देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
५८२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १०
५८२ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १०
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| यदुक्तं स्त्रीस्वभावासि तद्विचारय मूढ किम्।<br>पुमान्नाहं तत्स्वभावाभवं स्त्रीवेषधारिणी॥ ३२ | हे मूर्ख! तुमने जो यह कहा कि 'तुम स्त्रीस्वभाववाली हो', तो अब तुम इस बातपर जरा विचार करो कि क्या मैं पुरुष नहीं हूँ? वस्तुतः उसीके स्वभाववाली मैं इस समय स्त्रीवेषधारिणी हो गयी हूँ॥ ३२॥ |
| याचितं मरणं पूर्वं स्त्रिया त्वत्प्रभुणा यथा।<br>तस्मान्मन्येऽतिमूढोऽसौ न वीररसवित्तमः॥ ३३ | तुम्हारे स्वामी महिषासुरने पूर्वकालमें जो स्त्रीसे मारे जानेका वरदान माँगा था, उसीसे मैं समझती हूँ कि वह महामूर्ख है। वह वीररसका थोड़ा भी जानकार नहीं है॥ ३३॥ |
| कामिन्या मरणं क्लीबरतिदं शूरदुःखदम्।<br>प्रार्थितं प्रभुणा तेन महिषेणात्मबुद्धिना॥ ३४<br><br>तस्मात्स्त्रीरूपमाधाय कार्यं कर्तुमुपागता।<br>कथं बिभेमि त्वद्वाक्यैर्धर्मशास्त्रविरोधकैः॥ ३५ | स्त्रीके द्वारा मारा जाना पराक्रमहीनके लिये भले ही सुखकर हो, किंतु वीरके लिये यह कष्टप्रद होता है। महिषकी अपनी जो बुद्धि हो सकती है, उसीके अनुसार तुम्हारे स्वामीने ऐसा वरदान माँगा। इसीलिये मैं स्त्री-रूप धारण करके अपना कार्य सिद्ध करनेके लिये यहाँ आयी हूँ। मैं तुम्हारे धर्मशास्त्र-विरोधी वचनोंसे क्यों डरूँ?॥ ३४-३५॥ |
| विपरीतं यदा दैवं तृणं वज्रसमं भवेत्।<br>विधिश्चेत्सुमुखः कामं कुलिशं तूलवत्तदा॥ ३६ | जब दैव प्रतिकूल होता है, तब एक तिनका भी वज्र-तुल्य हो जाता है और जब वह दैव अनुकूल होता है, तब वज्र भी तूल (रूई)-के समान कोमल हो जाता है॥ ३६॥ |
| किं सैन्यैरायुधैः किं वा प्रपञ्चैर्दुर्गसेवनैः।<br>मरणं साम्प्रतं यस्य तस्य सैन्यैस्तु किं फलम्॥ ३७ | जिसकी मृत्यु सन्निकट हो उसके लिये सेना, अस्त्र-शस्त्र तथा किलेकी सुरक्षा, सैन्यबल आदि प्रपंचोंसे क्या लाभ!॥ ३७॥ |
| यदायं देहसम्बन्धो जीवस्य कालयोगतः।<br>तदैव लिखितं सर्वं सुखं दुःखं तथा मृतिः॥ ३८<br><br>यस्य येन प्रकारेण मरणं दैवनिर्मितम्।<br>तस्य तेनैव जायेत नान्यथेति विनिश्चयः॥ ३९ | जब कालयोगसे देहके साथ जीवका सम्बन्ध स्थापित होता है, उसी समय विधाताके द्वारा सुख, दुःख तथा मृत्यु—सब कुछ निर्धारित कर दिया जाता है। दैवने जिस प्राणीकी मृत्यु जिस प्रकारसे निश्चित कर दी है, उसकी मृत्यु उसी प्रकारसे होगी, इसके विपरीत नहीं; यह पूर्ण सत्य है॥ ३८-३९॥ |
| ब्रह्मादीनां यथा काले नाशोत्पत्ती विनिर्मिते।<br>तथैव भवतः कामं किमन्येषां विचार्यते॥ ४०<br><br>ये मृत्युधर्मिणस्तेषां वरदानेन दर्पिताः।<br>मरिष्यामो न मन्यन्ते ते मूढा मन्दचेतसः॥ ४१ | जिस प्रकारसे ब्रह्मा आदि देवताओंके भी जन्म और मृत्यु सुनिश्चित किये गये रहते हैं, समय आनेपर उसी प्रकारसे उनका भी जन्म-मरण होता है तब अन्य लोगोंके विषयमें विचार ही क्या! उन ब्रह्मा आदि मरणधर्माके वरदानसे गर्वित होकर जो लोग यह समझते हैं कि 'हम नहीं मरेंगे' वे मूर्ख तथा अल्पबुद्धिवाले हैं॥ ४०-४१॥ |
अ० १०] पञ्चम स्कन्ध ५८३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तस्माद् गच्छ नृपं ब्रूहि वचनं मम सत्वरम्।<br>यदाज्ञापयते भूपस्तत्कर्तव्यं त्वया किल॥ ४२<br><br>मघवा स्वर्गमाप्नोतु देवाः सन्तु हविर्भुजः।<br>यूयं प्रयात पातालं यदि जीवितुमिच्छथ॥ ४३<br><br>अन्यथा चेन्मतिर्मन्द महिषस्य दुरात्मनः।<br>तद्युध्यस्व मया सार्धं मरणाय कृतादरः॥ ४४ | अतएव अब तुम शीघ्र जाओ और अपने राजासे मेरी बात कह दो। इसके बाद तुम्हारे राजा जैसी आज्ञा दें, तुम वैसा करो। इन्द्रको स्वर्ग प्राप्त हो जाय और देवताओंको यज्ञका भाग मिलने लगे। तुमलोग यदि जीवित रहना चाहते हो, तो पाताललोक चले जाओ और हे मूर्ख! यदि दुष्टात्मा महिषासुरका विचार विपरीत हो, तो वह मरनेके लिये तैयार होकर मेरे साथ युद्ध करे॥ ४२—४४॥ |
| मन्यसे सङ्गरे भग्ना देवा विष्णुपुरोगमाः।<br>दैवं हि कारणं तत्र वरदानं प्रजापतेः॥ ४५ | यदि तुम यह मानते हो कि विष्णु आदि प्रधान देवता तो युद्धमें पहले ही परास्त किये जा चुके हैं, तो उस समय उसका कारण था—विपरीत भाग्य तथा ब्रह्माजीका वरदान॥ ४५॥ |
| व्यास उवाच<br>इति देव्या वचः श्रुत्वा चिन्तयामास दानवः।<br>किं कर्तव्यं मया युद्धं गन्तव्यं वा नृपं प्रति॥ ४६ | व्यासजी बोले—देवीका यह वचन सुनकर वह दानव सोचने लगा—अब मुझे क्या करना चाहिये? मैं इसके साथ युद्ध करूँ या राजा महिषके पास लौट चलूँ॥ ४६॥ |
| विवाहार्थमिहाज्ञप्तो राज्ञा कामातुरेण वै।<br>तत्कथं विरसं कृत्वा गच्छेयं नृपसन्निधौ॥ ४७ | [किंतु यह भी है कि] कामातुर महाराज महिषने विवाहके लिये [उसे राजी करनेकी] मुझे आज्ञा दी है तो फिर रसभंग करके मैं राजाके पास लौटकर कैसे जाऊँ?॥ ४७॥ |
| इयं बुद्धिः समीचीना यद् व्रजामि कलिं विना।<br>यथागतं तथा शीघ्रं राज्ञे संवेदयाम्यहम्॥ ४८<br><br>स प्रमाणं पुनः कार्ये राजा मतिमतां वरः।<br>करिष्यति विचार्यैव सचिवैर्निपुणैः सह॥ ४९ | अन्तमें अब मुझे यही विचार उचित प्रतीत होता है कि बिना युद्ध किये ही राजाके पास शीघ्र चला जाऊँ और जैसा सामने उपस्थित है, वैसा उनको बता दूँ। उसके बाद बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ राजा महिष अपने चतुर मन्त्रियोंसे विचार-विमर्श करके जो उचित समझेंगे, उसे करेंगे॥ ४८-४९॥ |
| सहसा न मया युद्धं कर्तव्यमनया सह।<br>जये पराजये वापि भूपतेरप्रियं भवेत्॥ ५० | मुझे अचानक इस स्त्रीके साथ युद्ध नहीं करना चाहिये; क्योंकि जय अथवा पराजय—इन दोनोंमें राजाका अप्रिय हो सकता है॥ ५०॥ |
| यदि मां सुन्दरी हन्यादहं वा हन्मि तां पुनः।<br>येन केनाप्युपायेन स कुप्येत्पार्थिवः किल॥ ५१<br><br>तस्मात्तत्रैव गत्वाहं बोधयिष्यामि तं नृपम्।<br>यथाद्याभिहितं देव्या यथारुचि करोतु सः॥ ५२ | यदि यह सुन्दरी मुझे मार डाले अथवा मैं ही जिस किसी उपायसे इसको मार डालूँ, तब भी राजा महिष निश्चितरूपसे कुपित होंगे। अतः अब मैं वहींपर चलकर इस सुन्दरीके द्वारा आज जो कुछ कहा गया है, वह सब राजा महिषको बता दूँगा। तत्पश्चात् उनकी जैसी रुचि होगी, वैसा वे करेंगे॥ ५१-५२॥ |
| ५८४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १० | | :--- | :--- |
| व्यास उवाच<br>इति सञ्चिन्त्य मेधावी जगाम नृपसन्निधौ।<br>प्रणम्य तमुवाचेदं कृताञ्जलिरमात्यकः॥ ५३ | **व्यासजी बोले—**ऐसा विचार करके वह बुद्धिमान् मन्त्री राजा (महिष)-के पास गया और उसे प्रणामकर दोनों हाथ जोड़कर कहने लगा— ॥ ५३॥ | | मन्त्र्युवाच<br>राजन् देवी वरारोहा सिंहस्योपरि संस्थिता।<br>अष्टादशभुजा रम्या वरायुधधरा परा॥ ५४ | **मन्त्री बोला—**हे राजन्! सुन्दर रूपवाली वह देवी सिंहपर आरूढ़ है, उस मनोहर देवीकी अठारह भुजाएँ हैं और उस श्रेष्ठ देवीने उत्तम कोटिके आयुध धारण कर रखे हैं॥ ५४॥ | | सा मयोक्ता महाराज महिषं भज भामिनि।<br>महिषी भव राज्ञस्त्वं त्रैलोक्याधिपतेः प्रिया॥ ५५<br><br>पट्टराज्ञी त्वमेवास्य भविता नात्र संशयः।<br>स तवाज्ञाकरो जातो वशवर्ती भविष्यति॥ ५६<br><br>त्रैलोक्यविभवं भुक्त्वा चिरकालं वरानने।<br>महिषं पतिमासाद्य योषितां सुभगा भव॥ ५७ | हे महाराज! मैंने उससे कहा—हे भामिनि! तुम राजा महिषसे प्रेम कर लो और तीनों लोकोंके स्वामी उन महाराजकी प्रिय पटरानी बन जाओ। केवल तुम्हीं उनकी पटरानी बननेयोग्य हो; इसमें कोई संशय नहीं है। वे तुम्हारे आज्ञाकारी बनकर सदा तुम्हारे अधीन रहेंगे। हे सुमुखि! महाराज महिषको पतिरूपमें प्राप्त करके तुम चिरकालतक तीनों लोकोंके ऐश्वर्यका उपभोगकर समस्त स्त्रियोंमें सौभाग्यवती बन जाओ॥ ५५–५७॥ | | इति मद्वचनं श्रुत्वा सा स्मयावेशमोहिता।<br>मामुवाच विशालाक्षी स्मितपूर्वमिदं वचः॥ ५८<br><br>महिषीगर्भसम्भूतं पशूनामधमं किल।