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देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

अ० १५] पञ्चम स्कन्ध ६०७

अ० १५] पञ्चम स्कन्ध ६०७

अथ पञ्चदशोऽध्यायः

बिडालाख्य और असिलोमाका रणभूमिमें आना, देवीसे उनका वार्तालाप और युद्ध तथा देवीद्वारा उनका वध

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
व्यास उवाच<br>तौ तया निहतौ श्रुत्वा महिषो विस्मयान्वितः ।<br>प्रेषयामास दैत्यांस्तद्वधार्थं महाबलान् ॥ १<br>असिलोमबिडालाख्यप्रमुखान् युद्धदुर्मदान् ।<br>सैन्येन महता युक्तान्सायुधान्सपरिच्छदान् ॥ २व्यासजी बोले—उस देवीने चिक्षुराख्य तथा ताम्रका वध कर दिया—यह सुनकर महिषासुरको बड़ा विस्मय हुआ। अब उसने विशाल सेनासे युक्त, शस्त्रास्त्र लिये हुए तथा कवच धारण किये हुए असिलोमा, बिडालाख्य आदि प्रमुख युद्धोन्मत्त तथा महाबली दैत्योंको भगवतीका वध करनेके लिये भेजा॥ १-२॥
ते तत्र ददृशुर्देवीं सिंहस्योपरि संस्थिताम् ।<br>अष्टादशभुजां दिव्यां खड्गखेटकधारिणीम् ॥ ३वहाँपर उन्होंने सिंहके ऊपर विराजमान, अठारह भुजाओंसे सुशोभित, खड्ग तथा ढाल धारण की हुई दिव्यस्वरूपवाली भगवतीको देखा॥ ३॥
असिलोमाग्रतो गत्वा तामुवाच हसन्निव ।<br>विनयावनतः शान्तो देवीं दैत्यवधोद्यताम् ॥ ४तब असिलोमा दैत्योंके वधके लिये उद्यत देवीके पास जाकर विनयावनत होकर शान्तिपूर्वक उनसे हँसते हुए कहने लगा— ॥ ४॥
असिलोमोवाच<br>देवि ब्रूहि वचः सत्यं किमर्थमिह सुन्दरि ।<br>आगतासि किमर्थं वा हंसि दैत्यान्निरागसः ॥ ५<br>कारणं कथयाद्य त्वं त्वया सन्धिं करोम्यहम् ।<br>काञ्चनं मणिरत्नानि भाजनानि वराणि च ॥ ६<br>यानीच्छसि वरारोहे गृहीत्वा गच्छ मा चिरम् ।<br>किमर्थं युद्धकामासि दुःखसन्तापवर्धनम् ॥ ७असिलोमा बोला—हे देवि! सच्ची बात बताइये, आप यहाँ किस प्रयोजनसे आयी हैं? हे सुन्दरि! इन निरपराध दैत्योंको आप क्यों मार रही हैं? इसका कारण बताइये। मैं अभी आपके साथ सन्धि करनेको तैयार हूँ। हे वरारोहे! सुवर्ण, मणि, रत्न और अच्छे-अच्छे पात्र जो भी आप चाहती हैं, उन्हें लेकर यहाँसे शीघ्र चली जाइये। आप युद्धकी इच्छुक क्यों हैं? महात्मा पुरुष कहते हैं कि युद्ध दुःख तथा सन्तापको बढ़ानेवाला और सम्पूर्ण सुखोंका विघातक होता है॥ ५-७ १/२॥
कथयन्ति महात्मानो युद्धं सर्वसुखापहम् ।<br>कोमलेऽतीव ते देहे पुष्पघातासहे भृशम् ॥ ८<br>किमर्थं शस्त्रसम्पातान्सहसीति विसिस्मिये ।<br>चातुर्यस्य फलं शान्तिः सततं सुखसेवनम् ॥ ९<br>तत्किमर्थं दुःखहेतुं संग्रामं कर्तुमिच्छसि ।<br>संसारेऽत्र सुखं ग्राह्यं दुःखं हेयमिति स्थितिः ॥ १०मुझे महान् आश्चर्य हो रहा है कि पुष्पका भी आघात न सह सकनेवाले अपने अत्यन्त सुकोमल शरीरमें आप शस्त्रोंके आघात सहनेके लिये क्यों तैयार हैं? चातुर्यका फल तो शान्ति और निरन्तर सुख भोगना है। अतः एकमात्र दुःखके कारणस्वरूप इस संग्रामको आप क्यों करना चाहती हैं? इस संसारमें सुख ग्रहण करना चाहिये और दुःखका परित्याग करना चाहिये—यही सर्वमान्य नियम है॥ ८—१०॥

| ६०८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १५ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तत्सुखं द्विविधं प्रोक्तं नित्यानित्यप्रभेदतः ।<br>आत्मज्ञानं सुखं नित्यमनित्यं भोगजं स्मृतम् ॥ ११<br>नाशात्मकं तु तत्त्याज्यं वेदशास्त्रार्थचिन्तकैः ।<br>सौगतानां मतं चेत्त्वं स्वीकरोषि वरानने ॥ १२<br>तथापि यौवनं प्राप्य भुंक्ष्व भोगाननुत्तमान् ।<br>परलोकस्य सन्देहो यदि तेऽस्ति कृशोदरि ॥ १३<br>स्वर्गभोगपरा नित्यं भव भामिनि भूतले ।<br>अनित्यं यौवनं देहे ज्ञात्वेति सुकृतं चरेत् ॥ १४वह सुख भी नित्य और अनित्यके भेदसे दो प्रकारका कहा गया है। आत्मज्ञानसम्बन्धी सुखको ‘नित्य’ और भोगजनित सुखको ‘अनित्य’ माना गया है। वेद और शास्त्रके तत्त्वका चिन्तन करनेवाले लोगोंको चाहिये कि उस विनाशशील अनित्य सुखको त्याग दें। हे वरानने! यदि आप नास्तिकका मत स्वीकार करती हों तो भी इस यौवनको पाकर उत्तमसे उत्तम सुखोंका भोग करें। हे कृशोदरि! हे भामिनि! यदि परलोकके विषयमें आपको सन्देह हो तो इस पृथ्वीपर ही सदाचारपूर्वक रहती हुई स्वर्गीय सुख प्राप्त करनेमें सदा तत्पर रहें, नहीं तो शरीरमें यह यौवन अनित्य है—ऐसा समझकर आपको सदा सत्कर्म करते रहना चाहिये॥ ११-१४॥
परोपतापनं कार्यं वर्जनीयं सदा बुधैः ।<br>अविरोधेन कर्तव्यं धर्मार्थकामसेवनम् ॥ १५<br>तस्मात्त्वमपि कल्याणि मतिं धर्मे सदा कुरु ।<br>अपराधं विना दैत्यान्कस्मान्मारयसेऽम्बिके ॥ १६<br>दयाधर्मोऽस्य देहोऽस्ति सत्ये प्राणाः प्रकीर्तिताः ।<br>तस्माद्दया तथा सत्यं रक्षणीयं सदा बुधैः ॥ १७<br>कारणं वद सुश्रोणि दानवानां वधे तव ।बुद्धिमान् पुरुषोंको चाहिये कि वे दूसरोंको पीड़ित करनेके कार्यका त्याग कर दें। अतः बिना विरोधके धर्म, अर्थ और कामका सेवन करना चाहिये। इसलिये हे कल्याणि! आप अपनी बुद्धि धर्मकृत्यमें लगाइये। हे अम्बिके! आप हम दैत्योंको बिना अपराधके क्यों मार रही हैं? दयाभाव पुरुषमात्रका शरीर है और सत्यमें ही उसका प्राण प्रतिष्ठित कहा गया है। अतः बुद्धिमान् पुरुषोंको चाहिये कि दया और सत्यकी सदा रक्षा करें। हे देवि! आप दानवोंके संहारमें अपना प्रयोजन बतायें?॥ १५-१७ १/२॥
देव्युवाच<br>त्वया पृष्टं महाबाहो किमर्थमिह चागता ॥ १८<br>तदहं सम्प्रवक्ष्यामि हनने च प्रयोजनम् ।<br>विचरामि सदा दैत्य सर्वलोकेषु सर्वदा ॥ १९<br>न्यायान्यायौ च भूतानां पश्यन्ती साक्षिरूपिणी ।<br>न मे कदापि भोगेच्छा न लोभो न च वैरि‍ता ॥ २०देवी बोलीं—हे महाबाहो! तुमने जो यह पूछा है कि मैं यहाँ क्यों आयी हूँ—उसे बताती हूँ और दानववधका प्रयोजन भी बताती हूँ। हे दैत्य! मैं सदा साक्षी बनकर सभी प्राणियोंके न्याय तथा अन्यायको देखती हुई सब लोकोंमें निरन्तर विचरती रहती हूँ। मुझे न तो कभी भोगविलासकी इच्छा है, न लोभ है और न किसीके प्रति द्वेषभाव ही है॥ १८-२०॥
धर्मार्थं विचराम्यत्र संसारे साधुरक्षणम् ।<br>व्रतमेतत्तु नियतं पालयामि निजं सदा ॥ २१<br>साधूनां रक्षणं कार्यं हन्तव्या येऽप्यसाधवः ।<br>वेदसंरक्षणं कार्यमवतारैरनेकशः ॥ २२<br>युगे युगे तानेवाहमवतारान्बिभर्मि च ।धर्मकी मर्यादा रखनेके लिये मैं इस संसारमें विचरण करती रहती हूँ। साधुपुरुषोंकी रक्षा करना—अपने इस व्रतका मैं सदा पालन करती हूँ। अनेक अवतार धारण करके मैं सज्जनोंकी रक्षा करती हूँ, जो असाधु हैं उनका संहार करती हूँ और वेदोंका संरक्षण करती हूँ। मैं प्रत्येक युगमें उन अवतारोंको धारण करती रहती हूँ॥ २१-२२ १/२॥

अ० १५] पञ्चम स्कन्ध ६०९

अ० १५] पञ्चम स्कन्ध ६०९

| महिषस्तु दुराचारो देवान्वै हन्तुमुद्यतः॥ २३<br>ज्ञात्वाहं तद्वधार्थं भोः प्राप्तास्मि राक्षसाधुना।<br>तं हनिष्ये दुराचारं सुरशत्रुं महाबलम्॥ २४ | दुराचारी महिषासुर देवताओंको मार डालनेके लिये उद्यत है—यह जानकर मैं उसके वधके लिये इस समय यहाँ उपस्थित हुई हूँ। हे दानव! मैं उस दुराचारी तथा सुरद्रोही महाबली महिषको मार डालूँगी॥ २३-२४॥ | | गच्छ वा तिष्ठ कामं त्वं सत्यमेतदुदाहृतम्।<br>ब्रूहि वा तं दुरात्मानं राजानं महिषीसुतम्॥ २५<br>किमन्यान् प्रेषयस्यत्र स्वयं युद्धं कुरुष्व ह।<br>सन्धिश्चेत्कर्तुमिच्छास्ति राजंस्तव मया सह॥ २६<br>सर्वे गच्छन्तु पातालं वैरं त्यक्त्वा यथासुखम्।<br>देवद्रव्यं तु यत्किञ्चिद्धृतं जित्वा रणे सुरान्।<br>तद्दत्त्वा यान्तु पातालं प्रह्लादो यत्र तिष्ठति॥ २७ | अब तुम इच्छानुसार जाओ या रुके रहो, मैंने तुमसे यह सब सच-सच बतला दिया। अतः जाकर अपने उस दुराचारी राजा महिषसे कह दो—‘आप अन्य दैत्योंको क्यों भेजते हैं? स्वयं युद्ध कीजिये।' यदि तुम्हारे राजाकी इच्छा मेरे साथ सन्धि करनेकी हो, तो सभी दैत्य शत्रुता छोड़कर सुखपूर्वक पाताल चले जायँ। देवताओंको जीतकर जो भी देवद्रव्य असुरोंने छीन लिया है, वह सब वापस करके वे उस पातालपुरीमें चले जायँ, जहाँ इस समय प्रह्लाद विराजमान हैं॥ २५-२७॥ | | व्यास उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं देव्या असिलोमा पुरःस्थितः।<br>बिडालाख्यं महावीर्यं पप्रच्छ प्रीतिपूर्वकम्॥ २८ | व्यासजी बोले—[हे राजन्!] इस प्रकार देवीका वचन सुनकर असिलोमा भगवतीके सामने ही महान् शूरवीर बिडालाख्यसे प्रीतिपूर्वक पूछने लगा—॥ २८॥ | | असिलोमोवाच<br>श्रुतं तेऽद्य बिडालाख्य भवान्या कथितं च यत्।<br>एवं गते किं कर्तव्यो विग्रहः सन्धिरेव वा॥ २९ | **असिलोमा बोला—**बिडालाख्य! देवीने अभी-अभी जो कहा है, वह तो तुमने सुन लिया, इस स्थितिमें हमें सन्धि या विग्रह—क्या करना चाहिये?॥ २९॥ | | बिडालाख्य उवाच<br>न सन्धिकामोऽस्ति नृपोऽभिमानी<br>युद्धे च मृत्युं नियतं हि जानन्।<br>दृष्ट्वा हतान् प्रेरयते तथास्मा-<br>न्दैवं हि कोऽतिक्रमितुं समर्थः॥ ३० | **बिडालाख्य बोला—**युद्धमें मृत्युको निश्चित जानते हुए भी हमारे अभिमानी महाराज सन्धि नहीं करना चाहते। समरमें बहुत-से योद्धा मारे जा चुके हैं—यह देखकर भी वे हमें भेज रहे हैं। दैवको टाल सकनेमें भला कौन समर्थ है!॥ ३०॥ | | (दुःसाध्य एवास्तिवह सेवकानां<br>धर्मः सदा मानविवर्जितानाम्।<br>आज्ञापराणां वशवर्त्तिकानां<br>पाञ्चालिकानामिव सूत्रभेदात्॥) | (सम्मानकी भावनासे रहित, स्वामीकी आज्ञाका पालन करनेवाले तथा सदा उनके अधीन रहनेवाले सेवकोंका सेवाधर्म अत्यन्त कठिन है। सूतके संकेतपर नर्तन करनेवाली कठपुतलीकी भाँति वे सदा परतन्त्र रहते हैं।) | | गत्वा कथं तस्य पुरस्त्वया च<br>मयापि वक्तव्यमिदं कठोरम्।<br>गच्छन्तु पातालमितश्च सर्वे<br>दत्त्वाथ रत्नानि धनं सुराणाम्॥ ३१ | अतः उन महिषासुरके सामने जाकर मेरे अथवा तुम्हारे द्वारा ऐसा अप्रिय वचन कैसे कहा जा सकता है कि देवताओंके धन एवं रत्न वापस करके सभी दानव यहाँसे पातालको लौट चलें?॥ ३१॥ |

