देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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| अ० १३ ] | पञ्चम स्कन्ध | ६०१ | | :--- | :--- |
| गच्छ चण्डि हनिष्यामि त्वामद्यैव सुबालिशे।<br>दैत्यं वा भज वामोरु महिषं मदगर्वितम्॥ ३८ | हे चण्डिके! हे मूर्ख बाले! भाग जाओ, नहीं तो मैं तुम्हें अभी मार डालूँगा अथवा हे वामोरु! मदसे मत्त महिषासुरको स्वीकार कर लो॥ ३८॥ |
| देव्युवाच<br>आसन्नमरणः कामं प्रलपस्यद्य मोहितः।<br>अद्यैव त्वां हनिष्यामि यथायं बाष्कलो हतः॥ ३९ | देवी बोलीं—अब तुम्हारी मृत्यु समीप है, तभी तुम मोहित होकर ऐसा प्रलाप कर रहे हो। अभी मैं तुम्हें भी उसी प्रकार मार डालूँगी, जैसे मैंने इस बाष्कलको मारा है॥ ३९॥ |
| गच्छ वा तिष्ठ वा मन्द मरणं यदि रोचते।<br>हत्वा त्वां वै वधिष्यामि बालिशं महिषीसुतम्॥ ४० | हे मूर्ख! भाग जाओ और यदि तुम्हें मृत्यु अच्छी लगती हो तो रुके रहो। तुम्हें मारनेके बाद मैं मूर्ख महिषासुरका भी संहार कर दूँगी॥ ४०॥ |
| तच्छ्रुत्वा वचनं तस्या दुर्मुखो मर्तुमुद्यतः।<br>मुमोच बाणवृष्टिं तु चण्डिकां प्रति दारुणाम्॥ ४१ | देवीका वह वचन सुनकर मरणोन्मुख दुर्मुख भगवती चण्डिकाके ऊपर भीषण बाण-वृष्टि करने लगा॥ ४१॥ |
| सापि तां तरसा छित्त्वा बाणवृष्टिं शितैः शरैः।<br>जघान दानवं क्रुद्धा वृत्रं वज्रधरो यथा॥ ४२ | भगवतीने भी कुपित होकर अपने तीक्ष्ण बाणोंसे उस बाण-वृष्टिको तत्काल व्यर्थ करके उस दैत्यपर उसी प्रकार आघात किया, जैसे इन्द्रने वृत्रासुरपर किया था॥ ४२॥ |
| तयोः परस्परं युद्धं सञ्जातं चातिकर्कशम्।<br>भयदं कातराणाञ्च शूराणां बलवर्धनम्॥ ४३ | अब उन दोनोंमें बड़ा भीषण युद्ध आरम्भ हो गया, जो कायरोंके लिये भयदायक तथा वीरोंके लिये उत्साहवर्धक था॥ ४३॥ |
| देवी चिच्छेद तरसा धनुस्तस्य करे स्थितम्।<br>तथैव पञ्चभिर्बाणैर्बभञ्ज रथमुत्तमम्॥ ४४ | देवीने बड़ी फुर्तीके साथ उसके हाथमें स्थित धनुषको काट डाला और उसी तरह अपने पाँच बाणोंसे उसके उत्तम रथको छिन्न-भिन्न कर दिया॥ ४४॥ |
| रथे भग्ने महाबाहुः पदातिर्दुर्मुखस्तदा।<br>गदां गृहीत्वा दुर्धर्षां जगाम चण्डिकां प्रति॥ ४५ | रथके नष्ट हो जानेपर महाबाहु दुर्मुख अपनी भयानक गदा लेकर पैदल ही भगवती चण्डिकाकी ओर दौड़ा॥ ४५॥ |
| चकार स गदाघातं सिंहमौलौ महाबलः।<br>न चचाल हरिः स्थानात्ताडितोऽपि महाबलः॥ ४६ | [उनके पास पहुँचकर] उस महाबली दैत्यने सिंहके मस्तकपर गदासे प्रहार कर दिया, किंतु महाशक्तिशाली सिंह गदासे मारे जानेपर भी अपने स्थानसे विचलित नहीं हुआ॥ ४६॥ |
| अम्बिका तं समालोक्य गदापाणिं पुरःस्थितम्।<br>खड्गेन शितधारेण शिरश्चिच्छेद मौलिमत्॥ ४७ | उसी समय जगदम्बाने हाथमें गदा लिये हुए उस दुर्मुखको सम्मुख उपस्थित देखकर अपनी तीक्ष्ण धारवाली तलवारसे उसके किरीटयुक्त मस्तकको काट दिया॥ ४७॥ |
| छिन्ने च मस्तके भूमौ पपात दुर्मुखो मृतः।<br>जयशब्दं तदा चक्रर्मुदिता निर्जरा भृशम्॥ ४८ | मस्तक कट जानेपर दुर्मुख जमीनपर गिर पड़ा और मर गया। तब देवता परम प्रसन्न होकर देवीकी जय-जयकार करने लगे॥ ४८॥ |