भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 614

| अ० १४ ] | पञ्चम स्कन्ध | ६०५ | | :--- | :--- | | मूर्च्छां प्राप स दुष्टात्मा गदयाभिहतो भृशम्।<br>मुहूर्तद्वयमात्रं तु रथोपस्थ इवाचलः॥ ३४ | गदासे अत्यधिक आहत होनेके कारण वह दुष्टात्मा दैत्य मूर्च्छित हो गया और दो मुहूर्ततक पाषाणकी भाँति रथपर ही पड़ा रहा॥ ३४॥ | | तं तथामूर्च्छितं दृष्ट्वा ताम्रः परबलार्दनः।<br>आजगाम रणे योद्धुं चण्डिकां प्रति चापलात्॥ ३५ | इस प्रकार उसे मूर्च्छित देखकर शत्रुसेनाको नष्ट कर डालनेवाला ताम्र नामक दैत्य चण्डिकासे लड़नेके लिये वेगपूर्वक रणमें उपस्थित हो गया॥ ३५॥ | | आगच्छन्तं तु तं वीक्ष्य हसन्ती प्राह चण्डिका।<br>एह्येहि दानवश्रेष्ठ यमलोकं नयाम्यहम्॥ ३६ | उसे आते देखकर भगवती चण्डिका उससे हँसती हुई बोलीं—अरे दानवश्रेष्ठ! आओ-आओ, अभी तुम्हें यमलोक भेज देती हूँ॥ ३६॥ | | किं भवद्भिः समायातैर्बलैश्च गतायुषैः।<br>महिषः किं गृहे मूढः करोति जीवनोद्यमम्॥ ३७<br><br>किं भवद्भिर्हतैर्मन्दैर्ममापि विफलः श्रमः।<br>अहते महिषे पापे सुरशत्रौ दुरात्मनि॥ ३८<br><br>तस्माद्यूयं गृहं गत्वा महिषं प्रेषयन्त्विह।<br>पश्येन्मां सोऽपि मन्दात्मा यादृशीं तादृशीं स्थिताम्॥ ३९ | निर्बल और समाप्त आयुवाले तुमलोगोंके यहाँ आनेसे क्या लाभ? वह मूर्ख महिषासुर घरमें रहकर अपने जीनेका कौन-सा उपाय कर रहा है? देवताओंके शत्रु, दुष्टात्मा तथा पापी महिषासुरका संहार किये बिना तुम मूर्खोंको मारनेसे मुझे क्या लाभ होगा? इससे तो मेरा परिश्रम भी व्यर्थ हो जायगा, अतः तुमलोग घरपर जाकर महिषासुरको यहाँ भेज दो, जिससे वह मन्दबुद्धि भी मैं जिस रूपमें स्थित हूँ, उसमें मुझको देख ले॥ ३७–३९॥ | | ताम्रस्तद्वचनं श्रुत्वा बाणवृष्टिं चकार ह।<br>चण्डिकां प्रति कोपेन कर्णाकृष्टशरासनः॥ ४० | भगवतीका वचन सुनकर वह ताम्र कुपित हो धनुषको कानतक खींचकर उनपर बाणोंकी वर्षा करने लगा॥ ४०॥ | | भगवत्यपि ताम्राक्षी समाकृष्य शरासनम्।<br>बाणान्मुमोच तरसा हन्तुकामा सुराहितम्॥ ४१ | देवताओंके शत्रु उस दैत्यको मारनेकी इच्छावाली ताम्राक्षी भगवती भी धनुष खींचकर उसके ऊपर वेगपूर्वक बाण छोड़ने लगीं॥ ४१॥ | | चिक्षुराख्योऽपि बलवान्मूर्च्छां त्यक्त्वोत्थितः पुनः।<br>गृहीत्वा सशरं चापं तस्थौ तत्सम्मुखः क्षणात्॥ ४२ | इतनेमें बलवान् चिक्षुराख्य भी मूर्च्छा त्यागकर उठ खड़ा हुआ और तुरंत बाणसहित धनुष लेकर देवीके सामने आकर खड़ा हो गया॥ ४२॥ | | चिक्षुराख्यश्च ताम्रश्च द्वावप्यतिबलोत्कटौ।<br>युयुधाते महावीरौ सह देव्या रणाङ्गणे॥ ४३ | चिक्षुराख्य और ताम्र दोनों ही अत्यन्त उग्र बलवान् और महान् वीर थे। अब वे दोनों ही मिलकर भगवती जगदम्बासे रणमें युद्ध करने लगे॥ ४३॥ | | कुपिता च महामाया ववर्ष शरसन्ततिम्।<br>चकार दानवान् सर्वान् बाणक्षततनुच्छदान्॥ ४४ | तब महामाया क्रोधित होकर बाणसमूहोंकी वर्षा करने लगीं, और उन्होंने अपने बाणोंके प्रहारसे सभी दानवोंके कवच छिन्न-भिन्न कर दिये॥ ४४॥ | | असुराः क्रोधसम्मूढा बभूवुः शरताडिताः।<br>चिक्षिपुः शरजालानि देवीं प्रति रुषान्विताः॥ ४५ | उन बाणोंसे आहत होकर सभी असुर क्रोधसे व्याकुल हो गये तथा रोषपूर्वक देवीपर बाणसमूह छोड़ने लगे। उस समय समस्त रणभूमिमें भगवतीके |