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—20 A

६१०श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १५

| ( प्रियं हि वक्तव्यमसत्यमेव<br>न च प्रियं स्याद्धितकृत्तु भाषितम्।<br>सत्यं प्रियं नो भवतीह कामं<br>मौनं ततो बुद्धिमतां प्रतिष्ठितम्॥ )<br><br>न फल्गुवाक्यैः प्रतिबोधनीयो<br>राजा तु वीरैरिति नीतिशास्त्रम्॥ ३२ | (सदा प्रिय वचन बोलना चाहिये, किंतु वह असत्य न हो। वचन हितकारक तथा प्रिय होना चाहिये। यदि वचन सत्य होनेपर भी प्रिय न हो तो ऐसी दशामें बुद्धिमान् मनुष्योंके लिये मौन ही श्रेष्ठ होता है।)<br>नीतिशास्त्रका कथन है कि वीर पुरुषोंको चाहिये कि वे मिथ्या वचनोंद्वारा राजाको धोखेमें न डालें॥ ३२॥ | | न नूनं तत्र गन्तव्यं हितं वा वक्तुमादरात्।<br>प्रष्टुं वापि गते राजा कोपयुक्तो भविष्यति॥ ३३<br><br>इति सञ्चिन्त्य कर्तव्यं युद्धं प्राणस्य संशये।<br>स्वामिकार्यं परं मत्वा मरणं तृणवत्तथा॥ ३४ | [सत्य बात तो यह है कि] आदरके साथ हितकी बात कहने अथवा पूछनेके लिये हमलोगोंको वहाँ नहीं चलना चाहिये। वहाँ जानेपर राजा महिषासुर कोपाविष्ट हो जायँगे। यह विचारकर अब हमलोगोंको यहाँ युद्ध ही करना चाहिये। जहाँ प्राणका संशय हो वहाँ स्वामीके कार्यको मुख्य मानकर मृत्युको तृणसदृश समझना चाहिये॥ ३३-३४॥ | | व्यास उवाच<br>इति सञ्चिन्त्य तौ वीरौ संस्थितौ युद्धतत्परौ।<br>धनुर्बाणधरौ तत्र सन्नद्धौ रथसङ्गतौ॥ ३५ | व्यासजी बोले—इस प्रकार विचार करके वे दोनों वीर युद्धके लिये तत्पर हो गये और कवच धारण करके हाथोंमें धनुष-बाण लेकर रथपर आरूढ हो देवीके सामने आ डटे॥ ३५॥ | | प्रथमं तु बिडालाख्यः सप्तबाणान्मुमोच ह।<br>असिलोमा स्थितो दूरे प्रेक्षकः परमास्त्रवित्॥ ३६ | सर्वप्रथम बिडालाख्यने देवीके ऊपर सात बाण चलाये। अस्त्र चलानेमें अत्यन्त निपुण असिलोमा दूर जाकर दर्शकके रूपमें खड़ा हो गया॥ ३६॥ | | चिच्छेद तांस्तथाप्राप्तानम्बिका स्वशरैः शरान्।<br>बिडालाख्यं त्रिभिर्बाणैर्जघान च शिलाशितैः॥ ३७ | भगवती जगदम्बाने अपने बाणोंसे बिडालाख्यके द्वारा चलाये गये उन बाणोंको काट डाला और पत्थरपर घिसकर तीक्ष्ण बनाये गये तीन बाणोंसे बिडालाख्यपर आघात किया॥ ३७॥ | | प्राप्य बाणव्यथां दैत्यः पपात समराङ्गणे।<br>मूर्च्छितोऽथ ममाराशु दानवो दैवयोगतः॥ ३८ | उन बाणोंकी असह्य वेदनासे पीड़ित होकर वह दैत्य समरभूमिमें गिर पड़ा, उसे मूर्च्छा आ गयी और कालयोगसे वह मर गया॥ ३८॥ | | बिडालाख्यं हतं दृष्ट्वा रणे शक्तिशरोत्करैः।<br>असिलोमा धनुष्पाणिः संस्थितो युद्धतत्परः॥ ३९<br><br>ऊर्ध्वं सव्यं करं कृत्वा तामुवाच मितं वचः।<br>देवि जानामि मरणं दानवानां दुरात्मनाम्॥ ४०<br><br>तथापि युद्धं कर्तव्यं पराधीनेन वै मया।<br>महिषो मन्दबुद्धिश्च न जानाति प्रियाप्रिये॥ ४१ | इस प्रकार भगवतीके बाणसमूहोंसे रणमें बिडालाख्यको मारा गया देखकर असिलोमा भी हाथमें धनुष लेकरके युद्ध करनेके लिये तैयार होकर सामने आ गया और दाहिना हाथ ऊपर उठाकर अभिमानपूर्वक बोला—हे देवि! मैं जानता हूँ कि सभी दुराचारी दानव मारे जायँगे, फिर भी पराधीन होनेके कारण मुझे युद्ध करना ही होगा। वह मन्दबुद्धि महिषासुर अपने प्रिय तथा अप्रियके विषयमें नहीं जानता॥ ३९—४१॥ |

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—20 B

अ० १५ ]पञ्चम स्कन्ध६११
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तदग्रे नैव वक्तव्यं हितं चैवाप्रियं मया।<br>मर्त्तव्यं वीरधर्मेण शुभं वाप्यशुभं भवेत्॥ ४२<br><br>दैवमेव परं मन्ये धिक्पौरुषमनर्थकम्।<br>पतन्ति दानवास्तूर्णं तव बाणहता भुवि॥ ४३उसके सामने हितकर वचन भी यदि अप्रिय है तो मुझे नहीं बोलना चाहिये। अब वीरधर्मके अनुसार मर जाना ही मेरे लिये उचित है—वह चाहे शुभ हो अथवा अशुभ। मैं तो दैवको ही बलवान् मानता हूँ, अनर्थकारी पुरुषार्थको धिक्कार है, तभी तो आपके बाणोंसे हत होकर दानव पृथ्वीपर गिरते जा रहे हैं॥ ४२-४३॥
इत्युक्त्वा शरवृष्टिं स चकार दानवोत्तमः।<br>देवी चिच्छेद तान्बाणैरप्राप्तांस्तु निजान्तिके॥ ४४<br><br>अन्यैर्विव्याध तं तूर्णमसिलोमानमाशुगैः।<br>वीक्षितामरसङ्घैश्च कोपपूर्णानना तदा॥ ४५<br><br>शुशुभे दानवः कामं बाणैर्विद्धतनुः किल।<br>स्रवद्रुधिरधारः स प्रफुल्लः किंशुको यथा॥ ४६ऐसा कहकर दानवश्रेष्ठ असिलोमा बाणवृष्टि करने लगा। देवीने अपने पासतक न पहुँचे हुए उन बाणोंको अपने बाणोंसे काट डाला और अपने अन्य शीघ्रगामी बाणोंसे असिलोमाको शीघ्रतापूर्वक बींध डाला। उस समय आकाशमें स्थित देवताओंने देखा कि भगवतीका मुखमण्डल क्रोधसे भर उठा है। देवीके बाणोंसे बिंधे शरीरवाला तथा बहती हुई रुधिरकी धारासे युक्त वह दैत्य ऐसा सुशोभित हो रहा था मानो पुष्पित हुआ पलाशका वृक्ष हो॥ ४४-४६॥
असिलोमा गदां गुर्वी लौहीमुद्यम्य वेगतः।<br>दुद्राव चण्डिकां कोपात्सिंहं मूर्ध्नि जघान ह॥ ४७<br><br>सिंहोऽपि नखराघातैस्तं ददार भुजान्तरे।<br>अगणय्य गदाघातं कृतं तेन बलीयसा॥ ४८अब असिलोमा लोहेकी बनी एक विशाल गदा लेकर बड़ी तेजीसे चण्डिकाकी ओर दौड़ा और क्रोधपूर्वक सिंहके सिरपर उसने गदासे प्रहार कर दिया। परंतु देवीके सिंहने उस बलवान् दानवके द्वारा किये गये गदा-प्रहारकी कुछ भी परवाह न करके अपने नखोंद्वारा उसके वक्षःस्थलको फाड़ डाला॥ ४७-४८॥
उत्पत्य तरसा दैत्यो गदापाणिः सुदारुणः।<br>सिंहमूर्ध्नि समारुह्य जघान गदयाम्बिकाम्॥ ४९तब उस महाविकराल दैत्यने हाथमें गदा लिये ही बड़े वेगसे उछलकर सिंहके मस्तकपर सवार हो भगवतीके ऊपर गदासे प्रहार किया॥ ४९॥
कृतं तेन प्रहारं तु वञ्चयित्वा विशांपते।<br>खड्गेन शितधारेण शिरश्चिच्छेद कण्ठतः॥ ५०<br><br>छिन्ने शिरसि दैत्येन्द्रः पपात तरसा क्षितौ।<br>हाहाकारो महानासीत्सैन्ये तस्य दुरात्मनः॥ ५१हे राजन्! उसके द्वारा किये गये प्रहारको रोककर देवीने तेज धारवाली तलवारसे उसका मस्तक गर्दनसे अलग कर दिया। इस प्रकार मस्तक कट जानेपर वह दानवराज तुरंत गिर पड़ा। अब उस दुरात्माकी सेनामें हाहाकार मच गया॥ ५०-५१॥
जय देवीति देवास्तां तुष्टुवुर्जगदम्बिकाम्।<br>देवदुन्दुभयो नेदुर्जगुश्च नृप किन्नराः॥ ५२हे राजन्! देवीकी जय हो—ऐसा कहकर देवतागण भगवतीकी स्तुति करने लगे। देवताओंकी दुन्दुभियाँ बज उठीं और किन्नरगण देवीका यशोगान करने लगे॥ ५२॥

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]— 20 C

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे असिलोमबिडालाख्यवधवर्णनं नाम पञ्चदशोऽध्यायः॥ १५॥

