देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ५८६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ११ | | :--- | :--- |
| कथं ब्रूमोऽत्र नृपते विचारे गहने त्विह।<br>शुभं वाप्यशुभं वापि को वेत्ति भुवनत्रये॥ ७ | हे राजन्! इस गूढ़ विषयमें हमलोग कुछ कैसे कह सकते हैं, और फिर इस त्रिलोकीमें भविष्यमें होनेवाले शुभ अथवा अशुभ परिणामके विषयमें कौन जान सकता है?॥७॥ | | राजोवाच<br>स्वस्वमत्यनुसारेण ब्रुवन्त्वद्य पृथक्पृथक्।<br>येषां हि यादृशो भावस्तच्छ्रुत्वा चिन्तयाम्यहम्॥ ८<br>बहूनां मतमाज्ञाय विचार्य च पुनः पुनः।<br>यच्छ्रेयस्तद्धि कर्तव्यं कार्यं कार्यविचक्षणैः॥ ९ | राजा बोला—आपलोग अपनी-अपनी बुद्धिके अनुसार अलग-अलग विचार प्रकट करें। जिसका जो भाव होगा, उसे सुनकर मैं स्वयं विचार करूँगा; क्योंकि बुद्धिमान् पुरुषोंको चाहिये कि अनेक लोगोंके मन्तव्य सुनकर और फिर उनपर बार-बार विचार करके उनमेंसे अपने लिये जो कल्याणप्रद हो, उसी कामको करें॥८-९॥ | | व्यास उवाच<br>तस्यैवं वचनं श्रुत्वा विरूपाक्षो महाबलः।<br>उवाच तरसा वाक्यं रञ्जयन्पृथिवीपतिम्॥ १० | व्यासजी बोले—उसकी यह बात सुनकर महाबली विरूपाक्ष राजा महिषको प्रसन्न करते हुए शीघ्र कहने लगा॥१०॥ | | विरूपाक्ष उवाच<br>राजनारी वराकीयं सा ब्रूते मदगर्विता।<br>विभीषिकामात्रमिदं ज्ञातव्यं वचनं त्वया॥ ११ | विरूपाक्ष बोला—हे राजन्! वह बेचारी स्त्री मदमत्त होकर जो कुछ बोल रही है, उन बातोंको आप केवल धमकीभर समझें॥११॥ | | को बिभेति स्त्रियो वाक्यैर्दुरुक्तै रणदुर्मदैः।<br>अनृतं साहसं चेति जानन्नारीविचेष्टितम्॥ १२ | यह जानते हुए कि झूठ और साहस स्त्रियोंकी आदत होती है, भला कौन एक स्त्रीके कहे हुए युद्धोन्मादी कठोर वाक्योंसे डरेगा?॥१२॥ | | जित्वा त्रिभुवनं राजन्नद्य कान्ताभयेन वै।<br>दीनत्वेऽप्ययशो नूनं वीरस्य भुवने भवेत्॥ १३ | हे राजन्! तीनों लोकोंपर विजय प्राप्त करके भी आज आप स्त्रीके भयसे ग्रस्त हो गये हैं! उसकी अधीनता स्वीकार कर लेनेपर इस लोकमें अवश्य ही आप-जैसे वीरकी अपकीर्ति होगी॥१३॥ | | तस्माद्याम्यहमेकाकी युद्धाय चण्डिकां प्रति।<br>हनिष्ये तां महाराज निर्भयो भव साम्प्रतम्॥ १४ | अतएव हे महाराज! मैं अकेला ही उस चण्डिकासे युद्ध करनेके लिये जा रहा हूँ और उसे निश्चितरूपसे मार डालूँगा। अब आप भयमुक्त हो जायँ॥१४॥ | | सेनावृतोऽहं गत्वा तां शस्त्रास्त्रैर्विविधैः किल।<br>निषूदयामि दुर्मर्षां चण्डिकां चण्डविक्रमाम्॥ १५<br>बद्ध्वा सर्पमयैः पाशैरानयिष्ये तवान्तिकम्।<br>वशगा तु सदा ते स्यात्पश्य राजन् बलं मम॥ १६ | अपनी सेनाके साथ वहाँ जाकर अनेक प्रकारके शस्त्रास्त्रोंसे मैं उस दुःसह तथा प्रचण्ड पराक्रमसम्पन्न चण्डिकाका निश्चय ही वध कर दूँगा अथवा उसे नागपाशमें बाँधकर जीवित दशामें ही आपके पास ले आऊँगा, जिससे वह सदाके लिये आपकी वशवर्तिनी हो जाय। हे राजन्! अब आप मेरा पराक्रम देखिये॥१५-१६॥ |