा चेन्मतिर्मन्द महिषस्य दुरात्मनः।<br>तद्युध्यस्व मया सार्धं मरणाय कृतादरः॥ ४४अतएव अब तुम शीघ्र जाओ और अपने राजासे मेरी बात कह दो। इसके बाद तुम्हारे राजा जैसी आज्ञा दें, तुम वैसा करो। इन्द्रको स्वर्ग प्राप्त हो जाय और देवताओंको यज्ञका भाग मिलने लगे। तुमलोग यदि जीवित रहना चाहते हो, तो पाताललोक चले जाओ और हे मूर्ख! यदि दुष्टात्मा महिषासुरका विचार विपरीत हो, तो वह मरनेके लिये तैयार होकर मेरे साथ युद्ध करे॥ ४२—४४॥
मन्यसे सङ्गरे भग्ना देवा विष्णुपुरोगमाः।<br>दैवं हि कारणं तत्र वरदानं प्रजापतेः॥ ४५यदि तुम यह मानते हो कि विष्णु आदि प्रधान देवता तो युद्धमें पहले ही परास्त किये जा चुके हैं, तो उस समय उसका कारण था—विपरीत भाग्य तथा ब्रह्माजीका वरदान॥ ४५॥
व्यास उवाच<br>इति देव्या वचः श्रुत्वा चिन्तयामास दानवः।<br>किं कर्तव्यं मया युद्धं गन्तव्यं वा नृपं प्रति॥ ४६व्यासजी बोले—देवीका यह वचन सुनकर वह दानव सोचने लगा—अब मुझे क्या करना चाहिये? मैं इसके साथ युद्ध करूँ या राजा महिषके पास लौट चलूँ॥ ४६॥
विवाहार्थमिहाज्ञप्तो राज्ञा कामातुरेण वै।<br>तत्कथं विरसं कृत्वा गच्छेयं नृपसन्निधौ॥ ४७[किंतु यह भी है कि] कामातुर महाराज महिषने विवाहके लिये [उसे राजी करनेकी] मुझे आज्ञा दी है तो फिर रसभंग करके मैं राजाके पास लौटकर कैसे जाऊँ?॥ ४७॥
इयं बुद्धिः समीचीना यद् व्रजामि कलिं विना।<br>यथागतं तथा शीघ्रं राज्ञे संवेदयाम्यहम्॥ ४८<br><br>स प्रमाणं पुनः कार्ये राजा मतिमतां वरः।<br>करिष्यति विचार्यैव सचिवैर्निपुणैः सह॥ ४९अन्तमें अब मुझे यही विचार उचित प्रतीत होता है कि बिना युद्ध किये ही राजाके पास शीघ्र चला जाऊँ और जैसा सामने उपस्थित है, वैसा उनको बता दूँ। उसके बाद बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ राजा महिष अपने चतुर मन्त्रियोंसे विचार-विमर्श करके जो उचित समझेंगे, उसे करेंगे॥ ४८-४९॥
सहसा न मया युद्धं कर्तव्यमनया सह।<br>जये पराजये वापि भूपतेरप्रियं भवेत्॥ ५०मुझे अचानक इस स्त्रीके साथ युद्ध नहीं करना चाहिये; क्योंकि जय अथवा पराजय—इन दोनोंमें राजाका अप्रिय हो सकता है॥ ५०॥
यदि मां सुन्दरी हन्यादहं वा हन्मि तां पुनः।<br>येन केनाप्युपायेन स कुप्येत्पार्थिवः किल॥ ५१<br><br>तस्मात्तत्रैव गत्वाहं बोधयिष्यामि तं नृपम्।<br>यथाद्याभिहितं देव्या यथारुचि करोतु सः॥ ५२यदि यह सुन्दरी मुझे मार डाले अथवा मैं ही जिस किसी उपायसे इसको मार डालूँ, तब भी राजा महिष निश्चितरूपसे कुपित होंगे। अतः अब मैं वहींपर चलकर इस सुन्दरीके द्वारा आज जो कुछ कहा गया है, वह सब राजा महिषको बता दूँगा। तत्पश्चात् उनकी जैसी रुचि होगी, वैसा वे करेंगे॥ ५१-५२॥

