देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 593, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ें| ५८४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १० | | :--- | :--- |
| व्यास उवाच<br>इति सञ्चिन्त्य मेधावी जगाम नृपसन्निधौ।<br>प्रणम्य तमुवाचेदं कृताञ्जलिरमात्यकः॥ ५३ | **व्यासजी बोले—**ऐसा विचार करके वह बुद्धिमान् मन्त्री राजा (महिष)-के पास गया और उसे प्रणामकर दोनों हाथ जोड़कर कहने लगा— ॥ ५३॥ | | मन्त्र्युवाच<br>राजन् देवी वरारोहा सिंहस्योपरि संस्थिता।<br>अष्टादशभुजा रम्या वरायुधधरा परा॥ ५४ | **मन्त्री बोला—**हे राजन्! सुन्दर रूपवाली वह देवी सिंहपर आरूढ़ है, उस मनोहर देवीकी अठारह भुजाएँ हैं और उस श्रेष्ठ देवीने उत्तम कोटिके आयुध धारण कर रखे हैं॥ ५४॥ | | सा मयोक्ता महाराज महिषं भज भामिनि।<br>महिषी भव राज्ञस्त्वं त्रैलोक्याधिपतेः प्रिया॥ ५५<br><br>पट्टराज्ञी त्वमेवास्य भविता नात्र संशयः।<br>स तवाज्ञाकरो जातो वशवर्ती भविष्यति॥ ५६<br><br>त्रैलोक्यविभवं भुक्त्वा चिरकालं वरानने।<br>महिषं पतिमासाद्य योषितां सुभगा भव॥ ५७ | हे महाराज! मैंने उससे कहा—हे भामिनि! तुम राजा महिषसे प्रेम कर लो और तीनों लोकोंके स्वामी उन महाराजकी प्रिय पटरानी बन जाओ। केवल तुम्हीं उनकी पटरानी बननेयोग्य हो; इसमें कोई संशय नहीं है। वे तुम्हारे आज्ञाकारी बनकर सदा तुम्हारे अधीन रहेंगे। हे सुमुखि! महाराज महिषको पतिरूपमें प्राप्त करके तुम चिरकालतक तीनों लोकोंके ऐश्वर्यका उपभोगकर समस्त स्त्रियोंमें सौभाग्यवती बन जाओ॥ ५५–५७॥ | | इति मद्वचनं श्रुत्वा सा स्मयावेशमोहिता।<br>मामुवाच विशालाक्षी स्मितपूर्वमिदं वचः॥ ५८<br><br>महिषीगर्भसम्भूतं पशूनामधमं किल।<br>बलिं दास्याम्यहं देव्यै सुराणां हितकाम्यया॥ ५९ | मेरा यह वचन सुनकर विशाल नयनोंवाली वह सुन्दरी गर्वके आवेगसे विमोहित होकर मुसकराती हुई मुझसे यह बात बोली—मैं देवताओंका हित करनेके विचारसे महिषीके गर्भसे उत्पन्न उस अधम पशु (महिष)-को देवीके लिये बलि चढ़ा दूँगी॥ ५८-५९॥ | | का मूढा कामिनी लोके महिषं वै पतिं भजेत्।<br>मादृशी मन्दबुद्धे किं पशुभावं भजेदिह॥ ६० | हे मन्दबुद्धे! इस संसारमें भला कौन मूर्ख स्त्री महिषको पतिरूपमें स्वीकार कर सकती है? क्या मुझ-जैसी स्त्री पशुस्वभाववाले उस महिषासुरसे प्रेम कर सकती है?॥ ६०॥ | | महिषी महिषं नाथं सश्रृङ्गा शृङ्गसंयुतम्।<br>कुरुते क्रन्दमाना वै नाहं तत्सदृशी शठा॥ ६१<br><br>करिष्येऽहं मृधे युद्धं हनिष्ये त्वां सुराप्रियम्।<br>गच्छ वा दुष्ट पातालं जीवितेच्छा यदस्ति ते॥ ६२ | हे मूर्ख! सींगवाली तथा जोर-जोरसे चिल्लानेवाली कोई महिषी ही उस श्रृंगधारी महिषको अपना पति बना सकती है; किंतु मैं वैसी मूर्ख नहीं हूँ। [देवीने पुनः कहलाया है] मैं तो देवताओंके शत्रु तुझ महिषासुरके साथ रणक्षेत्रमें युद्ध करूँगी और तुम्हें मार डालूँगी। हे दुष्ट! यदि जीवित रहनेकी तुम्हारी इच्छा है, तो अभी पाताललोक चले जाओ॥ ६१-६२॥ | | परुषं तु तया वाक्यमित्युक्तं नृप मत्तया।<br>तच्छ्रुत्वाहं समायातः प्रविचिन्त्य पुनः पुनः॥ ६३ | हे राजन्! उस मदमत्त स्त्रीने ऐसी बहुत कठोर बात मुझसे कही। उसे सुनकर बार-बार विचार करनेके बाद मैं यहाँ लौट आया हूँ॥ ६३॥ |