देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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५९४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १२
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| न बहूनां जयोऽप्यस्ति नैकस्य च पराजयः।<br>दैवाधीनौ सदा ज्ञेयौ युद्धे जयपराजयौ॥ २७ | न तो बहुत संख्यावालोंकी ही सदा विजय होती है और न तो अकेला रहते हुए भी किसीकी पराजय ही होती है। युद्धमें जय तथा पराजयको सदा दैवके अधीन जानना चाहिये॥ २७॥ |
| उपायवादिनः प्राहुर्दैवं किं केन वीक्षितम्।<br>अदृष्टमिति यन्नाम प्रवदन्ति मनीषिणः॥ २८<br><br>तत्सत्त्वेऽपि प्रमाणं किं कातराशावलम्बनम्।<br>न समर्थजनानां हि दैवं कुत्रापि लक्ष्यते॥ २९<br><br>उद्यमो दैवमेतौ हि शूरकातरयोर्मतम्।<br>विचिन्त्याद्य धिया सर्वं कर्तव्यं कार्यमादरात्॥ ३० | पुरुषार्थवादी लोग कहते हैं कि दैव क्या है, उसे किसने देखा है; इसीलिये तो बुद्धिमान् उसे 'अदृष्ट' कहते हैं। उसके होनेमें क्या प्रमाण है? वह केवल कायरोंको आशा बँधानेका साधन है, सामर्थ्यवान् लोग उसे कहीं नहीं देखते। उद्यम और दैव—ये दोनों ही वीर तथा कायर लोगोंकी मान्यताएँ हैं। अतः बुद्धिपूर्वक सारी बातोंपर विचार करके हमें कर्तव्यका निश्चय करना चाहिये॥ २८-३०॥ |
| व्यास उवाच<br>इति राज्ञो वचः श्रुत्वा हेतुगर्भं महायशाः।<br>बिडालाख्यो महाराजमित्युवाच कृताञ्जलिः॥ ३१<br><br>राजन्नेषा विशालाक्षी ज्ञातव्या यत्नतः पुनः।<br>किमर्थमिह सम्प्राप्ता कुतः कस्य परिग्रहः॥ ३२ | व्यासजी बोले— राजा महिषकी यह सारगर्भित बात सुनकर महायशस्वी बिडालाख्यने हाथ जोड़कर अपने महाराज महिषासुरसे यह वचन कहा—हे राजन्! विशाल नयनोंवाली इस स्त्रीके विषयमें सावधानीपूर्वक बार-बार यह पता लगाया जाना चाहिये कि यह यहाँ किसलिये और कहाँसे आयी हुई है तथा यह किसकी पत्नी है?॥ ३१-३२॥ |
| मरणं ते परिज्ञाय स्त्रिया सर्वात्मना सुरैः।<br>प्रेषिता पद्मपत्राक्षी समुत्पाद्य स्वतेजसा॥ ३३ | [मैं तो यह समझता हूँ कि] 'स्त्रीके द्वारा ही आपकी मृत्यु होगी'—ऐसा भलीभाँति जानकर सभी देवताओंने अपने तेजसे उस कमलनयनी स्त्रीका निर्माण करके यहाँ भेजा है॥ ३३॥ |
| तेऽपि छन्नाः स्थिताः खेऽत्र सर्वे युद्धदिदृक्षवः।<br>समयेऽस्याः सहायास्ते भविष्यन्ति युयुत्सवः॥ ३४ | युद्ध देखनेकी इच्छावाले वे देवता भी आकाशमें छिपकर विद्यमान हैं और अवसर आनेपर युद्धकी इच्छावाले देवता भी उसकी सहायता करेंगे॥ ३४॥ |
| पुरतः कामिनीं कृत्वा ते वै विष्णुपुरोगमाः।<br>वधिष्यन्ति च नः सर्वान्सा त्वां युद्धे हनिष्यति॥ ३५ | उस स्त्रीको आगे करके वे विष्णु आदि प्रधान देवता युद्धमें हम सबका वध कर देंगे और वह स्त्री भी आपको मार डालेगी॥ ३५॥ |
| एतच्चिकीर्षितं तेषां मया ज्ञातं नराधिप।<br>भवितव्यस्य न ज्ञानं वर्तते मम सर्वथा॥ ३६<br><br>योद्धव्यं न त्वयाद्येति नाहं वक्तुं क्षमः प्रभो।<br>प्रमाणं त्वं महाराज कार्येऽत्र देवनिर्मिते॥ ३७ | हे नरेश! मैंने तो यही समझा है कि उन देवताओंका यही अभीष्ट है, किंतु मुझे भविष्यमें होनेवाले परिणामका बिलकुल ज्ञान नहीं है। हे प्रभो! मैं इस समय यह भी नहीं कह सकता कि आप युद्ध न करें। हे महाराज! देवताओंके द्वारा निर्मित इस कार्यमें कुछ भी निर्णय लेनेमें आप ही प्रमाण हैं॥ ३६-३७॥ |