देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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५९८ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| स कृत्वा मानुषं रूपं सर्वलक्षणसंयुतम्।<br>भूषितं भूषणैर्दिव्यैस्त्वामेष्यति रहः किल॥ ४ | वे सभी लक्षणोंसे सम्पन्न मनुष्य-रूप धारण करके तथा दिव्य आभूषणोंसे अलंकृत होकर एकान्तमें आपसे मिलनेके लिये आयेंगे॥ ४॥ |
| त्रैलोक्यविभवं कामं त्वमेष्यसि शुचिस्मिते।<br>महिषे परं भावं कुरु कान्ते मनोगतम्॥ ५ | हे सुन्दर मुस्कानवाली देवि! [उन्हें पतिके रूपमें स्वीकार कर लेनेपर] आपको तीनों लोकोंका वैभव निश्चय ही प्राप्त हो जायगा। अतः हे कान्ते! उन महिषासुरके प्रति आप अपने मनमें परम प्रेमभाव रखिये॥ ५॥ |
| कृत्वा पतिं महावीरं संसारसुखमद्भुतम्।<br>त्वं प्राप्स्यसि पिकालापे योषितां खलु वाञ्छितम्॥ ६ | हे कोकिलभाषिणि! महान् पराक्रमी महिषासुरको अपना पति बनाकर आप स्त्रियोंके लिये अभीष्ट अद्भुत सांसारिक सुख प्राप्त करेंगी॥ ६॥ |
| देव्युवाच | देवी बोलीं— |
| जाल्म त्वं किं विजानासि नारीयं काममोहिता।<br>मन्दबुद्धिर्बलात्यर्थं भजेयं महिषं शठम्॥ ७ | अरे दुष्ट! क्या तुम यह समझ रहे हो कि यह कोई काममोहित, बुद्धिहीन तथा बलरहित नारी है? मैं उस मूर्ख महिषासुरकी सेवा कैसे कर सकती हूँ?॥ ७॥ |
| कुलशीलगुणैस्तुल्यं तं भजन्ति कुलस्त्रियः।<br>अधिकं रूपचातुर्यबुद्धिशीलक्षमादिभिः॥ ८ | कुलीन स्त्रियाँ कुल, चरित्र तथा गुणमें समानता रखनेवाले एवं रूप, चतुरता, बुद्धि, व्यवहार, क्षमा आदिसे विशेषरूपसे सम्पन्न पुरुषको ही स्वीकार करती हैं॥ ८॥ |
| का नु कामातुरा नारी भजेच्च पशुरूपिणम्।<br>पशूनामधमं नूनं महिषं देवरूपिणी॥ ९ | ऐसी कौन देवरूपिणी नारी होगी, जो कामातुर होकर पशुरूपधारी तथा पशुओंमें भी अधम महिषको अपना पति बनाना चाहेगी?॥ ९॥ |
| गच्छतं महिषं तूर्णं भूपं बाष्कलदुर्मुखौ।<br>वदतं मद्वचो दैत्यं गजंतुल्यं विषाणिनम्॥ १०<br><br>पातालं गच्छ वाभ्येत्य संग्रामं कुरु वा मया।<br>रणे जाते सहस्त्राक्षो निर्भयः स्यादिति ध्रुवम्॥ ११<br><br>हत्वाहं त्वां गमिष्यामि नान्यथा गमनं मम।<br>इत्थं ज्ञात्वा सुदुर्बुद्धे यथेच्छसि तथा कुरु॥ १२<br><br>मामनिर्जित्य भूभागे न स्थानं ते कदाचन।<br>भविष्यति चतुष्पाद दिवि वा गिरिकन्दरे॥ १३ | हे बाष्कल और दुर्मुख! तुम लोग तत्काल अपने राजा महिषासुरके पास जाओ और हाथीके समान विशाल शरीरवाले तथा शृङ्गधारी उस दानवसे मेरा सन्देश कह दो—‘तुम पाताललोक चले जाओ अथवा यहाँ आकर मेरे साथ युद्ध करो। संग्राम होनेपर ही इन्द्र निर्भय हो सकते हैं—यह निश्चित है। मैं तुम्हारा वध करके ही जाऊँगी, बिना तुम्हें मारे मैं नहीं जा सकती। हे महामूर्ख! यह समझकर अब तुम जो चाहते हो वैसा करो। हे चतुष्पाद! बिना मुझको पराजित किये पृथ्वीके किसी भी भागमें, अन्तरिक्ष या पर्वतकी गुफामें कहीं भी अब तुम्हें शरण नहीं मिलेगी’॥ १०—१३॥ |
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
| इत्युक्तौ तौ तया दैत्यौ कोपाकुलितलोचनौ।<br>धनुर्बाणधरौ वीरौ युद्धकामौ बभूवतुः॥ १४ | देवीके ऐसा कहनेपर क्रोधसे तमतमाये नेत्रोंवाले वे दोनों दैत्य धनुष-बाण लेकर युद्ध करनेके लिये तैयार हो गये॥ १४॥ |