देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
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अ० १५] पञ्चम स्कन्ध ६०७
अथ पञ्चदशोऽध्यायः
बिडालाख्य और असिलोमाका रणभूमिमें आना, देवीसे उनका वार्तालाप और युद्ध तथा देवीद्वारा उनका वध
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| व्यास उवाच<br>तौ तया निहतौ श्रुत्वा महिषो विस्मयान्वितः ।<br>प्रेषयामास दैत्यांस्तद्वधार्थं महाबलान् ॥ १<br>असिलोमबिडालाख्यप्रमुखान् युद्धदुर्मदान् ।<br>सैन्येन महता युक्तान्सायुधान्सपरिच्छदान् ॥ २ | व्यासजी बोले—उस देवीने चिक्षुराख्य तथा ताम्रका वध कर दिया—यह सुनकर महिषासुरको बड़ा विस्मय हुआ। अब उसने विशाल सेनासे युक्त, शस्त्रास्त्र लिये हुए तथा कवच धारण किये हुए असिलोमा, बिडालाख्य आदि प्रमुख युद्धोन्मत्त तथा महाबली दैत्योंको भगवतीका वध करनेके लिये भेजा॥ १-२॥ |
| ते तत्र ददृशुर्देवीं सिंहस्योपरि संस्थिताम् ।<br>अष्टादशभुजां दिव्यां खड्गखेटकधारिणीम् ॥ ३ | वहाँपर उन्होंने सिंहके ऊपर विराजमान, अठारह भुजाओंसे सुशोभित, खड्ग तथा ढाल धारण की हुई दिव्यस्वरूपवाली भगवतीको देखा॥ ३॥ |
| असिलोमाग्रतो गत्वा तामुवाच हसन्निव ।<br>विनयावनतः शान्तो देवीं दैत्यवधोद्यताम् ॥ ४ | तब असिलोमा दैत्योंके वधके लिये उद्यत देवीके पास जाकर विनयावनत होकर शान्तिपूर्वक उनसे हँसते हुए कहने लगा— ॥ ४॥ |
| असिलोमोवाच<br>देवि ब्रूहि वचः सत्यं किमर्थमिह सुन्दरि ।<br>आगतासि किमर्थं वा हंसि दैत्यान्निरागसः ॥ ५<br>कारणं कथयाद्य त्वं त्वया सन्धिं करोम्यहम् ।<br>काञ्चनं मणिरत्नानि भाजनानि वराणि च ॥ ६<br>यानीच्छसि वरारोहे गृहीत्वा गच्छ मा चिरम् ।<br>किमर्थं युद्धकामासि दुःखसन्तापवर्धनम् ॥ ७ | असिलोमा बोला—हे देवि! सच्ची बात बताइये, आप यहाँ किस प्रयोजनसे आयी हैं? हे सुन्दरि! इन निरपराध दैत्योंको आप क्यों मार रही हैं? इसका कारण बताइये। मैं अभी आपके साथ सन्धि करनेको तैयार हूँ। हे वरारोहे! सुवर्ण, मणि, रत्न और अच्छे-अच्छे पात्र जो भी आप चाहती हैं, उन्हें लेकर यहाँसे शीघ्र चली जाइये। आप युद्धकी इच्छुक क्यों हैं? महात्मा पुरुष कहते हैं कि युद्ध दुःख तथा सन्तापको बढ़ानेवाला और सम्पूर्ण सुखोंका विघातक होता है॥ ५-७ १/२॥ |
| कथयन्ति महात्मानो युद्धं सर्वसुखापहम् ।<br>कोमलेऽतीव ते देहे पुष्पघातासहे भृशम् ॥ ८<br>किमर्थं शस्त्रसम्पातान्सहसीति विसिस्मिये ।<br>चातुर्यस्य फलं शान्तिः सततं सुखसेवनम् ॥ ९<br>तत्किमर्थं दुःखहेतुं संग्रामं कर्तुमिच्छसि ।<br>संसारेऽत्र सुखं ग्राह्यं दुःखं हेयमिति स्थितिः ॥ १० | मुझे महान् आश्चर्य हो रहा है कि पुष्पका भी आघात न सह सकनेवाले अपने अत्यन्त सुकोमल शरीरमें आप शस्त्रोंके आघात सहनेके लिये क्यों तैयार हैं? चातुर्यका फल तो शान्ति और निरन्तर सुख भोगना है। अतः एकमात्र दुःखके कारणस्वरूप इस संग्रामको आप क्यों करना चाहती हैं? इस संसारमें सुख ग्रहण करना चाहिये और दुःखका परित्याग करना चाहिये—यही सर्वमान्य नियम है॥ ८—१०॥ |