देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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| अ० १४ ] | पञ्चम स्कन्ध | ६०३ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| चिक्षुराख्यस्तु तान्दृष्ट्वा पलायनपरायणान्।<br>उवाचातीव संक्रुद्धः किं भयं वः समागतम्॥ १०<br><br>अद्यैवाहं हनिष्यामि बाणैर्बालां मदोन्नताम्।<br>तिष्ठन्त्वत्र भयं त्यक्त्वा दैत्याः समरमूर्धनि॥ ११ | उन्हें भागते हुए देखकर चिक्षुराख्यने अत्यन्त क्रोधित होकर कहा—तुम्हारे सामने कौन-सा भय आ गया? मैं इस मदोन्मत्त नारीको आज ही बाणोंद्वारा मार डालूँगा। हे दैत्यो! तुम लोग भय छोड़कर लड़ाईके मोर्चेपर डटे रहो॥ १०-११॥ |
| इत्युक्त्वा दानवश्रेष्ठश्चापपाणिर्बलान्वितः।<br>आगत्य सङ्गरे देवीमित्युवाच गतव्यथः॥ १२<br><br>किं गर्जसि विशालाक्षि भीषयन्तीतरान्ररान्।<br>नाहं बिभेमि तन्वङ्गि श्रुत्वा तेऽद्य विचेष्टितम्॥ १३ | ऐसा कहकर उस पराक्रमी दैत्यश्रेष्ठ चिक्षुरने हाथमें धनुष उठा लिया और युद्धभूमिमें आकर वह निश्चिन्ततापूर्वक भगवतीसे कहने लगा—हे विशालाक्षि! अन्य साधारण मनुष्योंको भयभीत करती हुई तुम क्यों गरज रही हो? तुम्हारा यह व्यर्थ गर्जन सुनकर मैं भयभीत नहीं हो सकता॥ १२-१३॥ |
| स्त्रीवधे दूषणं ज्ञात्वा तथैवाकीर्तिसम्भवम्।<br>उपेक्षां कुरुते चित्तं मदीयं वामलोचने॥ १४<br><br>स्त्रीणां युद्धं कटाक्षैश्च तथा हावैश्च सुन्दरि।<br>न शस्त्रैर्विहितं क्वापि त्वादृशीनां कदाचन॥ १५ | हे सुलोचने! स्त्रीका वध करना पाप है तथा इससे जगत्में अपकीर्ति होती है—यह जानकर मेरा चित्त तुम्हें मारनेसे विचलित हो रहा है। हे सुन्दरि! तुम-जैसी स्त्रियोंके कटाक्षों तथा हाव-भावोंसे समरका कार्य सम्पन्न हो जाता है; कभी कहीं भी शस्त्रोंद्वारा स्त्रीका युद्ध नहीं हुआ है॥ १४-१५॥ |
| पुष्पैरपि न योद्धव्यं किं पुनर्निशितैः शरैः।<br>भवादृशीनां देहेषु दुनोति मालतीदलम्॥ १६ | हे सुन्दरि! तुम्हें तो पुष्पसे भी युद्ध नहीं करना चाहिये, तब फिर तीक्ष्ण बाणोंसे युद्धकी बात ही क्या; क्योंकि तुम्हारी-जैसी सुन्दरियोंके शरीरमें मालतीकी पंखुड़ी भी पीड़ा उत्पन्न कर सकती है॥ १६॥ |
| धिग्जन्म मानुषे लोके क्षात्रधर्मानुजीविनाम्।<br>लालितोऽयं प्रियो देहः कृन्तनीयः शितैः शरैः॥ १७ | इस संसारमें क्षात्रधर्मानुयायी लोगोंके जन्मको धिक्कार है; क्योंकि वे बड़े प्यारसे पाले गये अपने शरीरको भी तीक्ष्ण बाणोंसे छिदवाते हैं!॥ १७॥ |
| तैलाभ्यङ्गैः पुष्पवातैस्तथा मिष्टान्नभोजनैः।<br>पोषितोऽयं प्रियो देहो घातनीयः परेषुभिः॥ १८<br><br>देहं छित्त्वासिधाराभिर्धनभृज्जायते नरः।<br>धिग्धनं दुःखदं पूर्वं पश्चात्किं सुखदं भवेत्॥ १९ | तेलकी मालिशसे, फूलोंकी हवासे तथा स्वादिष्ट भोजन आदिसे पोषित इस प्रिय शरीरको शत्रुओंके बाणोंसे बिंधवाते हैं। तलवारकी धारसे अपना शरीर कटवाकर मनुष्य धनवान् होना चाहते हैं। ऐसे धनको धिक्कार है जो प्रारम्भमें ही दुःख देनेवाला होता है; तो बादमें क्या वह सुख देनेवाला हो सकता है?॥ १८-१९॥ |
| त्वमप्यज्ञैव वामोरु युद्धमाकाङ्क्षसे यतः।<br>सुखं सम्भोगजं त्यक्त्वा कं गुणं वेत्सि सङ्गरे॥ २० | हे सुन्दरि! तुम भी मूर्ख ही हो, तभी तो सम्भोगजन्य सुखको त्यागकर युद्धकी इच्छा कर रही हो। युद्धमें तुम कौन-सा लाभ समझ रही हो?॥ २०॥ |
| खड्गपातं गदाघातं भेदनञ्च शिलीमुखैः।<br>मरणान्ते तु संस्कारो गोमायुमुखकर्षणम्॥ २१ | युद्धमें तलवारें चलती हैं, गदाका प्रहार होता है और बाणोंसे शरीरका बेधन किया जाता है। मृत्युके अन्तमें सियार अपने मुँहसे नोच-नोचकर उस देहका संस्कार करते हैं॥ २१॥ |