भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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अ० ११ ]पञ्चम स्कन्ध५८९
विकृताः पक्षिणो रात्रौ रोरुवन्ति गृहे गृहे।<br>उत्पाता विविधा राजन् प्रभवन्ति गृहे गृहे॥ ३९<br><br>तेन जानाम्यहं नूनं कारणं किञ्चिदेव हि।<br>यत्त्वां प्रार्थयते बाला युद्धाय कृतनिश्चया॥ ४०हे राजन्! आजकल घर-घरमें भयानक पक्षी रोया करते हैं और घर-घरमें विविध प्रकारके उपद्रव होते रहते हैं। इससे मैं तो यह समझता हूँ कि इसमें निश्चितरूपसे कुछ और ही कारण है, तभी तो युद्धके लिये कृतसंकल्प यह स्त्री आपको ललकार रही है॥ ३९-४०॥
नैषास्ति मानुषी नो वा गान्धर्वी न तथासुरी।<br>देवैः कृतेयं ज्ञातव्या माया मोहकरी विभो॥ ४१हे राजन्! यह न तो मानुषी, न गान्धर्वी और न आसुरी ही है; अपितु इसे देवताओंकी रची हुई मोहकरी माया समझना चाहिये॥ ४१॥
कातरत्वं न कर्तव्यं ममैतन्मतमित्यलम्।<br>कर्तव्यं सर्वथा युद्धं यद्भाव्यं तद्भविष्यति॥ ४२<br><br>को वेद दैवकर्तव्यं शुभं वाप्यशुभं तथा।<br>अवलम्ब्य धिया धैर्यं स्थातव्यं वै विचक्षणैः॥ ४३अतः मेरा यह दृढ़ मत है कि इस समय कायरता नहीं प्रदर्शित करनी चाहिये, अपितु हर तरहसे युद्ध करना चाहिये; जो होना होगा वह होगा। भविष्यमें विधाताके द्वारा किये जानेवाले शुभ या अशुभके बारेमें कौन जानता है? अतः विद्वान् पुरुषोंको चाहिये कि बुद्धिपूर्वक धैर्य धारण करके समयकी प्रतीक्षा करें॥ ४२-४३॥
जीवितं मरणं पुंसां दैवाधीनं नराधिप।<br>कोऽपि नैवान्यथा कर्तुं समर्थो भुवनत्रये॥ ४४हे नरेश! प्राणियोंका जन्म तथा मरण दैवके अधीन है। तीनों लोकोंमें कोई भी व्यक्ति इसके विपरीत कुछ भी करनेमें समर्थ नहीं है॥ ४४॥
महिष उवाच<br>गच्छ ताम्र महाभाग युद्धाय कृतनिश्चयः।<br>तामानय वरारोहां जित्वा धर्मेण मानिनीम्॥ ४५महिष बोला—हे महाभाग! हे ताम्र! युद्धके लिये दृढ़ निश्चय करके तुम जाओ और धर्मपूर्वक उस मानिनी स्त्रीको जीतकर यहाँ ले आओ॥ ४५॥
न भवेद्वशगा नारी संग्रामे यदि सा तव।<br>हन्तव्या नान्यथा कामं माननीया प्रयत्नतः॥ ४६यदि संग्राममें वह स्त्री तुम्हारे अधीन न हो सके, तब तुम उसे मार डालना; नहीं तो जहाँतक सम्भव हो, प्रयत्नपूर्वक उसका सम्मान करना॥ ४६॥
वीरस्त्वमसि सर्वज्ञ कामशास्त्रविशारदः।<br>येन केनाप्युपायेन जेतव्या वरवर्णिनी॥ ४७हे सर्वज्ञ! तुम पराक्रमी तथा कामशास्त्रके पूर्ण विद्वान् हो, अतः किसी भी युक्तिसे उस सुन्दरीपर विजय प्राप्त करना॥ ४७॥
त्वरन्वीर महाबाहो सैन्येन महता वृतः।<br>तत्र गत्वा त्वया ज्ञेया विचार्य च पुनः पुनः॥ ४८<br><br>किमर्थमागता चेयं ज्ञातव्यं तद्धि कारणम्।<br>कामाद्वा वैरभावाच्च माया कस्येयमित्युत॥ ४९हे वीर! हे महाबाहो! विशाल सेनाके साथ तुम वहाँ शीघ्रतापूर्वक जाओ और वहाँ पहुँचकर बार-बार चिन्तन-मनन करके इसका पता लगाओ कि यह किसलिये आयी हुई है? तुम यह भी ज्ञात करना कि वह कामभाव अथवा वैरभाव—किस भावसे आयी है और वह किसकी माया है?॥ ४८-४९॥
आदौ तन्निश्चयं कृत्वा ज्ञातव्यं तच्चिकीर्षितम्।<br>पश्चाद्युद्धं प्रकर्तव्यं यथायोग्यं यथाबलम्॥ ५०आरम्भमें इन बातोंकी जानकारी कर लेनेपर तुम यह पता करना कि वह क्या करना चाहती है? तत्पश्चात् उसकी सबलता तथा निर्बलताको भलीभाँति समझकर ही उसके साथ तुम युद्ध करना॥ ५०॥