देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 604, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ें| अ० १२] | पञ्चम स्कन्ध | ५१५ | | :--- | :--- | | तदर्थेऽस्माभिरनिशं मर्तव्यं कार्यगौरवात्।<br>विहर्तव्यं त्वया सार्धमेष धर्मोऽनुजीविनाम्॥ ३८ | हम अनुयायियोंका तो यही धर्म है कि अवसर आनेपर आपके लिये सदा मरनेको तैयार रहें अथवा आपके साथ आनन्दपूर्वक रहें॥ ३८॥ | | विचारोऽत्र महानस्ति यदेका कामिनी नृप।<br>युद्धं प्रार्थयतेऽस्माभिः ससैन्यैर्बलदर्पितैः॥ ३९ | हे राजन्! अद्भुत बात तो यह है कि बलाभिमानी और सेनासम्पन्न हमलोगोंको एक स्त्री युद्धके लिये चुनौती दे रही है॥ ३९॥ | | दुर्मुख उवाच<br>राजन् युद्धे जयो नोऽद्य भविता वेद्म्यहं किल।<br>पलायनं न कर्तव्यं यशोहानिकरं नृणाम्॥ ४० | दुर्मुख बोला— हे राजन्! मैं यह पूर्णरूपसे जानता हूँ कि आज युद्धमें विजय निश्चितरूपसे हमलोगोंकी होगी। हमलोगोंको पलायन नहीं करना चाहिये; क्योंकि युद्धसे भाग जाना पुरुषोंकी कीर्तिको नष्ट करनेवाला होता है॥ ४०॥ | | इन्द्रादीनां संयुगेऽपि न कृतं यज्जुगुप्सितम्।<br>एकाकिनीं स्त्रियं प्राप्य को हि कुर्यात्पलायनम्॥ ४१ | इन्द्र आदि देवताओंके साथ भी युद्धमें जब हमलोगोंने यह निन्दनीय कार्य नहीं किया था, तब उस अकेली स्त्रीको सामने पाकर उससे डरकर भला कौन पलायन करेगा?॥ ४१॥ | | तस्माद्युद्धं प्रकर्तव्यं मरणं वा रणे जयः।<br>यद्भावि तद्भवत्येव कात्र चिन्ता विपश्यतः॥ ४२ | अतः अब हमें युद्ध आरम्भ कर देना चाहिये, युद्धमें हमारी मृत्यु हो अथवा विजय। जो होना होगा वह तो होगा ही। यथार्थ ज्ञानवालेको इस विषयमें चिन्ताकी क्या आवश्यकता?॥ ४२॥ | | मरणेऽत्र यशःप्राप्तिर्जीवने च तथा सुखम्।<br>उभयं मनसा कृत्वा कर्तव्यं युद्धमद्य वै॥ ४३ | रणभूमिमें मरनेपर कीर्ति मिलेगी और विजयी होनेपर जीवनमें सुख मिलेगा। इन दोनों ही बातोंको मनमें स्थिर करके हमें आज ही युद्ध छेड़ देना चाहिये॥ ४३॥ | | पलायने यशोहानिर्मरणं चायुषः क्षये।<br>तस्माच्छोको न कर्तव्यो जीविते मरणे वृथा॥ ४४ | युद्धसे पलायन कर जानेसे हमारा यश नष्ट हो जायगा। आयुके समाप्त हो जानेपर मृत्यु होनी तो निश्चित ही है। अतएव जीवन तथा मरणके लिये व्यर्थ चिन्ता नहीं करनी चाहिये॥ ४४॥ | | व्यास उवाच<br>दुर्मुखस्य वचः श्रुत्वा बाष्कलो वाक्यमब्रवीत्।<br>प्रणतः प्राञ्जलिर्भूत्वा राजानं वाक्यकोविदः॥ ४५ | व्यासजी बोले— दुर्मुखका विचार सुनकर बात करनेमें परम प्रवीण बाष्कल हाथ जोड़कर विनम्रतापूर्वक राजा महिषासुरसे यह वचन कहने लगा॥ ४५॥ | | बाष्कल उवाच<br>राजंश्चिन्ता न कर्तव्या कार्येऽस्मिन्कातरप्रिये।<br>अहमेको हनिष्यामि चण्डीं चञ्चललोचनाम्॥ ४६ | बाष्कल बोला— हे राजन्! कायर लोगोंके लिये प्रिय इस [पलायन] कार्यके विषयमें आपको विचार नहीं करना चाहिये। मैं उस चंचल नेत्रोंवाली चण्डीको अकेला ही मार डालूँगा॥ ४६॥ | | उत्साहस्तु प्रकर्तव्यः स्थायीभावो रसस्य च।<br>भयानको भवेद्वैरी वीरस्य नृपसत्तम॥ ४७ | हमें सर्वदा उत्साहसे सम्पन्न रहना चाहिये; क्योंकि उत्साह ही वीररसका स्थायीभाव है। हे नृपश्रेष्ठ! भयानक रस तो वीररसका वैरी है॥ ४७॥ |