६१२श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १६

| निहतौ दानवौ वीक्ष्य पतितौ च रणाङ्गणे।<br>निहताः सैनिकाः सर्वे तत्र केसरिणा बलात्॥ ५३<br><br>भक्षिताश्च तथा केचिन्निःशेषं तद्रणं कृतम्।<br>भग्नाः केचिद् गता मन्दा महिषं प्रति दुःखिताः॥ ५४<br><br>चुक्रुशू रुरुदुश्चैव त्राहि त्राहीति भाषणैः।<br>असिलोमबिडालाख्यौ निहतौ नृपसत्तम॥ ५५<br><br>अन्ये ये सैनिका राजन् सिंहेन भक्षिताश्च ते।<br>एवं ब्रुवन्तो राजानं तदा चक्रुश्च वैशसम्॥ ५६ | मारे गये उन दोनों दैत्योंको समरांगणमें गिरा हुआ देखकर शेष सम्पूर्ण सैनिकोंको सिंहने अपने पराक्रमद्वारा मार गिराया और कुछ दानवोंको खा डाला और इस प्रकार उस युद्धभूमिको दानवोंसे रहित कर दिया। कुछ अंग-भंग हुए मूर्ख दानव दुःखी होकर महिषासुरके पास पहुँचे और 'रक्षा कीजिये-रक्षा कीजिये'—ऐसा कहते हुए वे चीखने-चिल्लाने तथा रोने लगे—'हे नृपश्रेष्ठ! असिलोमा और बिडालाख्य दोनों ही मारे गये। हे राजन्! अन्य जो भी सैनिक थे, उन्हें सिंह खा गया' ऐसा कहते हुए उन्होंने राजाको दुःखमें डाल दिया॥ ५३—५६॥ | | तच्छ्रुत्वा वचनं तेषां महिषो दुर्मनास्तदा।<br>बभूव चिन्ताकुलितो विमना दुःखसंयुतः॥ ५७ | उनकी बात सुनकर महिषासुर खिन्नमनस्क, चिन्तासे व्याकुल, उदास तथा दुःखी हो गया॥ ५७॥ |

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे असिलोमबिडालाख्यवधवर्णनं नाम पञ्चदशोऽध्यायः॥ १५॥


अथ षोडशोऽध्यायः

महिषासुरका रणभूमिमें आना तथा देवीसे प्रणय-याचना करना

व्यास उवाचव्यासजी बोले—
तेषां तद्वचनं श्रुत्वा क्रोधयुक्तो नराधिपः।<br>दारुकं प्राह तरसा रथमानय मेऽद्भुतम्॥ १<br><br>सहस्रखरसंयुक्तं पताकाध्वजभूषितम्।<br>आयुधैः संयुतं शुभ्रं सुचक्रं चारूकूबरम्॥ २उन सैनिकोंकी बात सुनकर राजा महिष क्रोधित हो उठा और उसने सारथिसे कहा—हजार गधोंसे जुते हुए, ध्वजा तथा पताकाओंसे सुशोभित, अनेक प्रकारके आयुधोंसे परिपूर्ण, सुन्दर चक्कों तथा जुएसे विभूषित तथा प्रकाशमान मेरा अद्भुत रथ तुरंत ले आओ॥ १-२॥
सूतोऽपि रथमानीय तमुवाच त्वरान्वितः।<br>राजन् रथोऽयमानीतो द्वारि तिष्ठति भूषितः॥ ३सारथिने भी तत्क्षण रथ लाकर उससे कहा—हे राजन्! सुसज्जित करके रथ ला दिया गया जो द्वारपर खड़ा है; यह सभी आयुधोंसे समन्वित तथा उत्तम आस्तरणोंसे युक्त है॥ ३ १/२॥
सर्वायुधसमायुक्तो वरास्तरणसंयुतः।<br>आनीतं तं रथं ज्ञात्वा दानवेन्द्रो महाबलः॥ ४<br><br>मानुषं देहमास्थाय संग्रामे गन्तुमुद्यतः।<br>विचार्य मनसा चेति देवी मां प्रेक्ष्य दुर्मुखम्॥ ५<br><br>शृङ्गिणं महिषं नूनं विमना सा भविष्यति।<br>नारीणां च प्रियं रूपं तथा चातुर्यमित्यपि॥ ६रथके आनेकी बात सुनकर महाबली दानवराज महिष मनुष्यका रूप धारण करके युद्धभूमिमें जानेको तैयार हुआ। उसने अपने मनमें सोचा कि यदि मैं अपने महिषरूपमें जाऊँगा तो देवी मुझ शृंगयुक्त महिषको देखकर अवश्य उदास हो जायगी। स्त्रियोंको सुन्दर रूप और चातुर्य अत्यन्त प्रिय होता है। अतः आकर्षक रूप तथा चातुर्यसे सम्पन्न होकर मैं उसके

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—20 D

| अ० १६ ] | पञ्चम स्कन्ध | ६१३ | | :--- | :--- |

| तस्माद्रूपं च चातुर्यं कृत्वा यास्यामि तां प्रति।<br>यथा मां वीक्ष्य सा बाला प्रेमयुक्ता भविष्यति॥ ७ | पास जाऊँगा, जिससे मुझे देखते ही वह युवती प्रेमयुक्त—मोहित हो जायगी। मुझे भी इसी स्थितिमें सुख होगा, अन्य किसी स्वरूपसे नहीं॥ ४—७ १/२ ॥ | | ममापि च तदैव स्यात्सुखं नान्यस्वरूपतः।<br>इति सञ्चिन्त्य मनसा दानवेन्द्रो महाबलः॥ ८<br><br>त्यक्त्वा तन्माहिषं रूपं बभूव पुरुषः शुभः।<br>सर्वायुधधरः श्रीमांश्चारूभूषणभूषितः॥ ९<br><br>दिव्याम्बरधरः कान्तः पुष्पबाण इवापरः।<br>रथोपविष्टः केयूरस्रग्वी बाणधनुर्धरः॥ १०<br><br>सेनापरिवृतो देवीं जगाम मदगर्वितः।<br>मनोज्ञं रूपमास्थाय मानिनीनां मनोहरम्॥ ११ | मनमें ऐसा विचार करके महाबली वह दानवेन्द्र महिषरूप छोड़कर एक सुन्दर पुरुष बन गया। वह सभी प्रकारके आयुधको धारण किये हुए था, वह ऐश्वर्यसम्पन्न था, वह सुन्दर आभूषणोंसे अलंकृत था, उसने दिव्य वस्त्र धारण कर रखे थे। केयूर और हार पहने तथा हाथमें धनुष-बाण धारण किये रथपर बैठा हुआ वह कान्तिमान् दैत्य दूसरे कामदेवके सदृश प्रतीत हो रहा था। मानिनी सुन्दरियोंका भी मन हर लेनेवाला ऐसा सुन्दर रूप बनाकर वह मदोन्मत्त दैत्य अपनी विशाल सेनाके साथ देवीकी ओर चला॥ ८—११॥ | | तमागतं समालोक्य दैत्यानामधिपं तदा।<br>बहुभिः संवृतं वीरैर्देवी शङ्खमवादयत्॥ १२ | अनेक वीरोंसे घिरे हुए उस दैत्यराज महिषासुरको आया हुआ देखकर देवीने अपना शंख बजाया॥ १२॥ | | स शङ्खनिनादं श्रुत्वा जनविस्मयकारकम्।<br>समीपमेत्य देव्यास्तु तामुवाच हसन्निव॥ १३ | लोगोंको आश्चर्यचकित कर देनेवाली उस शंखध्वनिको सुनकर भगवतीके पास आकर वह दैत्य हँसता हुआ उनसे कहने लगा—॥ १३॥ | | देवि संसारचक्रेऽस्मिन्वर्तमानो जनः किल।<br>नरो वाथ तथा नारी सुखं वाञ्छति सर्वथा॥ १४<br><br>सुखं संयोगजं नृणां नासंयोगे भवेदिह।<br>संयोगो बहुधा भिन्नस्तानब्रवीमि शृणुष्व ह॥ १५<br><br>भेदान्सुप्रीतिहेतूत्थान्स्वभावोत्थाननेकशः ।<br>तत्र प्रीतिभवानादौ कथयामि यथामति॥ १६ | हे देवि! इस परिवर्तनशील जगत्में रहनेवाला व्यक्ति वह स्त्री अथवा पुरुष चाहे कोई भी हो, सब प्रकारसे सुख ही चाहता है। इस लोकमें सुख मनुष्योंको संयोगमें ही प्राप्त होता है, वियोगमें सुख होता ही नहीं। संयोग भी अनेक प्रकारका होता है। मैं उन भेदोंको बताता हूँ, सुनो। कहीं उत्तम प्रीतिके कारण संयोग हो जाता है और कहीं स्वभावतः संयोग हो जाता है, इनमें सर्वप्रथम मैं प्रीतिसे उत्पन्न होनेवाले संयोगके विषयमें अपनी बुद्धिके अनुसार बता रहा हूँ॥ १४—१६॥ | | मातापित्रोस्तु पुत्रेण संयोगस्तूत्तमः स्मृतः।<br>भ्रातृर्भ्रात्रा तथा योगः कारणान्मध्यमो मतः॥ १७<br><br>उत्तमस्य सुखस्यैव दातृत्वादुत्तमः स्मृतः।<br>तस्मादल्पसुखस्यैव प्रदातृत्वाच्च मध्यमः॥ १८ | माता-पिताका पुत्रके साथ होनेवाला संयोग उत्तम कहा गया है। भाईका भाईके साथ संयोग किसी प्रयोजनसे होता है, अतः वह मध्यम माना गया है। उत्तम सुख प्रदान करनेके कारण पहले प्रकारके संयोगको उत्तम तथा उससे कम सुख प्रदान करनेके कारण [दूसरे प्रकारके] संयोगको मध्यम कहा गया है॥ १७-१८॥ |

