देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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| अ० १२ ] | पञ्चम स्कन्ध | ५९१ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| पुष्पैरपि न योद्धव्यं किं पुनर्विशिखैः शरैः।<br>भेदनं निजगात्राणां कस्य तज्जायते मुदे॥ ६२<br><br>तस्मात्त्वमपि तन्वङ्गि प्रसादं कर्तुमर्हसि।<br>भर्तारं भज मे नाथं देवदानवपूजितम्॥ ६३ | पुष्पोंसे भी युद्ध नहीं करना चाहिये, फिर तीक्ष्ण बाणोंसे युद्धकी बात ही क्या? अपने अंगोंका छिद जाना भला किसकी प्रसन्नताका कारण बन सकता है? अतएव हे तन्वंगि! आप कृपा करें और देवताओं तथा दानवोंके द्वारा पूजित मेरे स्वामी महिषको पतिके रूपमें स्वीकार कर लें॥ ६२-६३॥ |
| स तेऽत्र वाञ्छितं सर्वं करिष्यति मनोरथम्।<br>त्वं पट्टमहिषी राज्ञः सर्वथा नात्र संशयः॥ ६४ | वे आपके सभी वांछित मनोरथ पूर्ण कर देंगे और उन्हें पतिरूपमें पाकर आप सदाके लिये उनकी पटरानी बन जायँगी; इसमें सन्देह नहीं है॥ ६४॥ |
| वचनं कुरु मे देवि प्राप्स्यसे सुखमुत्तमम्।<br>संग्रामे जयसन्देहः कष्टं प्राप्य न संशयः॥ ६५ | हे देवि! आप मेरी बात मान लें, इससे आपको उत्तम सुख मिलेगा। कष्ट पाकर भी संग्राममें विजयका सन्देह बना रहता है, इसमें संशय नहीं है॥ ६५॥ |
| जानासि राजनीतिं त्वं यथावद्वरवर्णिनि।<br>भुंक्ष्व राज्यसुखं पूर्णं वर्षाणामयुतायुतम्॥ ६६ | हे सुन्दरि! आप राजनीति भलीभाँति जानती हैं, अतः हजारों-हजारों वर्षोंतक राज्यसुखका भोग करें॥ ६६॥ |
| पुत्रस्ते भविता कान्तः सोऽपि राजा भविष्यति।<br>यौवने क्रीडयित्वान्ते वार्धक्ये सुखमाप्स्यसि॥ ६७ | आपको तेजस्वी पुत्र प्राप्त होगा; वह भी राजा बनेगा। इस प्रकार आप युवावस्थामें क्रीड़ासुख प्राप्त करके वृद्धावस्थामें आनन्द प्राप्त करेंगी॥ ६७॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे ताम्रकृतं देवीं प्रति विस्रंसनवचनवर्णनं नामैकादशोऽध्यायः॥ ११॥
अथ द्वादशोऽध्यायः
देवीके अट्टहाससे भयभीत होकर ताम्रका महिषासुरके पास भाग आना, महिषासुरका अपने मन्त्रियोंके साथ पुनः विचार-विमर्श तथा दुर्धर, दुर्मुख और बाष्कलकी गर्वोक्ति
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| व्यास उवाच<br>तन्निशम्य वचस्तस्य ताम्रस्य जगदम्बिका।<br>मेघगम्भीरया वाचा हसन्ती तमुवाच ह॥ १ | **व्यासजी बोले—**उस ताम्रकी वह बात सुनकर भगवती जगदम्बिका मेघके समान गम्भीर वाणीमें उससे हँसते हुए कहने लगीं॥ १॥ |
| देव्युवाच<br>गच्छ ताम्र पतिं ब्रूहि मुमूर्षुं मन्दचेतसम्।<br>महिषं चातिकामार्तं मूढं ज्ञानविवर्जितम्॥ २<br><br>यथा ते महिषी माता प्रौढा यवसभक्षिणी।<br>नाहं तथा शृङ्गवती लम्बपुच्छा महोदरी॥ ३ | **देवी बोलीं—**हे ताम्र! तुम अपने स्वामी महिषके पास जाओ और मरनेको उद्यत, मन्दबुद्धि, अति कामातुर तथा ज्ञानशून्य उस मूर्खसे कहो कि जिस प्रकार तुम्हारी माता महिषी घास खानेवाली, प्रौढा, विशाल सींगोंवाली, लम्बी पूँछवाली तथा महान् उदरवाली है; वैसी मैं नहीं हूँ॥ २-३॥ |
| न कामयेऽहं देवेशं नैव विष्णुं न शङ्करम्।<br>धनदं वरुणं नैव ब्रह्माणं न च पावकम्॥ ४ | मैं न देवराज इन्द्रको, न विष्णुको, न शिवको, न कुबेरको, न वरुणको, न ब्रह्माको और न तो |