भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 602, कुल 889 में से

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पृष्ठ 602
अ० १२ ]पञ्चम स्कन्ध५९३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ताम्रः श्रुत्वा च तं शब्दं भयत्रस्तमनास्तदा।<br>पलायनं ततः कृत्वा जगाम महिषान्तिकम्॥ १६उस शब्दको सुनकर ताम्रके मनमें भय व्याप्त हो गया और तब वह वहाँसे भागकर महिषासुरके पास जा पहुँचा॥ १६॥
नगरे तस्य ये दैत्यास्तेऽपि चिन्तामवाप्नुवन्।<br>बधिरीकृतकर्णाश्च पलायनपरा नृप॥ १७हे राजन्! उसके नगरमें जो भी दैत्य थे, वे सब बड़े चिन्तित हुए। वे उस ध्वनिके प्रभावसे बधिर हो गये और वहाँसे भागने लगे॥ १७॥
तदा क्रोधेन सिंहोऽपि ननाद भृशमुत्सटः।<br>तेन नादेन दैतेया भयं जग्मुरपि स्फुटम्॥ १८उसी समय देवीका सिंह भी क्रोधपूर्वक अपने अयालों (गर्दनके बालों)-को फैलाकर बड़े जोरसे दहाड़ा। उस गर्जनसे सभी दैत्य बहुत डर गये॥ १८॥
ताम्रं समागतं दृष्ट्वा हयारिरपि मोहितः।<br>चिन्तयामास सचिवैः किं कर्तव्यमतः परम्॥ १९ताम्रको वापस आया हुआ देखकर महिषासुरको बहुत विस्मय हुआ। वह उसी समय मन्त्रियोंके साथ विचार-विमर्श करने लगा कि अब आगे क्या किया जाय?॥ १९॥
दुर्गग्रहो वा कर्तव्यो युद्धं निर्गत्य वा पुनः।<br>पलायने कृते श्रेयो भवेद्वा दानवोत्तमाः॥ २०[उसने कहा—] हे श्रेष्ठ दानवो! हमें आत्मरक्षार्थ किलेके भीतर ही रहना चाहिये अथवा बाहर निकलकर युद्ध करना चाहिये अथवा भाग जानेमें ही हमारा कल्याण है?॥ २०॥
बुद्धिमन्तो दुराधर्षाः सर्वशास्त्रविशारदाः।<br>मन्त्रः खलु प्रकर्तव्यः सुगुप्तः कार्यसिद्धये॥ २१<br><br>मन्त्रमूलं स्मृतं राज्यं यदि स स्यात्सुरक्षितः।<br>मन्त्रिभिश्च सदाचारैर्विधेयः सर्वथा बुधैः॥ २२आपलोग बुद्धिमान्, अजेय तथा सभी शास्त्रोंके विद्वान् हैं। अतः मेरे कार्यकी सिद्धिके लिये आपलोग अत्यन्त गुप्त मन्त्रणा करें; क्योंकि मन्त्रणाको ही राज्यका मूल कहा गया है। यदि मन्त्रणा सुरक्षित (गुप्त) रहती है, तभी राज्यकी सुरक्षा सम्भव है। अतएव राजाको चाहिये कि बुद्धिमान् तथा सदाचारी मन्त्रियोंके साथ सदा गुप्त मन्त्रणा करे॥ २१-२२॥
मन्त्रभेदे विनाशः स्याद्राज्यस्य भूपतेस्तथा।<br>तस्माद्द्भेदभयाद् गुप्तः कर्तव्यो भूतिमिच्छता॥ २३मन्त्रणाके खुल जानेपर राज्य तथा राजा—इन दोनोंका विनाश हो जाता है। अतः अपने अभ्युदयकी इच्छा करनेवाले राजाको चाहिये कि भेद खुल जानेके भयसे सदा गुप्त मन्त्रणा करे॥ २३॥
तदत्र मन्त्रिभिर्वाच्यं वचनं हेतुमद्धितम्।<br>कालदेशानुसारेण विचिन्त्य नीतिनिर्णयम्॥ २४अतः इस समय आप मन्त्रिगण नीति-निर्णयपर सम्यक् विचार करके देश-कालके अनुसार मुझे सार्थक तथा हितकर परामर्श प्रदान करें॥ २४॥
या योषात्र समायाता प्रबला देवनिर्मिता।<br>एकाकिनी निरालम्बा कारणं तद्विचिन्त्यताम्॥ २५देवताओंद्वारा निर्मित जो यह अत्यन्त बलवती स्त्री बिना किसी सहायताके अकेली ही यहाँ आयी हुई है, उसके रहस्यपर आपलोग विचार करें॥ २५॥
युद्धं प्रार्थयते बाला किमाश्चर्यमतः परम्।<br>श्रेयोऽत्र विपरीतं वा को वेत्ति भुवनत्रये॥ २६वह बाला हमें युद्धके लिये चुनौती दे रही है, इससे बढ़कर आश्चर्य और क्या हो सकता है? इसमें मेरी विजय होगी अथवा पराजय—इसे तीनों लोकोंमें भला कौन जानता है?॥ २६॥