देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 622, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ें| अ० १६ ] | पञ्चम स्कन्ध | ६१३ | | :--- | :--- |
| तस्माद्रूपं च चातुर्यं कृत्वा यास्यामि तां प्रति।<br>यथा मां वीक्ष्य सा बाला प्रेमयुक्ता भविष्यति॥ ७ | पास जाऊँगा, जिससे मुझे देखते ही वह युवती प्रेमयुक्त—मोहित हो जायगी। मुझे भी इसी स्थितिमें सुख होगा, अन्य किसी स्वरूपसे नहीं॥ ४—७ १/२ ॥ | | ममापि च तदैव स्यात्सुखं नान्यस्वरूपतः।<br>इति सञ्चिन्त्य मनसा दानवेन्द्रो महाबलः॥ ८<br><br>त्यक्त्वा तन्माहिषं रूपं बभूव पुरुषः शुभः।<br>सर्वायुधधरः श्रीमांश्चारूभूषणभूषितः॥ ९<br><br>दिव्याम्बरधरः कान्तः पुष्पबाण इवापरः।<br>रथोपविष्टः केयूरस्रग्वी बाणधनुर्धरः॥ १०<br><br>सेनापरिवृतो देवीं जगाम मदगर्वितः।<br>मनोज्ञं रूपमास्थाय मानिनीनां मनोहरम्॥ ११ | मनमें ऐसा विचार करके महाबली वह दानवेन्द्र महिषरूप छोड़कर एक सुन्दर पुरुष बन गया। वह सभी प्रकारके आयुधको धारण किये हुए था, वह ऐश्वर्यसम्पन्न था, वह सुन्दर आभूषणोंसे अलंकृत था, उसने दिव्य वस्त्र धारण कर रखे थे। केयूर और हार पहने तथा हाथमें धनुष-बाण धारण किये रथपर बैठा हुआ वह कान्तिमान् दैत्य दूसरे कामदेवके सदृश प्रतीत हो रहा था। मानिनी सुन्दरियोंका भी मन हर लेनेवाला ऐसा सुन्दर रूप बनाकर वह मदोन्मत्त दैत्य अपनी विशाल सेनाके साथ देवीकी ओर चला॥ ८—११॥ | | तमागतं समालोक्य दैत्यानामधिपं तदा।<br>बहुभिः संवृतं वीरैर्देवी शङ्खमवादयत्॥ १२ | अनेक वीरोंसे घिरे हुए उस दैत्यराज महिषासुरको आया हुआ देखकर देवीने अपना शंख बजाया॥ १२॥ | | स शङ्खनिनादं श्रुत्वा जनविस्मयकारकम्।<br>समीपमेत्य देव्यास्तु तामुवाच हसन्निव॥ १३ | लोगोंको आश्चर्यचकित कर देनेवाली उस शंखध्वनिको सुनकर भगवतीके पास आकर वह दैत्य हँसता हुआ उनसे कहने लगा—॥ १३॥ | | देवि संसारचक्रेऽस्मिन्वर्तमानो जनः किल।<br>नरो वाथ तथा नारी सुखं वाञ्छति सर्वथा॥ १४<br><br>सुखं संयोगजं नृणां नासंयोगे भवेदिह।<br>संयोगो बहुधा भिन्नस्तानब्रवीमि शृणुष्व ह॥ १५<br><br>भेदान्सुप्रीतिहेतूत्थान्स्वभावोत्थाननेकशः ।<br>तत्र प्रीतिभवानादौ कथयामि यथामति॥ १६ | हे देवि! इस परिवर्तनशील जगत्में रहनेवाला व्यक्ति वह स्त्री अथवा पुरुष चाहे कोई भी हो, सब प्रकारसे सुख ही चाहता है। इस लोकमें सुख मनुष्योंको संयोगमें ही प्राप्त होता है, वियोगमें सुख होता ही नहीं। संयोग भी अनेक प्रकारका होता है। मैं उन भेदोंको बताता हूँ, सुनो। कहीं उत्तम प्रीतिके कारण संयोग हो जाता है और कहीं स्वभावतः संयोग हो जाता है, इनमें सर्वप्रथम मैं प्रीतिसे उत्पन्न होनेवाले संयोगके विषयमें अपनी बुद्धिके अनुसार बता रहा हूँ॥ १४—१६॥ | | मातापित्रोस्तु पुत्रेण संयोगस्तूत्तमः स्मृतः।<br>भ्रातृर्भ्रात्रा तथा योगः कारणान्मध्यमो मतः॥ १७<br><br>उत्तमस्य सुखस्यैव दातृत्वादुत्तमः स्मृतः।<br>तस्मादल्पसुखस्यैव प्रदातृत्वाच्च मध्यमः॥ १८ | माता-पिताका पुत्रके साथ होनेवाला संयोग उत्तम कहा गया है। भाईका भाईके साथ संयोग किसी प्रयोजनसे होता है, अतः वह मध्यम माना गया है। उत्तम सुख प्रदान करनेके कारण पहले प्रकारके संयोगको उत्तम तथा उससे कम सुख प्रदान करनेके कारण [दूसरे प्रकारके] संयोगको मध्यम कहा गया है॥ १७-१८॥ |