भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 613
६०४श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १४

| तस्यैव कविभिर्धूर्तैः कृतं चातीव शंसनम्।<br>रणे मृतानां स्वःप्राप्तिरर्थवादोऽस्ति केवलः ॥ २२ | धूर्त कवियोंने उसी युद्धकी अत्यन्त प्रशंसा की है कि रणभूमिमें मरनेवालोंको स्वर्ग प्राप्त होता है। उनका यह कहना केवल अर्थवादमात्र है॥ २२॥ | | तस्माद् गच्छ वरारोहे यत्र ते रमते मनः।<br>भज वा भूपतिं नाथं ह्यारिं सुरमर्दनम् ॥ २३ | अतः हे वरारोहे ! तुम्हारा मन जहाँ लगे, वहाँ चली जाओ अथवा तुम देवताओंका दमन करनेवाले मेरे स्वामी महाराज महिषासुरको स्वीकार कर लो ॥ २३ ॥ | | व्यास उवाच<br>एवं ब्रुवाणं तं दैत्यं प्रोवाच जगदम्बिका।<br>किं मृषा भाषसे मूढ बुद्धिमानिव पण्डितः ॥ २४ | व्यासजी बोले—इस प्रकार बोलते हुए उस दैत्यसे भगवती जगदम्बाने कहा—मूर्ख ! तुम अपनेको बुद्धिमान् पण्डितके समान मानकर व्यर्थ क्यों बोल रहे हो? तुम न तो नीतिशास्त्र जानते हो, न आन्वीक्षिकी विद्या ही जानते हो, तुमने कभी न वृद्धोंकी सेवा की है और न तो तुम्हारी बुद्धि ही धर्मपरायण है ॥ २४-२५ ॥ | | नीतिशास्त्रं न जानासि विद्यां चान्वीक्षिकीं तथा।<br>न सेवितास्त्वया वृद्धा न धर्मे मतिरस्ति ते ॥ २५ | | | मूर्खसेवापरो यस्मात्तस्मात्त्वं मूर्ख एव हि।<br>राजधर्मं न जानासि किं ब्रवीषि ममाग्रतः ॥ २६ | क्योंकि तुम मूर्खकी सेवामें लगे रहते हो, अतः तुम भी मूर्ख हो। जब तुम्हें राजधर्म ही ज्ञात नहीं, तब मेरे सामने क्यों व्यर्थ बकवाद कर रहे हो ? ॥ २६ ॥ | | संग्रामे महिषं हत्वा कृत्वा रुधिरकर्दमम्।<br>यशःस्तम्भं स्थिरं कृत्वा गमिष्यामि यथासुखम् ॥ २७ | संग्राममें महिषासुरका वध करके समरांगणको रुधिरसे पंकमय बनाकर अपना यश-स्तम्भ सुदृढ़ स्थापितकर मैं सुखपूर्वक चली जाऊँगी ॥ २७ ॥ | | देवानां दुःखदातारं दानवं मदगर्वितम्।<br>हनिष्येऽहं दुराचारं युद्धं कुरु स्थिरो भव ॥ २८<br><br>जीवितेच्छास्ति चेन्मूढ महिषस्य तथा तव।<br>तदा गच्छन्तु पातालं दानवाः सर्व एव ते ॥ २९<br><br>मुमूर्षा यदि वश्चित्ते युद्धं कुर्वन्तु सत्वराः।<br>सर्वानेव वधिष्यामि निश्चयोऽयं ममाधुना ॥ ३० | देवताओंको दुःख देनेवाले इस दुराचारी तथा मदोन्मत्त दानवको मैं अवश्य मार डालूँगी। तुम सावधान होकर युद्ध करो। हे मूर्ख! यदि तुम्हें तथा महिषासुरको जीनेकी अभिलाषा हो तो सभी दानव पाताललोकको शीघ्र ही चले जायँ; अन्यथा यदि तुमलोगोंके मनमें मरनेकी इच्छा हो तो तुरंत युद्ध करो। यह मेरा संकल्प है कि मैं सभी दानवोंको मार डालूँगी ॥ २८-३०॥ | | व्यास उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं तस्या दानवो बलदर्पितः।<br>मुमोच बाणवृष्टिं तां घनवृष्टिमिवापराम् ॥ ३१ | व्यासजी बोले—देवीका वचन सुनकर बलके अभिमानसे युक्त वह दैत्य उनपर इस प्रकार बाणोंकी वर्षा करने लगा, मानो दूसरे मेघ ही जलकी धारा बरसा रहे हों ॥ ३१ ॥ | | चिच्छेद तस्य सा बाणान्स्वबाणैर्निशितैस्तदा।<br>जघान तं तथा घोरैराशीविषसमैः शरैः ॥ ३२<br><br>युद्धं परस्परं तत्र बभूव विस्मयप्रदम्।<br>गदया घातयामास तं रथाज्जगदम्बिका ॥ ३३ | तब भगवतीने अपने तीक्ष्ण बाणोंद्वारा उसके सभी बाण काट डाले और विषधर सर्पके समान विषैले बाणोंसे उसपर प्रहार किया। उन दोनोंमें परस्पर विस्मयकारी युद्ध होने लगा। जगदम्बाने अपने वाहन सिंहपरसे ही उस दैत्यपर गदासे प्रहार किया ॥ ३२-३३ ॥ |