देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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| ६०२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १४ |
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| तुष्टुवुस्तां तदा देवीं दुर्मुखे निहतेऽमराः।<br>पुष्पवृष्टिं तथा चक्रुर्जयशब्दं नभःस्थिताः॥ ४९ | दुर्मुखके मर जानेपर आकाशमें विद्यमान देवता भगवतीकी स्तुति करने लगे। उनपर पुष्प बरसाने लगे तथा उनकी जयकार करने लगे॥ ४९॥ |
| ऋषयः सिद्धगन्धर्वाः सविद्याधरकिन्नराः।<br>जहृषुस्तं हतं दृष्ट्वा दानवं रणमस्तके॥ ५० | रणभूमिमें उस महान् दानवको मरा हुआ देखकर ऋषि, सिद्ध, गन्धर्व, विद्याधर और किन्नर आनन्दित हो उठे॥ ५०॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे महिषसेनाधिप-<br>बाष्कलदुर्मुखनिपातनवर्णनं नाम त्रयोदशोऽध्यायः॥ १३॥
अथ चतुर्दशोऽध्यायः
चिक्षुर और ताम्रका रणभूमिमें आना, देवीसे उनका वार्तालाप और युद्ध तथा देवीद्वारा उनका वध
</div>| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
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| दुर्मुखं निहतं श्रुत्वा महिषः क्रोधमूर्च्छितः।<br>उवाच दानवान्सर्वांकिं जातमिति चासकृत्॥ १<br>निहतौ दानवौ शूरौ रणे दुर्मुखबाष्कलौ।<br>तन्व्या तत्परमाश्चर्यं पश्यन्तु दैवचेष्टितम्॥ २ | हे राजन्! दुर्मुख मार दिया गया—यह सुनकर महिषासुर क्रोधसे मूर्च्छित हो गया और दानवोंसे बार-बार कहने लगा—'यह क्या हो गया?' दुर्मुख और बाष्कल तो बड़े शूर-वीर दानव थे। एक सुकुमार नारीने उन्हें रणभूमिमें मार डाला, यह तो महान् आश्चर्य है! दैवका विधान तो देखो॥ १-२॥ |
| कालो हि बलवान्कर्ता सततं सुखदुःखयोः।<br>नराणां परतन्त्राणां पुण्यपापानुयोगतः॥ ३ | समय बड़ा बलवान् होता है, वही परतन्त्र मनुष्योंके पुण्य तथा पापके अनुसार सदा उनके सुखों-दुःखोंका निर्माण करता है॥ ३॥ |
| निहतौ दानवश्रेष्ठौ किं कर्तव्यमतः परम्।<br>ब्रुवन्तु मिलिताः सर्वे यद्युक्तं कार्यसङ्कटे॥ ४ | ये दोनों ही श्रेष्ठ दानव मार डाले गये हैं, अब इसके बाद क्या करना चाहिये? इस विषम स्थितिमें सब लोग विचार करके जो उचित हो, बतायें॥ ४॥ |
| व्यास उवाच<br>एवं ब्रुवति राजेन्द्र महिषेऽतिबलान्विते।<br>चिक्षुराख्यस्तु सेनानीस्तमुवाच महारथः॥ ५<br>राजन्नहं हनिष्यामि का चिन्ता स्त्रीविहिंसने। | **व्यासजी बोले—**हे राजेन्द्र! इस प्रकार महाशक्तिशाली महिषासुरके कहनेपर उसके महारथी सेनाध्यक्ष चिक्षुरने कहा—हे राजन्! स्त्रीको मार डालनेमें चिन्ता किस बातकी! मैं उसे मार डालूँगा॥ ५ १/२॥ |
| इत्युक्त्वा स्वबलैर्युक्तः प्रययौ रथसंयुतः॥ ६<br>द्वितीयं पार्ष्णिरक्षं तु कृत्वा ताम्रं महाबलम्।<br>महता सैन्यघोषेण पूरयन्गगनं दिशः॥ ७ | ऐसा कहकर वह चिक्षुराख्य रथपर बैठकर दूसरे महाबली ताम्रको अपना अंगरक्षक बनाकर सेनाकी तुमुल ध्वनिसे आकाश एवं दिशाओंको निनादित करता हुआ युद्धके लिये चल पड़ा॥ ६-७॥ |
| तमागच्छन्तमालोक्य देवी भगवती शिवा।<br>चकार शङ्खज्याघोषं घण्टानादं महाद्भुतम्॥ ८<br>तत्रसुस्तेन शब्देन ते च सर्वे सुरारयः।<br>किमेतदिति भाषन्तो दुद्रुवुर्भयकम्पिताः॥ ९ | उसे आता हुआ देखकर कल्याणमयी भगवतीने अद्भुत शंखध्वनि, घण्टानाद तथा धनुषकी टंकार की। उस ध्वनिसे सभी राक्षस भयभीत हो गये। 'यह क्या'—ऐसा कहते हुए वे भयसे काँपने लगे तथा भाग खड़े हुए॥ ८-९॥ |