<br>बलिं दास्याम्यहं देव्यै सुराणां हितकाम्यया॥ ५९ | मेरा यह वचन सुनकर विशाल नयनोंवाली वह सुन्दरी गर्वके आवेगसे विमोहित होकर मुसकराती हुई मुझसे यह बात बोली—मैं देवताओंका हित करनेके विचारसे महिषीके गर्भसे उत्पन्न उस अधम पशु (महिष)-को देवीके लिये बलि चढ़ा दूँगी॥ ५८-५९॥ | | का मूढा कामिनी लोके महिषं वै पतिं भजेत्।<br>मादृशी मन्दबुद्धे किं पशुभावं भजेदिह॥ ६० | हे मन्दबुद्धे! इस संसारमें भला कौन मूर्ख स्त्री महिषको पतिरूपमें स्वीकार कर सकती है? क्या मुझ-जैसी स्त्री पशुस्वभाववाले उस महिषासुरसे प्रेम कर सकती है?॥ ६०॥ | | महिषी महिषं नाथं सश्रृङ्गा शृङ्गसंयुतम्।<br>कुरुते क्रन्दमाना वै नाहं तत्सदृशी शठा॥ ६१<br><br>करिष्येऽहं मृधे युद्धं हनिष्ये त्वां सुराप्रियम्।<br>गच्छ वा दुष्ट पातालं जीवितेच्छा यदस्ति ते॥ ६२ | हे मूर्ख! सींगवाली तथा जोर-जोरसे चिल्लानेवाली कोई महिषी ही उस श्रृंगधारी महिषको अपना पति बना सकती है; किंतु मैं वैसी मूर्ख नहीं हूँ। [देवीने पुनः कहलाया है] मैं तो देवताओंके शत्रु तुझ महिषासुरके साथ रणक्षेत्रमें युद्ध करूँगी और तुम्हें मार डालूँगी। हे दुष्ट! यदि जीवित रहनेकी तुम्हारी इच्छा है, तो अभी पाताललोक चले जाओ॥ ६१-६२॥ | | परुषं तु तया वाक्यमित्युक्तं नृप मत्तया।<br>तच्छ्रुत्वाहं समायातः प्रविचिन्त्य पुनः पुनः॥ ६३ | हे राजन्! उस मदमत्त स्त्रीने ऐसी बहुत कठोर बात मुझसे कही। उसे सुनकर बार-बार विचार करनेके बाद मैं यहाँ लौट आया हूँ॥ ६३॥ |
| अ० ११] | पञ्चम स्कन्ध | ५८५ |
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| रसभङ्गं विचिन्त्यैव न युद्धं तु मया कृतम्।<br>आज्ञां विना तवात्यन्तं कथं कुर्यां वृथोद्यमम्॥ ६४ | आपका रसभंग न हो—यह सोचकर मैंने उसके साथ युद्ध नहीं किया और फिर आपकी आज्ञाके बिना मैं व्यर्थ ही युद्ध कैसे कर सकता था? ॥ ६४॥ |
| सातीव च बलोन्मत्ता वर्तते भूप भामिनी।<br>भवितव्यं न जानामि किं वा भावि भविष्यति॥ ६५ | हे राजन्! वह स्त्री सदा अपने बलसे अत्यन्त उन्मत्त रहती है। होनीके विषयमें मैं नहीं जानता; आगे न जाने क्या होगा! इस विषयमें आप ही प्रमाण हैं। इसमें परामर्श देना मेरे लिये अत्यन्त कठिन है। इस समय हमारे लिये युद्ध करना अथवा पलायन कर जाना—इन दोनोंमें कौन श्रेयस्कर होगा, इसका निर्णय मैं नहीं कर पा रहा हूँ॥ ६५-६६॥ |
| कार्येऽस्मिंस्त्वं प्रमाणं नो मन्त्रोऽतीव दुरासदः।<br>युद्धं पलायनं श्रेयो न जानेऽहं विनिश्चयम्॥ ६६ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे मन्त्रीद्वारा महिषासुरेण देव्या सह विवाहप्रस्तावो नाम दशमोऽध्यायः॥ १०॥
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अथैकादशोऽध्यायः
महिषासुरका अपने मन्त्रियोंसे विचार-विमर्श करना और ताम्रको भगवतीके पास भेजना
| व्यास उवाच<br>इति तस्य वचः श्रुत्वा महिषो मदविह्वलः।<br>मन्त्रिवृद्धान् समाहूय राजा वचनमब्रवीत्॥ १ | व्यासजी बोले—मन्त्रीकी यह बात सुनकर मदोन्मत्त राजा महिषासुर अपने वयोवृद्ध मन्त्रियोंको बुलाकर उनसे यह वचन कहने लगा॥ १॥ |
| राजोवाच<br>मन्त्रिणः किं च कर्तव्यं विश्रब्धं ब्रूत मा चिरम्।<br>आगता देवविहिता मायेयं शाम्बरीव किम्॥ २ | राजा बोला—हे मन्त्रिगण! आपलोग निर्भीकता-पूर्वक मुझे शीघ्र बतायें कि इस समय मुझे क्या करना चाहिये? आपलोग इस कार्यमें प्रवीण हैं, साथ ही साम तथा दण्ड आदि नीतियोंमें भी कुशल हैं। कहीं देवताओंके द्वारा रची गयी शाम्बरी मायाके रूपमें तो यह नहीं आयी हुई है? अतः आपलोग मुझे यह बतायें कि इस समय किस नीतिका सहारा लिया जाय? ॥ २-३॥ |
| कार्येऽस्मिन्निपुणा यूयमुपायेषु विचक्षणाः।<br>सामादिषु च कर्तव्यः कोऽत्र मह्यं ब्रुवन्तु च॥ ३ | |
| मन्त्रिण ऊचुः<br>सत्यं सदैव वक्तव्यं प्रियञ्च नृपसत्तम।<br>कार्यं हितकरं नूनं विचार्य विबुधैः किल॥ ४ | मन्त्रिगण बोले—हे नृपश्रेष्ठ! बुद्धिमान् लोगोंको सदा सत्य और प्रिय बोलना चाहिये तथा सम्यक् विचार करके हितकर कार्य करना चाहिये॥ ४॥ |
| सत्यं च हितकृद्राजन्नप्रियं चाहितकृद्भवेत्।<br>यथौषधं नृणां लोके ह्यप्रियं रोगनाशनम्॥ ५ | हे राजन्! सत्य वचन कल्याणकारी होता है और प्रिय वचन [प्रायः] अहितकर होता है। इस लोकमें अप्रिय वचन भी मनुष्योंके लिये उसी प्रकार हितकारक होता है, जैसे औषधि अरुचिकर होते हुए भी मनुष्योंके रोगोंका नाश करनेवाली होती है॥ ५॥ |
| सत्यस्य श्रोता मन्ता च दुर्लभः पृथिवीपते।<br>वक्तापि दुर्लभः कामं बहवश्चाटुभाषकाः॥ ६ | हे पृथिवीपते! सत्य बातको सुनने तथा माननेवाला दुर्लभ है। सत्य बोलनेवाला तो परम दुर्लभ है; किंतु चाटुकारितापूर्ण बातें करनेवाले बहुत-से लोग हैं॥ ६॥ |
| ५८६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ११ | | :--- | :--- |
| कथं ब्रूमोऽत्र नृपते विचारे गहने त्विह।<br>शुभं वाप्यशुभं वापि को वेत्ति भुवनत्रये॥ ७ | हे राजन्! इस गूढ़ विषयमें हमलोग कुछ कैसे कह सकते हैं, और फिर इस त्रिलोकीमें भविष्यमें होनेवाले शुभ अथवा अशुभ परिणामके विषयमें कौन जान सकता है?॥७॥ | | राजोवाच<br>स्वस्वमत्यनुसारेण ब्रुवन्त्वद्य पृथक्पृथक्।<br>येषां हि यादृशो भावस्तच्छ्रुत्वा चिन्तयाम्यहम्॥ ८<br>बहूनां मतमाज्ञाय विचार्य च पुनः पुनः।<br>यच्छ्रेयस्तद्धि कर्तव्यं कार्यं कार्यविचक्षणैः॥ ९ | राजा बोला—आपलोग अपनी-अपनी बुद्धिके अनुसार अलग-अलग विचार प्रकट करें। जिसका जो भाव होगा, उसे सुनकर मैं स्वयं विचार करूँगा; क्योंकि बुद्धिमान् पुरुषोंको चाहिये कि अनेक लोगोंके मन्तव्य सुनकर और फिर उनपर बार-बार विचार करके उनमेंसे अपने लिये जो कल्याणप्रद हो, उसी कामको करें॥८-९॥ | | व्यास उवाच<br>तस्यैवं वचनं श्रुत्वा विरूपाक्षो महाबलः।<br>उवाच तरसा वाक्यं रञ्जयन्पृथिवीपतिम्॥ १० | व्यासजी बोले—उसकी यह बात सुनकर महाबली विरूपाक्ष राजा महिषको प्रसन्न करते हुए शीघ्र कहने लगा॥१०॥ | | विरूपाक्ष उवाच<br>राजनारी वराकीयं सा ब्रूते मदगर्विता।<br>विभीषिकामात्रमिदं ज्ञातव्यं वचनं त्वया॥ ११ | विरूपाक्ष बोला—हे राजन्! वह बेचारी स्त्री मदमत्त होकर जो कुछ बोल रही है, उन बातोंको आप केवल धमकीभर समझें॥११॥ | | को बिभेति स्त्रियो वाक्यैर्दुरुक्तै रणदुर्मदैः।<br>अनृतं साहसं चेति जानन्नारीविचेष्टितम्॥ १२ | यह जानते हुए कि झूठ और साहस स्त्रियोंकी आदत होती है, भला कौन एक स्त्रीके कहे हुए युद्धोन्मादी कठोर वाक्योंसे डरेगा?॥१२॥ | | जित्वा त्रिभुवनं राजन्नद्य कान्ताभयेन वै।<br>दीनत्वेऽप्ययशो नूनं वीरस्य भुवने भवेत्॥ १३ | हे राजन्! तीनों लोकोंपर विजय प्राप्त करके भी आज आप स्त्रीके भयसे ग्रस्त हो गये हैं! उसकी अधीनता स्वीकार कर लेनेपर इस लोकमें अवश्य ही आप-जैसे वीरकी अपकीर्ति होगी॥१३॥ | | तस्माद्याम्यहमेकाकी युद्धाय चण्डिकां प्रति।<br>हनिष्ये तां महाराज निर्भयो भव साम्प्रतम्॥ १४ | अतएव हे महाराज! मैं अकेला ही उस चण्डिकासे युद्ध करनेके लिये जा रहा हूँ और उसे निश्चितरूपसे मार डालूँगा। अब आप भयमुक्त हो जायँ॥१४॥ | | सेनावृतोऽहं गत्वा तां शस्त्रास्त्रैर्विविधैः किल।<br>निषूदयामि दुर्मर्षां चण्डिकां चण्डविक्रमाम्॥ १५<br>बद्ध्वा सर्पमयैः पाशैरानयिष्ये तवान्तिकम्।<br>वशगा तु सदा ते स्यात्पश्य राजन् बलं मम॥ १६ | अपनी सेनाके साथ वहाँ जाकर अनेक प्रकारके शस्त्रास्त्रोंसे मैं उस दुःसह तथा प्रचण्ड पराक्रमसम्पन्न चण्डिकाका निश्चय ही वध कर दूँगा अथवा उसे नागपाशमें बाँधकर जीवित दशामें ही आपके पास ले आऊँगा, जिससे वह सदाके लिये आपकी वशवर्तिनी हो जाय। हे राजन्! अब आप मेरा पराक्रम देखिये॥१५-१६॥ |