६१४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १६

६१४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १६

संस्कृतहिन्दी
नाविकानां तु संयोगः स्मृतः स्वाभाविको बुधैः।<br>विविधावृतचित्तानां प्रसङ्गपरिवर्तिनाम्॥ १९<br><br>अत्यल्पसुखदातृत्वात्कनिष्ठोऽयं स्मृतो बुधैः।<br>अत्युत्तमस्तु संयोगः संसारे सुखदः सदा॥ २०<br><br>नारीपुरुषयोः कान्ते समानवयसोः सदा।<br>संयोगो यः समाख्यातः स एवात्युत्तमः स्मृतः॥ २१<br><br>अत्युत्तमसुखस्यैव दातृत्वात्स तथाविधः।<br>चातुर्यरूपवेषाद्यैः कुलशीलगुणैस्तथा॥ २२<br><br>परस्परसमुत्कर्षः कथ्यते हि परस्परम्।<br>तं चेत्करोषि संयोगं वीरेण च मया सह॥ २३<br><br>अत्युत्तमसुखस्यैव प्राप्तिः स्यात्ते न संशयः।<br>नानाविधानि रूपाणि करोमि स्वेच्छया प्रिये॥ २४<br><br>इन्द्रादयः सुराः सर्वे संग्रामे विजिता मया।<br>रत्नानि यानि दिव्यानि भवनेऽस्मिन्ममाधुना॥ २५<br><br>भुंक्ष्व त्वं तानि सर्वाणि यथेष्टं देहि वा यथा।<br>पट्टराज्ञी भवाद्य त्वं दासोऽस्मि तव सुन्दरि॥ २६<br><br>वैरं त्यजेऽहं देवैस्तु तव वाक्यान्न संशयः।<br>यथा त्वं सुखमाप्नोषि तथाहं करवाणि वै॥ २७<br><br>आज्ञापय विशालाक्षि तथाहं प्रकरोम्यथ।<br>चित्तं मे तव रूपेण मोहितं चारुभाषिणि॥ २८<br><br>आतुरोऽस्मि वरारोहे प्राप्तस्ते शरणं किल।<br>प्रपन्नं पाहि रम्भोरु कामबाणैः प्रपीडितम्॥ २९<br><br>धर्माणामुत्तमो धर्मः शरणागतरक्षणम्।<br>त्वदीयोऽस्म्यसितापाङ्गि सेवकोऽहं कृशोदरि॥ ३०<br><br>मरणान्तं वचः सत्यं नान्यथा प्रकरोम्यहम्।<br>पादौ नतोऽस्मि तन्वङ्गि त्यक्त्वा नानायुधानि ते॥ ३१विविध विचारोंसे युक्त चित्तवाले तथा प्रसंगवश एकत्रित नौकामें बैठे हुए लोगोंके मिलनेको विद्वानोंने स्वाभाविक संयोग कहा है। बहुत कम समयके लिये सुख प्रदान करनेके कारण विद्वानोंके द्वारा इसे कनिष्ठ संयोग कहा गया है॥ १९ ½॥<br><br>अत्युत्तम संयोग संसारमें सदा सुखदायक होता है। हे कान्ते! समान अवस्थावाले स्त्री-पुरुषका जो संयोग है, वही अत्युत्तम कहा गया है। अत्युत्तम सुख प्रदान करनेके कारण ही उसे उस प्रकारका संयोग कहा गया है। चातुर्य, रूप, वेष, कुल, शील, गुण आदिमें समानता रहनेपर परस्पर सुखकी अभिवृद्धि कही जाती है॥ २०—२२ ½॥<br><br>यदि तुम मुझ वीरके साथ संयोग करोगी तो तुम्हें अत्युत्तम सुखकी प्राप्ति होगी; इसमें सन्देह नहीं है। हे प्रिये! मैं अपनी रुचिके अनुसार अनेक प्रकारके रूप धारण कर लेता हूँ। मैंने इन्द्र आदि सभी देवताओंको संग्राममें जीत लिया है। मेरे भवनमें इस समय जो भी दिव्य रत्न हैं, उन सबका तुम उपभोग करो; अथवा इच्छानुसार उसका दान करो। अब तुम मेरी पटरानी बन जाओ। हे सुन्दरि! मैं तुम्हारा दास हूँ॥ २३—२६॥<br><br>तुम्हारे कहनेसे मैं देवताओंसे वैर करना भी छोड़ दूँगा; इसमें सन्देह नहीं है। तुम्हें जैसे भी सुख मिलेगा, मैं वही करूँगा। हे विशालनयने! अब तुम मुझे आज्ञा दो और मैं उसका पालन करूँ। हे मधुरभाषिणि! मेरा मन तुम्हारे रूपपर मोहित हो गया है॥ २७-२८॥<br><br>हे सुन्दरि! मैं [तुम्हें पानेके लिये] व्याकुल हूँ, इसलिये इस समय तुम्हारी शरणमें आया हूँ। हे रम्भोरु! कामबाणसे आहत मुझ शरणागतकी रक्षा करो। शरणमें आये हुएकी रक्षा करना सभी धर्मोंमें उत्तम धर्म है। श्याम नेत्रोंवाली हे कृशोदरि! मैं तुम्हारा सेवक हूँ। मैं मरणपर्यन्त सत्य वचनका पालन करूँगा, इसके विपरीत नहीं करूँगा। हे तन्वंगि! नानाविध आयुधोंको त्यागकर मैं तुम्हारे चरणोंमें अवनत हूँ॥ २९—३१॥
अ० १६ ]पञ्चम स्कन्ध६१५
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
दयां कुरु विशालाक्षि तप्तोऽस्मि काममार्गणैः।<br>जन्मप्रभृति चार्वङ्गि दैन्यं नाचरितं मया ॥ ३२<br><br>ब्रह्मादीनीश्वरान्प्राप्य त्वयि तद्विदधाम्यहम्।<br>चरितं मम जानन्ति रणे ब्रह्मादयः सुराः ॥ ३३<br><br>सोऽप्यहं तव दासोऽस्मि मन्मुखं पश्य भामिनि।हे विशालाक्षि! मैं कामदेवके बाणोंद्वारा सन्तप्त हो रहा हूँ, अतः तुम मेरे ऊपर दया करो। हे सुन्दरि! जन्मसे लेकर आजतक मैंने ब्रह्मा आदि देवताओंके समक्ष भी दीनता नहीं प्रदर्शित की, किंतु तुम्हारे समक्ष आज उसे प्रकट कर रहा हूँ। ब्रह्मा आदि देवता समरांगणमें मेरे चरित्रको जानते हैं। हे भामिनि! वही मैं आज तुम्हारी दासता स्वीकार करता हूँ, मेरी ओर देखो ॥ ३२–३३ १/२ ॥
व्यास उवाच<br>इति ब्रुवाणं तं दैत्यं देवी भगवती हि सा ॥ ३४<br><br>प्रहस्य सस्मितं वाक्यमुवाच वरवर्णिनी।व्यासजी बोले— ऐसा कहते हुए उस दैत्य महिषासुरसे हँसकर अनुपम सौन्दर्यमयी भगवती मुसकानके साथ यह वचन कहने लगीं ॥ ३४ १/२ ॥
देव्युवाच<br>नाहं पुरुषमिच्छामि परं पुरुषं विना ॥ ३५<br><br>तस्य चेच्छाम्यहं दैत्य सृजामि सकलं जगत्।<br>स मां पश्यति विश्वात्मा तस्याहं प्रकृतिः शिवा ॥ ३६<br><br>तत्सान्निध्यवशादेव चैतन्यं मयि शाश्वतम्।<br>जडाहं तस्य संयोगात्प्रभवामि सचेतना ॥ ३७देवी बोलीं— मैं परमपुरुषके अतिरिक्त अन्य किसी पुरुषको नहीं चाहती। हे दैत्य! मैं उनकी इच्छाशक्ति हूँ, मैं ही सारे संसारकी सृष्टि करती हूँ। वे विश्वात्मा मुझे देख रहे हैं; मैं उनकी कल्याणमयी प्रकृति हूँ। निरन्तर उनके सांनिध्यके कारण ही मुझमें शाश्वत चेतना है। वैसे तो मैं जड़ हूँ, किंतु उन्हींके संयोगसे मैं चेतनायुक्त हो जाती हूँ जैसे चुम्बकके संयोगसे साधारण लोहेमें भी चेतना उत्पन्न हो जाती है ॥ ३५–३७ १/२ ॥
अयस्कान्तस्य सान्निध्यादयस्सचेतना यथा।<br>न ग्राम्यसुखवाञ्छा मे कदाचिदपि जायते ॥ ३८<br><br>मूर्खस्त्वमसि मन्दात्मन् यत्स्त्रीसङ्गं चिकीर्षसि।<br>नरस्य बन्धनार्थाय शृङ्खला स्त्री प्रकीर्तिता ॥ ३९<br><br>लोहबद्धोऽपि मुच्येत स्त्रीबद्धो नैव मुच्यते।<br>किमिच्छसि च मन्दात्मन् मूत्रागारस्य सेवनम् ॥ ४०<br><br>शमं कुरु सुखाय त्वं शमात्सुखमवाप्स्यसि।<br>नारीसङ्गे महद्दुःखं जानन्किं त्वं विमुह्यसि ॥ ४१मेरे मनमें कभी भी विषयभोगकी इच्छा नहीं होती। हे मन्दबुद्धि! तुम मूर्ख हो जो कि स्त्रीसंग करना चाहते हो; पुरुषको बाँधनेके लिये स्त्री जंजीर कही गयी है। लोहेसे बँधा हुआ मनुष्य बन्धनमुक्त हो भी सकता है, किंतु स्त्रीके बन्धनमें बँधा हुआ प्राणी कभी नहीं छूटता। हे मूर्ख! मूत्रागार (गुह्य अंग)-का सेवन क्यों करना चाहते हो? सुखके लिये मनमें शान्ति धारण करो। शान्तिसे ही तुम सुख प्राप्त कर सकोगे। स्त्रीसंगसे बहुत दुःख मिलता है—इस बातको जानते हुए भी तुम अज्ञानी क्यों बनते हो? ॥ ३८–४१ ॥
त्यज वैरं सुरैः सार्धं यथेष्टं विचरावनौ।<br>पातालं गच्छ वा कामं जीवितेच्छा यदस्ति ते ॥ ४२<br><br>अथवा कुरु संग्रामं बलवत्यस्मि साम्प्रतम्।<br>प्रेषिताहं सुरैः सर्वैस्तव नाशाय दानव ॥ ४३तुम देवताओंके साथ वैरभाव छोड़ दो और पृथ्वीपर इच्छानुसार विचरण करो। यदि जीवित रहनेकी तुम्हारी अभिलाषा हो तो पाताललोक चले जाओ अथवा मेरे साथ युद्ध करो। इस समय मुझमें पूर्ण शक्ति विद्यमान है। हे दानव! सभी देवताओंने तुम्हारा नाश करनेके लिये मुझे यहाँ भेजा है ॥ ४२–४३ ॥
६१६श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १६
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
सत्यं ब्रवीमि येनाद्य त्वया वचनसौहृदम्।<br>दर्शितं तेन तुष्टास्मि जीवन्गच्छ यथासुखम्॥ ४४<br><br>सतां सप्तपदी मैत्री तेन मुञ्चामि जीवितम्।<br>मरणेच्छास्ति चेद्युद्धं कुरु वीर यथासुखम्॥ ४५<br><br>हनिष्यामि महाबाहो त्वामहं नात्र संशयः।मैं तुमसे यह सत्य कह रही हूँ, तुमने वाणीद्वारा सौहार्दपूर्ण भाव प्रदर्शित किया है, अतः मैं तुम्हारे ऊपर प्रसन्न हूँ। अब तुम जीवित रहते ही सुखपूर्वक यहाँसे चले जाओ। केवल सात पग साथ चलनेपर ही सज्जनोंमें मैत्री हो जाती है, इसी कारण मैं तुम्हें जीवित छोड़ दे रही हूँ। हे वीर! यदि मरनेकी ही इच्छा हो तो तुम मेरे साथ आनन्दसे युद्ध कर सकते हो। हे महाबाहो! मैं तुम्हें युद्धमें मार डालूँगी; इसमें संशय नहीं है॥ ४४-४५ ½ ॥
व्यास उवाच<br>इति तस्या वचः श्रुत्वा दानवः काममोहितः॥ ४६<br><br>उवाच श्लक्ष्णया वाचा मधुरं वचनं ततः।<br>बिभेम्यहं वरारोहे त्वां प्रहर्तुं वरानने॥ ४७<br><br>कोमलां चारुसर्वाङ्गीं नारीं नरविमोहिनीम्।<br>जित्वा हरिहरादींश्च लोकपालांश्च सर्वशः॥ ४८<br><br>किं त्वया सह युद्धं मे युक्तं कमललोचने।व्यासजी बोले— भगवतीका यह वचन सुनकर कामसे मोहित दानव [पुनः] मधुर वाणीमें मीठी बातें करने लगा— हे सुन्दरि! हे सुमुखि! कोमल, सुन्दर अंगोंवाली तथा पुरुषोंको मोह लेनेवाली तुझ युवतीके ऊपर प्रहार करनेमें मुझे भय लगता है। हे कमललोचने! विष्णु, शिव आदि बड़े-बड़े देवताओं और सब लोकपालोंपर विजय प्राप्त करके क्या अब तुम्हारे साथ मेरा युद्ध करना उचित होगा?॥ ४६—४८ ½॥
रोचते यदि चार्वङ्गि विवाहं कुरु मां भज॥ ४९<br><br>नोचेद् गच्छ यथेष्टं ते देशं यस्मात्समागता।<br>नाहं त्वां प्रहरिष्यामि यतो मैत्री कृता त्वया॥ ५०<br><br>हितमुक्तं शुभं वाक्यं तस्माद् गच्छ यथासुखम्।<br>का शोभा मे भवेदन्ते हत्वा त्वां चारुलोचनाम्॥ ५१<br><br>स्त्रीहत्या बालहत्या च ब्रह्महत्या दुरत्यया।हे सुन्दर अंगोंवाली! यदि तुम्हारी इच्छा हो तो मेरे साथ विवाह कर लो और मेरा सेवन करो; अन्यथा तुम जहाँसे आयी हो, उसी देशमें इच्छानुसार चली जाओ। मैं तुम्हारे साथ मित्रता कर चुका हूँ, इसलिये तुमपर प्रहार नहीं करूँगा। यह मैंने तुम्हारे लिये हितकर तथा कल्याणकारी बात बतायी है; इसलिये तुम सुखपूर्वक यहाँसे चली जाओ। सुन्दर नेत्रोंवाली तुझ रमणीका वध करनेसे मेरी कौन-सी गरिमा बढ़ जायगी? स्त्रीहत्या, बालहत्या और ब्रह्महत्याका पाप बहुत ही जघन्य होता है॥ ४९—५१ ½॥
गृहीत्वा त्वां गृहं नूनं गच्छाम्यद्य वरानने॥ ५२<br><br>तथापि मे फलं न स्याद् बलाद्भोगसुखं कुतः।<br>प्रब्रवीमि सुकेशि त्वां विनयावनतो यतः॥ ५३<br><br>पुरुषस्य सुखं न स्यादृते कान्तामुखाम्बुजात्।<br>तत्तथैव हि नारीणां न स्याच्च पुरुषं विना॥ ५४हे वरानने! वैसे तो मैं तुम्हें बलपूर्वक पकड़कर अपने घर निश्चितरूपसे ले जा सकता हूँ, किंतु बलप्रयोगसे मुझे सच्चा सुख नहीं मिलेगा, उसमें भोगसुख कैसे प्राप्त हो सकता है? अतएव हे सुकेशि! मैं बहुत विनीतभावसे तुमसे कह रहा हूँ कि जैसे पुरुषको अपनी प्रियाके मुखकमलके बिना सुख नहीं मिलता, उसी प्रकार स्त्रियोंको भी पुरुषके बिना सुख नहीं मिलता॥ ५२—५४॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्रयां संहितयां पञ्चमस्कन्धे