| ५८४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १० | | :--- | :--- |

| व्यास उवाच<br>इति सञ्चिन्त्य मेधावी जगाम नृपसन्निधौ।<br>प्रणम्य तमुवाचेदं कृताञ्जलिरमात्यकः॥ ५३ | **व्यासजी बोले—**ऐसा विचार करके वह बुद्धिमान् मन्त्री राजा (महिष)-के पास गया और उसे प्रणामकर दोनों हाथ जोड़कर कहने लगा— ॥ ५३॥ | | मन्त्र्युवाच<br>राजन् देवी वरारोहा सिंहस्योपरि संस्थिता।<br>अष्टादशभुजा रम्या वरायुधधरा परा॥ ५४ | **मन्त्री बोला—**हे राजन्! सुन्दर रूपवाली वह देवी सिंहपर आरूढ़ है, उस मनोहर देवीकी अठारह भुजाएँ हैं और उस श्रेष्ठ देवीने उत्तम कोटिके आयुध धारण कर रखे हैं॥ ५४॥ | | सा मयोक्ता महाराज महिषं भज भामिनि।<br>महिषी भव राज्ञस्त्वं त्रैलोक्याधिपतेः प्रिया॥ ५५<br><br>पट्टराज्ञी त्वमेवास्य भविता नात्र संशयः।<br>स तवाज्ञाकरो जातो वशवर्ती भविष्यति॥ ५६<br><br>त्रैलोक्यविभवं भुक्त्वा चिरकालं वरानने।<br>महिषं पतिमासाद्य योषितां सुभगा भव॥ ५७ | हे महाराज! मैंने उससे कहा—हे भामिनि! तुम राजा महिषसे प्रेम कर लो और तीनों लोकोंके स्वामी उन महाराजकी प्रिय पटरानी बन जाओ। केवल तुम्हीं उनकी पटरानी बननेयोग्य हो; इसमें कोई संशय नहीं है। वे तुम्हारे आज्ञाकारी बनकर सदा तुम्हारे अधीन रहेंगे। हे सुमुखि! महाराज महिषको पतिरूपमें प्राप्त करके तुम चिरकालतक तीनों लोकोंके ऐश्वर्यका उपभोगकर समस्त स्त्रियोंमें सौभाग्यवती बन जाओ॥ ५५–५७॥ | | इति मद्वचनं श्रुत्वा सा स्मयावेशमोहिता।<br>मामुवाच विशालाक्षी स्मितपूर्वमिदं वचः॥ ५८<br><br>महिषीगर्भसम्भूतं पशूनामधमं किल।<br>बलिं दास्याम्यहं देव्यै सुराणां हितकाम्यया॥ ५९ | मेरा यह वचन सुनकर विशाल नयनोंवाली वह सुन्दरी गर्वके आवेगसे विमोहित होकर मुसकराती हुई मुझसे यह बात बोली—मैं देवताओंका हित करनेके विचारसे महिषीके गर्भसे उत्पन्न उस अधम पशु (महिष)-को देवीके लिये बलि चढ़ा दूँगी॥ ५८-५९॥ | | का मूढा कामिनी लोके महिषं वै पतिं भजेत्।<br>मादृशी मन्दबुद्धे किं पशुभावं भजेदिह॥ ६० | हे मन्दबुद्धे! इस संसारमें भला कौन मूर्ख स्त्री महिषको पतिरूपमें स्वीकार कर सकती है? क्या मुझ-जैसी स्त्री पशुस्वभाववाले उस महिषासुरसे प्रेम कर सकती है?॥ ६०॥ | | महिषी महिषं नाथं सश्रृङ्गा शृङ्गसंयुतम्।<br>कुरुते क्रन्दमाना वै नाहं तत्सदृशी शठा॥ ६१<br><br>करिष्येऽहं मृधे युद्धं हनिष्ये त्वां सुराप्रियम्।<br>गच्छ वा दुष्ट पातालं जीवितेच्छा यदस्ति ते॥ ६२ | हे मूर्ख! सींगवाली तथा जोर-जोरसे चिल्लानेवाली कोई महिषी ही उस श्रृंगधारी महिषको अपना पति बना सकती है; किंतु मैं वैसी मूर्ख नहीं हूँ। [देवीने पुनः कहलाया है] मैं तो देवताओंके शत्रु तुझ महिषासुरके साथ रणक्षेत्रमें युद्ध करूँगी और तुम्हें मार डालूँगी। हे दुष्ट! यदि जीवित रहनेकी तुम्हारी इच्छा है, तो अभी पाताललोक चले जाओ॥ ६१-६२॥ | | परुषं तु तया वाक्यमित्युक्तं नृप मत्तया।<br>तच्छ्रुत्वाहं समायातः प्रविचिन्त्य पुनः पुनः॥ ६३ | हे राजन्! उस मदमत्त स्त्रीने ऐसी बहुत कठोर बात मुझसे कही। उसे सुनकर बार-बार विचार करनेके बाद मैं यहाँ लौट आया हूँ॥ ६३॥ |

