भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 629, कुल 889 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 629
६२०श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
एवंविधानि दुःखानि विद्यमाने तु भर्तरि ॥ २४<br><br>कालयोगान्मृते तस्मिन्नारी स्याद्दुःखभाजनम् ।<br>वैधव्यं परमं दुःखं शोकसंत्तापकारकम् ॥ २५<br><br>पोषितपतित्वेऽपि दुःखं स्यादधिकं गृहे ।<br>मदनाग्निविदग्धायाः किं सुखं पतिसङ्गजम् ॥ २६<br><br>तस्मात्पतिर्न कर्तव्यः सर्वथेति मतिर्मम ।<br>एवं प्रोक्ता तदा माता पतिं प्राह नृपात्मजा ॥ २७पतिके रहते हुए भी इस प्रकारके अनेक दुःख स्त्रीको सहने पड़ते हैं। दैवयोगसे उसकी मृत्यु हो जानेपर स्त्रीको [विधवा बनकर] दुःख उठाना पड़ता है; क्योंकि वैधव्य परम दुःखमय होता है तथा नानाविध शोक एवं संताप उत्पन्न करता रहता है। पतिके परदेश चले जानेपर कामदेवकी अग्निमें जलती हुई स्त्रीको घरमें अत्यधिक दुःख सहना पड़ता है, तो फिर उसे पतिसंगजनित क्या सुख प्राप्त हुआ? अतएव मेरा तो यही मत है कि स्त्रियोंको विवाह कभी नहीं करना चाहिये ॥ २४–२६\frac{१}{२} ॥
न च वाञ्छति भर्तारं कौमारव्रतधारिणी ।<br>व्रतजाप्यपरा नित्यं संसाराद्विमुखी सदा ॥ २८<br><br>न काङ्क्षति पतिं कर्तुं बहुदोषविचक्षणा ।<br>भार्यया भाषितं श्रुत्वा तथैव संस्थितो नृपः ॥ २९[पुत्रीके] ऐसा कहनेपर उसकी माताने अपने पतिसे कहा—कौमारव्रत धारण करनेकी इच्छावाली वह राजकुमारी पतिकी कामना नहीं करती है। संसारसे विरक्त रहकर वह सदा व्रत और जपमें तत्पर रहना चाहती है। [पतिसंगजनित] अनेक दोषोंको जाननेवाली वह कन्या विवाह नहीं करना चाहती ॥ २७–२८\frac{१}{२} ॥
विवाहो न कृतः पुत्र्या ज्ञात्वा भावविवर्जिताम् ।<br>वर्तमाना गृहेष्वेव पित्रा मात्रा च रक्षिता ॥ ३०<br><br>यौवनस्याङ्कुरा जाता नारीणां कामदीपकाः ।<br>तथापि सा वयस्याभिः प्रेरितापि पुनः पुनः ॥ ३१<br><br>चकमे न पतिं कर्तुं ज्ञानार्थपदभाषिणी ।<br>एकदोद्यानदेशे सा विहर्तुं बहुपादपे ॥ ३२अपनी भार्याकी बात सुनकर राजा चन्द्रसेन भी चुप रह गये। अपनी पुत्रीको विवाहकी इच्छासे रहित भाववाली जानकर राजाने भी उसका विवाह नहीं किया। वह मन्दोदरी भी माता-पिताके द्वारा भलीभाँति रक्षित होती हुई घरपर ही रहने लगी। कुछ समय पश्चात् नारियोंमें कामोत्तेजना उत्पन्न करनेवाले यौवन-सम्बन्धी लक्षण उसमें विकसित होने लगे। उस समय उसकी सखियोंने विवाहके लिये उसे बार-बार प्रेरित किया, फिर भी ज्ञान-तत्त्वकी बातें कहकर वह मन्दोदरी पति बनानेके लिये तैयार न हुई ॥ २९–३१\frac{१}{२} ॥
जगाम सुमुखी प्रेम्णा सैरन्ध्रीगणसेविता ।<br>रेमे कृशोदरी तत्रापश्यत्कुसुमिता लताः ॥ ३३<br><br>पुष्पाणि चिन्वती रम्या वयस्याभिः समावृता ।<br>कोसलाधिपतिस्तत्र मार्गे दैववशात्तदा ॥ ३४एक दिन सुन्दर मुखवाली वह कन्या अपनी दासियोंके साथ बहुत-से वृक्षोंसे सुशोभित उद्यानमें आनन्दपूर्वक विहार करनेके लिये गयी। उस कृशोदरीने वहाँ पुष्पित लताओंको देखा और अपनी सखियोंके साथ पुष्प चुनती हुई वह वहींपर क्रीडाविहार करने लगी ॥ ३२–३३\frac{१}{२} ॥
आजगाम महावीरो वीरसेनोऽतिविश्रुतः ।<br>एकाकी रथमारूढः कतिचित्सेवकैर्वृतः ॥ ३५<br>सैन्यं च पृष्ठतस्तस्य समायाति शनैः शनैः ।उसी समय उस मार्गसे संयोगवश कोसलनरेश वीरसेन आ गये। वे महान् शूरवीर तथा बहुत विख्यात थे। वे रथपर अकेले ही आरूढ़ थे तथा उनके साथ कुछ सेवक भी थे और सेना उनके पीछे धीरे-धीरे चली आ रही थी ॥ ३४–३५\frac{१}{२} ॥
देवी भागवत महापुराण · पृष्ठ 629, कुल 889 में से · BharatKosha