| अ० ११ ] | पञ्चम स्कन्ध | ५८७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| व्यास उवाच<br>विरूपाक्षवचः श्रुत्वा दुर्धरो वाक्यमब्रवीत्।<br>सत्यमुक्तं वचो राजन् विरूपाक्षेण धीमता॥ १७<br><br>ममापि वचनं श्लक्ष्णं श्रोतव्यं धीमता त्वया।<br>कामातुरैषा सुदती लक्ष्यतेऽप्यनुमानतः॥ १८<br><br>भवत्येवंविधा कामं नायिका रूपगर्विता।<br>भीषयित्वा वरारोहा त्वां वशे कर्तुमिच्छति॥ १९ | व्यासजी बोले— विरूपाक्षकी बात सुनकर दुर्धरने कहा—हे राजन्! बुद्धिमान् विरूपाक्षने यथार्थ बात कही है। प्रतिभासम्पन्न आप अब मेरी भी उत्तम बात सुन लें। अनुमानसे ऐसा प्रतीत होता है कि सुन्दर दाँतोंवाली यह स्त्री कामातुर है। अपने रूपके गर्वमें चूर इस प्रकारकी नायिकाएँ अपने प्रियको डरा-धमकाकर वशमें करनेका प्रयास करती हैं; वैसे ही यह सुन्दरी भी आपको धमकाकर अपने वशमें करना चाहती है॥ १७–१९॥ |
| हावोऽयं मानिनीनां वै तं वेत्ति रसवित्तमः।<br>वक्रोक्तिरेषा कामिन्याः प्रियं प्रति परायणम्॥ २०<br><br>वेत्ति कोऽपि नरः कामं कामशास्त्रविचक्षणः।<br>यदुक्तं नाम बाणैस्त्वां वधिष्ये रणमूर्धनि॥ २१<br><br>हेतुगर्भमिदं वाक्यं ज्ञातव्यं हेतुवित्तमैः।<br>बाणास्तु मानिनीनां वै कटाक्षा एव विश्रुताः॥ २२<br><br>पुष्पाञ्जलिमयाश्चान्ये व्यंग्यानि वचनानि च।<br>का शक्तिरन्यबाणानां प्रेरणे त्वयि पार्थिव॥ २३<br><br>तादृशीनां न सा शक्तिर्ब्रह्मविष्णुहरादिषु।<br>ययोक्तं नेत्रबाणैस्त्वां हनिष्ये मन्द पार्थिवम्॥ २४ | यह तो मानिनी स्त्रियोंका हाव-भाव होता है और रसका महान् ज्ञाता ही उस हाव-भावको समझ पाता है। आसक्त प्रेमीके प्रति किसी स्त्रीकी ऐसी वक्रोक्ति होती ही है, जिसे कामशास्त्रका विद्वान् कोई विरला पुरुष ही समझ पाता है। जैसे उसने कहा है—'मैं तुम्हें युद्धक्षेत्रमें बाणोंसे मार डालूँगी', इस कथनमें बहुत बड़ा रहस्य निहित है, जिसे रहस्यविद् ही भलीभाँति समझ सकते हैं। मानिनी स्त्रियोंके बाण तो उनके कटाक्ष ही कहे गये हैं और हे राजन्! उनके व्यंग्यपूर्ण वचन दूसरे पुष्पांजलिमय बाण हैं; क्योंकि कटाक्षको छोड़कर वह अन्य प्रकारके बाण भला आपपर क्या चला सकेगी? जब ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदिमें आपपर बाण चलानेकी शक्ति नहीं है, तब वैसी स्त्रियोंमें अन्य बाण चलानेकी शक्ति कहाँ है? उसने अमात्यसे जो कहा था—'हे मन्द! मैं तुम्हारे राजाको अपने नेत्रबाणोंसे बेध डालूँगी' इस कथनका तात्पर्य उन रसज्ञानसे विहीन मन्त्रीने विपरीत ही समझ लिया था॥ २०–२४ १/२॥ |
| विपरीतं परिज्ञातं तेनारसविदा किल।<br>पातयिष्यामि शय्यायां रणमय्यां पतिं तव॥ २५<br><br>विपरीतरतिक्रीडाभाषणं ज्ञेयमेव तत्।<br>करिष्ये विगतप्राणं यदुक्तं वचनं तया॥ २६<br><br>वीर्यं प्राणा इति प्रोक्तं तद्विहीनं न चान्यथा। | उसने प्रधान अमात्यसे जो यह कहा था कि 'मैं तुम्हारे स्वामीको रणमयी शय्यापर गिरा दूँगी'— इस कथनका तात्पर्य उस स्त्रीके द्वारा विपरीत रतिक्रीडाका किया जाना समझना चाहिये। साथ ही उसने जो यह बात कही थी कि 'मैं उन्हें प्राणहीन कर दूँगी'—तो [हे राजन्!] पुरुषोंमें वीर्यको ही प्राण कहा गया है, अतः उस स्त्रीके कथनका तात्पर्य आपको वीर्यहीन कर देनेसे है, इसके अतिरिक्त दूसरी बात नहीं॥ २५–२६ १/२॥ |
५८८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० ११
५८८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० ११
| संस्कृत मूल (श्लोक) | हिन्दी अनुवाद |
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| व्यंग्याधिक्येन वाक्येन वरयत्युत्तमा नृप॥ २७<br><br>तद्वै विचारतो ज्ञेयं रसग्रन्थविचक्षणैः।<br>इति ज्ञात्वा महाराज कर्तव्यं रससंयुतम्॥ २८<br><br>सामदानद्वयं तस्या नान्योपायोऽस्ति भूपते।<br>रुष्टा वा गर्विता वापि वशगा मानिनी भवेत्॥ २९<br><br>तादृशैर्मधुरैर्वाक्यैरानयिष्ये तवान्तिकम्।<br>किं बहूक्तेन मे राजन् कर्तव्या वशवर्तिनी॥ ३०<br><br>गत्वा मयाधुनैवेयं किङ्करीव सदैव ते। | हे राजन्! व्यंग्यभरे इस कथनके द्वारा वह सुन्दरी आपको पतिके रूपमें वरण करना चाहती है। रसशास्त्रके विद्वानोंको विचारपूर्वक इस कथनका अभिप्राय भलीभाँति जान लेना चाहिये। हे महाराज! ऐसा जानकर आपको उसके प्रति रसमय व्यवहार करना चाहिये। हे राजन्! साम (प्रिय वचन) और दान (प्रलोभन आदि)—ये ही दो उपाय उसे वशमें करनेके हैं, इनके अतिरिक्त कोई दूसरा उपाय नहीं है। रुष्ट अथवा मदगर्वित कोई भी मानिनी स्त्री इन उपायोंसे वशवर्तिनी हो जाती है। उसी प्रकारके मधुर वचनोंसे प्रसन्न करके मैं उसे आपके पास ले आऊँगा। हे राजन्! बहुत कहनेसे क्या लाभ! अभी वहाँ जाकर मैं उस स्त्रीको एक दासीकी भाँति सदाके लिये आपके वशमें कर दूँगा॥ २७—३० १/२॥ |
| व्यास उवाच<br>इत्थं निशम्य तद्वाक्यं ताम्रस्तत्त्वविचक्षणः॥ ३१<br><br>उवाच वचनं राजन्निशामय मयोदितम्।<br>हेतुमद्धर्मसहितं रसयुक्तं नयान्वितम्॥ ३२ | **व्यासजी बोले—**दुर्धरकी यह बात सुनकर तत्त्वविद् ताम्र बोला—हे राजन्! अब आप मेरेद्वारा कही गयी बात सुनिये जो तर्कयुक्त, धर्मसे ओतप्रोत, रसमय तथा नीतिसे भरी हुई है॥ ३१-३२॥ |
| नैषा कामातुरा बाला नानुरक्ता विचक्षणा।<br>व्यंग्यानि नैव वाक्यानि तयोक्तानि तु मानद॥ ३३ | हे मानद! यह बुद्धिसम्पन्न स्त्री न कामातुर है, न आपपर आसक्त है और न तो उसने व्यंग्यपूर्ण बातें ही कही हैं॥ ३३॥ |
| चित्रमत्र महाबाहो यदेका वरवर्णिनी।<br>निरालम्बा समायाति चित्ररूपा मनोहरा॥ ३४<br><br>अष्टादशभुजा नारी न श्रुता न च वीक्षिता।<br>केनापि त्रिषु लोकेषु पराक्रमवती शुभा॥ ३५<br><br>आयुधान्यपि तावन्ति धृतानि बलवन्ति च।<br>विपरीतमिदं मन्ये सर्वं कालकृतं नृप॥ ३६ | हे महाबाहो! यह तो महान् आश्चर्य है कि एक अत्यधिक रूपवती और मनोहर स्त्री बिना किसीका आश्रय लिये अकेली ही युद्धहेतु आयी हुई है। अठारह भुजाओंसे सम्पन्न ऐसी पराक्रमशालिनी तथा सुन्दर स्त्री किसीके भी द्वारा तीनों लोकोंमें न तो देखी गयी और न तो सुनी ही गयी। उसने अनेक प्रकारके सुदृढ़ आयुध धारण कर रखे हैं। हे राजन्! इससे मैं तो यह मानता हूँ कि समयने सब कुछ हमारे विपरीत कर दिया है॥ ३४—३६॥ |
| स्वप्नानि दुर्निमित्तानि मया दृष्टानि वै निशि।<br>तेन जानाम्यहं नूनं वैशसं समुपागतम्॥ ३७ | मैंने रातमें अपशकुनसूचक अनेक स्वप्न देखे हैं, इससे मैं तो यह समझता हूँ कि अब निश्चय ही हमारा विनाश आ चुका है॥ ३७॥ |
| कृष्णाम्बरधरा नारी रुदती च गृहाङ्गणे।<br>दृष्टा स्वप्नेऽप्युषःकाले चिन्तितव्यस्तदत्ययः॥ ३८ | मैंने आज ही उषाकालमें स्वप्न देखा कि काले वस्त्र धारण किये एक स्त्री घरके आँगनमें रुदन कर रही है। यह विनाशसूचक स्वप्न विचारणीय है॥ ३८॥ |
| अ० ११ ] | पञ्चम स्कन्ध | ५८९ |
|---|---|---|
| विकृताः पक्षिणो रात्रौ रोरुवन्ति गृहे गृहे।<br>उत्पाता विविधा राजन् प्रभवन्ति गृहे गृहे॥ ३९<br><br>तेन जानाम्यहं नूनं कारणं किञ्चिदेव हि।<br>यत्त्वां प्रार्थयते बाला युद्धाय कृतनिश्चया॥ ४० | हे राजन्! आजकल घर-घरमें भयानक पक्षी रोया करते हैं और घर-घरमें विविध प्रकारके उपद्रव होते रहते हैं। इससे मैं तो यह समझता हूँ कि इसमें निश्चितरूपसे कुछ और ही कारण है, तभी तो युद्धके लिये कृतसंकल्प यह स्त्री आपको ललकार रही है॥ ३९-४०॥ | |
| नैषास्ति मानुषी नो वा गान्धर्वी न तथासुरी।<br>देवैः कृतेयं ज्ञातव्या माया मोहकरी विभो॥ ४१ | हे राजन्! यह न तो मानुषी, न गान्धर्वी और न आसुरी ही है; अपितु इसे देवताओंकी रची हुई मोहकरी माया समझना चाहिये॥ ४१॥ | |
| कातरत्वं न कर्तव्यं ममैतन्मतमित्यलम्।<br>कर्तव्यं सर्वथा युद्धं यद्भाव्यं तद्भविष्यति॥ ४२<br><br>को वेद दैवकर्तव्यं शुभं वाप्यशुभं तथा।<br>अवलम्ब्य धिया धैर्यं स्थातव्यं वै विचक्षणैः॥ ४३ | अतः मेरा यह दृढ़ मत है कि इस समय कायरता नहीं प्रदर्शित करनी चाहिये, अपितु हर तरहसे युद्ध करना चाहिये; जो होना होगा वह होगा। भविष्यमें विधाताके द्वारा किये जानेवाले शुभ या अशुभके बारेमें कौन जानता है? अतः विद्वान् पुरुषोंको चाहिये कि बुद्धिपूर्वक धैर्य धारण करके समयकी प्रतीक्षा करें॥ ४२-४३॥ | |