अ० ११]पञ्चम स्कन्ध५८५
रसभङ्गं विचिन्त्यैव न युद्धं तु मया कृतम्।<br>आज्ञां विना तवात्यन्तं कथं कुर्यां वृथोद्यमम्॥ ६४आपका रसभंग न हो—यह सोचकर मैंने उसके साथ युद्ध नहीं किया और फिर आपकी आज्ञाके बिना मैं व्यर्थ ही युद्ध कैसे कर सकता था? ॥ ६४॥
सातीव च बलोन्मत्ता वर्तते भूप भामिनी।<br>भवितव्यं न जानामि किं वा भावि भविष्यति॥ ६५हे राजन्! वह स्त्री सदा अपने बलसे अत्यन्त उन्मत्त रहती है। होनीके विषयमें मैं नहीं जानता; आगे न जाने क्या होगा! इस विषयमें आप ही प्रमाण हैं। इसमें परामर्श देना मेरे लिये अत्यन्त कठिन है। इस समय हमारे लिये युद्ध करना अथवा पलायन कर जाना—इन दोनोंमें कौन श्रेयस्कर होगा, इसका निर्णय मैं नहीं कर पा रहा हूँ॥ ६५-६६॥
कार्येऽस्मिंस्त्वं प्रमाणं नो मन्त्रोऽतीव दुरासदः।<br>युद्धं पलायनं श्रेयो न जानेऽहं विनिश्चयम्॥ ६६

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे मन्त्रीद्वारा महिषासुरेण देव्या सह विवाहप्रस्तावो नाम दशमोऽध्यायः॥ १०॥
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अथैकादशोऽध्यायः

महिषासुरका अपने मन्त्रियोंसे विचार-विमर्श करना और ताम्रको भगवतीके पास भेजना

व्यास उवाच<br>इति तस्य वचः श्रुत्वा महिषो मदविह्वलः।<br>मन्त्रिवृद्धान् समाहूय राजा वचनमब्रवीत्॥ १व्यासजी बोले—मन्त्रीकी यह बात सुनकर मदोन्मत्त राजा महिषासुर अपने वयोवृद्ध मन्त्रियोंको बुलाकर उनसे यह वचन कहने लगा॥ १॥
राजोवाच<br>मन्त्रिणः किं च कर्तव्यं विश्रब्धं ब्रूत मा चिरम्।<br>आगता देवविहिता मायेयं शाम्बरीव किम्॥ २राजा बोला—हे मन्त्रिगण! आपलोग निर्भीकता-पूर्वक मुझे शीघ्र बतायें कि इस समय मुझे क्या करना चाहिये? आपलोग इस कार्यमें प्रवीण हैं, साथ ही साम तथा दण्ड आदि नीतियोंमें भी कुशल हैं। कहीं देवताओंके द्वारा रची गयी शाम्बरी मायाके रूपमें तो यह नहीं आयी हुई है? अतः आपलोग मुझे यह बतायें कि इस समय किस नीतिका सहारा लिया जाय? ॥ २-३॥
कार्येऽस्मिन्निपुणा यूयमुपायेषु विचक्षणाः।<br>सामादिषु च कर्तव्यः कोऽत्र मह्यं ब्रुवन्तु च॥ ३
मन्त्रिण ऊचुः<br>सत्यं सदैव वक्तव्यं प्रियञ्च नृपसत्तम।<br>कार्यं हितकरं नूनं विचार्य विबुधैः किल॥ ४मन्त्रिगण बोले—हे नृपश्रेष्ठ! बुद्धिमान् लोगोंको सदा सत्य और प्रिय बोलना चाहिये तथा सम्यक् विचार करके हितकर कार्य करना चाहिये॥ ४॥
सत्यं च हितकृद्राजन्नप्रियं चाहितकृद्भवेत्।<br>यथौषधं नृणां लोके ह्यप्रियं रोगनाशनम्॥ ५हे राजन्! सत्य वचन कल्याणकारी होता है और प्रिय वचन [प्रायः] अहितकर होता है। इस लोकमें अप्रिय वचन भी मनुष्योंके लिये उसी प्रकार हितकारक होता है, जैसे औषधि अरुचिकर होते हुए भी मनुष्योंके रोगोंका नाश करनेवाली होती है॥ ५॥
सत्यस्य श्रोता मन्ता च दुर्लभः पृथिवीपते।<br>वक्तापि दुर्लभः कामं बहवश्चाटुभाषकाः॥ ६हे पृथिवीपते! सत्य बातको सुनने तथा माननेवाला दुर्लभ है। सत्य बोलनेवाला तो परम दुर्लभ है; किंतु चाटुकारितापूर्ण बातें करनेवाले बहुत-से लोग हैं॥ ६॥

