देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 599, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ें| ५९० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ११ ] |
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| कातरत्वं न कर्तव्यं निर्दयत्वं तथा न च।<br>यादृशं हि मनस्तस्याः कर्तव्यं तादृशं त्वया॥ ५१ | तुम उसके समक्ष न तो कायरता प्रदर्शित करना और न बिलकुल निर्दयताका ही व्यवहार करना। उसकी जैसी मनोदशा देखना, उसीके अनुसार उससे बर्ताव करना॥ ५१॥ | | व्यास उवाच<br>इति तद्भाषितं श्रुत्वा ताम्रः कालवशं गतः।<br>निर्गतः सैन्यसंयुक्तः प्रणम्य महिषं नृपम्॥ ५२<br><br>गच्छन्मार्गे दुरात्मासौ शकुनान्वीक्ष्य दारुणान्।<br>विस्मयञ्च भयं प्राप यममार्गप्रदर्शकान्॥ ५३ | व्यासजी बोले— महिषासुरकी यह बात सुनकर कालके वशीभूत वह ताम्र राजा महिषको प्रणाम करके सेनाके साथ चल पड़ा। चलते समय मार्गमें यमका द्वार दिखलानेवाले अत्यन्त भयानक अपशकुनोंको देख-देखकर वह बहुत विस्मित तथा भयभीत होता था॥ ५२-५३॥ | | स गत्वा तां समालोक्य देवीं सिंहोपरिस्थिताम्।<br>स्तूयमानां सुरैः सर्वैः सर्वायुधविभूषिताम्॥ ५४<br><br>तामुवाच विनीतः सन् वाक्यं मधुरया गिरा।<br>सामभावं समाश्रित्य विनयावनतः स्थितः॥ ५५<br><br>देवि दैत्येश्वरः शृङ्गी त्वद्रूपगुणमोहितः।<br>स्पृहां करोति महिषस्त्वत्पाणिग्रहणाय च॥ ५६ | देवीके समीप पहुँचकर उसने देखा कि वे सिंहपर सवार हैं, वे विविध प्रकारके आयुधोंसे विभूषित हैं तथा सभी देवता उनकी स्तुति कर रहे हैं। तदनन्तर उस ताम्रने विनम्र भावसे खड़े होकर सामनीतिका आश्रय लेकर मधुर वाणीमें शान्तिपूर्वक देवीसे यह वचन कहा—हे देवि! दैत्योंके अधिपति तथा विशाल सींगोंवाले राजा महिष आपके रूप तथा गुणपर मोहित होकर आपसे विवाह करनेकी अभिलाषा रखते हैं॥ ५४—५६॥ | | भावं कुरु विशालाक्षि तस्मिन्नमरदुर्जये।<br>पतिं तं प्राप्य मृद्वङ्गि नन्दने विहराद्भुते॥ ५७ | विशाल नयनों तथा सुकुमार अंगोंवाली हे सुन्दरि! देवताओंके लिये भी अजेय उन महिषसे आप प्रेम कीजिये और उन्हें पतिरूपमें प्राप्त करके अद्भुत नन्दनवनमें विहार कीजिये॥ ५७॥ | | सर्वाङ्गसुन्दरं देहं प्राप्य सर्वसुखास्पदम्।<br>सुखं सर्वात्मना ग्राह्यं दुःखं हेयमिति स्थितिः॥ ५८ | सभी प्रकारके सुखोंके निधानस्वरूप इस सर्वांगसुन्दर शरीरको प्राप्त करके हर तरह सुख भोगना चाहिये और दुःखका तिरस्कार करना चाहिये, यही बात सर्वमान्य है॥ ५८॥ | | करभोरु किमर्थं ते गृहीतान्यायुधान्यलम्।<br>पुष्पकन्दुकयोग्यास्ते कराः कमलकोमलाः॥ ५९ | हे करभोरु! आपने अपने हाथोंमें ये आयुध किसलिये धारण कर रखे हैं? कमलके समान कोमल आपके ये हाथ तो पुष्पोंके गेंद धारण करनेयोग्य हैं॥ ५९॥ | | भ्रूचापे विद्यमानेऽपि धनुषा किं प्रयोजनम्।<br>कटाक्षा विशिखाः सन्ति किं बाणैर्निष्प्रयोजनैः॥ ६० | भौंहरूपी धनुषके रहते आपको यह धनुष धारण करनेसे क्या प्रयोजन है और जब आपके पास ये कटाक्षरूपी बाण हैं तो फिर व्यर्थ बाणोंको धारण करनेसे क्या लाभ?॥ ६०॥ | | संसारे दुःखदं युद्धं न कर्तव्यं विजानता।<br>लोभासक्ताः प्रकुर्वन्ति संग्रामञ्च परस्परम्॥ ६१ | इस संसारमें युद्ध दुःखदायी होता है, अतः ज्ञानीजनको युद्ध नहीं करना चाहिये। राज्य तथा धनके लोलुप लोग ही परस्पर युद्ध करते हैं॥ ६१॥ |