| जीवितं मरणं पुंसां दैवाधीनं नराधिप।<br>कोऽपि नैवान्यथा कर्तुं समर्थो भुवनत्रये॥ ४४ | हे नरेश! प्राणियोंका जन्म तथा मरण दैवके अधीन है। तीनों लोकोंमें कोई भी व्यक्ति इसके विपरीत कुछ भी करनेमें समर्थ नहीं है॥ ४४॥ | |
| महिष उवाच<br>गच्छ ताम्र महाभाग युद्धाय कृतनिश्चयः।<br>तामानय वरारोहां जित्वा धर्मेण मानिनीम्॥ ४५ | महिष बोला—हे महाभाग! हे ताम्र! युद्धके लिये दृढ़ निश्चय करके तुम जाओ और धर्मपूर्वक उस मानिनी स्त्रीको जीतकर यहाँ ले आओ॥ ४५॥ | |
| न भवेद्वशगा नारी संग्रामे यदि सा तव।<br>हन्तव्या नान्यथा कामं माननीया प्रयत्नतः॥ ४६ | यदि संग्राममें वह स्त्री तुम्हारे अधीन न हो सके, तब तुम उसे मार डालना; नहीं तो जहाँतक सम्भव हो, प्रयत्नपूर्वक उसका सम्मान करना॥ ४६॥ | |
| वीरस्त्वमसि सर्वज्ञ कामशास्त्रविशारदः।<br>येन केनाप्युपायेन जेतव्या वरवर्णिनी॥ ४७ | हे सर्वज्ञ! तुम पराक्रमी तथा कामशास्त्रके पूर्ण विद्वान् हो, अतः किसी भी युक्तिसे उस सुन्दरीपर विजय प्राप्त करना॥ ४७॥ | |
| त्वरन्वीर महाबाहो सैन्येन महता वृतः।<br>तत्र गत्वा त्वया ज्ञेया विचार्य च पुनः पुनः॥ ४८<br><br>किमर्थमागता चेयं ज्ञातव्यं तद्धि कारणम्।<br>कामाद्वा वैरभावाच्च माया कस्येयमित्युत॥ ४९ | हे वीर! हे महाबाहो! विशाल सेनाके साथ तुम वहाँ शीघ्रतापूर्वक जाओ और वहाँ पहुँचकर बार-बार चिन्तन-मनन करके इसका पता लगाओ कि यह किसलिये आयी हुई है? तुम यह भी ज्ञात करना कि वह कामभाव अथवा वैरभाव—किस भावसे आयी है और वह किसकी माया है?॥ ४८-४९॥ | |
| आदौ तन्निश्चयं कृत्वा ज्ञातव्यं तच्चिकीर्षितम्।<br>पश्चाद्युद्धं प्रकर्तव्यं यथायोग्यं यथाबलम्॥ ५० | आरम्भमें इन बातोंकी जानकारी कर लेनेपर तुम यह पता करना कि वह क्या करना चाहती है? तत्पश्चात् उसकी सबलता तथा निर्बलताको भलीभाँति समझकर ही उसके साथ तुम युद्ध करना॥ ५०॥ |
| ५९० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ११ ] |
|---|
| कातरत्वं न कर्तव्यं निर्दयत्वं तथा न च।<br>यादृशं हि मनस्तस्याः कर्तव्यं तादृशं त्वया॥ ५१ | तुम उसके समक्ष न तो कायरता प्रदर्शित करना और न बिलकुल निर्दयताका ही व्यवहार करना। उसकी जैसी मनोदशा देखना, उसीके अनुसार उससे बर्ताव करना॥ ५१॥ | | व्यास उवाच<br>इति तद्भाषितं श्रुत्वा ताम्रः कालवशं गतः।<br>निर्गतः सैन्यसंयुक्तः प्रणम्य महिषं नृपम्॥ ५२<br><br>गच्छन्मार्गे दुरात्मासौ शकुनान्वीक्ष्य दारुणान्।<br>विस्मयञ्च भयं प्राप यममार्गप्रदर्शकान्॥ ५३ | व्यासजी बोले— महिषासुरकी यह बात सुनकर कालके वशीभूत वह ताम्र राजा महिषको प्रणाम करके सेनाके साथ चल पड़ा। चलते समय मार्गमें यमका द्वार दिखलानेवाले अत्यन्त भयानक अपशकुनोंको देख-देखकर वह बहुत विस्मित तथा भयभीत होता था॥ ५२-५३॥ | | स गत्वा तां समालोक्य देवीं सिंहोपरिस्थिताम्।<br>स्तूयमानां सुरैः सर्वैः सर्वायुधविभूषिताम्॥ ५४<br><br>तामुवाच विनीतः सन् वाक्यं मधुरया गिरा।<br>सामभावं समाश्रित्य विनयावनतः स्थितः॥ ५५<br><br>देवि दैत्येश्वरः शृङ्गी त्वद्रूपगुणमोहितः।<br>स्पृहां करोति महिषस्त्वत्पाणिग्रहणाय च॥ ५६ | देवीके समीप पहुँचकर उसने देखा कि वे सिंहपर सवार हैं, वे विविध प्रकारके आयुधोंसे विभूषित हैं तथा सभी देवता उनकी स्तुति कर रहे हैं। तदनन्तर उस ताम्रने विनम्र भावसे खड़े होकर सामनीतिका आश्रय लेकर मधुर वाणीमें शान्तिपूर्वक देवीसे यह वचन कहा—हे देवि! दैत्योंके अधिपति तथा विशाल सींगोंवाले राजा महिष आपके रूप तथा गुणपर मोहित होकर आपसे विवाह करनेकी अभिलाषा रखते हैं॥ ५४—५६॥ | | भावं कुरु विशालाक्षि तस्मिन्नमरदुर्जये।<br>पतिं तं प्राप्य मृद्वङ्गि नन्दने विहराद्भुते॥ ५७ | विशाल नयनों तथा सुकुमार अंगोंवाली हे सुन्दरि! देवताओंके लिये भी अजेय उन महिषसे आप प्रेम कीजिये और उन्हें पतिरूपमें प्राप्त करके अद्भुत नन्दनवनमें विहार कीजिये॥ ५७॥ | | सर्वाङ्गसुन्दरं देहं प्राप्य सर्वसुखास्पदम्।<br>सुखं सर्वात्मना ग्राह्यं दुःखं हेयमिति स्थितिः॥ ५८ | सभी प्रकारके सुखोंके निधानस्वरूप इस सर्वांगसुन्दर शरीरको प्राप्त करके हर तरह सुख भोगना चाहिये और दुःखका तिरस्कार करना चाहिये, यही बात सर्वमान्य है॥ ५८॥ | | करभोरु किमर्थं ते गृहीतान्यायुधान्यलम्।<br>पुष्पकन्दुकयोग्यास्ते कराः कमलकोमलाः॥ ५९ | हे करभोरु! आपने अपने हाथोंमें ये आयुध किसलिये धारण कर रखे हैं? कमलके समान कोमल आपके ये हाथ तो पुष्पोंके गेंद धारण करनेयोग्य हैं॥ ५९॥ | | भ्रूचापे विद्यमानेऽपि धनुषा किं प्रयोजनम्।<br>कटाक्षा विशिखाः सन्ति किं बाणैर्निष्प्रयोजनैः॥ ६० | भौंहरूपी धनुषके रहते आपको यह धनुष धारण करनेसे क्या प्रयोजन है और जब आपके पास ये कटाक्षरूपी बाण हैं तो फिर व्यर्थ बाणोंको धारण करनेसे क्या लाभ?॥ ६०॥ | | संसारे दुःखदं युद्धं न कर्तव्यं विजानता।<br>लोभासक्ताः प्रकुर्वन्ति संग्रामञ्च परस्परम्॥ ६१ | इस संसारमें युद्ध दुःखदायी होता है, अतः ज्ञानीजनको युद्ध नहीं करना चाहिये। राज्य तथा धनके लोलुप लोग ही परस्पर युद्ध करते हैं॥ ६१॥ |
| अ० १२ ] | पञ्चम स्कन्ध | ५९१ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पुष्पैरपि न योद्धव्यं किं पुनर्विशिखैः शरैः।<br>भेदनं निजगात्राणां कस्य तज्जायते मुदे॥ ६२<br><br>तस्मात्त्वमपि तन्वङ्गि प्रसादं कर्तुमर्हसि।<br>भर्तारं भज मे नाथं देवदानवपूजितम्॥ ६३ | पुष्पोंसे भी युद्ध नहीं करना चाहिये, फिर तीक्ष्ण बाणोंसे युद्धकी बात ही क्या? अपने अंगोंका छिद जाना भला किसकी प्रसन्नताका कारण बन सकता है? अतएव हे तन्वंगि! आप कृपा करें और देवताओं तथा दानवोंके द्वारा पूजित मेरे स्वामी महिषको पतिके रूपमें स्वीकार कर लें॥ ६२-६३॥ |
| स तेऽत्र वाञ्छितं सर्वं करिष्यति मनोरथम्।<br>त्वं पट्टमहिषी राज्ञः सर्वथा नात्र संशयः॥ ६४ | वे आपके सभी वांछित मनोरथ पूर्ण कर देंगे और उन्हें पतिरूपमें पाकर आप सदाके लिये उनकी पटरानी बन जायँगी; इसमें सन्देह नहीं है॥ ६४॥ |
| वचनं कुरु मे देवि प्राप्स्यसे सुखमुत्तमम्।<br>संग्रामे जयसन्देहः कष्टं प्राप्य न संशयः॥ ६५ | हे देवि! आप मेरी बात मान लें, इससे आपको उत्तम सुख मिलेगा। कष्ट पाकर भी संग्राममें विजयका सन्देह बना रहता है, इसमें संशय नहीं है॥ ६५॥ |
| जानासि राजनीतिं त्वं यथावद्वरवर्णिनि।<br>भुंक्ष्व राज्यसुखं पूर्णं वर्षाणामयुतायुतम्॥ ६६ | हे सुन्दरि! आप राजनीति भलीभाँति जानती हैं, अतः हजारों-हजारों वर्षोंतक राज्यसुखका भोग करें॥ ६६॥ |
| पुत्रस्ते भविता कान्तः सोऽपि राजा भविष्यति।<br>यौवने क्रीडयित्वान्ते वार्धक्ये सुखमाप्स्यसि॥ ६७ | आपको तेजस्वी पुत्र प्राप्त होगा; वह भी राजा बनेगा। इस प्रकार आप युवावस्थामें क्रीड़ासुख प्राप्त करके वृद्धावस्थामें आनन्द प्राप्त करेंगी॥ ६७॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे ताम्रकृतं देवीं प्रति विस्रंसनवचनवर्णनं नामैकादशोऽध्यायः॥ ११॥
अथ द्वादशोऽध्यायः
देवीके अट्टहाससे भयभीत होकर ताम्रका महिषासुरके पास भाग आना, महिषासुरका अपने मन्त्रियोंके साथ पुनः विचार-विमर्श तथा दुर्धर, दुर्मुख और बाष्कलकी गर्वोक्ति
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| व्यास उवाच<br>तन्निशम्य वचस्तस्य ताम्रस्य जगदम्बिका।<br>मेघगम्भीरया वाचा हसन्ती तमुवाच ह॥ १ | **व्यासजी बोले—**उस ताम्रकी वह बात सुनकर भगवती जगदम्बिका मेघके समान गम्भीर वाणीमें उससे हँसते हुए कहने लगीं॥ १॥ |
| देव्युवाच<br>गच्छ ताम्र पतिं ब्रूहि मुमूर्षुं मन्दचेतसम्।<br>महिषं चातिकामार्तं मूढं ज्ञानविवर्जितम्॥ २<br><br>यथा ते महिषी माता प्रौढा यवसभक्षिणी।<br>नाहं तथा शृङ्गवती लम्बपुच्छा महोदरी॥ ३ | **देवी बोलीं—**हे ताम्र! तुम अपने स्वामी महिषके पास जाओ और मरनेको उद्यत, मन्दबुद्धि, अति कामातुर तथा ज्ञानशून्य उस मूर्खसे कहो कि जिस प्रकार तुम्हारी माता महिषी घास खानेवाली, प्रौढा, विशाल सींगोंवाली, लम्बी पूँछवाली तथा महान् उदरवाली है; वैसी मैं नहीं हूँ॥ २-३॥ |
