भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

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पृष्ठ 617

| ६०८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १५ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तत्सुखं द्विविधं प्रोक्तं नित्यानित्यप्रभेदतः ।<br>आत्मज्ञानं सुखं नित्यमनित्यं भोगजं स्मृतम् ॥ ११<br>नाशात्मकं तु तत्त्याज्यं वेदशास्त्रार्थचिन्तकैः ।<br>सौगतानां मतं चेत्त्वं स्वीकरोषि वरानने ॥ १२<br>तथापि यौवनं प्राप्य भुंक्ष्व भोगाननुत्तमान् ।<br>परलोकस्य सन्देहो यदि तेऽस्ति कृशोदरि ॥ १३<br>स्वर्गभोगपरा नित्यं भव भामिनि भूतले ।<br>अनित्यं यौवनं देहे ज्ञात्वेति सुकृतं चरेत् ॥ १४वह सुख भी नित्य और अनित्यके भेदसे दो प्रकारका कहा गया है। आत्मज्ञानसम्बन्धी सुखको ‘नित्य’ और भोगजनित सुखको ‘अनित्य’ माना गया है। वेद और शास्त्रके तत्त्वका चिन्तन करनेवाले लोगोंको चाहिये कि उस विनाशशील अनित्य सुखको त्याग दें। हे वरानने! यदि आप नास्तिकका मत स्वीकार करती हों तो भी इस यौवनको पाकर उत्तमसे उत्तम सुखोंका भोग करें। हे कृशोदरि! हे भामिनि! यदि परलोकके विषयमें आपको सन्देह हो तो इस पृथ्वीपर ही सदाचारपूर्वक रहती हुई स्वर्गीय सुख प्राप्त करनेमें सदा तत्पर रहें, नहीं तो शरीरमें यह यौवन अनित्य है—ऐसा समझकर आपको सदा सत्कर्म करते रहना चाहिये॥ ११-१४॥
परोपतापनं कार्यं वर्जनीयं सदा बुधैः ।<br>अविरोधेन कर्तव्यं धर्मार्थकामसेवनम् ॥ १५<br>तस्मात्त्वमपि कल्याणि मतिं धर्मे सदा कुरु ।<br>अपराधं विना दैत्यान्कस्मान्मारयसेऽम्बिके ॥ १६<br>दयाधर्मोऽस्य देहोऽस्ति सत्ये प्राणाः प्रकीर्तिताः ।<br>तस्माद्दया तथा सत्यं रक्षणीयं सदा बुधैः ॥ १७<br>कारणं वद सुश्रोणि दानवानां वधे तव ।बुद्धिमान् पुरुषोंको चाहिये कि वे दूसरोंको पीड़ित करनेके कार्यका त्याग कर दें। अतः बिना विरोधके धर्म, अर्थ और कामका सेवन करना चाहिये। इसलिये हे कल्याणि! आप अपनी बुद्धि धर्मकृत्यमें लगाइये। हे अम्बिके! आप हम दैत्योंको बिना अपराधके क्यों मार रही हैं? दयाभाव पुरुषमात्रका शरीर है और सत्यमें ही उसका प्राण प्रतिष्ठित कहा गया है। अतः बुद्धिमान् पुरुषोंको चाहिये कि दया और सत्यकी सदा रक्षा करें। हे देवि! आप दानवोंके संहारमें अपना प्रयोजन बतायें?॥ १५-१७ १/२॥
देव्युवाच<br>त्वया पृष्टं महाबाहो किमर्थमिह चागता ॥ १८<br>तदहं सम्प्रवक्ष्यामि हनने च प्रयोजनम् ।<br>विचरामि सदा दैत्य सर्वलोकेषु सर्वदा ॥ १९<br>न्यायान्यायौ च भूतानां पश्यन्ती साक्षिरूपिणी ।<br>न मे कदापि भोगेच्छा न लोभो न च वैरि‍ता ॥ २०देवी बोलीं—हे महाबाहो! तुमने जो यह पूछा है कि मैं यहाँ क्यों आयी हूँ—उसे बताती हूँ और दानववधका प्रयोजन भी बताती हूँ। हे दैत्य! मैं सदा साक्षी बनकर सभी प्राणियोंके न्याय तथा अन्यायको देखती हुई सब लोकोंमें निरन्तर विचरती रहती हूँ। मुझे न तो कभी भोगविलासकी इच्छा है, न लोभ है और न किसीके प्रति द्वेषभाव ही है॥ १८-२०॥
धर्मार्थं विचराम्यत्र संसारे साधुरक्षणम् ।<br>व्रतमेतत्तु नियतं पालयामि निजं सदा ॥ २१<br>साधूनां रक्षणं कार्यं हन्तव्या येऽप्यसाधवः ।<br>वेदसंरक्षणं कार्यमवतारैरनेकशः ॥ २२<br>युगे युगे तानेवाहमवतारान्बिभर्मि च ।धर्मकी मर्यादा रखनेके लिये मैं इस संसारमें विचरण करती रहती हूँ। साधुपुरुषोंकी रक्षा करना—अपने इस व्रतका मैं सदा पालन करती हूँ। अनेक अवतार धारण करके मैं सज्जनोंकी रक्षा करती हूँ, जो असाधु हैं उनका संहार करती हूँ और वेदोंका संरक्षण करती हूँ। मैं प्रत्येक युगमें उन अवतारोंको धारण करती रहती हूँ॥ २१-२२ १/२॥