भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 619
६१०श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १५

| ( प्रियं हि वक्तव्यमसत्यमेव<br>न च प्रियं स्याद्धितकृत्तु भाषितम्।<br>सत्यं प्रियं नो भवतीह कामं<br>मौनं ततो बुद्धिमतां प्रतिष्ठितम्॥ )<br><br>न फल्गुवाक्यैः प्रतिबोधनीयो<br>राजा तु वीरैरिति नीतिशास्त्रम्॥ ३२ | (सदा प्रिय वचन बोलना चाहिये, किंतु वह असत्य न हो। वचन हितकारक तथा प्रिय होना चाहिये। यदि वचन सत्य होनेपर भी प्रिय न हो तो ऐसी दशामें बुद्धिमान् मनुष्योंके लिये मौन ही श्रेष्ठ होता है।)<br>नीतिशास्त्रका कथन है कि वीर पुरुषोंको चाहिये कि वे मिथ्या वचनोंद्वारा राजाको धोखेमें न डालें॥ ३२॥ | | न नूनं तत्र गन्तव्यं हितं वा वक्तुमादरात्।<br>प्रष्टुं वापि गते राजा कोपयुक्तो भविष्यति॥ ३३<br><br>इति सञ्चिन्त्य कर्तव्यं युद्धं प्राणस्य संशये।<br>स्वामिकार्यं परं मत्वा मरणं तृणवत्तथा॥ ३४ | [सत्य बात तो यह है कि] आदरके साथ हितकी बात कहने अथवा पूछनेके लिये हमलोगोंको वहाँ नहीं चलना चाहिये। वहाँ जानेपर राजा महिषासुर कोपाविष्ट हो जायँगे। यह विचारकर अब हमलोगोंको यहाँ युद्ध ही करना चाहिये। जहाँ प्राणका संशय हो वहाँ स्वामीके कार्यको मुख्य मानकर मृत्युको तृणसदृश समझना चाहिये॥ ३३-३४॥ | | व्यास उवाच<br>इति सञ्चिन्त्य तौ वीरौ संस्थितौ युद्धतत्परौ।<br>धनुर्बाणधरौ तत्र सन्नद्धौ रथसङ्गतौ॥ ३५ | व्यासजी बोले—इस प्रकार विचार करके वे दोनों वीर युद्धके लिये तत्पर हो गये और कवच धारण करके हाथोंमें धनुष-बाण लेकर रथपर आरूढ हो देवीके सामने आ डटे॥ ३५॥ | | प्रथमं तु बिडालाख्यः सप्तबाणान्मुमोच ह।<br>असिलोमा स्थितो दूरे प्रेक्षकः परमास्त्रवित्॥ ३६ | सर्वप्रथम बिडालाख्यने देवीके ऊपर सात बाण चलाये। अस्त्र चलानेमें अत्यन्त निपुण असिलोमा दूर जाकर दर्शकके रूपमें खड़ा हो गया॥ ३६॥ | | चिच्छेद तांस्तथाप्राप्तानम्बिका स्वशरैः शरान्।<br>बिडालाख्यं त्रिभिर्बाणैर्जघान च शिलाशितैः॥ ३७ | भगवती जगदम्बाने अपने बाणोंसे बिडालाख्यके द्वारा चलाये गये उन बाणोंको काट डाला और पत्थरपर घिसकर तीक्ष्ण बनाये गये तीन बाणोंसे बिडालाख्यपर आघात किया॥ ३७॥ | | प्राप्य बाणव्यथां दैत्यः पपात समराङ्गणे।<br>मूर्च्छितोऽथ ममाराशु दानवो दैवयोगतः॥ ३८ | उन बाणोंकी असह्य वेदनासे पीड़ित होकर वह दैत्य समरभूमिमें गिर पड़ा, उसे मूर्च्छा आ गयी और कालयोगसे वह मर गया॥ ३८॥ | | बिडालाख्यं हतं दृष्ट्वा रणे शक्तिशरोत्करैः।<br>असिलोमा धनुष्पाणिः संस्थितो युद्धतत्परः॥ ३९<br><br>ऊर्ध्वं सव्यं करं कृत्वा तामुवाच मितं वचः।<br>देवि जानामि मरणं दानवानां दुरात्मनाम्॥ ४०<br><br>तथापि युद्धं कर्तव्यं पराधीनेन वै मया।<br>महिषो मन्दबुद्धिश्च न जानाति प्रियाप्रिये॥ ४१ | इस प्रकार भगवतीके बाणसमूहोंसे रणमें बिडालाख्यको मारा गया देखकर असिलोमा भी हाथमें धनुष लेकरके युद्ध करनेके लिये तैयार होकर सामने आ गया और दाहिना हाथ ऊपर उठाकर अभिमानपूर्वक बोला—हे देवि! मैं जानता हूँ कि सभी दुराचारी दानव मारे जायँगे, फिर भी पराधीन होनेके कारण मुझे युद्ध करना ही होगा। वह मन्दबुद्धि महिषासुर अपने प्रिय तथा अप्रियके विषयमें नहीं जानता॥ ३९—४१॥ |

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—20 B

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