देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ५८० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १० |
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| तस्माद् गच्छस्व त्यक्त्वैको मेदिनीञ्च ससागराम् ।<br>पातालं तरसा मन्द यावद् बाणा न मेऽपतन् ॥ ९० | जायँगे। इसलिये हे दुष्ट! जबतक मेरे बाण तुझपर नहीं गिरते, उसके पूर्व ही तुम शीघ्रतापूर्वक समुद्रसहित पृथ्वीका त्याग करके पाताललोक चले जाओ॥ ९-१०॥ | | युद्धेच्छा चेन्मनसि ते तर्होहि त्वरितोऽसुर ।<br>वीरैर्महाबलैः सर्वैर्नयामि यमसादनम् ॥ ९१ | हे असुर! यदि तुम्हारे मनमें युद्धकी इच्छा हो तो अपने सभी महाबली वीरोंको साथ लेकर शीघ्र आ जाओ। मैं सबको यमपुरी पहुँचा दूँगी॥ ९१॥ | | युगे युगे महामूढ हतास्त्वत्सदृशाः किल ।<br>असंख्यातास्तथा त्वां वै हनिष्यामि रणाङ्गणे ॥ ९२<br><br>साफल्यं कुरु शस्त्राणां धारणे तु श्रमोऽन्यथा ।<br>तद्युध्यस्व मया सार्धं समरे स्मरपीडितः ॥ ९३ | हे महामूढ! मैंने युग-युगमें तुम्हारे-जैसे असंख्य दैत्योंका संहार किया है, उसी प्रकार मैं तुम्हें भी रणमें मार डालूँगी। [मेरा सामना करके] तुम मेरे शस्त्र धारण करनेके परिश्रमको सफल करो, नहीं तो यह श्रम व्यर्थ हो जायगा। कामपीड़ित तुम रणभूमिमें मेरे साथ युद्ध करो॥ ९२-९३॥ | | मा गर्वं कुरु दुष्टात्मन् यन्मेऽस्ति ब्रह्मणो वरः ।<br>स्त्रीवध्यत्वे त्वया मूढ पीडिताः सुरसत्तमाः ॥ ९४ | हे दुरात्मन्! तुम इस बातपर अभिमान मत करो कि मुझे ब्रह्माका वर प्राप्त हो गया है। हे मूढ़! केवल स्त्रीके द्वारा वध्य होनेके कारण तुमने श्रेष्ठ देवताओंको बहुत पीड़ित किया है॥ ९४॥ | | कर्तव्यं वचनं धातुस्तेनाहं त्वामुपागता ।<br>स्त्रीरूपमतुलं कृत्वा सत्यं हन्तुं कृतागसम् ॥ ९५<br><br>यथेच्छं गच्छ वा मूढ पातालं पन्नगावृत्तम् ।<br>हित्वा भूसुरसद्माद्य जीवितेच्छा यदस्ति ते ॥ ९६ | अतः ब्रह्माजीका वचन सत्य करना है, इसीलिये स्त्रीका अनुपम रूप धारण करके मैं तुझ पापीका संहार करनेके लिये यहाँ आयी हूँ। हे मूढ़! यदि जीवित रहनेकी तुम्हारी इच्छा हो तो इसी समय देवलोक छोड़कर तुम सर्पोंसे भरे पाताललोकको अथवा जहाँ तुम्हारी इच्छा हो वहाँ चले जाओ॥ ९५-९६॥ | | व्यास उवाच<br>इत्युक्तः स ततो देव्या मन्त्रिश्रेष्ठो बलान्वितः ।<br>प्रत्युवाच निशम्यासौ वचनं हेतुगर्भितम् ॥ ९७ | **व्यासजी बोले—**देवीने उससे ऐसा कहा, तब उनकी बात सुनकर वह पराक्रमशाली मन्त्रिश्रेष्ठ उनसे सारगर्भित वचन कहने लगा— ॥ ९७॥ | | देवि स्त्रीसदृशं वाक्यं ब्रूषे त्वं मदगर्विता ।<br>क्वासौ क्व त्वं कथं युद्धमसम्भाव्यमिदं किल ॥ ९८ | हे देवि! आप अभिमानमें चूर होकर एक साधारण स्त्रीके समान बात कर रही हैं। कहाँ वे महिषासुर और कहाँ आप, यह युद्ध तो असम्भव ही दीखता है॥ ९८॥ | | एकाकिनी पुनर्बाला प्रारब्धयौवना मृदुः ।<br>महिषोऽसौ महाकायो दुर्विभाव्यं हि सङ्गतम् ॥ ९९ | आप यहाँ अकेली हैं और उसपर भी सद्यः युवावस्थाको प्राप्त सुकुमार बाला हैं। [इसके विपरीत] वे महिषासुर विशाल शरीरवाले हैं; ऐसी स्थितिमें उनकी और आपकी तुलना कल्पनातीत है॥ ९९॥ | | सैन्यं बहुविधं तस्य हस्त्यश्वरथसंकुलम् ।<br>पदातिगणसंविद्धं नानायुधविराजितम् ॥ २० | उनके पास हाथी-घोड़े और रथसे परिपूर्ण, पैदल सैनिकोंसे सम्पन्न तथा अनेक प्रकारके आयुधोंसे सज्जित अनेक प्रकारकी सेना है॥ २०॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ] — 19 D