| ५८६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ११ | | :--- | :--- |

| कथं ब्रूमोऽत्र नृपते विचारे गहने त्विह।<br>शुभं वाप्यशुभं वापि को वेत्ति भुवनत्रये॥ ७ | हे राजन्! इस गूढ़ विषयमें हमलोग कुछ कैसे कह सकते हैं, और फिर इस त्रिलोकीमें भविष्यमें होनेवाले शुभ अथवा अशुभ परिणामके विषयमें कौन जान सकता है?॥७॥ | | राजोवाच<br>स्वस्वमत्यनुसारेण ब्रुवन्त्वद्य पृथक्पृथक्।<br>येषां हि यादृशो भावस्तच्छ्रुत्वा चिन्तयाम्यहम्॥ ८<br>बहूनां मतमाज्ञाय विचार्य च पुनः पुनः।<br>यच्छ्रेयस्तद्धि कर्तव्यं कार्यं कार्यविचक्षणैः॥ ९ | राजा बोला—आपलोग अपनी-अपनी बुद्धिके अनुसार अलग-अलग विचार प्रकट करें। जिसका जो भाव होगा, उसे सुनकर मैं स्वयं विचार करूँगा; क्योंकि बुद्धिमान् पुरुषोंको चाहिये कि अनेक लोगोंके मन्तव्य सुनकर और फिर उनपर बार-बार विचार करके उनमेंसे अपने लिये जो कल्याणप्रद हो, उसी कामको करें॥८-९॥ | | व्यास उवाच<br>तस्यैवं वचनं श्रुत्वा विरूपाक्षो महाबलः।<br>उवाच तरसा वाक्यं रञ्जयन्पृथिवीपतिम्॥ १० | व्यासजी बोले—उसकी यह बात सुनकर महाबली विरूपाक्ष राजा महिषको प्रसन्न करते हुए शीघ्र कहने लगा॥१०॥ | | विरूपाक्ष उवाच<br>राजनारी वराकीयं सा ब्रूते मदगर्विता।<br>विभीषिकामात्रमिदं ज्ञातव्यं वचनं त्वया॥ ११ | विरूपाक्ष बोला—हे राजन्! वह बेचारी स्त्री मदमत्त होकर जो कुछ बोल रही है, उन बातोंको आप केवल धमकीभर समझें॥११॥ | | को बिभेति स्त्रियो वाक्यैर्दुरुक्तै रणदुर्मदैः।<br>अनृतं साहसं चेति जानन्नारीविचेष्टितम्॥ १२ | यह जानते हुए कि झूठ और साहस स्त्रियोंकी आदत होती है, भला कौन एक स्त्रीके कहे हुए युद्धोन्मादी कठोर वाक्योंसे डरेगा?॥१२॥ | | जित्वा त्रिभुवनं राजन्नद्य कान्ताभयेन वै।<br>दीनत्वेऽप्ययशो नूनं वीरस्य भुवने भवेत्॥ १३ | हे राजन्! तीनों लोकोंपर विजय प्राप्त करके भी आज आप स्त्रीके भयसे ग्रस्त हो गये हैं! उसकी अधीनता स्वीकार कर लेनेपर इस लोकमें अवश्य ही आप-जैसे वीरकी अपकीर्ति होगी॥१३॥ | | तस्माद्याम्यहमेकाकी युद्धाय चण्डिकां प्रति।<br>हनिष्ये तां महाराज निर्भयो भव साम्प्रतम्॥ १४ | अतएव हे महाराज! मैं अकेला ही उस चण्डिकासे युद्ध करनेके लिये जा रहा हूँ और उसे निश्चितरूपसे मार डालूँगा। अब आप भयमुक्त हो जायँ॥१४॥ | | सेनावृतोऽहं गत्वा तां शस्त्रास्त्रैर्विविधैः किल।<br>निषूदयामि दुर्मर्षां चण्डिकां चण्डविक्रमाम्॥ १५<br>बद्ध्वा सर्पमयैः पाशैरानयिष्ये तवान्तिकम्।<br>वशगा तु सदा ते स्यात्पश्य राजन् बलं मम॥ १६ | अपनी सेनाके साथ वहाँ जाकर अनेक प्रकारके शस्त्रास्त्रोंसे मैं उस दुःसह तथा प्रचण्ड पराक्रमसम्पन्न चण्डिकाका निश्चय ही वध कर दूँगा अथवा उसे नागपाशमें बाँधकर जीवित दशामें ही आपके पास ले आऊँगा, जिससे वह सदाके लिये आपकी वशवर्तिनी हो जाय। हे राजन्! अब आप मेरा पराक्रम देखिये॥१५-१६॥ |