भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 620
अ० १५ ]पञ्चम स्कन्ध६११
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तदग्रे नैव वक्तव्यं हितं चैवाप्रियं मया।<br>मर्त्तव्यं वीरधर्मेण शुभं वाप्यशुभं भवेत्॥ ४२<br><br>दैवमेव परं मन्ये धिक्पौरुषमनर्थकम्।<br>पतन्ति दानवास्तूर्णं तव बाणहता भुवि॥ ४३उसके सामने हितकर वचन भी यदि अप्रिय है तो मुझे नहीं बोलना चाहिये। अब वीरधर्मके अनुसार मर जाना ही मेरे लिये उचित है—वह चाहे शुभ हो अथवा अशुभ। मैं तो दैवको ही बलवान् मानता हूँ, अनर्थकारी पुरुषार्थको धिक्कार है, तभी तो आपके बाणोंसे हत होकर दानव पृथ्वीपर गिरते जा रहे हैं॥ ४२-४३॥
इत्युक्त्वा शरवृष्टिं स चकार दानवोत्तमः।<br>देवी चिच्छेद तान्बाणैरप्राप्तांस्तु निजान्तिके॥ ४४<br><br>अन्यैर्विव्याध तं तूर्णमसिलोमानमाशुगैः।<br>वीक्षितामरसङ्घैश्च कोपपूर्णानना तदा॥ ४५<br><br>शुशुभे दानवः कामं बाणैर्विद्धतनुः किल।<br>स्रवद्रुधिरधारः स प्रफुल्लः किंशुको यथा॥ ४६ऐसा कहकर दानवश्रेष्ठ असिलोमा बाणवृष्टि करने लगा। देवीने अपने पासतक न पहुँचे हुए उन बाणोंको अपने बाणोंसे काट डाला और अपने अन्य शीघ्रगामी बाणोंसे असिलोमाको शीघ्रतापूर्वक बींध डाला। उस समय आकाशमें स्थित देवताओंने देखा कि भगवतीका मुखमण्डल क्रोधसे भर उठा है। देवीके बाणोंसे बिंधे शरीरवाला तथा बहती हुई रुधिरकी धारासे युक्त वह दैत्य ऐसा सुशोभित हो रहा था मानो पुष्पित हुआ पलाशका वृक्ष हो॥ ४४-४६॥
असिलोमा गदां गुर्वी लौहीमुद्यम्य वेगतः।<br>दुद्राव चण्डिकां कोपात्सिंहं मूर्ध्नि जघान ह॥ ४७<br><br>सिंहोऽपि नखराघातैस्तं ददार भुजान्तरे।<br>अगणय्य गदाघातं कृतं तेन बलीयसा॥ ४८अब असिलोमा लोहेकी बनी एक विशाल गदा लेकर बड़ी तेजीसे चण्डिकाकी ओर दौड़ा और क्रोधपूर्वक सिंहके सिरपर उसने गदासे प्रहार कर दिया। परंतु देवीके सिंहने उस बलवान् दानवके द्वारा किये गये गदा-प्रहारकी कुछ भी परवाह न करके अपने नखोंद्वारा उसके वक्षःस्थलको फाड़ डाला॥ ४७-४८॥
उत्पत्य तरसा दैत्यो गदापाणिः सुदारुणः।<br>सिंहमूर्ध्नि समारुह्य जघान गदयाम्बिकाम्॥ ४९तब उस महाविकराल दैत्यने हाथमें गदा लिये ही बड़े वेगसे उछलकर सिंहके मस्तकपर सवार हो भगवतीके ऊपर गदासे प्रहार किया॥ ४९॥
कृतं तेन प्रहारं तु वञ्चयित्वा विशांपते।<br>खड्गेन शितधारेण शिरश्चिच्छेद कण्ठतः॥ ५०<br><br>छिन्ने शिरसि दैत्येन्द्रः पपात तरसा क्षितौ।<br>हाहाकारो महानासीत्सैन्ये तस्य दुरात्मनः॥ ५१हे राजन्! उसके द्वारा किये गये प्रहारको रोककर देवीने तेज धारवाली तलवारसे उसका मस्तक गर्दनसे अलग कर दिया। इस प्रकार मस्तक कट जानेपर वह दानवराज तुरंत गिर पड़ा। अब उस दुरात्माकी सेनामें हाहाकार मच गया॥ ५०-५१॥
जय देवीति देवास्तां तुष्टुवुर्जगदम्बिकाम्।<br>देवदुन्दुभयो नेदुर्जगुश्च नृप किन्नराः॥ ५२हे राजन्! देवीकी जय हो—ऐसा कहकर देवतागण भगवतीकी स्तुति करने लगे। देवताओंकी दुन्दुभियाँ बज उठीं और किन्नरगण देवीका यशोगान करने लगे॥ ५२॥

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]— 20 C