देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 590, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ें| अ० १० ] | पञ्चम स्कन्ध | ५८१ | | :--- | :--- |
| कः श्रमः करिराजस्य मालतीपुष्पमर्दने।<br>मारणे तव वामोरु महिषस्य तथा रणे॥ २१ | मालतीके पुष्पोंको कुचल डालनेमें गजराजको भला कौन-सा परिश्रम करना पड़ता है। हे सुजघने! उसी प्रकार युद्धमें आपको मारनेमें महिषासुरको कुछ भी प्रयास नहीं करना पड़ेगा॥ २१॥ | | यदि त्वां परुषं वाक्यं ब्रवीमि स्वल्पमप्यहम्।<br>शृङ्गारे तद्विरुद्धं हि रसभङ्गाद् बिभेम्यहम्॥ २२ | यदि मैं आपको थोड़ा भी कठोर वचन कह दूँ तो वह शृंगाररसके विरुद्ध होगा; और मैं रसभंगसे डरता हूँ॥ २२॥ | | राजास्माकं सुररिपुर्वर्तते त्वयि भक्तिमान्।<br>साममेव मया वाच्यं दानयुक्तं तथा वचः॥ २३<br><br>नोचेद्धन्म्यहमद्यैव बाणेन त्वां मृषावदाम्।<br>मिथ्याभिमानचतुरां रूपयौवनगर्विताम्॥ २४ | हमारे राजा महिषासुर देवताओंके शत्रु हैं, किंतु वे आपके प्रति अनुरागयुक्त हैं। [मेरे राजाने कहा है कि] मैं आपसे साम तथा दाननीतियोंसे पूर्ण वचन ही बोलूँ, अन्यथा मैं झूठ बोलनेवाली, मिथ्या अभिमानमें भरकर चतुरता दिखानेवाली और रूप तथा यौवनके अभिमानमें चूर रहनेवाली आपको इसी समय अपने बाणसे मार डालता॥ २३-२४॥ | | स्वामी मे मोहितः श्रुत्वा रूपं ते भुवनातिगम्।<br>तत्प्रियार्थं प्रियं कामं वक्तव्यं त्वयि यन्मया॥ २५ | आपके अलौकिक रूपके विषयमें सुनकर मेरे स्वामी मोहित हो गये हैं। उनकी प्रसन्नताके लिये ही मुझे प्रिय वचन बोलना पड़ रहा है॥ २५॥ | | राज्यं तव धनं सर्वं दासस्ते महिषः किल।<br>कुरु भावं विशालाक्षि त्यक्त्वा रोषं मृतिप्रदम्॥ २६ | उनका सम्पूर्ण राज्य तथा धन आपका है; क्योंकि वे महाराज महिषासुर निश्चय ही आपके दास हो चुके हैं। अतः हे विशालनयने! इस मृत्युदायक रोषका त्याग करके उनके प्रति प्रेमभाव प्रदर्शित कीजिये॥ २६॥ | | पतामि पादयोस्तेऽहं भक्तिभावेन भामिनि।<br>पट्टराज्ञी महाराज्ञो भव शीघ्रं शुचिस्मिते॥ २७ | हे भामिनि! मैं भक्तिभावसे आपके चरणोंपर गिर रहा हूँ। हे पवित्र मुसकानवाली! आप शीघ्र ही महाराज महिषकी पटरानी बन जाइये॥ २७॥ | | त्रैलोक्यविभवं सर्वं प्राप्स्यसि त्वमनाविलम्।<br>सुखं संसारजं सर्वं महिषस्य परिग्रहात्॥ २८ | महिषासुरको स्वीकार कर लेनेसे आपको तीनों लोकोंका सम्पूर्ण उत्तम वैभव तथा समस्त सांसारिक सुख प्राप्त हो जायगा॥ २८॥ | | देव्युवाच<br>शृणु सचिव वक्ष्यामि वाक्यानां सारमुत्तमम्।<br>शास्त्रदृष्टेन मार्गेण चातुर्यमनुचिन्त्य च॥ २९ | देवी बोलीं—हे सचिव! सुनो, मैं बुद्धिचातुर्यसे सम्यक् विचार करके तथा शास्त्रप्रतिपादित मार्गसे निर्णय करके सारभूत बातें बताऊँगी॥ २९॥ | | महिषस्य प्रधानस्त्वं मया ज्ञातं धिया किल।<br>पशुबुद्धिस्वभावोऽसि वचनात्तव साम्प्रतम्॥ ३० | तुम्हारी बातोंसे मैंने अपनी बुद्धिद्वारा जान लिया कि तुम महिषासुरके प्रधानमन्त्री हो और तुम भी [उसीकी तरह] पशुबुद्धिस्वभाववाले हो॥ ३०॥ | | मन्त्रिणस्त्वादृशा यस्य स कथं बुद्धिमान्भवेत्।<br>उभयोः सदृशो योगः कृतोऽयं विधिना किल॥ ३१ | जिस राजाके तुम्हारे-जैसे मन्त्री हों, वह बुद्धिमान् कैसे हो सकता है? ब्रह्माने निश्चय ही तुम दोनोंका यह समान योग रचा है॥ ३१॥ |