भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

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अ० १० ]पञ्चम स्कन्ध५७९

| तथा करोमि देवेशि यथा ते मनसेप्सितम्।<br>वशगोऽसौ तवात्यर्थं रूपसंश्रवणात्तव ॥ ६७<br><br>करभोरु वदाशु त्वं संविधेयं मया तथा॥ ६८ | हे देवेशि! आपके मनमें जैसी इच्छा होगी, मैं वही करूँगा। आपके रूपके विषयमें सुनकर वे पूर्णरूपसे आपके वशवर्ती हो गये हैं। हे करभोरु! आप शीघ्र बताएँ; मैं उसीके अनुसार कार्य करूँगा॥ ६७-६८॥ |

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे महिषमन्त्रिणा देवीवार्तावर्णनं नाम नवमोऽध्यायः॥ ९॥


अथ दशमोऽध्यायः

देवीद्वारा महिषासुरके अमात्यको अपना उद्देश्य बताना तथा अमात्यका वापस लौटकर देवीद्वारा कही गयी बातें महिषासुरको बताना

व्यास उवाच<br>इति तस्य वचः श्रुत्वा प्रहस्य प्रमदोत्तमा।<br>तमुवाच महाराज मेघगम्भीरया गिरा॥ १व्यासजी बोले—हे महाराज! उसकी यह बात सुनकर नारीश्रेष्ठ भगवती जोरसे हँसकर मेघके समान गम्भीर वाणीमें उससे कहने लगीं॥ १॥
देव्युवाच<br>मन्त्रिवर्य सुराणां वै जननीं विद्धि मां किल।<br>महालक्ष्मीमिति ख्यातां सर्वदैत्यनिषूदिनीम्॥ २देवी बोलीं— हे मन्त्रिवर! मुझे देवमाताके रूपमें जानो। मैं सभी दैत्योंका नाश करनेवाली तथा महालक्ष्मी नामसे विख्यात हूँ॥ २॥
प्रार्थिताहं सुरैः सर्वैर्महिषस्य वधाय च।<br>पीडितैर्दानवेन्द्रेण यज्ञभागबहिष्कृतैः॥ ३<br><br>तस्मादिहागतास्म्यद्य तद्वधार्थं कृतोद्यमा।<br>एकाकिनी न सैन्येन संयुता मन्त्रिसत्तम॥ ४दानवेन्द्र महिषासुरसे पीड़ित और यज्ञभागसे बहिष्कृत सभी देवताओंने उसके संहारके लिये मुझसे प्रार्थना की है। हे मन्त्रिश्रेष्ठ! इसलिये उसके वधके लिये पूर्णरूपसे तत्पर होकर मैं बिना किसी सेनाके अकेली ही आज यहाँ आयी हूँ॥ ३-४॥
यत्त्वयाहं सामपूर्वं कृत्वा स्वागतमादरात्।<br>उक्ता मधुरया वाचा तेन तुष्टास्मि तेऽनघ॥ ५<br><br>नोचेद्धन्मि दृशा त्वां वै कालाग्निसमया किल।<br>कस्य प्रीतिकरं न स्यान्माधुर्यवचनं खलु॥ ६हे अनघ! तुमने जो शान्तिपूर्वक आदरके साथ मेरा स्वागत करके मधुर वाणीमें मुझसे बात की है, उससे मैं बहुत प्रसन्न हूँ; अन्यथा अपनी कालाग्निके समान दृष्टिसे तुम्हें भस्म कर देती। मधुरतासे युक्त वचन भला किसके लिये प्रीतिकारक नहीं होता!॥ ५-६॥
गच्छ तं महिषं पापं वद मद्द्वचनादिदम्।<br>गच्छ पातालमधुना जीवितेच्छा यदस्ति ते॥ ७<br><br>नोचेत्कृतागसं दुष्टं हनिष्यामि रणाङ्गणे।<br>मद्बाणक्षुण्णदेहस्त्वं गन्तासि यमसादनम्॥ ८अब तुम जाओ और मेरे शब्दोंमें उस पापी महिषासुरसे कह दो—यदि तुम्हें जीवित रहनेकी अभिलाषा हो तो अभी पाताललोकमें चले जाओ, नहीं तो मैं तुझ पापी तथा दुष्टको रणभूमिमें मार डालूँगी। मेरे बाणोंसे छिन्न-भिन्न शरीरवाले होकर तुम यमपुरी चले जाओगे॥ ७-८॥
दयालुत्वं ममेदं त्वं विदित्वा गच्छ सत्वरम्।<br>हते त्वयि सुरा मूढ स्वर्गं प्राप्स्यन्ति सत्वरम्॥ ९हे मूर्ख! इसे मेरी दयालुता समझकर तुम यहाँसे शीघ्र चले जाओ, नहीं तो तुम्हारे मार दिये जानेपर देवतागण निश्चय ही तत्काल स्वर्गका राज्य पा

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—19 C