अ० १६ ]पञ्चम स्कन्ध६१७
संस्कृत मूलहिन्दी अनुवाद
संयोगे सुखसम्भूतिर्वियोगे दुःखसम्भवः।<br>कान्तासि रूपसम्पन्ना सर्वाभरणभूषिता॥ ५५<br><br>चातुर्यं त्वयि किं नास्ति यतो मां न भजस्यहो।<br>तवोपदिष्टं केनेदं भोगानां परिवर्जनम्॥ ५६<br><br>वञ्चितासि प्रियालापे वैरिणा केनचित्त्विह।<br>मुञ्चाग्रहमिमं कान्ते कुरु कार्यं सुशोभनम्॥ ५७<br><br>सुखं तव ममापि स्याद्विवाहे विहिते किल।<br>विष्णुर्लक्ष्म्या सहाभाति सावित्र्या च सहात्मभूः॥ ५८<br><br>रुद्रो भाति च पार्वत्या शच्या शतमखस्तथा।<br>का नारी पतिहीना च सुखं प्राप्नोति शाश्वतम्॥ ५९<br><br>येन त्वमसितापाङ्गि न करोषि पतिं शुभम्।<br>कामः क्वादद्य गतः कान्ते यस्त्वां बाणैः सुकोमलैः॥ ६०<br><br>मादनैः पञ्चभिः कामं न ताडयति मन्दधीः।<br>मन्येऽहमिव कामोऽपि दयावांस्त्वयि सुन्दरि॥ ६१<br><br>अबलेति च मन्वानो न प्रेरयति मार्गणान्।<br>मनोभवस्य वैरं वा किमप्यस्ति मया सह॥ ६२<br><br>तेन च त्वय्यरालाक्षि न मुञ्चति शिलीमुखान्।<br>अथवा मेऽहितैर्देवैर्वारितोऽसौ झषध्वजः॥ ६३<br><br>सुखविध्वंसिभिस्तेन त्वयि न प्रहरत्यपि।<br>त्यक्त्वा मां मृगशावाक्षि पश्चात्तापं करिष्यसि॥ ६४<br><br>मन्दोदरीव तन्वङ्गि परित्यज्य शुभं नृपम्।<br>अनुकूलं पतिं पश्चात्सा चकार शठं पतिम्।<br>कामार्ता च यदा जाता मोहेन व्याकुलान्तरा॥ ६५संयोगमें सुख उत्पन्न होता है और वियोगमें दुःख। तुम सुन्दर, रूपवती और सभी आभूषणोंसे अलंकृत हो। [यह सब होते हुये भी] तुझमें चतुरता क्यों नहीं है, जिससे तुम मुझे स्वीकार नहीं कर रही हो? इस तरह भोगोंको छोड़ देनेका परामर्श तुम्हें किसने दिया है? हे मधुरभाषिणि! [ऐसा करके] किसी शत्रुने तुम्हें धोखा दिया है॥ ५५-५६½॥<br><br>हे कान्ते! अब तुम यह आग्रह छोड़ दो और अत्यन्त सुन्दर कार्य करनेमें तत्पर हो जाओ। विवाह सम्पन्न हो जानेपर तुम्हें और मुझे दोनोंको सुख प्राप्त होगा। विष्णु लक्ष्मीके साथ, ब्रह्मा सावित्रीके साथ, शंकर पार्वतीके साथ तथा इन्द्र शचीके साथ रहकर ही सुशोभित होते हैं। पतिके बिना कौन स्त्री चिरस्थायी सुख प्राप्त कर सकती है? हे सुन्दरि! [कौन-सा ऐसा कारण है] जिससे तुम मुझ-जैसे उत्तम पुरुषको अपना पति नहीं बना रही हो?॥ ५७-५९½॥<br><br>हे कान्ते! न जाने मन्दबुद्धि कामदेव इस समय कहाँ चला गया जो अपने अत्यन्त कोमल तथा मादक पंचबाणोंसे तुम्हें आहत नहीं कर रहा है। हे सुन्दरि! मुझे तो लगता है कि कामदेव भी तुम्हारे ऊपर दयालु हो गया है और तुम्हें अबला समझते हुए वह अपने बाण नहीं छोड़ रहा है। हे तिरछी चितवनवाली सुन्दरि! सम्भव है उस कामदेवको भी मेरे साथ कुछ शत्रुता हो, इसीलिये वह तुम्हारे ऊपर बाण न चलाता हो। अथवा यह भी हो सकता है कि मेरे सुखका नाश करनेवाले मेरे शत्रु देवताओंने उस कामदेवको मना कर दिया हो, इसीलिये वह तुम्हारे ऊपर [अपने बाणोंसे] प्रहार नहीं कर रहा है॥ ६०-६३½॥<br><br>हे मृगशावकके समान नेत्रोंवाली! मुझे त्यागकर तुम मन्दोदरीकी भाँति पश्चात्ताप करोगी, हे तन्वंगि! पतिरूपमें प्राप्त सुन्दर तथा अनुकूल राजाका त्याग करके बादमें वह मन्दोदरी जब कामार्त तथा मोहसे व्याकुल अन्तःकरणवाली हो गयी, तब उसने एक धूर्तको अपना पति बना लिया था॥ ६४-६५॥
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इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्रयां संहितयां पञ्चमस्कन्धे महिषद्वारा देवीप्रबोधनं नाम षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥

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६१८श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १७

अथ सप्तदशोऽध्यायः

महिषासुरका देवीको मन्दोदरी नामक राजकुमारीका आख्यान सुनाना

व्यास उवाचव्यासजी बोले—
इति श्रुत्वा वचस्तस्य देवी पप्रच्छ दानवम्।<br>का सा मन्दोदरी नारी कोऽसौ त्यक्तो नृपस्तया ॥ १[हे महाराज!] उसका यह वचन सुनकर भगवतीने उस दानवसे पूछा—वह स्त्री मन्दोदरी कौन थी और वह राजा कौन था, जिसे उसने त्याग दिया था? ॥ १ ॥
शठः को वा नृपः पश्चात्तन्मे ब्रूहि कथानकम्।<br>विस्तरेण यथा प्राप्तं दुःखं वनितया पुनः ॥ २बादमें उसने जिसे पति बनाया, वह धूर्त राजा कौन था? उस स्त्रीको पुनः जिस प्रकार दुःख मिला हो, वह कथानक विस्तारपूर्वक बताओ ॥ २ ॥
महिष उवाचमहिषासुर बोला—
सिंहलो नाम देशोऽस्ति विख्यातः पृथिवीतले।<br>घनपादपसंयुक्तो धनधान्यसमृद्धिमान् ॥ ३पृथवीतलपर विख्यात सिंहल नामक एक देश है। उसमें बहुत ही घने-घने वृक्ष हैं और वह धन-धान्यसे समृद्ध है ॥ ३ ॥
चन्द्रसेनाभिधस्तत्र राजा धर्मपरायणः।<br>न्यायदण्डधरः शान्तः प्रजापालनतत्परः ॥ ४<br><br>सत्यवादी मृदुः शूरस्तितिक्षुर्नीतिसागरः।<br>शास्त्रवित्सर्वधर्मज्ञो धनुर्वेदेऽतिनिष्ठितः ॥ ५वहाँ चन्द्रसेन नामका राजा राज्य करता था, जो बड़ा धर्मात्मा, शान्तस्वभाव, प्रजापालनमें तत्पर, न्यायपूर्वक शासन-कार्य करनेवाला, सत्यवादी, मृदु स्वभाववाला, वीर, सहिष्णु, नीतिशास्त्रका सागर, शास्त्रवेत्ता, सब धर्मोंका ज्ञाता और धनुर्वेदमें अत्यन्त प्रवीण था ॥ ४-५ ॥
तस्य भार्या वरारोहा सुन्दरी सुभगा शुभा।<br>सदाचारातिसुमुखी पतिभक्तिपरायणा ॥ ६<br><br>नाम्ना गुणवती कान्ता सर्वलक्षणसंयुता।<br>सुषुवे प्रथमे गर्भे पुत्रीं सा चातिसुन्दरीम् ॥ ७उसकी भार्या भी रूपवती, सुन्दरी, सौभाग्यशालिनी, सद्गुणी, सदाचारिणी, अत्यन्त सुन्दर मुखवाली, पतिभक्तिमें लीन रहनेवाली, मनोहर और सभी उत्तम लक्षणोंसे सम्पन्न थी। उसका नाम गुणवती था। उसने प्रथम गर्भसे एक अति सुन्दर कन्याको जन्म दिया ॥ ६-७ ॥
पिता चातीव सन्तुष्टः पुत्रीं प्राप्य मनोरमाम्।<br>मन्दोदरीति नामास्याः पिता चक्रे मुदान्वितः ॥ ८उस मनोरम कन्याको पाकर पिता बहुत ही प्रसन्न हुए और उन्होंने बड़े हर्षके साथ उसका नाम मन्दोदरी रखा ॥ ८ ॥
इन्दोः कलेव चात्यर्थं ववृधे सा दिने दिने।<br>दशवर्षा यदा जाता कन्या चातिमनोहरा ॥ ९वह कन्या चन्द्रमाकी कलाके समान दिन-प्रतिदिन बढ़ने लगी। अत्यन्त मनोहारिणी वह कन्या जब दस वर्षकी हुई, तब उसके वरके लिये राजा चन्द्रसेन प्रतिदिन चिन्तित रहने लगे ॥ ९ ½ ॥
वरार्थं नृपतिश्चिन्तामवाप च दिने दिने।<br>मद्रदेशाधिपः शूरः सुधन्वा नाम पार्थिवः ॥ १०<br><br>तस्य पुत्रोऽतिमेधावी कम्बुग्रीवोऽतिविश्रुतः।<br>ब्राह्मणैः कथितो राज्ञे स युक्तोऽस्या वरः शुभः ॥ ११<br><br>सर्वलक्षणसम्पन्नः सर्वविद्यार्थपारगः।उस समय मद्रदेशके अधिपति सुधन्वा नामवाले एक पराक्रमी नरेश थे। कम्बुग्रीव नामसे अति विख्यात उनका एक पुत्र था, जो बहुत मेधावी था। ब्राह्मणोंने राजा चन्द्रसेनसे कहा कि कम्बुग्रीव उस कन्याके योग्य वर है। वह सुन्दर, सभी शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न तथा समस्त विद्याओंमें पारंगत है ॥ १०-११ ½ ॥