| न कामयेऽहं देवेशं नैव विष्णुं न शङ्करम्।<br>धनदं वरुणं नैव ब्रह्माणं न च पावकम्॥ ४ | मैं न देवराज इन्द्रको, न विष्णुको, न शिवको, न कुबेरको, न वरुणको, न ब्रह्माको और न तो |
| ५९२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १२ |
|---|
| एतान्देवगणान्हित्वा पशुं केन गुणेन वै।<br>वृणोम्यहं वृथा लोके गर्हणा मे भवेदिति॥ ५ | अग्निदेवको ही चाहती हूँ। जब मैंने इन देवताओंकी उपेक्षा कर दी, तब भला मैं एक पशुका उसके किस गुणसे प्रसन्न होकर वरण करूँगी; इससे तो संसारमें मेरी निन्दा ही होगी!॥ ४-५॥ |
| नाहं पतिंवरा नारी वर्तते मे पतिः प्रभुः।<br>सर्वकर्ता सर्वसाक्षी ह्यकर्ता निःस्पृहः स्थिरः॥ ६<br><br>निर्गुणो निर्ममोऽनन्तो निरालम्बो निराश्रयः।<br>सर्वज्ञः सर्वगः साक्षी पूर्णः पूर्णाशयः शिवः॥ ७<br><br>सर्वावासक्षमः शान्तः सर्वदृक्सर्वभावनः।<br>तं त्यक्त्वा महिषं मन्दं कथं सेवितुमुत्सहे॥ ८ | मैं पतिका वरण करनेवाली साधारण स्त्री नहीं हूँ। मेरे पति तो साक्षात् प्रभु हैं। वे सब कुछ करनेवाले, सबके साक्षी, कुछ भी न करनेवाले, इच्छारहित, सदा रहनेवाले, निर्गुण, मोहरहित, अनन्त, निरालम्ब, आश्रयरहित, सर्वज्ञ, सर्वव्यापी, साक्षी, पूर्ण, पूर्ण आशयवाले, कल्याणकारी, सबको आश्रय देनेमें समर्थ, शान्त, सबको देखनेवाले तथा सबकी भावनाओंको जाननेवाले हैं। उन प्रभुको छोड़कर मैं मूर्ख महिषको अपना पति क्यों बनाना चाहूँगी?॥ ६-८॥ |
| प्रबुध्य युध्यतां कामं करोमि यमवाहनम्।<br>अथवा मनुजानां वै करिष्ये जलवाहकम्॥ ९ | [उससे कह देना—] अब तुम उठकर युद्ध करो। मैं तुम्हें या तो यमका वाहन बना दूँगी अथवा मनुष्योंके लिये पानी ढोनेवाला महिष बना दूँगी॥ ९॥ |
| जीवितेच्छास्ति चेत्याप गच्छ पातालमाशु वै।<br>समस्तैर्दानवैर्युक्तस्त्वन्यथा हन्मि सङ्गरे॥ १० | अरे पापी! यदि जीवित रहनेकी तुम्हारी इच्छा हो तो शीघ्र ही समस्त दानवोंको साथ लेकर पाताललोक चले जाओ, अन्यथा मैं युद्धमें मार डालूँगी॥ १०॥ |
| कामं सदृशयोर्र्योगः संसारे सुखदो भवेत्।<br>अन्यथा दुःखदो भूयादज्ञानाद्यदि कल्पितः॥ ११ | इस संसारमें समान कुल तथा आचारवालोंका परस्पर सम्बन्ध सुखदायक होता है, इसके विपरीत बिना सोचे-समझे यदि सम्बन्ध हो जाता है, तो वह बड़ा दुःखदायी होता है॥ ११॥ |
| मूर्खस्त्वमसि यद् ब्रूषे पतिं मे भज भामिनि।<br>क्वाहं क्व महिषः शृङ्गी सम्बन्धः कीदृशो द्वयोः॥ १२ | [अरे महिष!] तुम मूर्ख हो जो यह कहते हो कि 'हे भामिनि! मुझे पतिरूपमें स्वीकार कर लो।' कहाँ मैं और कहाँ तुम सींग धारण करनेवाले महिष! हम दोनोंका यह कैसा सम्बन्ध! अतः अब तुम |
| गच्छ युध्यस्व वा कामं हनिष्येऽहं सबान्धवम्।<br>यज्ञभागं देवलोकं नोचेत्त्यक्त्वा सुखी भव॥ १३ | [पाताललोक] चले जाओ अथवा मुझसे युद्ध करो, मैं तुम्हें बन्धु-बान्धवोंसहित निश्चय ही मार डालूँगी, नहीं तो देवताओंका यज्ञभाग दे दो और देवलोक छोड़कर सुखी हो जाओ॥ १२-१३॥ |
| व्यास उवाच<br>इत्युक्त्वा सा तदा देवी जगर्ज भृशमद्भुतम्।<br>कल्पान्तसदृशं नादं चक्रे दैत्यभयावहम्॥ १४ | व्यासजी बोले—ऐसा कहकर देवीने बड़े जोरसे अद्भुत गर्जन किया। वह गर्जन प्रलयकालीन भीषण ध्वनिके समान तथा दैत्योंको भयभीत कर देनेवाला था। उस नादसे पृथ्वी काँप उठी और पर्वत डगमगाने |
| चकम्पे वसुधा चेलुस्तेन शब्देन भूधराः।<br>गर्भाश्च दैत्यपत्नीनां सस्रंसुर्गर्जितस्वनात्॥ १५ | लगे तथा दैत्योंकी पत्नियोंके गर्भ गिर गये॥ १४-१५॥ |
| अ० १२ ] | पञ्चम स्कन्ध | ५९३ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ताम्रः श्रुत्वा च तं शब्दं भयत्रस्तमनास्तदा।<br>पलायनं ततः कृत्वा जगाम महिषान्तिकम्॥ १६ | उस शब्दको सुनकर ताम्रके मनमें भय व्याप्त हो गया और तब वह वहाँसे भागकर महिषासुरके पास जा पहुँचा॥ १६॥ |
| नगरे तस्य ये दैत्यास्तेऽपि चिन्तामवाप्नुवन्।<br>बधिरीकृतकर्णाश्च पलायनपरा नृप॥ १७ | हे राजन्! उसके नगरमें जो भी दैत्य थे, वे सब बड़े चिन्तित हुए। वे उस ध्वनिके प्रभावसे बधिर हो गये और वहाँसे भागने लगे॥ १७॥ |
| तदा क्रोधेन सिंहोऽपि ननाद भृशमुत्सटः।<br>तेन नादेन दैतेया भयं जग्मुरपि स्फुटम्॥ १८ | उसी समय देवीका सिंह भी क्रोधपूर्वक अपने अयालों (गर्दनके बालों)-को फैलाकर बड़े जोरसे दहाड़ा। उस गर्जनसे सभी दैत्य बहुत डर गये॥ १८॥ |
| ताम्रं समागतं दृष्ट्वा हयारिरपि मोहितः।<br>चिन्तयामास सचिवैः किं कर्तव्यमतः परम्॥ १९ | ताम्रको वापस आया हुआ देखकर महिषासुरको बहुत विस्मय हुआ। वह उसी समय मन्त्रियोंके साथ विचार-विमर्श करने लगा कि अब आगे क्या किया जाय?॥ १९॥ |
| दुर्गग्रहो वा कर्तव्यो युद्धं निर्गत्य वा पुनः।<br>पलायने कृते श्रेयो भवेद्वा दानवोत्तमाः॥ २० | [उसने कहा—] हे श्रेष्ठ दानवो! हमें आत्मरक्षार्थ किलेके भीतर ही रहना चाहिये अथवा बाहर निकलकर युद्ध करना चाहिये अथवा भाग जानेमें ही हमारा कल्याण है?॥ २०॥ |
| बुद्धिमन्तो दुराधर्षाः सर्वशास्त्रविशारदाः।<br>मन्त्रः खलु प्रकर्तव्यः सुगुप्तः कार्यसिद्धये॥ २१<br><br>मन्त्रमूलं स्मृतं राज्यं यदि स स्यात्सुरक्षितः।<br>मन्त्रिभिश्च सदाचारैर्विधेयः सर्वथा बुधैः॥ २२ | आपलोग बुद्धिमान्, अजेय तथा सभी शास्त्रोंके विद्वान् हैं। अतः मेरे कार्यकी सिद्धिके लिये आपलोग अत्यन्त गुप्त मन्त्रणा करें; क्योंकि मन्त्रणाको ही राज्यका मूल कहा गया है। यदि मन्त्रणा सुरक्षित (गुप्त) रहती है, तभी राज्यकी सुरक्षा सम्भव है। अतएव राजाको चाहिये कि बुद्धिमान् तथा सदाचारी मन्त्रियोंके साथ सदा गुप्त मन्त्रणा करे॥ २१-२२॥ |
| मन्त्रभेदे विनाशः स्याद्राज्यस्य भूपतेस्तथा।<br>तस्माद्द्भेदभयाद् गुप्तः कर्तव्यो भूतिमिच्छता॥ २३ | मन्त्रणाके खुल जानेपर राज्य तथा राजा—इन दोनोंका विनाश हो जाता है। अतः अपने अभ्युदयकी इच्छा करनेवाले राजाको चाहिये कि भेद खुल जानेके भयसे सदा गुप्त मन्त्रणा करे॥ २३॥ |
| तदत्र मन्त्रिभिर्वाच्यं वचनं हेतुमद्धितम्।<br>कालदेशानुसारेण विचिन्त्य नीतिनिर्णयम्॥ २४ | अतः इस समय आप मन्त्रिगण नीति-निर्णयपर सम्यक् विचार करके देश-कालके अनुसार मुझे सार्थक तथा हितकर परामर्श प्रदान करें॥ २४॥ |
| या योषात्र समायाता प्रबला देवनिर्मिता।<br>एकाकिनी निरालम्बा कारणं तद्विचिन्त्यताम्॥ २५ | देवताओंद्वारा निर्मित जो यह अत्यन्त बलवती स्त्री बिना किसी सहायताके अकेली ही यहाँ आयी हुई है, उसके रहस्यपर आपलोग विचार करें॥ २५॥ |
| युद्धं प्रार्थयते बाला किमाश्चर्यमतः परम्।<br>श्रेयोऽत्र विपरीतं वा को वेत्ति भुवनत्रये॥ २६ | वह बाला हमें युद्धके लिये चुनौती दे रही है, इससे बढ़कर आश्चर्य और क्या हो सकता है? इसमें मेरी विजय होगी अथवा पराजय—इसे तीनों लोकोंमें भला कौन जानता है?॥ २६॥ |
५९४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १२
५९४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १२
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| न बहूनां जयोऽप्यस्ति नैकस्य च पराजयः।<br>दैवाधीनौ सदा ज्ञेयौ युद्धे जयपराजयौ॥ २७ | न तो बहुत संख्यावालोंकी ही सदा विजय होती है और न तो अकेला रहते हुए भी किसीकी पराजय ही होती है। युद्धमें जय तथा पराजयको सदा दैवके अधीन जानना चाहिये॥ २७॥ |
| उपायवादिनः प्राहुर्दैवं किं केन वीक्षितम्।<br>अदृष्टमिति यन्नाम प्रवदन्ति मनीषिणः॥ २८<br><br>तत्सत्त्वेऽपि प्रमाणं किं कातराशावलम्बनम्।<br>न समर्थजनानां हि दैवं कुत्रापि लक्ष्यते॥ २९<br><br>उद्यमो दैवमेतौ हि शूरकातरयोर्मतम्।<br>विचिन्त्याद्य धिया सर्वं कर्तव्यं कार्यमादरात्॥ ३० | पुरुषार्थवादी लोग कहते हैं कि दैव क्या है, उसे किसने देखा है; इसीलिये तो बुद्धिमान् उसे 'अदृष्ट' कहते हैं। उसके होनेमें क्या प्रमाण है? वह केवल कायरोंको आशा बँधानेका साधन है, सामर्थ्यवान् लोग उसे कहीं नहीं देखते। उद्यम और दैव—ये दोनों ही वीर तथा कायर लोगोंकी मान्यताएँ हैं। अतः बुद्धिपूर्वक सारी बातोंपर विचार करके हमें कर्तव्यका निश्चय करना चाहिये॥ २८-३०॥ |
