देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 618, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० १५] पञ्चम स्कन्ध ६०९
| महिषस्तु दुराचारो देवान्वै हन्तुमुद्यतः॥ २३<br>ज्ञात्वाहं तद्वधार्थं भोः प्राप्तास्मि राक्षसाधुना।<br>तं हनिष्ये दुराचारं सुरशत्रुं महाबलम्॥ २४ | दुराचारी महिषासुर देवताओंको मार डालनेके लिये उद्यत है—यह जानकर मैं उसके वधके लिये इस समय यहाँ उपस्थित हुई हूँ। हे दानव! मैं उस दुराचारी तथा सुरद्रोही महाबली महिषको मार डालूँगी॥ २३-२४॥ | | गच्छ वा तिष्ठ कामं त्वं सत्यमेतदुदाहृतम्।<br>ब्रूहि वा तं दुरात्मानं राजानं महिषीसुतम्॥ २५<br>किमन्यान् प्रेषयस्यत्र स्वयं युद्धं कुरुष्व ह।<br>सन्धिश्चेत्कर्तुमिच्छास्ति राजंस्तव मया सह॥ २६<br>सर्वे गच्छन्तु पातालं वैरं त्यक्त्वा यथासुखम्।<br>देवद्रव्यं तु यत्किञ्चिद्धृतं जित्वा रणे सुरान्।<br>तद्दत्त्वा यान्तु पातालं प्रह्लादो यत्र तिष्ठति॥ २७ | अब तुम इच्छानुसार जाओ या रुके रहो, मैंने तुमसे यह सब सच-सच बतला दिया। अतः जाकर अपने उस दुराचारी राजा महिषसे कह दो—‘आप अन्य दैत्योंको क्यों भेजते हैं? स्वयं युद्ध कीजिये।' यदि तुम्हारे राजाकी इच्छा मेरे साथ सन्धि करनेकी हो, तो सभी दैत्य शत्रुता छोड़कर सुखपूर्वक पाताल चले जायँ। देवताओंको जीतकर जो भी देवद्रव्य असुरोंने छीन लिया है, वह सब वापस करके वे उस पातालपुरीमें चले जायँ, जहाँ इस समय प्रह्लाद विराजमान हैं॥ २५-२७॥ | | व्यास उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं देव्या असिलोमा पुरःस्थितः।<br>बिडालाख्यं महावीर्यं पप्रच्छ प्रीतिपूर्वकम्॥ २८ | व्यासजी बोले—[हे राजन्!] इस प्रकार देवीका वचन सुनकर असिलोमा भगवतीके सामने ही महान् शूरवीर बिडालाख्यसे प्रीतिपूर्वक पूछने लगा—॥ २८॥ | | असिलोमोवाच<br>श्रुतं तेऽद्य बिडालाख्य भवान्या कथितं च यत्।<br>एवं गते किं कर्तव्यो विग्रहः सन्धिरेव वा॥ २९ | **असिलोमा बोला—**बिडालाख्य! देवीने अभी-अभी जो कहा है, वह तो तुमने सुन लिया, इस स्थितिमें हमें सन्धि या विग्रह—क्या करना चाहिये?॥ २९॥ | | बिडालाख्य उवाच<br>न सन्धिकामोऽस्ति नृपोऽभिमानी<br>युद्धे च मृत्युं नियतं हि जानन्।<br>दृष्ट्वा हतान् प्रेरयते तथास्मा-<br>न्दैवं हि कोऽतिक्रमितुं समर्थः॥ ३० | **बिडालाख्य बोला—**युद्धमें मृत्युको निश्चित जानते हुए भी हमारे अभिमानी महाराज सन्धि नहीं करना चाहते। समरमें बहुत-से योद्धा मारे जा चुके हैं—यह देखकर भी वे हमें भेज रहे हैं। दैवको टाल सकनेमें भला कौन समर्थ है!॥ ३०॥ | | (दुःसाध्य एवास्तिवह सेवकानां<br>धर्मः सदा मानविवर्जितानाम्।<br>आज्ञापराणां वशवर्त्तिकानां<br>पाञ्चालिकानामिव सूत्रभेदात्॥) | (सम्मानकी भावनासे रहित, स्वामीकी आज्ञाका पालन करनेवाले तथा सदा उनके अधीन रहनेवाले सेवकोंका सेवाधर्म अत्यन्त कठिन है। सूतके संकेतपर नर्तन करनेवाली कठपुतलीकी भाँति वे सदा परतन्त्र रहते हैं।) | | गत्वा कथं तस्य पुरस्त्वया च<br>मयापि वक्तव्यमिदं कठोरम्।<br>गच्छन्तु पातालमितश्च सर्वे<br>दत्त्वाथ रत्नानि धनं सुराणाम्॥ ३१ | अतः उन महिषासुरके सामने जाकर मेरे अथवा तुम्हारे द्वारा ऐसा अप्रिय वचन कैसे कहा जा सकता है कि देवताओंके धन एवं रत्न वापस करके सभी दानव यहाँसे पातालको लौट चलें?॥ ३१॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—20 A