देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 587, कुल 889 में से
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| ५७८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ९ ] |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| महिष उवाच<br>गच्छ वीर मयादिष्टो मन्त्रिश्रेष्ठ बलान्वितः ॥ ५५<br><br>सामादिभिरुपायैस्त्वं समानय शुभाननाम्।<br>नायाति यदि सा नारी त्रिभिः सामादिभिस्त्विह ॥ ५६<br><br>अहत्वा तां वरारोहां त्वमानय ममान्तिकम्।<br>करोमि पट्टमहिषीं तां मरालभ्रुवं मुदा ॥ ५७<br><br>प्रीतियुक्ता समायाति यदि सा मृगलोचना।<br>रसभङ्गो यथा न स्यात्तथा कुरु ममेप्सितम् ॥ ५८<br><br>श्रवणान्मोहितोऽस्म्यद्य तस्या रूपस्य सम्पदा। | महिषासुर बोला—हे वीर! हे मन्त्रिश्रेष्ठ! तुम मेरे आदेशसे सेना साथमें लेकर जाओ और साम आदि उपायोंसे उस सुन्दर मुखवाली स्त्रीको यहाँ ले आओ। यदि वह स्त्री साम, दान और भेद—इन तीन उपायोंसे भी यहाँ न आये तो उस सुन्दरीको बिना मारे ही पकड़कर मेरे पास ले आओ, यदि वह मृगनयनी प्रीतिपूर्वक आयेगी तो मैं हंसके समान भौंहोंवाली उस स्त्रीको प्रसन्नतापूर्वक अपनी पटरानी बनाऊँगा। मेरी इच्छा समझकर जिस प्रकार रसभंग न हो, वैसा करना। मैं उसकी रूपराशिकी बात सुनकर मोहित हो गया हूँ॥ ५५–५८ १/२ ॥ |
| व्यास उवाच<br>महिषस्य वचः श्रुत्वा पेशलं मन्त्रिसत्तमः ॥ ५९<br><br>जगाम तरसा कामं गजाश्वरथसंयुतः।<br>गत्वा दूरतरं स्थित्वा तामुवाच मनस्विनीम् ॥ ६०<br><br>विनयावनतः श्लक्ष्णं मन्त्री मधुरया गिरा। | व्यासजी बोले—महिषासुरकी यह कोमल वाणी सुनकर वह श्रेष्ठ मन्त्री हाथी, घोड़े और रथ साथ लेकर तुरंत चल पड़ा। वहाँ पहुँचकर कुछ दूर खड़े होकर वह सचिव कोमल तथा मधुर वाणीमें विनम्रतापूर्वक उस दृढ़ निश्चयवाली नारीसे कहने लगा॥ ५९–६० १/२ ॥ |
| प्रधान उवाच<br>कासि त्वं मधुरालापे किमत्रागमनं कृतम् ॥ ६१ | प्रधान बोला—हे मधुरभाषिणि! तुम कौन हो और यहाँ क्यों आयी हो? हे महाभागे! मेरे मुखसे ऐसा कहलाकर मेरे स्वामीने तुमसे यह बात पूछी है॥ ६१ १/२ ॥ |
| पृच्छति त्वां महाभागे मन्मुखेन मम प्रभुः।<br>स जेता सर्वदेवानाभवध्यस्तु नरैः किल ॥ ६२<br><br>ब्रह्मणो वरदानेन गर्वितश्चारुलोचने।<br>दैत्येश्वरोऽसौ बलवान्कामरूपधरः सदा ॥ ६३ | उन्होंने समस्त देवताओंको जीत लिया है और वे मनुष्योंसे अवध्य हैं। हे चारुलोचने! ब्रह्माजीसे वरदान पानेके कारण वे बहुत गर्वयुक्त रहते हैं। वे दैत्यराज महिष बड़े बलवान् हैं और अपनी इच्छाके अनुसार वे सदा विविध रूप धारण कर सकते हैं॥ ६२–६३॥ |
| श्रुत्वा त्वां समुपायातां चारुवेषां मनोहराम्।<br>द्रष्टुमिच्छति राजा मे महिषो नाम पार्थिवः ॥ ६४<br><br>मानुषं रूपमादाय त्वत्समीपं समेष्यति।<br>यथा रुच्येत चार्वङ्गि तथा मन्यामहे वयम् ॥ ६५ | सुन्दर वेष तथा मनोहर विग्रहवाली आप यहाँ आयी हुई हैं—ऐसा सुनकर मेरे प्रभु महाराज महिषासुर आपको देखना चाहते हैं। वे मनुष्यका रूप धारण करके आपके पास आयेंगे। हे सुन्दर अंगोंवाली! आपकी जो इच्छा होगी, हम उसीको मान लेंगे॥ ६४–६५॥ |
| तर्हीहि मृगशावाक्षि समीपं तस्य धीमतः।<br>नो चेदिहानयाम्येनं राजानं भक्तितत्परम् ॥ ६६ | हे बालमृगके समान नेत्रोंवाली! अब आप उन बुद्धिमान् राजा महिषके पास चलें और नहीं तो मैं स्वयं जाकर आपके प्रेममें लीन राजा महिषको यहाँ ले आऊँ॥ ६६॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]— 19 B