| व्यास उवाच<br>इति राज्ञो वचः श्रुत्वा हेतुगर्भं महायशाः।<br>बिडालाख्यो महाराजमित्युवाच कृताञ्जलिः॥ ३१<br><br>राजन्नेषा विशालाक्षी ज्ञातव्या यत्नतः पुनः।<br>किमर्थमिह सम्प्राप्ता कुतः कस्य परिग्रहः॥ ३२ | व्यासजी बोले— राजा महिषकी यह सारगर्भित बात सुनकर महायशस्वी बिडालाख्यने हाथ जोड़कर अपने महाराज महिषासुरसे यह वचन कहा—हे राजन्! विशाल नयनोंवाली इस स्त्रीके विषयमें सावधानीपूर्वक बार-बार यह पता लगाया जाना चाहिये कि यह यहाँ किसलिये और कहाँसे आयी हुई है तथा यह किसकी पत्नी है?॥ ३१-३२॥ |
| मरणं ते परिज्ञाय स्त्रिया सर्वात्मना सुरैः।<br>प्रेषिता पद्मपत्राक्षी समुत्पाद्य स्वतेजसा॥ ३३ | [मैं तो यह समझता हूँ कि] 'स्त्रीके द्वारा ही आपकी मृत्यु होगी'—ऐसा भलीभाँति जानकर सभी देवताओंने अपने तेजसे उस कमलनयनी स्त्रीका निर्माण करके यहाँ भेजा है॥ ३३॥ |
| तेऽपि छन्नाः स्थिताः खेऽत्र सर्वे युद्धदिदृक्षवः।<br>समयेऽस्याः सहायास्ते भविष्यन्ति युयुत्सवः॥ ३४ | युद्ध देखनेकी इच्छावाले वे देवता भी आकाशमें छिपकर विद्यमान हैं और अवसर आनेपर युद्धकी इच्छावाले देवता भी उसकी सहायता करेंगे॥ ३४॥ |
| पुरतः कामिनीं कृत्वा ते वै विष्णुपुरोगमाः।<br>वधिष्यन्ति च नः सर्वान्सा त्वां युद्धे हनिष्यति॥ ३५ | उस स्त्रीको आगे करके वे विष्णु आदि प्रधान देवता युद्धमें हम सबका वध कर देंगे और वह स्त्री भी आपको मार डालेगी॥ ३५॥ |
| एतच्चिकीर्षितं तेषां मया ज्ञातं नराधिप।<br>भवितव्यस्य न ज्ञानं वर्तते मम सर्वथा॥ ३६<br><br>योद्धव्यं न त्वयाद्येति नाहं वक्तुं क्षमः प्रभो।<br>प्रमाणं त्वं महाराज कार्येऽत्र देवनिर्मिते॥ ३७ | हे नरेश! मैंने तो यही समझा है कि उन देवताओंका यही अभीष्ट है, किंतु मुझे भविष्यमें होनेवाले परिणामका बिलकुल ज्ञान नहीं है। हे प्रभो! मैं इस समय यह भी नहीं कह सकता कि आप युद्ध न करें। हे महाराज! देवताओंके द्वारा निर्मित इस कार्यमें कुछ भी निर्णय लेनेमें आप ही प्रमाण हैं॥ ३६-३७॥ |
| अ० १२] | पञ्चम स्कन्ध | ५१५ | | :--- | :--- | | तदर्थेऽस्माभिरनिशं मर्तव्यं कार्यगौरवात्।<br>विहर्तव्यं त्वया सार्धमेष धर्मोऽनुजीविनाम्॥ ३८ | हम अनुयायियोंका तो यही धर्म है कि अवसर आनेपर आपके लिये सदा मरनेको तैयार रहें अथवा आपके साथ आनन्दपूर्वक रहें॥ ३८॥ | | विचारोऽत्र महानस्ति यदेका कामिनी नृप।<br>युद्धं प्रार्थयतेऽस्माभिः ससैन्यैर्बलदर्पितैः॥ ३९ | हे राजन्! अद्भुत बात तो यह है कि बलाभिमानी और सेनासम्पन्न हमलोगोंको एक स्त्री युद्धके लिये चुनौती दे रही है॥ ३९॥ | | दुर्मुख उवाच<br>राजन् युद्धे जयो नोऽद्य भविता वेद्म्यहं किल।<br>पलायनं न कर्तव्यं यशोहानिकरं नृणाम्॥ ४० | दुर्मुख बोला— हे राजन्! मैं यह पूर्णरूपसे जानता हूँ कि आज युद्धमें विजय निश्चितरूपसे हमलोगोंकी होगी। हमलोगोंको पलायन नहीं करना चाहिये; क्योंकि युद्धसे भाग जाना पुरुषोंकी कीर्तिको नष्ट करनेवाला होता है॥ ४०॥ | | इन्द्रादीनां संयुगेऽपि न कृतं यज्जुगुप्सितम्।<br>एकाकिनीं स्त्रियं प्राप्य को हि कुर्यात्पलायनम्॥ ४१ | इन्द्र आदि देवताओंके साथ भी युद्धमें जब हमलोगोंने यह निन्दनीय कार्य नहीं किया था, तब उस अकेली स्त्रीको सामने पाकर उससे डरकर भला कौन पलायन करेगा?॥ ४१॥ | | तस्माद्युद्धं प्रकर्तव्यं मरणं वा रणे जयः।<br>यद्भावि तद्भवत्येव कात्र चिन्ता विपश्यतः॥ ४२ | अतः अब हमें युद्ध आरम्भ कर देना चाहिये, युद्धमें हमारी मृत्यु हो अथवा विजय। जो होना होगा वह तो होगा ही। यथार्थ ज्ञानवालेको इस विषयमें चिन्ताकी क्या आवश्यकता?॥ ४२॥ | | मरणेऽत्र यशःप्राप्तिर्जीवने च तथा सुखम्।<br>उभयं मनसा कृत्वा कर्तव्यं युद्धमद्य वै॥ ४३ | रणभूमिमें मरनेपर कीर्ति मिलेगी और विजयी होनेपर जीवनमें सुख मिलेगा। इन दोनों ही बातोंको मनमें स्थिर करके हमें आज ही युद्ध छेड़ देना चाहिये॥ ४३॥ | | पलायने यशोहानिर्मरणं चायुषः क्षये।<br>तस्माच्छोको न कर्तव्यो जीविते मरणे वृथा॥ ४४ | युद्धसे पलायन कर जानेसे हमारा यश नष्ट हो जायगा। आयुके समाप्त हो जानेपर मृत्यु होनी तो निश्चित ही है। अतएव जीवन तथा मरणके लिये व्यर्थ चिन्ता नहीं करनी चाहिये॥ ४४॥ | | व्यास उवाच<br>दुर्मुखस्य वचः श्रुत्वा बाष्कलो वाक्यमब्रवीत्।<br>प्रणतः प्राञ्जलिर्भूत्वा राजानं वाक्यकोविदः॥ ४५ | व्यासजी बोले— दुर्मुखका विचार सुनकर बात करनेमें परम प्रवीण बाष्कल हाथ जोड़कर विनम्रतापूर्वक राजा महिषासुरसे यह वचन कहने लगा॥ ४५॥ | | बाष्कल उवाच<br>राजंश्चिन्ता न कर्तव्या कार्येऽस्मिन्कातरप्रिये।<br>अहमेको हनिष्यामि चण्डीं चञ्चललोचनाम्॥ ४६ | बाष्कल बोला— हे राजन्! कायर लोगोंके लिये प्रिय इस [पलायन] कार्यके विषयमें आपको विचार नहीं करना चाहिये। मैं उस चंचल नेत्रोंवाली चण्डीको अकेला ही मार डालूँगा॥ ४६॥ | | उत्साहस्तु प्रकर्तव्यः स्थायीभावो रसस्य च।<br>भयानको भवेद्वैरी वीरस्य नृपसत्तम॥ ४७ | हमें सर्वदा उत्साहसे सम्पन्न रहना चाहिये; क्योंकि उत्साह ही वीररसका स्थायीभाव है। हे नृपश्रेष्ठ! भयानक रस तो वीररसका वैरी है॥ ४७॥ |
| ५९६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १२ | | :--- | :--- |
| तस्मात्त्यक्त्वा भयं भूप करिष्ये युद्धमद्भुतम्।<br>नयिष्यामि नरेन्द्राहं चण्डिकां यमसादनम्॥ ४८<br><br>न बिभेमि यमादिन्द्रात्कुबेराद्वरुणादपि।<br>वायोर्वह्नेस्तथा विष्णोः शङ्कराच्छशिनो रवेः॥ ४९<br><br>एकाकिनी तथा नारी किं पुनर्मदगर्विता।<br>अहं तां निहनिष्यामि विशिखैश्च शिलाशितैः॥ ५०<br><br>पश्य बाहुबलं मेऽद्य विहरस्व यथासुखम्।<br>भवतात्र न गन्तव्यं संग्रामेऽप्यनया समम्॥ ५१ | अतएव हे राजन्! भयका त्याग करके मैं अद्भुत युद्ध करूँगा। हे नरेन्द्र! मैं उस चण्डिकाको मारकर उसे यमपुरी पहुँचा दूँगा॥ ४८॥<br><br>मैं यम, इन्द्र, कुबेर, वरुण, वायु, अग्नि, विष्णु, शिव, चन्द्रमा और सूर्यसे भी नहीं डरता, तब उस अकेली तथा मदोन्मत्त स्त्रीसे भला क्यों डरूँगा? पत्थरपर सान धरे हुए तीक्ष्ण बाणोंसे मैं उस स्त्रीका वध कर दूँगा। आज आप मेरा बाहुबल तो देखिये और इस स्त्रीके साथ युद्ध करनेके लिये आपको संग्राममें जानेकी आवश्यकता नहीं है; आप केवल सुखपूर्वक विहार कीजिये॥ ४९–५१॥ | | <center>व्यास उवाच</center>एवं ब्रुवति राजेन्द्र बाष्कले मदगर्विते।<br>प्रणम्य नृपतिं तत्र दुर्धरो वाक्यमब्रवीत्॥ ५२ | व्यासजी बोले— दैत्यराज महिषसे मदोन्मत्त बाष्कलके ऐसा कहनेपर वहाँ उपस्थित दुर्धर अपने राजा महिषासुरको प्रणाम करके कहने लगा॥ ५२॥ | | <center>दुर्धर उवाच</center>महिषाहं विजेष्यामि देवीं देवविनिर्मिताम्।<br>अष्टादशभुजां रम्यां कारणाच्च समागताम्॥ ५३ | दुर्धर बोला— हे महाराज महिष! रहस्यमय ढंगसे आयी हुई उस देवनिर्मित अठारह भुजाओंवाली तथा मनोहर देवीपर मैं विजय प्राप्त करूँगा॥ ५३॥ | | राजन् भीषयितुं त्वां वै मायैषा निर्मिता सुरैः।<br>विभीषिकेयं विज्ञाय त्यज मोहं मनोगतम्॥ ५४ | हे राजन्! आपको भयभीत करनेके लिये ही देवताओंने इस मायाकी रचना की है। यह एक विभीषिकाममात्र है—ऐसा जानकर आप अपने मनकी व्याकुलता दूर कर दीजिये॥ ५४॥ | | राजनीतिरियं राजन् मन्त्रिकृत्यं तथा शृणु।<br>सात्त्विका राजसाः केचित्तामसाश्च तथापरे॥ ५५<br><br>मन्त्रिणस्त्रिविधा लोके भवन्ति दानवाधिप।<br>सात्त्विकाः प्रभुकार्याणि साधयन्ति स्वशक्तिभिः॥ ५६<br><br>आत्मकृत्यं प्रकुर्वन्ति स्वामिकार्याविरोधतः।<br>एकचित्ता धर्मपरा मन्त्रशास्त्रविशारदाः॥ ५७ | हे राजन्! यह सब तो राजनीतिकी बात हुई, अब आप मन्त्रियोंका कर्तव्य सुनिये। हे दानवेन्द्र! तीन प्रकारके मन्त्री संसारमें होते हैं। उनमें कुछ सात्त्विक, कुछ राजस तथा अन्य तामस होते हैं। सात्त्विक मन्त्री अपनी पूरी शक्तिसे अपने स्वामीका कार्य सिद्ध करते हैं। वे अपने स्वामीके कार्यमें बिना कोई अवरोध उत्पन्न किये अपना कार्य करते हैं। ऐसे मन्त्री एकाग्रचित्त, धर्मपरायण तथा मन्त्रशास्त्रों (मन्त्रणासे सम्बन्धित शास्त्र)-के विद्वान् होते हैं॥ ५५–५७॥ | | राजसा भिन्नचित्ताश्च स्वकार्यनिरताः सदा।<br>कदाचित्स्वामिकार्यं ते प्रकुर्वन्ति यदृच्छया॥ ५८ | राजस प्रकृतिके मन्त्री चंचल चित्तवाले होते हैं और वे सदा अपना कार्य साधनेमें लगे रहते हैं। जब कभी उनके मनमें आ जाता है, तब वे अपने स्वामीका भी काम कर देते हैं॥ ५८॥ | | तामसा लोभनिरताः स्वकार्यनिरताः सदा।<br>प्रभुकार्यं विनाशयैव स्वकार्यं साधयन्ति ते॥ ५९ | तामस प्रकृतिके मन्त्री लोभपरायण होते हैं और वे सदैव अपना कार्य सिद्ध करनेमें संलग्न रहते हैं। वे अपने स्वामीका कार्य विनष्ट करके भी अपना |
