भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 596, कुल 889 में से

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पृष्ठ 596
अ० ११ ]पञ्चम स्कन्ध५८७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
व्यास उवाच<br>विरूपाक्षवचः श्रुत्वा दुर्धरो वाक्यमब्रवीत्।<br>सत्यमुक्तं वचो राजन् विरूपाक्षेण धीमता॥ १७<br><br>ममापि वचनं श्लक्ष्णं श्रोतव्यं धीमता त्वया।<br>कामातुरैषा सुदती लक्ष्यतेऽप्यनुमानतः॥ १८<br><br>भवत्येवंविधा कामं नायिका रूपगर्विता।<br>भीषयित्वा वरारोहा त्वां वशे कर्तुमिच्छति॥ १९व्यासजी बोले— विरूपाक्षकी बात सुनकर दुर्धरने कहा—हे राजन्! बुद्धिमान् विरूपाक्षने यथार्थ बात कही है। प्रतिभासम्पन्न आप अब मेरी भी उत्तम बात सुन लें। अनुमानसे ऐसा प्रतीत होता है कि सुन्दर दाँतोंवाली यह स्त्री कामातुर है। अपने रूपके गर्वमें चूर इस प्रकारकी नायिकाएँ अपने प्रियको डरा-धमकाकर वशमें करनेका प्रयास करती हैं; वैसे ही यह सुन्दरी भी आपको धमकाकर अपने वशमें करना चाहती है॥ १७–१९॥
हावोऽयं मानिनीनां वै तं वेत्ति रसवित्तमः।<br>वक्रोक्तिरेषा कामिन्याः प्रियं प्रति परायणम्॥ २०<br><br>वेत्ति कोऽपि नरः कामं कामशास्त्रविचक्षणः।<br>यदुक्तं नाम बाणैस्त्वां वधिष्ये रणमूर्धनि॥ २१<br><br>हेतुगर्भमिदं वाक्यं ज्ञातव्यं हेतुवित्तमैः।<br>बाणास्तु मानिनीनां वै कटाक्षा एव विश्रुताः॥ २२<br><br>पुष्पाञ्जलिमयाश्चान्ये व्यंग्यानि वचनानि च।<br>का शक्तिरन्यबाणानां प्रेरणे त्वयि पार्थिव॥ २३<br><br>तादृशीनां न सा शक्तिर्ब्रह्मविष्णुहरादिषु।<br>ययोक्तं नेत्रबाणैस्त्वां हनिष्ये मन्द पार्थिवम्॥ २४यह तो मानिनी स्त्रियोंका हाव-भाव होता है और रसका महान् ज्ञाता ही उस हाव-भावको समझ पाता है। आसक्त प्रेमीके प्रति किसी स्त्रीकी ऐसी वक्रोक्ति होती ही है, जिसे कामशास्त्रका विद्वान् कोई विरला पुरुष ही समझ पाता है। जैसे उसने कहा है—'मैं तुम्हें युद्धक्षेत्रमें बाणोंसे मार डालूँगी', इस कथनमें बहुत बड़ा रहस्य निहित है, जिसे रहस्यविद् ही भलीभाँति समझ सकते हैं। मानिनी स्त्रियोंके बाण तो उनके कटाक्ष ही कहे गये हैं और हे राजन्! उनके व्यंग्यपूर्ण वचन दूसरे पुष्पांजलिमय बाण हैं; क्योंकि कटाक्षको छोड़कर वह अन्य प्रकारके बाण भला आपपर क्या चला सकेगी? जब ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदिमें आपपर बाण चलानेकी शक्ति नहीं है, तब वैसी स्त्रियोंमें अन्य बाण चलानेकी शक्ति कहाँ है? उसने अमात्यसे जो कहा था—'हे मन्द! मैं तुम्हारे राजाको अपने नेत्रबाणोंसे बेध डालूँगी' इस कथनका तात्पर्य उन रसज्ञानसे विहीन मन्त्रीने विपरीत ही समझ लिया था॥ २०–२४ १/२॥
विपरीतं परिज्ञातं तेनारसविदा किल।<br>पातयिष्यामि शय्यायां रणमय्यां पतिं तव॥ २५<br><br>विपरीतरतिक्रीडाभाषणं ज्ञेयमेव तत्।<br>करिष्ये विगतप्राणं यदुक्तं वचनं तया॥ २६<br><br>वीर्यं प्राणा इति प्रोक्तं तद्विहीनं न चान्यथा।उसने प्रधान अमात्यसे जो यह कहा था कि 'मैं तुम्हारे स्वामीको रणमयी शय्यापर गिरा दूँगी'— इस कथनका तात्पर्य उस स्त्रीके द्वारा विपरीत रतिक्रीडाका किया जाना समझना चाहिये। साथ ही उसने जो यह बात कही थी कि 'मैं उन्हें प्राणहीन कर दूँगी'—तो [हे राजन्!] पुरुषोंमें वीर्यको ही प्राण कहा गया है, अतः उस स्त्रीके कथनका तात्पर्य आपको वीर्यहीन कर देनेसे है, इसके अतिरिक्त दूसरी बात नहीं॥ २५–२६ १/२॥
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