अ० १७] पञ्चम स्कन्ध ६१९

अ० १७] पञ्चम स्कन्ध ६१९


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
राज्ञा पृष्टा तदा राज्ञी नाम्ना गुणवती प्रिया ॥ १२<br>कम्बुग्रीवाय कन्यां स्वां दास्यामि वरवर्णिनीम् ।तब राजाने गुणवती नामवाली अपनी प्रिय रानीसे पूछा—[मेरा विचार है कि] मैं अपनी सुन्दर पुत्री मन्दोदरीको कम्बुग्रीवको सौंप दूँ ॥ १२ १/२ ॥
सा तु पत्युर्वचः श्रुत्वा पुत्रीं पप्रच्छ सादरम् ॥ १३<br>विवाहं ते पिता कर्तुं कम्बुग्रीवेण वाञ्छति ।पतिकी यह बात सुनकर उस रानीने अपनी पुत्रीसे आदरपूर्वक पूछा—तुम्हारे पिता कम्बुग्रीवके साथ तुम्हारा विवाह करना चाहते हैं ॥ १३ १/२ ॥
तच्छ्रुत्वा मातरं प्राह वाक्यं मन्दोदरी तदा ॥ १४<br>नाहं पतिं करिष्यामि नेच्छा मेऽस्ति परिग्रहे ।<br>कौमारं व्रतमास्थाय कालं नेष्यामि सर्वथा ॥ १५<br><br>स्वातन्र्येण चरिष्यामि तपस्तीव्रं सदैव हि ।<br>पारतन्त्र्यं परं दुःखं मातः संसारसागरे ॥ १६<br><br>स्वातन्त्र्यान्मोक्षमित्याहुः पण्डिताः शास्त्रकोविदाः ।<br>तस्मान्मुक्ता भविष्यामि पत्या मे न प्रयोजनम् ॥ १७तब यह सुनकर मन्दोदरीने मातासे यह वचन कहा—मैं पति नहीं बनाऊँगी, विवाह करनेमें मेरी अभिरुचि नहीं है। मैं सदा कौमार्यव्रतका आश्रय लेकर अपना जीवन व्यतीत करूँगी। मैं स्वतन्त्रतापूर्वक सदा कठोर तप करूँगी। हे माता! संसारसागरमें परतन्त्रता परम दुःख है। स्वतन्त्रतासे ही मोक्षकी प्राप्ति होती है—ऐसा शास्त्रोंके ज्ञाता पण्डितजनोंने कहा है, अतएव मैं बन्धनसे मुक्त रहूँगी, मुझे पतिसे कोई भी प्रयोजन नहीं है ॥ १४—१७ ॥
विवाहे वर्तमाने तु पावकस्य च सन्निधौ ।<br>वक्तव्यं वचनं सम्यक्त्वदधीनास्मि सर्वदा ॥ १८<br><br>श्वश्रूदेवरवर्गाणां दासीत्वं श्वशुरालये ।<br>पतिचित्तानुवर्तित्वं दुःखार्दुःखतरं स्मृतम् ॥ १९विवाह होते समय अग्निके साक्ष्यमें [प्रतिज्ञा-रूपमें] यह वचन कहना पड़ता है—'[हे पतिदेव!] अब मैं सदाके लिये पूर्णरूपसे आपके अधीन हो चुकी हूँ।' इसके अतिरिक्त ससुरालमें सास तथा देवर आदि लोगोंकी दासी बनकर रहना तथा सदा पतिके अनुकूल रहना अत्यन्त दुःखदायक बताया गया है ॥ १८-१९ ॥
कदाचित्पतिरन्यां वा कामिनीं च भजेद्यदि ।<br>तदा महत्तरं दुःखं सपत्नीसम्भवं भवेत् ॥ २०<br><br>तदेर्ष्या जायते पत्यौ क्लेशश्चापि भवेदथ ।<br>संसारे क्व सुखं मातर्नारीणां च विशेषतः ॥ २१<br><br>स्वभावात्परतन्त्राणां संसारे स्वप्नधर्मिणि ।कहीं यदि पतिने अन्य स्त्रीके साथ विवाह कर लिया तब तो सौतसे मिलनेवाला महान् दुःख उपस्थित हो जाता है। उस समय पतिके प्रति ईर्ष्याभाव उत्पन्न हो जाता है, कलह भी होने लगता है। हे माता! संसारमें सुख कहाँ है ? और विशेष करके स्वभावसे ही परतन्त्र नारियोंके लिये इस स्वप्नधर्मा संसारमें सुख है ही नहीं ॥ २०-२१ १/२ ॥
श्रुतं मया पुरा मातरुत्तानचरणात्मजः ॥ २२<br><br>उत्तमः सर्वधर्मज्ञो ध्रुवादवरजो नृपः ।<br>पत्नीं धर्मपरां साध्वीं पतिभक्तिपरायणाम् ॥ २३<br>अपराधं विना कान्तां त्यक्तवान्विपिने प्रियाम् ।हे माता! मैंने सुना है कि प्राचीनकालमें राजा उत्तानपादके एक 'उत्तम' नामक पुत्र थे, जो समस्त धर्मोंके ज्ञाता एवं ध्रुवके कनिष्ठ भ्राता थे। उन्होंने अपनी धर्मनिष्ठ, पतिव्रता, पतिके प्रति भक्तिभाव रखनेवाली, प्रिय तथा सुन्दर पत्नीको बिना किसी अपराधके ही वनमें छोड़ दिया था ॥ २२-२३ १/२ ॥
६२०श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
एवंविधानि दुःखानि विद्यमाने तु भर्तरि ॥ २४<br><br>कालयोगान्मृते तस्मिन्नारी स्याद्दुःखभाजनम् ।<br>वैधव्यं परमं दुःखं शोकसंत्तापकारकम् ॥ २५<br><br>पोषितपतित्वेऽपि दुःखं स्यादधिकं गृहे ।<br>मदनाग्निविदग्धायाः किं सुखं पतिसङ्गजम् ॥ २६<br><br>तस्मात्पतिर्न कर्तव्यः सर्वथेति मतिर्मम ।<br>एवं प्रोक्ता तदा माता पतिं प्राह नृपात्मजा ॥ २७पतिके रहते हुए भी इस प्रकारके अनेक दुःख स्त्रीको सहने पड़ते हैं। दैवयोगसे उसकी मृत्यु हो जानेपर स्त्रीको [विधवा बनकर] दुःख उठाना पड़ता है; क्योंकि वैधव्य परम दुःखमय होता है तथा नानाविध शोक एवं संताप उत्पन्न करता रहता है। पतिके परदेश चले जानेपर कामदेवकी अग्निमें जलती हुई स्त्रीको घरमें अत्यधिक दुःख सहना पड़ता है, तो फिर उसे पतिसंगजनित क्या सुख प्राप्त हुआ? अतएव मेरा तो यही मत है कि स्त्रियोंको विवाह कभी नहीं करना चाहिये ॥ २४–२६\frac{१}{२} ॥
न च वाञ्छति भर्तारं कौमारव्रतधारिणी ।<br>व्रतजाप्यपरा नित्यं संसाराद्विमुखी सदा ॥ २८<br><br>न काङ्क्षति पतिं कर्तुं बहुदोषविचक्षणा ।<br>भार्यया भाषितं श्रुत्वा तथैव संस्थितो नृपः ॥ २९[पुत्रीके] ऐसा कहनेपर उसकी माताने अपने पतिसे कहा—कौमारव्रत धारण करनेकी इच्छावाली वह राजकुमारी पतिकी कामना नहीं करती है। संसारसे विरक्त रहकर वह सदा व्रत और जपमें तत्पर रहना चाहती है। [पतिसंगजनित] अनेक दोषोंको जाननेवाली वह कन्या विवाह नहीं करना चाहती ॥ २७–२८\frac{१}{२} ॥
विवाहो न कृतः पुत्र्या ज्ञात्वा भावविवर्जिताम् ।<br>वर्तमाना गृहेष्वेव पित्रा मात्रा च रक्षिता ॥ ३०<br><br>यौवनस्याङ्कुरा जाता नारीणां कामदीपकाः ।<br>तथापि सा वयस्याभिः प्रेरितापि पुनः पुनः ॥ ३१<br><br>चकमे न पतिं कर्तुं ज्ञानार्थपदभाषिणी ।<br>एकदोद्यानदेशे सा विहर्तुं बहुपादपे ॥ ३२अपनी भार्याकी बात सुनकर राजा चन्द्रसेन भी चुप रह गये। अपनी पुत्रीको विवाहकी इच्छासे रहित भाववाली जानकर राजाने भी उसका विवाह नहीं किया। वह मन्दोदरी भी माता-पिताके द्वारा भलीभाँति रक्षित होती हुई घरपर ही रहने लगी। कुछ समय पश्चात् नारियोंमें कामोत्तेजना उत्पन्न करनेवाले यौवन-सम्बन्धी लक्षण उसमें विकसित होने लगे। उस समय उसकी सखियोंने विवाहके लिये उसे बार-बार प्रेरित किया, फिर भी ज्ञान-तत्त्वकी बातें कहकर वह मन्दोदरी पति बनानेके लिये तैयार न हुई ॥ २९–३१\frac{१}{२} ॥
जगाम सुमुखी प्रेम्णा सैरन्ध्रीगणसेविता ।<br>रेमे कृशोदरी तत्रापश्यत्कुसुमिता लताः ॥ ३३<br><br>पुष्पाणि चिन्वती रम्या वयस्याभिः समावृता ।<br>कोसलाधिपतिस्तत्र मार्गे दैववशात्तदा ॥ ३४एक दिन सुन्दर मुखवाली वह कन्या अपनी दासियोंके साथ बहुत-से वृक्षोंसे सुशोभित उद्यानमें आनन्दपूर्वक विहार करनेके लिये गयी। उस कृशोदरीने वहाँ पुष्पित लताओंको देखा और अपनी सखियोंके साथ पुष्प चुनती हुई वह वहींपर क्रीडाविहार करने लगी ॥ ३२–३३\frac{१}{२} ॥
आजगाम महावीरो वीरसेनोऽतिविश्रुतः ।<br>एकाकी रथमारूढः कतिचित्सेवकैर्वृतः ॥ ३५<br>सैन्यं च पृष्ठतस्तस्य समायाति शनैः शनैः ।उसी समय उस मार्गसे संयोगवश कोसलनरेश वीरसेन आ गये। वे महान् शूरवीर तथा बहुत विख्यात थे। वे रथपर अकेले ही आरूढ़ थे तथा उनके साथ कुछ सेवक भी थे और सेना उनके पीछे धीरे-धीरे चली आ रही थी ॥ ३४–३५\frac{१}{२} ॥
अ० १७ ]पञ्चम स्कन्ध६२१
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
दृष्टस्तस्या वयस्याभिर्दूरतः पार्थिवस्तदा ॥ ३६<br>मन्दोदर्यै तथा प्रोक्तं समायाति नरः पथि।<br>रथारूढो महाबाहू रूपवान्मदनोऽपरः ॥ ३७तभी उसकी सखियोंने दूरसे ही राजाको देख लिया और [उनमेंसे किसी युवतीने] मन्दोदरीसे कहा—विशाल भुजाओंवाला, रूपवान् तथा दूसरे कामदेवके समान एक पुरुष रथपर सवार होकर इस मार्गसे चला आ रहा है। मैं तो यह मानती हूँ कि यहाँ भाग्यवश कोई राजा ही आ गया है॥ ३६-३७ १/२ ॥
मन्येऽहं नृपतिः कश्चित्प्राप्तो भाग्यवशादिह।<br>एवं ब्रुवत्यां तत्रासौ कोसलेन्द्रः समागतः ॥ ३८<br>दृष्ट्वा तामसितापाङ्गीं विस्मयं प्राप भूपतिः।<br>उत्तीर्य स रथात्तूर्णं पप्रच्छ परिचारिकाम् ॥ ३९वह युवती ऐसा कह रही थी कि इतनेमें कोसल-नरेश वीरसेन वहाँ आ गये। उस श्याम कटाक्षोंवाली मन्दोदरीको देखकर राजा विस्मयमें पड़ गये। रथसे तुरंत उतरकर उन्होंने दासीसे पूछा—विशाल नेत्रोंवाली यह युवती कौन है और किसकी पुत्री है? मुझे शीघ्र बताओ॥ ३८-३९ १/२ ॥
केयं बाला विशालाक्षी कस्य पुत्री वदाशु मे।<br>एवं पृष्टा तु सैरन्ध्री तमुवाच शुचिस्मिता ॥ ४०<br>प्रथमं ब्रूहि मे वीर पृच्छामि त्वां सुलोचन।<br>कोऽसि त्वं किमिहायातः किं कार्यं वद साम्प्रतम् ॥ ४१इस प्रकार पूछे जानेपर मधुर मुसकानवाली दासीने उनसे कहा—सुन्दर नेत्रोंवाले हे वीर! पहले आप मुझे बतायें, मैं आपसे पूछ रही हूँ कि आप कौन हैं? यहाँ किसलिये आये हैं और यहाँ आपका कौन-सा कार्य है? [यह सब] अभी बतानेकी कृपा करें॥ ४०-४१॥
इति पृष्टस्तु सैरन्ध्र्या तामुवाच महीपतिः।<br>कोसलो नाम देशोऽस्ति पृथिव्यां परमाद्भुतः ॥ ४२<br>तस्य पालयिता चाहं वीरसेनाभिधः प्रिये।<br>वाहिनी पृष्ठतः कामं समायाति चतुर्विधा ॥ ४३<br>मार्गभ्रमादिह प्राप्तं विद्धि मां कोसलाधिपम्।दासीके यह पूछनेपर राजाने उससे कहा—पृथ्‍वीपर अत्यन्त अद्भुत कोसल नामक एक देश है। हे प्रिये! वीरसेन नामवाला मैं उसी देशका शासक हूँ। मेरी विशाल चतुरंगिणी सेना पीछे-पीछे आ रही है। मार्ग भूल जानेके कारण यहाँ आये हुए मुझको तुम कोसलदेशका राजा समझो॥ ४२-४३ १/२ ॥
सैरन्ध्र्युवाच<br>चन्द्रसेनसुता राजन्नाम्ना मन्दोदरी किल ॥ ४४<br>उद्याने रन्तुकामेयं प्राप्ता कमललोचना।**सैरन्ध्री बोली—**हे राजन्! यह महाराज चन्द्रसेनकी पुत्री है और इसका नाम मन्दोदरी है। कमलसदृश नेत्रोंवाली यह राजकुमारी विहार करनेकी इच्छासे इस उपवनमें आयी है॥ ४४ १/२ ॥
श्रुत्वा तद्भाषितं राजा प्रत्युवाच प्रसाधिकाम् ॥ ४५<br>सैरन्ध्रि चतुरासि त्वं राजपुत्रीं प्रबोधय।<br>ककुत्स्थवंशजश्चाहं राजास्मि चारुलोचने ॥ ४६<br>गान्धर्वेण विवाहेन पतिं मां कुरु कामिनि।<br>न मे भार्यास्ति सुश्रोणि वयसोऽद्भुतयौवनाम् ॥ ४७<br>वाञ्छामि रूपसम्पन्नां सुकुलां कामिनीं किल।<br>अथवा ते पिता मह्यं विधिना दातुमर्हति ॥ ४८<br>अनुकूलः पतिश्चाहं भविष्यामि न संशयः।उसकी बात सुनकर राजाने उस सैरन्ध्रीसे कहा—हे सैरन्ध्रि! तुम चतुर हो, अतः राजकुमारीको समझा दो। ‘हे सुनयने! मैं ककुत्स्थवंशमें उत्पन्न एक राजा हूँ। अतः हे कामिनि! तुम गान्धर्व-विवाहके द्वारा मुझे पति बना लो। हे सुश्रोणि! मेरी कोई भार्या नहीं है। मैं भी अद्भुत यौवनावस्थासे सम्पन्न, रूपवती और कुलीन युवतीकी आकांक्षा रखता हूँ। अथवा [यदि गान्धर्व-विवाह पसन्द न हो तो] तुम्हारे पिता विधि-विधानसे तुमको मुझे सौंप दें। मैं सर्वथा तुम्हारे अनुकूल पति होऊँगा; इसमें सन्देह नहीं है’॥ ४५-४८ १/२ ॥
श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १७ ]
६२२
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
महिष उवाच<br>इत्याकर्ण्य वचस्तस्य सैरन्ध्री प्राह तां तदा ॥ ४९<br>प्रहस्य मधुरं वाक्यं कामशास्त्रविशारदा।<br>मन्दोदरि नृपः प्राप्तः सूर्यवंशसमुद्भवः ॥ ५०<br>रूपवान्बलवान्कान्तो वयसा त्वत्समः पुनः।<br>प्रीतिमान्नृपतिर्जातस्त्वयि सुन्दरि सर्वथा ॥ ५१महिष बोला—तब वीरसेनका वचन सुनकर कामशास्त्रमें प्रवीण सैरन्ध्रीने हँसकर उस मन्दोदरीसे मधुर वाणीमें कहा—हे मन्दोदरि! सूर्यवंशमें उत्पन्न ये राजा यहाँ आये हैं। ये रूपवान्, बलवान् तथा आयुमें तुम्हारे ही तुल्य हैं। हे सुन्दरि! ये राजा सम्यक् प्रकारसे तुझमें प्रेमासक्त हो गये हैं॥ ४९—५१॥
पितापि ते विशालाक्षि परितप्यति सर्वथा।<br>विवाहकालं ते ज्ञात्वा त्वां च वैराग्यसंयुताम् ॥ ५२<br>इत्याहास्मान् नृपतिर्निःश्वस्य पुनः पुनः।<br>पुत्रीं प्रबोधयन्त्वेतां सैरन्ध्रयः सेवने रताः ॥ ५३<br>वक्तुं शक्ता वयं न त्वां हठधर्मरतां पुनः।<br>भर्तुः शुश्रूषणं स्त्रीणां परो धर्मोऽब्रवीन्मनुः ॥ ५४<br>भर्तारं सेवमाना वै नारी स्वर्गमवाप्नुयात्।<br>तस्मात्कुरु विशालाक्षि विवाहं विधिपूर्वकम् ॥ ५५हे विशाल नयनोंवाली! तुम्हारी विवाहयोग्य अवस्था हो गयी है और तुम वैराग्यभावसे युक्त रहती हो—यह जानकर तुम्हारे पिता भी सदा चिन्तित रहते हैं। उन महाराजने बार-बार लंबी साँस लेकर हमलोगोंसे यह कहा था—'हे दासियो! तुमलोग सदा उसकी सेवामें संलग्न रहती हो, अतः तुम्हीं लोग मेरी इस पुत्रीको समझाओ।' किंतु हमलोग तुझ हठधर्मपरायणासे कुछ भी कहनेमें समर्थ नहीं हैं। [फिर भी हम तुम्हें बता देना चाहती हैं कि] पतिकी सेवा ही स्त्रियोंके लिये परम धर्म है—ऐसा मनुने कहा है। पतिकी सेवा करनेवाली स्त्री स्वर्ग प्राप्त कर लेती है। अतएव हे विशाल नेत्रोंवाली! तुम विधिपूर्वक विवाह कर लो॥ ५२—५५॥
मन्दोदर्युवाच<br>नाहं पतिं करिष्यामि चरिष्ये तप अद्भुतम्।<br>निवारय नृपं बाले किं मां पश्यति निस्त्रपः ॥ ५६मन्दोदरी बोली—मैं पति नहीं बनाऊँगी; मैं अद्भुत तप करूँगी। हे बाले! तुम इस राजाको मना कर दो; यह निर्लज्ज मेरी ओर क्यों देख रहा है?॥ ५६॥
सैरन्ध्र्युवाच<br>दुर्जयो देवि कामोऽसौ कालोऽसौ दुरतिक्रमः।<br>तस्मान्मे वचनं पथ्यं कर्तुमर्हसि सुन्दरि ॥ ५७<br>अन्यथा व्यसनं नूनमापतेदिति निश्चयः।सैरन्ध्री बोली—हे देवि! यह कामदेव अजेय है तथा कालका अतिक्रमण भी अत्यन्त कठिन है। अतएव हे सुन्दरि! तुम मेरे इस कल्याणकारी वचनको मान लेनेकी कृपा करो। अन्यथा [तुम्हारे ऊपर कभी-न-कभी] संकट अवश्य पड़ेगा; यह मेरा दृढ़ विश्वास है॥ ५७ १/२॥
इति तस्या वचः श्रुत्वा कन्योवाचाथ तां सखीम् ॥ ५८<br>यद्यद्भवॆत्तद्भवतु दैवयोगादसंशयम्।<br>न विवाहं करिष्येऽहं सर्वथा परिचारिके ॥ ५९उसकी यह बात सुनकर राजकुमारीने उस सखीसे कहा—हे परिचारिके! दैवयोगसे जो भी होनेवाला है वह हो, किंतु मैं विवाह बिलकुल नहीं करूँगी; इसमें सन्देह नहीं है॥ ५८-५९॥
महिष उवाच<br>इति तस्यास्तु निर्बन्धं ज्ञात्वा प्राह नृपं पुनः।<br>गच्छ राजन् यथाकामं नेयमिच्छति सत्पतिम् ॥ ६०महिष बोला—उस राजकुमारीका निश्चित विचार जानकर सैरन्ध्रीने राजासे पुनः कहा—हे राजन्! आप इच्छानुसार यहाँसे जा सकते हैं। यह राजकुमारी उत्तम पति बनाना नहीं चाहती॥ ६०॥
अ० १८ ]पञ्चम स्कन्ध६२३
संस्कृतहिन्दी
नृपस्तु तद्वचः श्रुत्वा निर्गतः सह सेनया।<br>कोसलान्विमना भूत्वा कामिनीं प्रति निःस्पृहः॥ ६१उसकी बात सुनकर राजा वीरसेन उदास हो गये और उस राजकुमारीके प्रति आसक्तिरहित होकर अपनी सेनाके साथ कोसलदेशके लिये प्रस्थित हो गये॥ ६१॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे देवीमहिषसंवादे राजपुत्रीमन्दोदरीवृत्तवर्णनं नाम सप्तदशोऽध्यायः॥ १७॥