अ० १३] पञ्चम स्कन्ध ५१७
अ० १३] पञ्चम स्कन्ध ५१७
| समये ते विभिद्यन्ते परैस्तु परिवञ्चिताः।<br>स्वच्छिद्रं शत्रुपक्षीयान्निर्दिशन्ति गृहस्थिताः॥ ६०<br><br>कार्यभेदकरा नित्यं कोशगुप्तासिवत्सदा।<br>संग्रामेऽथ समुत्पन्ने भीषयन्ति प्रभुं सदा॥ ६१ | कार्य सिद्ध करते हैं। वे समय आनेपर परपक्षके लोगोंसे प्रलोभन पाकर अपने स्वामीका भेद खोल देते हैं और घरमें बैठे-बैठे अपनी कमजोरी शत्रुपक्षके लोगोंको बता देते हैं। ऐसे मन्त्री म्यानमें छिपी तलवारकी भाँति अपने स्वामीके कार्यमें बाधा डालते हैं और संग्रामकी स्थिति उत्पन्न होनेपर सदा उन्हें डराते रहते हैं॥ ५९-६१॥ |
| विश्वासस्तु न कर्तव्यस्तेषां राजन् कदाचन।<br>विश्वासे कार्यहानिः स्यान्मन्त्रहानिः सदैव हि॥ ६२<br><br>खलाः किं किं न कुर्वन्ति विश्वस्ता लोभतत्पराः।<br>तामसाः पापनिरता बुद्धिहीनाः शठास्तथा॥ ६३ | हे राजन्! उन मन्त्रियोंका कभी विश्वास नहीं करना चाहिये; क्योंकि उनका विश्वास करनेपर काम बिगड़ जाता है और गुप्त भेद भी खुल जाता है। लोभी, तमोगुणी, पापी, बुद्धिहीन, शठ तथा खल मन्त्रियोंका विश्वास कर लेनेपर वे क्या-क्या अनर्थ नहीं कर डालते?॥ ६२-६३॥ |
| तस्मात्कार्यं करिष्यामि गत्वाहं रणमस्तके।<br>चिन्ता त्वया न कर्तव्या सर्वथा नृपसत्तम॥ ६४<br><br>गृहीत्वा तां दुराचारामागमिष्यामि सत्वरः।<br>पश्य मेऽद्य बलं धैर्यं प्रभुकार्यं स्वशक्तितः॥ ६५ | अतएव हे नृपश्रेष्ठ! मैं स्वयं युद्धभूमिमें जाकर आपका कार्य सम्पन्न करूँगा। आप किसी भी तरहकी चिन्ता न करें। मैं उस दुराचारिणी स्त्रीको पकड़कर आपके पास शीघ्र ले आऊँगा। आप मेरा बल तथा धैर्य देखें। मैं अपनी पूरी शक्तिसे अपने स्वामीका कार्य सिद्ध करूँगा॥ ६४-६५॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे देवीपराजयकरणाय दुर्धरप्रबोधवचनं नाम द्वादशोऽध्यायः॥ १२॥
अथ त्रयोदशोऽध्यायः
बाष्कल और दुर्मुखका रणभूमिमें आना, देवीसे उनका वार्तालाप और युद्ध तथा देवीद्वारा उनका वध
| व्यास उवाच | |
|---|---|
| इत्युक्त्वा तौ महाबाहू दैत्यौ बाष्कलदुर्मुखौ।<br>जग्मतुर्मददिग्धाङ्गौ सर्वशस्त्रास्त्रकोविदौ॥ १ | व्यासजी बोले—हे राजन्! ऐसा कहकर अभिमानसे चूर अंगोंवाले तथा सभी शस्त्रास्त्रोंके विशारद वे दोनों महाबाहु दैत्य बाष्कल तथा दुर्मुख समरांगणकी ओर चल पड़े॥ १॥ |
| तौ गत्वा समरे देवीमूचतुर्वचनं तदा।<br>दानवौ च मदोन्मत्तौ मेघगम्भीरया गिरा॥ २ | इसके बाद वे दोनों मदोन्मत्त दानव समरभूमिमें पहुँचकर मेघ-गर्जनके समान गम्भीर वाणीमें देवीसे कहने लगे॥ २॥ |
| देवि देवा जिता येन महिषेण महात्मना।<br>वरय त्वं वरारोहे सर्वदैत्याधिपं नृपम्॥ ३ | हे देवि! हे सुन्दरि! जिन महान् महिषासुरने सभी देवताओंपर विजय प्राप्त कर ली है; सभी दैत्योंके अधिष्ठाता उन नरेश महिषासुरका आप वरण कर लें॥ ३॥ |
५९८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| स कृत्वा मानुषं रूपं सर्वलक्षणसंयुतम्।<br>भूषितं भूषणैर्दिव्यैस्त्वामेष्यति रहः किल॥ ४ | वे सभी लक्षणोंसे सम्पन्न मनुष्य-रूप धारण करके तथा दिव्य आभूषणोंसे अलंकृत होकर एकान्तमें आपसे मिलनेके लिये आयेंगे॥ ४॥ |
| त्रैलोक्यविभवं कामं त्वमेष्यसि शुचिस्मिते।<br>महिषे परं भावं कुरु कान्ते मनोगतम्॥ ५ | हे सुन्दर मुस्कानवाली देवि! [उन्हें पतिके रूपमें स्वीकार कर लेनेपर] आपको तीनों लोकोंका वैभव निश्चय ही प्राप्त हो जायगा। अतः हे कान्ते! उन महिषासुरके प्रति आप अपने मनमें परम प्रेमभाव रखिये॥ ५॥ |
| कृत्वा पतिं महावीरं संसारसुखमद्भुतम्।<br>त्वं प्राप्स्यसि पिकालापे योषितां खलु वाञ्छितम्॥ ६ | हे कोकिलभाषिणि! महान् पराक्रमी महिषासुरको अपना पति बनाकर आप स्त्रियोंके लिये अभीष्ट अद्भुत सांसारिक सुख प्राप्त करेंगी॥ ६॥ |
| देव्युवाच | देवी बोलीं— |
| जाल्म त्वं किं विजानासि नारीयं काममोहिता।<br>मन्दबुद्धिर्बलात्यर्थं भजेयं महिषं शठम्॥ ७ | अरे दुष्ट! क्या तुम यह समझ रहे हो कि यह कोई काममोहित, बुद्धिहीन तथा बलरहित नारी है? मैं उस मूर्ख महिषासुरकी सेवा कैसे कर सकती हूँ?॥ ७॥ |
| कुलशीलगुणैस्तुल्यं तं भजन्ति कुलस्त्रियः।<br>अधिकं रूपचातुर्यबुद्धिशीलक्षमादिभिः॥ ८ | कुलीन स्त्रियाँ कुल, चरित्र तथा गुणमें समानता रखनेवाले एवं रूप, चतुरता, बुद्धि, व्यवहार, क्षमा आदिसे विशेषरूपसे सम्पन्न पुरुषको ही स्वीकार करती हैं॥ ८॥ |
| का नु कामातुरा नारी भजेच्च पशुरूपिणम्।<br>पशूनामधमं नूनं महिषं देवरूपिणी॥ ९ | ऐसी कौन देवरूपिणी नारी होगी, जो कामातुर होकर पशुरूपधारी तथा पशुओंमें भी अधम महिषको अपना पति बनाना चाहेगी?॥ ९॥ |
| गच्छतं महिषं तूर्णं भूपं बाष्कलदुर्मुखौ।<br>वदतं मद्वचो दैत्यं गजंतुल्यं विषाणिनम्॥ १०<br><br>पातालं गच्छ वाभ्येत्य संग्रामं कुरु वा मया।<br>रणे जाते सहस्त्राक्षो निर्भयः स्यादिति ध्रुवम्॥ ११<br><br>हत्वाहं त्वां गमिष्यामि नान्यथा गमनं मम।<br>इत्थं ज्ञात्वा सुदुर्बुद्धे यथेच्छसि तथा कुरु॥ १२<br><br>मामनिर्जित्य भूभागे न स्थानं ते कदाचन।<br>भविष्यति चतुष्पाद दिवि वा गिरिकन्दरे॥ १३ | हे बाष्कल और दुर्मुख! तुम लोग तत्काल अपने राजा महिषासुरके पास जाओ और हाथीके समान विशाल शरीरवाले तथा शृङ्गधारी उस दानवसे मेरा सन्देश कह दो—‘तुम पाताललोक चले जाओ अथवा यहाँ आकर मेरे साथ युद्ध करो। संग्राम होनेपर ही इन्द्र निर्भय हो सकते हैं—यह निश्चित है। मैं तुम्हारा वध करके ही जाऊँगी, बिना तुम्हें मारे मैं नहीं जा सकती। हे महामूर्ख! यह समझकर अब तुम जो चाहते हो वैसा करो। हे चतुष्पाद! बिना मुझको पराजित किये पृथ्वीके किसी भी भागमें, अन्तरिक्ष या पर्वतकी गुफामें कहीं भी अब तुम्हें शरण नहीं मिलेगी’॥ १०—१३॥ |
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
| इत्युक्तौ तौ तया दैत्यौ कोपाकुलितलोचनौ।<br>धनुर्बाणधरौ वीरौ युद्धकामौ बभूवतुः॥ १४ | देवीके ऐसा कहनेपर क्रोधसे तमतमाये नेत्रोंवाले वे दोनों दैत्य धनुष-बाण लेकर युद्ध करनेके लिये तैयार हो गये॥ १४॥ |
अ० १३] पञ्चम स्कन्ध ५९९
अ० १३] पञ्चम स्कन्ध ५९९
| कृत्वा सुविपुलं नादं देवी सा निर्भया स्थिता।<br>उभौ च चक्रतुस्तीव्रां बाणवृष्टिं कुरुद्वह॥ १५ | वे भगवती जगदम्बा भी गम्भीर गर्जना करके निर्भीक भावसे विराजमान थीं। हे कुरुनन्दन! वे दोनों दैत्य घनघोर बाण-वृष्टि करने लगे॥ १५॥ |
| भगवत्यपि बाणौघान्मुमोच दानवौ प्रति।<br>कृत्वातिमधुरं नादं देवकार्यार्थसिद्धये॥ १६ | भगवती जगदम्बा भी देवताओंकी कार्य-सिद्धिके निमित्त अत्यन्त मधुर नाद करती हुई उन दोनों दानवोंपर बाण-समूह बरसाने लगीं॥ १६॥ |
| तयोस्तु बाष्कलस्तूर्णं सम्मुखोऽभूद् रणाङ्गणे।<br>दुर्मुखः प्रेक्षकस्तत्र देवीमभिमुखः स्थितः॥ १७ | उन दोनोंमेंसे बाष्कल शीघ्रतापूर्वक समरभूमिमें देवीके सामने आ गया। उस समय दुर्मुख केवल दर्शक बनकर देवीकी ओर मुख करके खड़ा रहा॥ १७॥ |
| तयोर्युद्धमभूद् घोरं देवीबाष्कलयोस्तदा।<br>बाणासिपरिघाघातैर्भयदं मन्दचेतसाम्॥ १८ | अब भगवती तथा बाष्कलके बीच बाणों, तलवार तथा परिघके प्रहारसे भीषण युद्ध होने लगा, जो उत्साहहीन चित्तवाले लोगोंके लिये भयदायक था॥ १८॥ |
