भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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| ५९६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १२ | | :--- | :--- |

| तस्मात्त्यक्त्वा भयं भूप करिष्ये युद्धमद्भुतम्।<br>नयिष्यामि नरेन्द्राहं चण्डिकां यमसादनम्॥ ४८<br><br>न बिभेमि यमादिन्द्रात्कुबेराद्वरुणादपि।<br>वायोर्वह्नेस्तथा विष्णोः शङ्कराच्छशिनो रवेः॥ ४९<br><br>एकाकिनी तथा नारी किं पुनर्मदगर्विता।<br>अहं तां निहनिष्यामि विशिखैश्च शिलाशितैः॥ ५०<br><br>पश्य बाहुबलं मेऽद्य विहरस्व यथासुखम्।<br>भवतात्र न गन्तव्यं संग्रामेऽप्यनया समम्॥ ५१ | अतएव हे राजन्! भयका त्याग करके मैं अद्भुत युद्ध करूँगा। हे नरेन्द्र! मैं उस चण्डिकाको मारकर उसे यमपुरी पहुँचा दूँगा॥ ४८॥<br><br>मैं यम, इन्द्र, कुबेर, वरुण, वायु, अग्नि, विष्णु, शिव, चन्द्रमा और सूर्यसे भी नहीं डरता, तब उस अकेली तथा मदोन्मत्त स्त्रीसे भला क्यों डरूँगा? पत्थरपर सान धरे हुए तीक्ष्ण बाणोंसे मैं उस स्त्रीका वध कर दूँगा। आज आप मेरा बाहुबल तो देखिये और इस स्त्रीके साथ युद्ध करनेके लिये आपको संग्राममें जानेकी आवश्यकता नहीं है; आप केवल सुखपूर्वक विहार कीजिये॥ ४९–५१॥ | | <center>व्यास उवाच</center>एवं ब्रुवति राजेन्द्र बाष्कले मदगर्विते।<br>प्रणम्य नृपतिं तत्र दुर्धरो वाक्यमब्रवीत्॥ ५२ | व्यासजी बोले— दैत्यराज महिषसे मदोन्मत्त बाष्कलके ऐसा कहनेपर वहाँ उपस्थित दुर्धर अपने राजा महिषासुरको प्रणाम करके कहने लगा॥ ५२॥ | | <center>दुर्धर उवाच</center>महिषाहं विजेष्यामि देवीं देवविनिर्मिताम्।<br>अष्टादशभुजां रम्यां कारणाच्च समागताम्॥ ५३ | दुर्धर बोला— हे महाराज महिष! रहस्यमय ढंगसे आयी हुई उस देवनिर्मित अठारह भुजाओंवाली तथा मनोहर देवीपर मैं विजय प्राप्त करूँगा॥ ५३॥ | | राजन् भीषयितुं त्वां वै मायैषा निर्मिता सुरैः।<br>विभीषिकेयं विज्ञाय त्यज मोहं मनोगतम्॥ ५४ | हे राजन्! आपको भयभीत करनेके लिये ही देवताओंने इस मायाकी रचना की है। यह एक विभीषिकाममात्र है—ऐसा जानकर आप अपने मनकी व्याकुलता दूर कर दीजिये॥ ५४॥ | | राजनीतिरियं राजन् मन्त्रिकृत्यं तथा शृणु।<br>सात्त्विका राजसाः केचित्तामसाश्च तथापरे॥ ५५<br><br>मन्त्रिणस्त्रिविधा लोके भवन्ति दानवाधिप।<br>सात्त्विकाः प्रभुकार्याणि साधयन्ति स्वशक्तिभिः॥ ५६<br><br>आत्मकृत्यं प्रकुर्वन्ति स्वामिकार्याविरोधतः।<br>एकचित्ता धर्मपरा मन्त्रशास्त्रविशारदाः॥ ५७ | हे राजन्! यह सब तो राजनीतिकी बात हुई, अब आप मन्त्रियोंका कर्तव्य सुनिये। हे दानवेन्द्र! तीन प्रकारके मन्त्री संसारमें होते हैं। उनमें कुछ सात्त्विक, कुछ राजस तथा अन्य तामस होते हैं। सात्त्विक मन्त्री अपनी पूरी शक्तिसे अपने स्वामीका कार्य सिद्ध करते हैं। वे अपने स्वामीके कार्यमें बिना कोई अवरोध उत्पन्न किये अपना कार्य करते हैं। ऐसे मन्त्री एकाग्रचित्त, धर्मपरायण तथा मन्त्रशास्त्रों (मन्त्रणासे सम्बन्धित शास्त्र)-के विद्वान् होते हैं॥ ५५–५७॥ | | राजसा भिन्नचित्ताश्च स्वकार्यनिरताः सदा।<br>कदाचित्स्वामिकार्यं ते प्रकुर्वन्ति यदृच्छया॥ ५८ | राजस प्रकृतिके मन्त्री चंचल चित्तवाले होते हैं और वे सदा अपना कार्य साधनेमें लगे रहते हैं। जब कभी उनके मनमें आ जाता है, तब वे अपने स्वामीका भी काम कर देते हैं॥ ५८॥ | | तामसा लोभनिरताः स्वकार्यनिरताः सदा।<br>प्रभुकार्यं विनाशयैव स्वकार्यं साधयन्ति ते॥ ५९ | तामस प्रकृतिके मन्त्री लोभपरायण होते हैं और वे सदैव अपना कार्य सिद्ध करनेमें संलग्न रहते हैं। वे अपने स्वामीका कार्य विनष्ट करके भी अपना |