भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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५८८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० ११

संस्कृत मूल (श्लोक)हिन्दी अनुवाद
व्यंग्याधिक्येन वाक्येन वरयत्युत्तमा नृप॥ २७<br><br>तद्वै विचारतो ज्ञेयं रसग्रन्थविचक्षणैः।<br>इति ज्ञात्वा महाराज कर्तव्यं रससंयुतम्॥ २८<br><br>सामदानद्वयं तस्या नान्योपायोऽस्ति भूपते।<br>रुष्टा वा गर्विता वापि वशगा मानिनी भवेत्॥ २९<br><br>तादृशैर्मधुरैर्वाक्यैरानयिष्ये तवान्तिकम्।<br>किं बहूक्तेन मे राजन् कर्तव्या वशवर्तिनी॥ ३०<br><br>गत्वा मयाधुनैवेयं किङ्करीव सदैव ते।हे राजन्! व्यंग्यभरे इस कथनके द्वारा वह सुन्दरी आपको पतिके रूपमें वरण करना चाहती है। रसशास्त्रके विद्वानोंको विचारपूर्वक इस कथनका अभिप्राय भलीभाँति जान लेना चाहिये। हे महाराज! ऐसा जानकर आपको उसके प्रति रसमय व्यवहार करना चाहिये। हे राजन्! साम (प्रिय वचन) और दान (प्रलोभन आदि)—ये ही दो उपाय उसे वशमें करनेके हैं, इनके अतिरिक्त कोई दूसरा उपाय नहीं है। रुष्ट अथवा मदगर्वित कोई भी मानिनी स्त्री इन उपायोंसे वशवर्तिनी हो जाती है। उसी प्रकारके मधुर वचनोंसे प्रसन्न करके मैं उसे आपके पास ले आऊँगा। हे राजन्! बहुत कहनेसे क्या लाभ! अभी वहाँ जाकर मैं उस स्त्रीको एक दासीकी भाँति सदाके लिये आपके वशमें कर दूँगा॥ २७—३० १/२॥
व्यास उवाच<br>इत्थं निशम्य तद्वाक्यं ताम्रस्तत्त्वविचक्षणः॥ ३१<br><br>उवाच वचनं राजन्निशामय मयोदितम्।<br>हेतुमद्धर्मसहितं रसयुक्तं नयान्वितम्॥ ३२**व्यासजी बोले—**दुर्धरकी यह बात सुनकर तत्त्वविद् ताम्र बोला—हे राजन्! अब आप मेरेद्वारा कही गयी बात सुनिये जो तर्कयुक्त, धर्मसे ओतप्रोत, रसमय तथा नीतिसे भरी हुई है॥ ३१-३२॥
नैषा कामातुरा बाला नानुरक्ता विचक्षणा।<br>व्यंग्यानि नैव वाक्यानि तयोक्तानि तु मानद॥ ३३हे मानद! यह बुद्धिसम्पन्न स्त्री न कामातुर है, न आपपर आसक्त है और न तो उसने व्यंग्यपूर्ण बातें ही कही हैं॥ ३३॥
चित्रमत्र महाबाहो यदेका वरवर्णिनी।<br>निरालम्बा समायाति चित्ररूपा मनोहरा॥ ३४<br><br>अष्टादशभुजा नारी न श्रुता न च वीक्षिता।<br>केनापि त्रिषु लोकेषु पराक्रमवती शुभा॥ ३५<br><br>आयुधान्यपि तावन्ति धृतानि बलवन्ति च।<br>विपरीतमिदं मन्ये सर्वं कालकृतं नृप॥ ३६हे महाबाहो! यह तो महान् आश्चर्य है कि एक अत्यधिक रूपवती और मनोहर स्त्री बिना किसीका आश्रय लिये अकेली ही युद्धहेतु आयी हुई है। अठारह भुजाओंसे सम्पन्न ऐसी पराक्रमशालिनी तथा सुन्दर स्त्री किसीके भी द्वारा तीनों लोकोंमें न तो देखी गयी और न तो सुनी ही गयी। उसने अनेक प्रकारके सुदृढ़ आयुध धारण कर रखे हैं। हे राजन्! इससे मैं तो यह मानता हूँ कि समयने सब कुछ हमारे विपरीत कर दिया है॥ ३४—३६॥
स्वप्नानि दुर्निमित्तानि मया दृष्टानि वै निशि।<br>तेन जानाम्यहं नूनं वैशसं समुपागतम्॥ ३७मैंने रातमें अपशकुनसूचक अनेक स्वप्न देखे हैं, इससे मैं तो यह समझता हूँ कि अब निश्चय ही हमारा विनाश आ चुका है॥ ३७॥
कृष्णाम्बरधरा नारी रुदती च गृहाङ्गणे।<br>दृष्टा स्वप्नेऽप्युषःकाले चिन्तितव्यस्तदत्ययः॥ ३८मैंने आज ही उषाकालमें स्वप्न देखा कि काले वस्त्र धारण किये एक स्त्री घरके आँगनमें रुदन कर रही है। यह विनाशसूचक स्वप्न विचारणीय है॥ ३८॥