देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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| अ० ११] | पञ्चम स्कन्ध | ५८५ |
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| रसभङ्गं विचिन्त्यैव न युद्धं तु मया कृतम्।<br>आज्ञां विना तवात्यन्तं कथं कुर्यां वृथोद्यमम्॥ ६४ | आपका रसभंग न हो—यह सोचकर मैंने उसके साथ युद्ध नहीं किया और फिर आपकी आज्ञाके बिना मैं व्यर्थ ही युद्ध कैसे कर सकता था? ॥ ६४॥ |
| सातीव च बलोन्मत्ता वर्तते भूप भामिनी।<br>भवितव्यं न जानामि किं वा भावि भविष्यति॥ ६५ | हे राजन्! वह स्त्री सदा अपने बलसे अत्यन्त उन्मत्त रहती है। होनीके विषयमें मैं नहीं जानता; आगे न जाने क्या होगा! इस विषयमें आप ही प्रमाण हैं। इसमें परामर्श देना मेरे लिये अत्यन्त कठिन है। इस समय हमारे लिये युद्ध करना अथवा पलायन कर जाना—इन दोनोंमें कौन श्रेयस्कर होगा, इसका निर्णय मैं नहीं कर पा रहा हूँ॥ ६५-६६॥ |
| कार्येऽस्मिंस्त्वं प्रमाणं नो मन्त्रोऽतीव दुरासदः।<br>युद्धं पलायनं श्रेयो न जानेऽहं विनिश्चयम्॥ ६६ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे मन्त्रीद्वारा महिषासुरेण देव्या सह विवाहप्रस्तावो नाम दशमोऽध्यायः॥ १०॥
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अथैकादशोऽध्यायः
महिषासुरका अपने मन्त्रियोंसे विचार-विमर्श करना और ताम्रको भगवतीके पास भेजना
| व्यास उवाच<br>इति तस्य वचः श्रुत्वा महिषो मदविह्वलः।<br>मन्त्रिवृद्धान् समाहूय राजा वचनमब्रवीत्॥ १ | व्यासजी बोले—मन्त्रीकी यह बात सुनकर मदोन्मत्त राजा महिषासुर अपने वयोवृद्ध मन्त्रियोंको बुलाकर उनसे यह वचन कहने लगा॥ १॥ |
| राजोवाच<br>मन्त्रिणः किं च कर्तव्यं विश्रब्धं ब्रूत मा चिरम्।<br>आगता देवविहिता मायेयं शाम्बरीव किम्॥ २ | राजा बोला—हे मन्त्रिगण! आपलोग निर्भीकता-पूर्वक मुझे शीघ्र बतायें कि इस समय मुझे क्या करना चाहिये? आपलोग इस कार्यमें प्रवीण हैं, साथ ही साम तथा दण्ड आदि नीतियोंमें भी कुशल हैं। कहीं देवताओंके द्वारा रची गयी शाम्बरी मायाके रूपमें तो यह नहीं आयी हुई है? अतः आपलोग मुझे यह बतायें कि इस समय किस नीतिका सहारा लिया जाय? ॥ २-३॥ |
| कार्येऽस्मिन्निपुणा यूयमुपायेषु विचक्षणाः।<br>सामादिषु च कर्तव्यः कोऽत्र मह्यं ब्रुवन्तु च॥ ३ | |
| मन्त्रिण ऊचुः<br>सत्यं सदैव वक्तव्यं प्रियञ्च नृपसत्तम।<br>कार्यं हितकरं नूनं विचार्य विबुधैः किल॥ ४ | मन्त्रिगण बोले—हे नृपश्रेष्ठ! बुद्धिमान् लोगोंको सदा सत्य और प्रिय बोलना चाहिये तथा सम्यक् विचार करके हितकर कार्य करना चाहिये॥ ४॥ |
| सत्यं च हितकृद्राजन्नप्रियं चाहितकृद्भवेत्।<br>यथौषधं नृणां लोके ह्यप्रियं रोगनाशनम्॥ ५ | हे राजन्! सत्य वचन कल्याणकारी होता है और प्रिय वचन [प्रायः] अहितकर होता है। इस लोकमें अप्रिय वचन भी मनुष्योंके लिये उसी प्रकार हितकारक होता है, जैसे औषधि अरुचिकर होते हुए भी मनुष्योंके रोगोंका नाश करनेवाली होती है॥ ५॥ |
| सत्यस्य श्रोता मन्ता च दुर्लभः पृथिवीपते।<br>वक्तापि दुर्लभः कामं बहवश्चाटुभाषकाः॥ ६ | हे पृथिवीपते! सत्य बातको सुनने तथा माननेवाला दुर्लभ है। सत्य बोलनेवाला तो परम दुर्लभ है; किंतु चाटुकारितापूर्ण बातें करनेवाले बहुत-से लोग हैं॥ ६॥ |