| ततः क्रुद्धा जगन्माता दृष्ट्वा तं युद्धदुर्मदम्।<br>जघान पञ्चभिर्बाणैः कर्णाकृष्टैः शिलाशितैः॥ १९ | तत्पश्चात् युद्धके लिये उन्मत्त उस बाष्कलको देखकर जगदम्बिका कुपित हो गयीं और उन्होंने पत्थरकी सानपर चढ़ाकर तीखे बनाये गये तथा कानोंतक खींचे गये पाँच बाणोंसे उसपर प्रहार किया॥ १९॥ |
| दानवोऽपि शरान्देव्याश्चिच्छेद निशितैः शरैः।<br>सप्तभिस्ताडयामास देवीं सिंहोपरिस्थिताम्॥ २० | उस दानवने भी अपने तीक्ष्ण बाणोंसे देवीके बाणोंको काट दिया और पुनः सिंहपर विराजमान भगवतीपर सात बाणोंसे प्रहार किया॥ २०॥ |
| सापि तं दशभिस्तीक्ष्णैः सुपीतैः सायकैः खलम्।<br>जघान तच्छरांश्छित्त्वा जहास च मुहुर्मुहुः॥ २१ | देवी भगवतीने उसके बाणोंको काटकर पानी चढ़ाकर तीक्ष्ण किये हुए दस बाणोंसे उस दुष्टपर प्रहार किया और वे बार-बार जोर-जोरसे हँसने लगीं॥ २१॥ |
| अर्धचन्द्रेण बाणेन चिच्छेद च शरासनम्।<br>बाष्कलोऽपि गदां गृह्य देवीं हन्तुमुपाययौ॥ २२ | जगदम्बाने अपने अर्धचन्द्राकार बाणसे उसका धनुष काट डाला। तब बाष्कल भी गदा लेकर देवीको मारनेके लिये उनकी ओर दौड़ा॥ २२॥ |
| आगच्छन्तं गदापाणिं दानवं मदगर्वितम्।<br>चण्डिका स्वगदापातैः पातयामास भूतले॥ २३ | अभिमानमें चूर उस दानवको हाथमें गदा लिये आता हुआ देखकर देवी चण्डिकाने अपनी गदाके प्रहारसे उसे धराशायी कर दिया॥ २३॥ |
| बाष्कलः पतितो भूमौ मुहूर्तादुत्थितः पुनः।<br>चिक्षेप च गदां सोऽपि चण्डिकां चण्डविक्रमः॥ २४ | बाष्कल मुहूर्तभर पृथ्वीपर पड़ा रहा, इसके बाद वह फिर उठ खड़ा हुआ और प्रचण्ड, पराक्रमी उस वीरने भी भगवतीपर गदा चला दी॥ २४॥ |
| तमागच्छन्तमालोक्य देवी शूलेन वक्षसि।<br>जघान बाष्कलं क्रुद्धा पपात च ममार सः॥ २५ | उस दैत्यको सामने आते देखकर भगवतीने कुपित होकर बाष्कलके वक्षःस्थलपर त्रिशूलसे प्रहार किया, जिससे वह गिर पड़ा और मर गया॥ २५॥ |
| ६०० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १३ | | :--- | :--- | | पतिते बाष्कले सैन्यं भग्नं तस्य दुरात्मनः ।<br>जयेति च मुदा देवाश्चक्रुशुर्गगने स्थिताः ॥ २६ | बाष्कलके गिरते ही उस दुरात्माकी सेना भाग गयी और आकाशमण्डलमें विद्यमान देवता प्रसन्नतापूर्वक भगवतीकी जय-जयकार करने लगे ॥ २६ ॥ | | तस्मिंश्च निहते दैत्ये दुर्मुखोऽतिबलान्वितः ।<br>आजगाम रणे देवीं क्रोधसंरक्तलोचनः ॥ २७ | उस दैत्यके मार दिये जानेपर महाबली दुर्मुख क्रोधसे आँखें लाल किये रणभूमिमें देवीके समक्ष आया ॥ २७ ॥ | | तिष्ठ तिष्ठाबले सोऽपि भाषमाणः पुनः पुनः ।<br>धनुर्बाणधरः श्रीमान्रथस्थः कवचावृतः ॥ २८ | उस समय वह वैभवशाली दैत्य ‘अरी अबले ! ठहरो, ठहरो’—ऐसा बार-बार कहते हुए धनुष-बाण धारण करके कवच पहने हुए रथपर सवार था ॥ २८ ॥ | | तमागच्छन्तमालोक्य देवी शङ्खमवादयत् ।<br>कोपयन्ती दानवं तं ज्याघोषञ्च चकार ह ॥ २९ | उस दानवको अपनी ओर आते देखकर देवीने शंखध्वनि की और उसे कुपित करती हुई वे अपने धनुषकी टंकार करने लगीं ॥ २९ ॥ | | सोऽपि बाणान्मुमोचाशु तीक्ष्णानाशीविषोपमान् ।<br>स्वबाणैस्तान्महामाया चिच्छेद च ननाद च ॥ ३० | दुर्मुख भी बड़ी तेजीसे सर्पके समान विषैले तीक्ष्ण बाण छोड़ने लगा। तब महामायाने अपने बाणोंसे उन बाणोंको काट डाला और वे गर्जन करने लगीं ॥ ३० ॥ | | तयोः परस्परं युद्धं बभूव तुमुलं नृप ।<br>बाणशक्तिगदाघातैर्मुसलैस्तोमरैस्तथा ॥ ३१ | हे राजन् ! बाण, शक्ति, गदा, मूसल और तोमर आदिके प्रहारसे उन दोनोंमें परस्पर भयंकर युद्ध होने लगा ॥ ३१ ॥ | | रणभूमौ तदा जाता रुधिरौघवहा नदी ।<br>पतितानि तदा तीरे शिरांसि प्रबभुस्तदा ॥ ३२<br>यथा सन्तरणार्थाय यमकिङ्करनायकैः ।<br>तुम्बीफलानि नीतानि नवशिक्षापरैर्मुदा ॥ ३३ | उस समय रणभूमिमें रुधिरकी नदी बह चली। उसके तटपर गिरे हुए मस्तक इस प्रकार सुशोभित हो रहे थे, मानो वैतरणी पार करनेके लिये तैरना सीखनेवाले यमदूतोंके द्वारा प्रसन्नतापूर्वक तुम्बीफल लाकर रख दिये गये हों ॥ ३२-३३ ॥ | | रणभूमिस्तदा घोरा बभूवातीव दुर्गमा ।<br>शरीरैः पतितैर्भूमौ खाद्यमानैर्वृकादिभिः ॥ ३४ | भूमिपर कटकर गिरे शवों तथा उन्हें खानेवाले भेड़िये आदि जन्तुओंसे वह रणभूमि अत्यन्त भयंकर तथा दुर्गम हो गयी थी ॥ ३४ ॥ | | गोमायुसारमेयाश्च काकाः कङ्का अयोमुखाः ।<br>गृध्राः श्येनाश्च खादन्ति शरीराणि दुरात्मनाम् ॥ ३५ | सियार, कुत्ते, कौए, कंक, अयोमुख नामक पक्षी, गिद्ध और बाज उन दुष्ट दानवोंके शरीरको [नोच-नोचकर] खा रहे थे ॥ ३५ ॥ | | ववौ वायुश्च दुर्गन्धो मृतानां देहसङ्गतः ।<br>अभूत्किलकिलाशब्दः खगानां पलभक्षिणाम् ॥ ३६ | मृतकोंके शरीरके संसर्गसे दुर्गन्धित हवा चल रही थी और मांसाहारी पक्षियोंकी किलकिला ध्वनि हो रही थी ॥ ३६ ॥ | | तदा चुकोप दुष्टात्मा दुर्मुखः कालमोहितः ।<br>देवीमुवाच गर्वेण कृत्वा चोर्ध्वकरं शुभम् ॥ ३७ | तब कालसे मोहित वह दुरात्मा दुर्मुख अत्यन्त क्रुद्ध हो उठा और गर्वके साथ अपनी सुन्दर भुजा उठाकर देवीसे कहने लगा— ॥ ३७ ॥ |
| अ० १३ ] | पञ्चम स्कन्ध | ६०१ | | :--- | :--- |
| गच्छ चण्डि हनिष्यामि त्वामद्यैव सुबालिशे।<br>दैत्यं वा भज वामोरु महिषं मदगर्वितम्॥ ३८ | हे चण्डिके! हे मूर्ख बाले! भाग जाओ, नहीं तो मैं तुम्हें अभी मार डालूँगा अथवा हे वामोरु! मदसे मत्त महिषासुरको स्वीकार कर लो॥ ३८॥ |
| देव्युवाच<br>आसन्नमरणः कामं प्रलपस्यद्य मोहितः।<br>अद्यैव त्वां हनिष्यामि यथायं बाष्कलो हतः॥ ३९ | देवी बोलीं—अब तुम्हारी मृत्यु समीप है, तभी तुम मोहित होकर ऐसा प्रलाप कर रहे हो। अभी मैं तुम्हें भी उसी प्रकार मार डालूँगी, जैसे मैंने इस बाष्कलको मारा है॥ ३९॥ |
| गच्छ वा तिष्ठ वा मन्द मरणं यदि रोचते।<br>हत्वा त्वां वै वधिष्यामि बालिशं महिषीसुतम्॥ ४० | हे मूर्ख! भाग जाओ और यदि तुम्हें मृत्यु अच्छी लगती हो तो रुके रहो। तुम्हें मारनेके बाद मैं मूर्ख महिषासुरका भी संहार कर दूँगी॥ ४०॥ |
| तच्छ्रुत्वा वचनं तस्या दुर्मुखो मर्तुमुद्यतः।<br>मुमोच बाणवृष्टिं तु चण्डिकां प्रति दारुणाम्॥ ४१ | देवीका वह वचन सुनकर मरणोन्मुख दुर्मुख भगवती चण्डिकाके ऊपर भीषण बाण-वृष्टि करने लगा॥ ४१॥ |
| सापि तां तरसा छित्त्वा बाणवृष्टिं शितैः शरैः।<br>जघान दानवं क्रुद्धा वृत्रं वज्रधरो यथा॥ ४२ | भगवतीने भी कुपित होकर अपने तीक्ष्ण बाणोंसे उस बाण-वृष्टिको तत्काल व्यर्थ करके उस दैत्यपर उसी प्रकार आघात किया, जैसे इन्द्रने वृत्रासुरपर किया था॥ ४२॥ |
| तयोः परस्परं युद्धं सञ्जातं चातिकर्कशम्।<br>भयदं कातराणाञ्च शूराणां बलवर्धनम्॥ ४३ | अब उन दोनोंमें बड़ा भीषण युद्ध आरम्भ हो गया, जो कायरोंके लिये भयदायक तथा वीरोंके लिये उत्साहवर्धक था॥ ४३॥ |
| देवी चिच्छेद तरसा धनुस्तस्य करे स्थितम्।<br>तथैव पञ्चभिर्बाणैर्बभञ्ज रथमुत्तमम्॥ ४४ | देवीने बड़ी फुर्तीके साथ उसके हाथमें स्थित धनुषको काट डाला और उसी तरह अपने पाँच बाणोंसे उसके उत्तम रथको छिन्न-भिन्न कर दिया॥ ४४॥ |
| रथे भग्ने महाबाहुः पदातिर्दुर्मुखस्तदा।<br>गदां गृहीत्वा दुर्धर्षां जगाम चण्डिकां प्रति॥ ४५ | रथके नष्ट हो जानेपर महाबाहु दुर्मुख अपनी भयानक गदा लेकर पैदल ही भगवती चण्डिकाकी ओर दौड़ा॥ ४५॥ |
| चकार स गदाघातं सिंहमौलौ महाबलः।<br>न चचाल हरिः स्थानात्ताडितोऽपि महाबलः॥ ४६ | [उनके पास पहुँचकर] उस महाबली दैत्यने सिंहके मस्तकपर गदासे प्रहार कर दिया, किंतु महाशक्तिशाली सिंह गदासे मारे जानेपर भी अपने स्थानसे विचलित नहीं हुआ॥ ४६॥ |
| अम्बिका तं समालोक्य गदापाणिं पुरःस्थितम्।<br>खड्गेन शितधारेण शिरश्चिच्छेद मौलिमत्॥ ४७ | उसी समय जगदम्बाने हाथमें गदा लिये हुए उस दुर्मुखको सम्मुख उपस्थित देखकर अपनी तीक्ष्ण धारवाली तलवारसे उसके किरीटयुक्त मस्तकको काट दिया॥ ४७॥ |
| छिन्ने च मस्तके भूमौ पपात दुर्मुखो मृतः।<br>जयशब्दं तदा चक्रर्मुदिता निर्जरा भृशम्॥ ४८ | मस्तक कट जानेपर दुर्मुख जमीनपर गिर पड़ा और मर गया। तब देवता परम प्रसन्न होकर देवीकी जय-जयकार करने लगे॥ ४८॥ |