भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 601, कुल 889 में से

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पृष्ठ 601
५९२श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १२
एतान्देवगणान्हित्वा पशुं केन गुणेन वै।<br>वृणोम्यहं वृथा लोके गर्हणा मे भवेदिति॥ ५अग्निदेवको ही चाहती हूँ। जब मैंने इन देवताओंकी उपेक्षा कर दी, तब भला मैं एक पशुका उसके किस गुणसे प्रसन्न होकर वरण करूँगी; इससे तो संसारमें मेरी निन्दा ही होगी!॥ ४-५॥
नाहं पतिंवरा नारी वर्तते मे पतिः प्रभुः।<br>सर्वकर्ता सर्वसाक्षी ह्यकर्ता निःस्पृहः स्थिरः॥ ६<br><br>निर्गुणो निर्ममोऽनन्तो निरालम्बो निराश्रयः।<br>सर्वज्ञः सर्वगः साक्षी पूर्णः पूर्णाशयः शिवः॥ ७<br><br>सर्वावासक्षमः शान्तः सर्वदृक्सर्वभावनः।<br>तं त्यक्त्वा महिषं मन्दं कथं सेवितुमुत्सहे॥ ८मैं पतिका वरण करनेवाली साधारण स्त्री नहीं हूँ। मेरे पति तो साक्षात् प्रभु हैं। वे सब कुछ करनेवाले, सबके साक्षी, कुछ भी न करनेवाले, इच्छारहित, सदा रहनेवाले, निर्गुण, मोहरहित, अनन्त, निरालम्ब, आश्रयरहित, सर्वज्ञ, सर्वव्यापी, साक्षी, पूर्ण, पूर्ण आशयवाले, कल्याणकारी, सबको आश्रय देनेमें समर्थ, शान्त, सबको देखनेवाले तथा सबकी भावनाओंको जाननेवाले हैं। उन प्रभुको छोड़कर मैं मूर्ख महिषको अपना पति क्यों बनाना चाहूँगी?॥ ६-८॥
प्रबुध्य युध्यतां कामं करोमि यमवाहनम्।<br>अथवा मनुजानां वै करिष्ये जलवाहकम्॥ ९[उससे कह देना—] अब तुम उठकर युद्ध करो। मैं तुम्हें या तो यमका वाहन बना दूँगी अथवा मनुष्योंके लिये पानी ढोनेवाला महिष बना दूँगी॥ ९॥
जीवितेच्छास्ति चेत्याप गच्छ पातालमाशु वै।<br>समस्तैर्दानवैर्युक्तस्त्वन्यथा हन्मि सङ्गरे॥ १०अरे पापी! यदि जीवित रहनेकी तुम्हारी इच्छा हो तो शीघ्र ही समस्त दानवोंको साथ लेकर पाताललोक चले जाओ, अन्यथा मैं युद्धमें मार डालूँगी॥ १०॥
कामं सदृशयोर्र्योगः संसारे सुखदो भवेत्।<br>अन्यथा दुःखदो भूयादज्ञानाद्यदि कल्पितः॥ ११इस संसारमें समान कुल तथा आचारवालोंका परस्पर सम्बन्ध सुखदायक होता है, इसके विपरीत बिना सोचे-समझे यदि सम्बन्ध हो जाता है, तो वह बड़ा दुःखदायी होता है॥ ११॥
मूर्खस्त्वमसि यद् ब्रूषे पतिं मे भज भामिनि।<br>क्वाहं क्व महिषः शृङ्गी सम्बन्धः कीदृशो द्वयोः॥ १२[अरे महिष!] तुम मूर्ख हो जो यह कहते हो कि 'हे भामिनि! मुझे पतिरूपमें स्वीकार कर लो।' कहाँ मैं और कहाँ तुम सींग धारण करनेवाले महिष! हम दोनोंका यह कैसा सम्बन्ध! अतः अब तुम
गच्छ युध्यस्व वा कामं हनिष्येऽहं सबान्धवम्।<br>यज्ञभागं देवलोकं नोचेत्त्यक्त्वा सुखी भव॥ १३[पाताललोक] चले जाओ अथवा मुझसे युद्ध करो, मैं तुम्हें बन्धु-बान्धवोंसहित निश्चय ही मार डालूँगी, नहीं तो देवताओंका यज्ञभाग दे दो और देवलोक छोड़कर सुखी हो जाओ॥ १२-१३॥
व्यास उवाच<br>इत्युक्त्वा सा तदा देवी जगर्ज भृशमद्भुतम्।<br>कल्पान्तसदृशं नादं चक्रे दैत्यभयावहम्॥ १४व्यासजी बोले—ऐसा कहकर देवीने बड़े जोरसे अद्भुत गर्जन किया। वह गर्जन प्रलयकालीन भीषण ध्वनिके समान तथा दैत्योंको भयभीत कर देनेवाला था। उस नादसे पृथ्वी काँप उठी और पर्वत डगमगाने
चकम्पे वसुधा चेलुस्तेन शब्देन भूधराः।<br>गर्भाश्च दैत्यपत्नीनां सस्रंसुर्गर्जितस्वनात्॥ १५लगे तथा दैत्योंकी पत्नियोंके गर्भ गिर गये॥ १४-१५॥
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