देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 591, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 591
५८२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १०
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| यदुक्तं स्त्रीस्वभावासि तद्विचारय मूढ किम्।<br>पुमान्नाहं तत्स्वभावाभवं स्त्रीवेषधारिणी॥ ३२ | हे मूर्ख! तुमने जो यह कहा कि 'तुम स्त्रीस्वभाववाली हो', तो अब तुम इस बातपर जरा विचार करो कि क्या मैं पुरुष नहीं हूँ? वस्तुतः उसीके स्वभाववाली मैं इस समय स्त्रीवेषधारिणी हो गयी हूँ॥ ३२॥ |
| याचितं मरणं पूर्वं स्त्रिया त्वत्प्रभुणा यथा।<br>तस्मान्मन्येऽतिमूढोऽसौ न वीररसवित्तमः॥ ३३ | तुम्हारे स्वामी महिषासुरने पूर्वकालमें जो स्त्रीसे मारे जानेका वरदान माँगा था, उसीसे मैं समझती हूँ कि वह महामूर्ख है। वह वीररसका थोड़ा भी जानकार नहीं है॥ ३३॥ |
| कामिन्या मरणं क्लीबरतिदं शूरदुःखदम्।<br>प्रार्थितं प्रभुणा तेन महिषेणात्मबुद्धिना॥ ३४<br><br>तस्मात्स्त्रीरूपमाधाय कार्यं कर्तुमुपागता।<br>कथं बिभेमि त्वद्वाक्यैर्धर्मशास्त्रविरोधकैः॥ ३५ | स्त्रीके द्वारा मारा जाना पराक्रमहीनके लिये भले ही सुखकर हो, किंतु वीरके लिये यह कष्टप्रद होता है। महिषकी अपनी जो बुद्धि हो सकती है, उसीके अनुसार तुम्हारे स्वामीने ऐसा वरदान माँगा। इसीलिये मैं स्त्री-रूप धारण करके अपना कार्य सिद्ध करनेके लिये यहाँ आयी हूँ। मैं तुम्हारे धर्मशास्त्र-विरोधी वचनोंसे क्यों डरूँ?॥ ३४-३५॥ |
| विपरीतं यदा दैवं तृणं वज्रसमं भवेत्।<br>विधिश्चेत्सुमुखः कामं कुलिशं तूलवत्तदा॥ ३६ | जब दैव प्रतिकूल होता है, तब एक तिनका भी वज्र-तुल्य हो जाता है और जब वह दैव अनुकूल होता है, तब वज्र भी तूल (रूई)-के समान कोमल हो जाता है॥ ३६॥ |
| किं सैन्यैरायुधैः किं वा प्रपञ्चैर्दुर्गसेवनैः।<br>मरणं साम्प्रतं यस्य तस्य सैन्यैस्तु किं फलम्॥ ३७ | जिसकी मृत्यु सन्निकट हो उसके लिये सेना, अस्त्र-शस्त्र तथा किलेकी सुरक्षा, सैन्यबल आदि प्रपंचोंसे क्या लाभ!॥ ३७॥ |
| यदायं देहसम्बन्धो जीवस्य कालयोगतः।<br>तदैव लिखितं सर्वं सुखं दुःखं तथा मृतिः॥ ३८<br><br>यस्य येन प्रकारेण मरणं दैवनिर्मितम्।<br>तस्य तेनैव जायेत नान्यथेति विनिश्चयः॥ ३९ | जब कालयोगसे देहके साथ जीवका सम्बन्ध स्थापित होता है, उसी समय विधाताके द्वारा सुख, दुःख तथा मृत्यु—सब कुछ निर्धारित कर दिया जाता है। दैवने जिस प्राणीकी मृत्यु जिस प्रकारसे निश्चित कर दी है, उसकी मृत्यु उसी प्रकारसे होगी, इसके विपरीत नहीं; यह पूर्ण सत्य है॥ ३८-३९॥ |
| ब्रह्मादीनां यथा काले नाशोत्पत्ती विनिर्मिते।<br>तथैव भवतः कामं किमन्येषां विचार्यते॥ ४०<br><br>ये मृत्युधर्मिणस्तेषां वरदानेन दर्पिताः।<br>मरिष्यामो न मन्यन्ते ते मूढा मन्दचेतसः॥ ४१ | जिस प्रकारसे ब्रह्मा आदि देवताओंके भी जन्म और मृत्यु सुनिश्चित किये गये रहते हैं, समय आनेपर उसी प्रकारसे उनका भी जन्म-मरण होता है तब अन्य लोगोंके विषयमें विचार ही क्या! उन ब्रह्मा आदि मरणधर्माके वरदानसे गर्वित होकर जो लोग यह समझते हैं कि 'हम नहीं मरेंगे' वे मूर्ख तथा अल्पबुद्धिवाले हैं॥ ४०-४१॥ |