भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 592, कुल 889 में से

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पृष्ठ 592

अ० १०] पञ्चम स्कन्ध ५८३

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तस्माद् गच्छ नृपं ब्रूहि वचनं मम सत्वरम्।<br>यदाज्ञापयते भूपस्तत्कर्तव्यं त्वया किल॥ ४२<br><br>मघवा स्वर्गमाप्नोतु देवाः सन्तु हविर्भुजः।<br>यूयं प्रयात पातालं यदि जीवितुमिच्छथ॥ ४३<br><br>अन्यथा चेन्मतिर्मन्द महिषस्य दुरात्मनः।<br>तद्युध्यस्व मया सार्धं मरणाय कृतादरः॥ ४४अतएव अब तुम शीघ्र जाओ और अपने राजासे मेरी बात कह दो। इसके बाद तुम्हारे राजा जैसी आज्ञा दें, तुम वैसा करो। इन्द्रको स्वर्ग प्राप्त हो जाय और देवताओंको यज्ञका भाग मिलने लगे। तुमलोग यदि जीवित रहना चाहते हो, तो पाताललोक चले जाओ और हे मूर्ख! यदि दुष्टात्मा महिषासुरका विचार विपरीत हो, तो वह मरनेके लिये तैयार होकर मेरे साथ युद्ध करे॥ ४२—४४॥
मन्यसे सङ्गरे भग्ना देवा विष्णुपुरोगमाः।<br>दैवं हि कारणं तत्र वरदानं प्रजापतेः॥ ४५यदि तुम यह मानते हो कि विष्णु आदि प्रधान देवता तो युद्धमें पहले ही परास्त किये जा चुके हैं, तो उस समय उसका कारण था—विपरीत भाग्य तथा ब्रह्माजीका वरदान॥ ४५॥
व्यास उवाच<br>इति देव्या वचः श्रुत्वा चिन्तयामास दानवः।<br>किं कर्तव्यं मया युद्धं गन्तव्यं वा नृपं प्रति॥ ४६व्यासजी बोले—देवीका यह वचन सुनकर वह दानव सोचने लगा—अब मुझे क्या करना चाहिये? मैं इसके साथ युद्ध करूँ या राजा महिषके पास लौट चलूँ॥ ४६॥
विवाहार्थमिहाज्ञप्तो राज्ञा कामातुरेण वै।<br>तत्कथं विरसं कृत्वा गच्छेयं नृपसन्निधौ॥ ४७[किंतु यह भी है कि] कामातुर महाराज महिषने विवाहके लिये [उसे राजी करनेकी] मुझे आज्ञा दी है तो फिर रसभंग करके मैं राजाके पास लौटकर कैसे जाऊँ?॥ ४७॥
इयं बुद्धिः समीचीना यद् व्रजामि कलिं विना।<br>यथागतं तथा शीघ्रं राज्ञे संवेदयाम्यहम्॥ ४८<br><br>स प्रमाणं पुनः कार्ये राजा मतिमतां वरः।<br>करिष्यति विचार्यैव सचिवैर्निपुणैः सह॥ ४९अन्तमें अब मुझे यही विचार उचित प्रतीत होता है कि बिना युद्ध किये ही राजाके पास शीघ्र चला जाऊँ और जैसा सामने उपस्थित है, वैसा उनको बता दूँ। उसके बाद बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ राजा महिष अपने चतुर मन्त्रियोंसे विचार-विमर्श करके जो उचित समझेंगे, उसे करेंगे॥ ४८-४९॥
सहसा न मया युद्धं कर्तव्यमनया सह।<br>जये पराजये वापि भूपतेरप्रियं भवेत्॥ ५०मुझे अचानक इस स्त्रीके साथ युद्ध नहीं करना चाहिये; क्योंकि जय अथवा पराजय—इन दोनोंमें राजाका अप्रिय हो सकता है॥ ५०॥
यदि मां सुन्दरी हन्यादहं वा हन्मि तां पुनः।<br>येन केनाप्युपायेन स कुप्येत्पार्थिवः किल॥ ५१<br><br>तस्मात्तत्रैव गत्वाहं बोधयिष्यामि तं नृपम्।<br>यथाद्याभिहितं देव्या यथारुचि करोतु सः॥ ५२यदि यह सुन्दरी मुझे मार डाले अथवा मैं ही जिस किसी उपायसे इसको मार डालूँ, तब भी राजा महिष निश्चितरूपसे कुपित होंगे। अतः अब मैं वहींपर चलकर इस सुन्दरीके द्वारा आज जो कुछ कहा गया है, वह सब राजा महिषको बता दूँगा। तत्पश्चात् उनकी जैसी रुचि होगी, वैसा वे करेंगे॥ ५१-५२॥