देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 615, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ें| ६०६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १४ |
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| बभुस्ते राक्षसास्तत्र किंशुका इव पुष्पिणः।<br>शिलीमुखक्षताः सर्वे वसन्ते च वने रणे॥ ४६ | बाणोंसे घायल सभी राक्षस ऐसे सुशोभित होने लगे, जैसे वसन्त ऋतुमें वनमें किंशुकके लाल पुष्प दिखायी पड़ते हों॥ ४५-४६॥ | | बभूव तुमुलं युद्धं ताम्रेण सह संयुगे।<br>विस्मयं परमं जग्मुर्देवा ये प्रेक्षकाः स्थिताः॥ ४७ | उस समरभूमिमें ताम्रके साथ देवीका भीषण युद्ध होने लगा। इसे देखनेवाले जो देवता आकाशमें स्थित थे, वे आश्चर्यचकित हो गये॥ ४७॥ | | ताम्रो मुसलमादाय लोहजं दारुणं दृढम्।<br>जघान मस्तके सिंहं जहास च ननर्द च॥ ४८ | उसी समय ताम्रने लोहेका बना हुआ एक सुदृढ़ तथा भयंकर मूसल लेकर देवीके सिंहके सिरपर प्रहार किया और वह जोरसे हँसने तथा गरजने लगा॥ ४८॥ | | नर्दमानं तदा तं तु दृष्ट्वा देवी रुषान्विता।<br>खड्गेन शितधारेण शिरश्शिच्छेद सत्वरा॥ ४९ | तब उसे गरजता हुआ देखकर भगवती क्रोधित हो गयीं और उन्होंने तुरंत अपनी तेज धारवाली तलवारसे उसका मस्तक काट डाला॥ ४९॥ | | छिन्ने शिरसि ताम्रस्तु विशीर्षो मुसली बली।<br>बभ्राम क्षणमात्रं तु पपात रणमस्तके॥ ५० | सिर कट जानेपर भी वह मस्तकविहीन बलशाली ताम्र मूसल लिये हुए कुछ क्षणतक घूमता रहा, इसके बाद वह समरांगणमें गिर पड़ा॥ ५०॥ | | पतितं ताम्रमालोक्य चिक्षुराख्यो महाबलः।<br>खड्गमादाय तरसा दुद्राव चण्डिकां प्रति॥ ५१ | ताम्रको गिरा हुआ देखकर महाबली चिक्षुराख्य खड्ग लेकर बड़े वेगसे चण्डिकाकी ओर झपटा॥ ५१॥ | | भगवत्यपि तं दृष्ट्वा खड्गपाणिमुपागतम्।<br>दानवं पञ्चभिर्बाणैर्जघान तरसा रणे॥ ५२ | हाथमें तलवार लिये उस दानवको रणमें अपनी ओर आते देखकर देवीने भी तुरंत पाँच बाणोंसे उसपर प्रहार किया॥ ५२॥ | | एकेन पातितं खड्गं द्वितीयेन तु तत्करः।<br>कण्ठाच्च मस्तकं तस्य कृन्तितं चापरैः शरैः॥ ५३ | भगवतीने एक बाणसे उसका खड्ग काट दिया, दूसरेसे उसका हाथ काट दिया और अन्य बाणोंसे उसका मस्तक कण्ठसे अलग कर दिया॥ ५३॥ | | एवं तौ निहतौ क्रूरौ राक्षसौ रणदुर्मदौ।<br>भग्नं सैन्यं तयोस्तूर्णं दिक्षु सन्त्रस्तमानसम्॥ ५४ | इस प्रकार युद्धके लिये उन्मत्त रहनेवाले उन दोनों क्रूर राक्षसोंका वध हो गया, तब उन दोनोंकी सेना भयभीत होकर चारों दिशाओंमें शीघ्रतापूर्वक भाग चली॥ ५४॥ | | देवाश्च मुदिताः सर्वे दृष्ट्वा तौ निहतौ रणे।<br>पुष्पवृष्टिं मुदा चक्रुर्जयशब्दं नभःस्थिताः॥ ५५<br><br>ऋषयो देवगन्धर्वा वेतालाः सिद्धचारणाः।<br>ऊचुस्ते जय देवीति चाम्बिकेति पुनः पुनः॥ ५६ | उन दोनों दानवोंको रणमें मारा गया देखकर आकाशमें विराजमान सम्पूर्ण देवता आह्लादित हो गये और प्रसन्नतापूर्वक भगवतीकी जयध्वनि करते हुए फूलोंकी वर्षा करने लगे। ऋषि, देवता, गन्धर्व, वेताल, सिद्ध और चारण—वे सब ‘देवीकी जय, अम्बिकाकी जय' ऐसा बार-बार बोलने लगे॥ ५५-५६॥ |
<div align="center">इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे
ताम्रचिक्षुराख्यवधवर्णनं नाम चतुर्दशोऽध्यायः॥ १४॥
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