अथाष्टादशोऽध्यायः

दुर्धर, त्रिनेत्र, अन्धक और महिषासुरका वध

महिष उवाचमहिष बोला—
तस्यास्तु भगिनी कन्या नाम्ना चेन्दुमती शुभा।<br>विवाहयोग्या सञ्जाता सुरूपावरजा यदा॥ १<br><br>तस्या विवाहः संवृत्तः सञ्जातश्च स्वयंवरः।<br>राजानो बहुदेशीयाः सङ्गतास्तत्र मण्डपे॥ २उस मन्दोदरीकी इन्दुमती नामकी एक छोटी बहन थी, जो समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न तथा अत्यन्त रूपवती थी। जब वह विवाहके योग्य हुई, तब उसके विवाहकी तैयारी होने लगी। उसका स्वयंवर रचाया गया, स्वयंवरके मण्डपमें अनेक देशोंके राजा एकत्रित हुए॥ १-२॥
तया वृत्तो नृपः कश्चिद् बलवान् रूपसंयुतः।<br>कुलशीलसमायुक्तः सर्वलक्षणसंयुतः॥ ३इन्दुमतीने उनमेंसे एक बलशाली, रूपवान्, कुलीन, शीलवान् तथा समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न राजाका वरण कर लिया॥ ३॥
तदा कामातुरा जाता विटं वीक्ष्य नृपं तु सा।<br>चकमे दैवयोगात्तु शठं चातुर्यभूषितम्॥ ४उसी समय वह मन्दोदरी दैवयोगसे एक धूर्त, शठ तथा चातुर्यसम्पन्न राजाको देखकर कामातुर हो उठी और उसपर मोहित हो गयी॥ ४॥
पितरं प्राह तन्वङ्गी विवाहं कुरु मे पितः।<br>इच्छा मेऽद्य समुद्भूता दृष्ट्वा मद्राधिपं त्विह॥ ५उस कोमलांगीने अपने पितासे कहा—हे पिताजी! अब आप मेरा भी विवाह कर दीजिये। मद्रदेशके राजाको यहाँ देखकर अब मेरी भी विवाह करनेकी इच्छा हो गयी है॥ ५॥
चन्द्रसेनोऽपि तच्छ्रुत्वा पुत्र्या यद्भाषितं रहः।<br>प्रसन्नेन च मनसा तत्कार्ये तत्परोऽभवत्॥ ६पुत्रीने एकान्तमें अपने पितासे जो कुछ कहा था, उसे सुनकर राजा चन्द्रसेन प्रसन्नमनसे उसके भी विवाहकार्यकी व्यवस्थामें संलग्न हो गये॥ ६॥
तमाहूय नृपं गेहे विवाहविधिना ददौ।<br>कन्यां मन्दोदरीं तस्मै पारिबर्हं तथा बहु॥ ७तत्पश्चात् मद्रदेशके उन राजाको अपने घर बुलाकर उन्होंने वैवाहिक विधिके अनुसार उन्हें अपनी कन्या मन्दोदरी सौंप दी और बहुत-सा वैवाहिक उपहार प्रदान किया॥ ७॥
चारुदेष्णोऽपि तां प्राप्य सुन्दरीं मुदितोऽभवत्।<br>जगाम स्वगृहं तुष्टो राजापि सहितः स्त्रिया॥ ८मद्रनरेश चारुदेष्ण भी उस सुन्दरीको पाकर बहुत प्रसन्न हुआ और सन्तुष्ट होकर स्त्रीके साथ अपने घर चला गया॥ ८॥

