देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 621, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ें| ६१२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १६ |
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| निहतौ दानवौ वीक्ष्य पतितौ च रणाङ्गणे।<br>निहताः सैनिकाः सर्वे तत्र केसरिणा बलात्॥ ५३<br><br>भक्षिताश्च तथा केचिन्निःशेषं तद्रणं कृतम्।<br>भग्नाः केचिद् गता मन्दा महिषं प्रति दुःखिताः॥ ५४<br><br>चुक्रुशू रुरुदुश्चैव त्राहि त्राहीति भाषणैः।<br>असिलोमबिडालाख्यौ निहतौ नृपसत्तम॥ ५५<br><br>अन्ये ये सैनिका राजन् सिंहेन भक्षिताश्च ते।<br>एवं ब्रुवन्तो राजानं तदा चक्रुश्च वैशसम्॥ ५६ | मारे गये उन दोनों दैत्योंको समरांगणमें गिरा हुआ देखकर शेष सम्पूर्ण सैनिकोंको सिंहने अपने पराक्रमद्वारा मार गिराया और कुछ दानवोंको खा डाला और इस प्रकार उस युद्धभूमिको दानवोंसे रहित कर दिया। कुछ अंग-भंग हुए मूर्ख दानव दुःखी होकर महिषासुरके पास पहुँचे और 'रक्षा कीजिये-रक्षा कीजिये'—ऐसा कहते हुए वे चीखने-चिल्लाने तथा रोने लगे—'हे नृपश्रेष्ठ! असिलोमा और बिडालाख्य दोनों ही मारे गये। हे राजन्! अन्य जो भी सैनिक थे, उन्हें सिंह खा गया' ऐसा कहते हुए उन्होंने राजाको दुःखमें डाल दिया॥ ५३—५६॥ | | तच्छ्रुत्वा वचनं तेषां महिषो दुर्मनास्तदा।<br>बभूव चिन्ताकुलितो विमना दुःखसंयुतः॥ ५७ | उनकी बात सुनकर महिषासुर खिन्नमनस्क, चिन्तासे व्याकुल, उदास तथा दुःखी हो गया॥ ५७॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे असिलोमबिडालाख्यवधवर्णनं नाम पञ्चदशोऽध्यायः॥ १५॥
अथ षोडशोऽध्यायः
महिषासुरका रणभूमिमें आना तथा देवीसे प्रणय-याचना करना
| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
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| तेषां तद्वचनं श्रुत्वा क्रोधयुक्तो नराधिपः।<br>दारुकं प्राह तरसा रथमानय मेऽद्भुतम्॥ १<br><br>सहस्रखरसंयुक्तं पताकाध्वजभूषितम्।<br>आयुधैः संयुतं शुभ्रं सुचक्रं चारूकूबरम्॥ २ | उन सैनिकोंकी बात सुनकर राजा महिष क्रोधित हो उठा और उसने सारथिसे कहा—हजार गधोंसे जुते हुए, ध्वजा तथा पताकाओंसे सुशोभित, अनेक प्रकारके आयुधोंसे परिपूर्ण, सुन्दर चक्कों तथा जुएसे विभूषित तथा प्रकाशमान मेरा अद्भुत रथ तुरंत ले आओ॥ १-२॥ |
| सूतोऽपि रथमानीय तमुवाच त्वरान्वितः।<br>राजन् रथोऽयमानीतो द्वारि तिष्ठति भूषितः॥ ३ | सारथिने भी तत्क्षण रथ लाकर उससे कहा—हे राजन्! सुसज्जित करके रथ ला दिया गया जो द्वारपर खड़ा है; यह सभी आयुधोंसे समन्वित तथा उत्तम आस्तरणोंसे युक्त है॥ ३ १/२॥ |
| सर्वायुधसमायुक्तो वरास्तरणसंयुतः।<br>आनीतं तं रथं ज्ञात्वा दानवेन्द्रो महाबलः॥ ४<br><br>मानुषं देहमास्थाय संग्रामे गन्तुमुद्यतः।<br>विचार्य मनसा चेति देवी मां प्रेक्ष्य दुर्मुखम्॥ ५<br><br>शृङ्गिणं महिषं नूनं विमना सा भविष्यति।<br>नारीणां च प्रियं रूपं तथा चातुर्यमित्यपि॥ ६ | रथके आनेकी बात सुनकर महाबली दानवराज महिष मनुष्यका रूप धारण करके युद्धभूमिमें जानेको तैयार हुआ। उसने अपने मनमें सोचा कि यदि मैं अपने महिषरूपमें जाऊँगा तो देवी मुझ शृंगयुक्त महिषको देखकर अवश्य उदास हो जायगी। स्त्रियोंको सुन्दर रूप और चातुर्य अत्यन्त प्रिय होता है। अतः आकर्षक रूप तथा चातुर्यसे सम्पन्न होकर मैं उसके |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—20 D