६२४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १८

६२४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १८

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
रेमे नृपतिशार्दूलः कामिन्या बहुवासरान्।<br>कदाचिद्दासपत्न्या स रममाणो रहः किल॥ ९<br><br>सैरन्ध्र्या कथितं तस्यै तया दृष्टः पतिस्तथा।<br>उपालम्भं ददौ तस्मै स्मितपूर्वं रुषान्विता॥ १०राजाओंमें श्रेष्ठ वह चारुदेष्ण बहुत दिनोंतक उस कामिनीके साथ रमण करता रहा। एक दिन वह किसी दासीके साथ एकान्तमें रमण कर रहा था। सैरन्ध्रीने यह बात मन्दोदरीको बता दी और उसने स्वयं जाकर पतिको [उस स्थितिमें] देख लिया। तब उसने मुसकराकर क्रोधके साथ राजाको बहुत उपालम्भ दिया॥ ९-१०॥
कदाचिदपि सामान्यां रहो रूपवतीं नृपः।<br>क्रीडयँल्लालयन्दृष्टः खेदं प्राप तदैव सा॥ ११इसके बाद पुनः किसी दिन मन्दोदरीने राजाको एक रूपवती दासीके साथ एकान्तमें क्रीड़ाविहार करते हुए देख लिया। [यह देखकर] उस समय उसे महान् कष्ट हुआ॥ ११॥
न ज्ञातोऽयं शठः पूर्वं यदा दृष्टः स्वयंवरे।<br>किं कृतं तु मया मोहाद्वञ्चिताहं नृपेण ह॥ १२वह सोचने लगी कि जब मैंने इसे स्वयंवरमें देखा था, तब मैं इस शठके विषयमें ऐसा नहीं समझ पायी थी। मैंने मोहवश यह क्या कर डाला? इस राजाने तो मुझे ठग लिया॥ १२॥
किं करोम्यद्य सन्तापं निर्लज्जे निर्घृणे शठे।<br>का प्रीतीरीदृशे पत्यौ धिगद्य मम जीवितम्॥ १३अब मैं क्या करूँ; केवल सन्ताप ही मिला। ऐसे निर्लज्ज, निर्दयी और धूर्त पतिके प्रति प्रेम कैसे हो सकता है! अब मेरे जीवनको धिक्कार है॥ १३॥
अद्यप्रभृति संसारे सुखं त्यक्तं मया खलु।<br>पतिसम्भोगजं सर्वं सन्तोषोऽद्य मया कृतः॥ १४आजसे मैं संसारमें पतिके साथ सहवाससे प्राप्त होनेवाले सारे सुखका त्याग कर रही हूँ; अब मैंने सन्तोष कर लिया॥ १४॥
अकर्तव्यं कृतं कार्यं तज्जातं दुःखदं मम।<br>देहत्यागः क्रियते चेद्गत्यातीव दुरत्यया॥ १५<br><br>पितृगेहं व्रजाम्याशु तत्रापि न सुखं भवेत्।<br>हास्ययोग्या सखीनां तु भवेयं नात्र संशयः॥ १६<br><br>तस्मादत्रैव संवासो वैराग्ययुतया मया।<br>कर्तव्यः कालयोगेन त्यक्त्वा कामसुखं पुनः॥ १७मैंने वह काम कर डाला, जिसे मुझे नहीं करना चाहिये था, इसीलिये वह मेरे लिये कष्टदायक सिद्ध हुआ। अब यदि मैं देहत्याग करती हूँ तो वह दुस्तर आत्महत्याके समान होगा। यदि पिताके घर चली जाऊँ तो वहाँ भी सुख नहीं मिलेगा और वहाँपर मैं अपनी सखियोंकी हँसीका पात्र बनी रहूँगी; इसमें कोई संशय नहीं है। अतः वैराग्ययुक्त होकर भोगविलासके सुखका परित्याग करके कालयोगसे मुझे यहींपर निवास करना चाहिये॥ १५–१७॥
महिष उवाच<br>इति सञ्चिन्त्य सा नारी दुःखशोकपरायणा।<br>स्थिता पतिगृहं त्यक्त्वा सुखं संसारजं ततः॥ १८महिष बोला— ऐसा विचार करके वह नारी सांसारिक सुखका परित्याग करके दुःख तथा शोकसे सन्तप्त रहती हुई अपने पतिके घरपर ही रह गयी॥ १८॥
तस्मात्त्वमपि कल्याणि मामनादृत्य भूपतिम्।<br>अन्यं कापुरुषं मन्दं कामार्ता संश्रयिष्यसि॥ १९अतः हे कल्याणि! उसी प्रकार तुम भी मुझ राज पतिका अनादर करके पुनः कामातुर होनेपर किसी अन्य मूर्ख तथा कायर पुरुषका आश्रय ग्रहण करोगी॥ १९।

| अ० १८ ] | पञ्चम स्कन्ध | ६२५ | | :--- | :--- |

| वचनं कुरु मे तथ्यं नारीणां परमं हितम्।<br>अकृत्वा परमं शोकं लप्स्यसे नात्र संशयः॥ २० | अतः स्त्रियोंके लिये परम हितकारी तथा सच्ची मेरी यह बात मान लो। इसे न मानकर तुम बहुत कष्ट उठाओगी; इसमें सन्देह नहीं है॥ २०॥ | | देव्युवाच<br>मन्दात्मन् गच्छ पातालं युद्धं वा कुरु साम्प्रतम्।<br>हत्वा त्वामसुरान्सर्वानामिष्यामि यथासुखम्॥ २१ | देवी बोलीं—हे मन्दबुद्धि! अब तुम पाताललोक भाग जाओ अथवा मेरे साथ युद्ध करो। मैं तुम्हें तथा सभी असुरोंको मारकर सुखपूर्वक यहाँसे चली जाऊँगी॥ २१॥ | | यदा यदा हि साधूनां दुःखं भवति दानव।<br>तदा तेषां च रक्षार्थं देहं सन्धारयाम्यहम्॥ २२ | हे दानव! जब-जब साधु पुरुषोंपर संकट आता है, तब-तब उनकी रक्षाके लिये मैं देह धारण करती हूँ॥ २२॥ | | अरूपायाश्च मे रूपमजन्मायाश्च जन्म च।<br>सुराणां रक्षणार्थाय विद्धि दैत्य विनिश्चितम्॥ २३ | हे दैत्य! वास्तवमें मैं निराकार और अजन्मा हूँ, तथापि देवताओंकी रक्षा करनेके लिये रूप और जन्म धारण करती हूँ; यह तुम निश्चित समझ लो॥ २३॥ | | सत्यं ब्रवीमि जानीहि प्रार्थिताहं सुरैः किल।<br>त्वद्वधार्थं हयारे त्वां हत्वा स्थास्यामि निश्चला॥ २४ | मैं सत्य कहती हूँ कि देवताओंने तुम्हारा वध करनेके लिये मुझसे प्रार्थना की थी। हे महिष! तुझे मारकर मैं सर्वथा निश्चिन्त हो जाऊँगी॥ २४॥ | | तस्माद्युध्यस्व वा गच्छ पातालमसुरालयम्।<br>सर्वथा त्वां हनिष्यामि सत्यमेतद् ब्रवीम्यहम्॥ २५ | अतएव अब तुम मेरे साथ युद्ध करो अथवा असुरोंकी निवासभूमि पाताललोकको चले जाओ। अब मैं तुम्हें निश्चय ही मार डालूँगी, मैं यह बिलकुल सच कह रही हूँ॥ २५॥ | | व्यास उवाच<br>इत्युक्तः स तया देव्या धनुरदाय दानवः।<br>युद्धकामः स्थितस्तत्र संग्रामाङ्गणभूमिषु॥ २६ | व्यासजी बोले—देवीके ऐसा कहनेपर महिषासुर धनुष लेकर युद्ध करनेकी इच्छासे संग्रामभूमिमें डट गया॥ २६॥ | | मुमोच तरसा बाणान्कर्णाकृष्टञ्छिलाशितान्।<br>देवी चिच्छेद तान्बाणैः क्रोधान्मुक्तैरयोमुखैः॥ २७ | वह पत्थरपर घिसकर नुकीले बनाये गये बाणोंको कानतक खींचकर बड़े वेगसे छोड़ने लगा। तब भगवतीने कुपित होकर अपने लौहमुख बाणोंसे उसके बाणोंको काट डाला॥ २७॥ | | तयोः परस्परं युद्धं सम्बभूव भयप्रदम्।<br>देवानां दानवानाञ्च परस्परजयैषिणाम्॥ २८ | अब देवी और दानव महिषमें भीषण संग्राम होने लगा। वह युद्ध अपनी-अपनी विजय चाहनेवाले देवताओं और दानवोंके लिये बड़ा भयदायक था॥ २८॥ | | मध्ये दुर्धर आगत्य मुमोच च शिलीमुखान्।<br>देवीं प्रति विषासक्तान्कोपयन्नतिदारुणान्॥ २९ | उसी समय दुर्धर नामक दैत्य बीचमें आकर भगवतीको कुपित करता हुआ उनपर अतिशय दारुण और विषैले बाणोंकी वर्षा करने लगा॥ २९॥ | | ततो भगवती क्रुद्धा तं जघान शितैः शरैः।<br>दुर्धरस्तु पपातोर्व्यां गतासुर्गिरिशृङ्गवत्॥ ३० | तब भगवतीने क्रोधित होकर उसपर तीक्ष्ण बाणोंके द्वारा प्रहार किया, जिससे दुर्धर प्राणहीन होकर पर्वतशिखरकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़ा॥ ३०॥ |

६२६ श्रीमद्देवीभागवत [अ० १८]

६२६ श्रीमद्देवीभागवत [अ० १८]


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तं तथा निहतं दृष्ट्वा त्रिनेत्रः परमास्त्रवित्।<br>आगत्य सप्तभिर्बाणैर्जघान परमेश्वरीम्॥ ३१दुर्धरको मृत देखकर शस्त्रोंका महान् ज्ञाता त्रिनेत्र रणभूमिमें आकर सात बाणोंसे भगवती परमेश्वरीपर आघात करने लगा॥ ३१॥
अनागतांस्तु चिच्छेद देवी तान्विशिखैः शरान्।<br>त्रिशूलेन त्रिनेत्रं तु जघान जगदम्बिका॥ ३२वे बाण देवीके पास पहुँच भी नहीं पाये थे कि बीचहीमें उन्होंने अपने बाणोंसे उन बाणोंको काट दिया। तत्पश्चात् जगदम्बाने अपने त्रिशूलसे त्रिनेत्रको मार डाला॥ ३२॥
अन्धकस्त्वाजगामाशु हतं दृष्ट्वा त्रिलोचनम्।<br>गदया लोहमय्याशु सिंहं विव्याध मस्तके॥ ३३<br><br>सिंहस्तु नखघातेन तं हत्वा बलवत्तरम्।<br>चखाद तरसा मांसमन्धकस्य रुषान्वितः॥ ३४तब त्रिनेत्रको मारा गया देखकर तुरंत अन्धक आ गया और उसने अपनी लौहमयी गदासे सिंहके मस्तकपर प्रहार कर दिया, किंतु सिंह क्रोधमें भरकर अपने तीक्ष्ण नखोंके प्रहारसे उस महान् बलशाली दानवका वध करके उसका मांस खाने लगा॥ ३३-३४॥
तान् रणे निहतान्वीक्ष्य दानवो विस्मयं गतः।<br>चिक्षेप तरसा बाणानतितीक्ष्णाञ्छिलाशितान्॥ ३५उन्हें रणमें मारा गया देखकर महिषासुरको बहुत आश्चर्य हुआ। अतएव वह और भी वेगके साथ अति तीक्ष्ण और पत्थरकी सानपर चढ़ाकर तीक्ष्ण किये हुए बाणोंको छोड़ने लगा॥ ३५॥
द्विधा चक्रे शरान्देवी तानप्राप्ताञ्छिलीमुखैः।<br>गदया ताडयामास दैत्यं वक्षसि चाम्बिका॥ ३६किंतु भगवतीने उन बाणोंको अपने पास पहुँचनेके पहले ही अपने बाणोंसे काटकर उनके दो टुकड़े कर दिये। इसी समय जगदम्बाने महिषासुरके वक्षपर अपनी गदासे आघात किया॥ ३६॥
स गदाभिहतो मूर्च्छामवापामरबाधकः।<br>विषह्य पीडां पापात्मा पुनरागत्य सत्वरः॥ ३७<br><br>जघान गदया सिंहं मूर्ध्नि क्रोधसमन्वितः।<br>सिंहोऽपि नखघातेन तं ददार महासुरम्॥ ३८देवताओंको दुःख देनेवाला महिष गदासे घायल होकर मूर्च्छित हो गया। किंतु उस वेदनाको सहन करके वह पापी उठ खड़ा हुआ और पुनः तुरंत आकर उसने कोपाविष्ट होकर अपनी गदासे सिंहके मस्तकपर प्रहार कर दिया। तब सिंह भी नखोंके आघातसे उस महान् असुरको विदीर्ण करने लगा॥ ३७-३८॥
विहाय पौरुषं रूपं सोऽपि सिंहो बभूव ह।<br>नखैर्विदारयामास देवीसिंहं मदोत्कटम्॥ ३९तब महिषासुरने मानवरूप त्यागकर सिंहका रूप धारण कर लिया और वह अपने नखोंसे भगवतीके मतवाले सिंहको चीरने लगा॥ ३९॥
तञ्च केसरिणं वीक्ष्य देवी क्रुद्धा हयायोमुखैः।<br>शरैर्वाकिरत्तीक्ष्णैः क्रूरैराशीविषैरिव॥ ४०उसे सिंहरूपमें देखकर भगवती क्रोधित हो उठीं और अपने लौहमुख, तीक्ष्ण, क्रूर एवं सर्पसदृश बाणोंसे उसे बींधने लगीं॥ ४०॥
त्यक्त्वा स हरिरूपं तु गजो भूत्वा मदस्रवः।<br>शैलशृङ्गं करे कृत्वा चिक्षेप चण्डिकां प्रति॥ ४१तदनन्तर सिंहरूप त्यागकर महिषासुरने मद बहाते हुए हाथीका रूप धारण करके अपनी सूँडसे एक विशाल शैलशिखर उठाकर चण्डिकापर फेंका॥ ४१॥