भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 628, कुल 889 में से

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पृष्ठ 628

अ० १७] पञ्चम स्कन्ध ६१९


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
राज्ञा पृष्टा तदा राज्ञी नाम्ना गुणवती प्रिया ॥ १२<br>कम्बुग्रीवाय कन्यां स्वां दास्यामि वरवर्णिनीम् ।तब राजाने गुणवती नामवाली अपनी प्रिय रानीसे पूछा—[मेरा विचार है कि] मैं अपनी सुन्दर पुत्री मन्दोदरीको कम्बुग्रीवको सौंप दूँ ॥ १२ १/२ ॥
सा तु पत्युर्वचः श्रुत्वा पुत्रीं पप्रच्छ सादरम् ॥ १३<br>विवाहं ते पिता कर्तुं कम्बुग्रीवेण वाञ्छति ।पतिकी यह बात सुनकर उस रानीने अपनी पुत्रीसे आदरपूर्वक पूछा—तुम्हारे पिता कम्बुग्रीवके साथ तुम्हारा विवाह करना चाहते हैं ॥ १३ १/२ ॥
तच्छ्रुत्वा मातरं प्राह वाक्यं मन्दोदरी तदा ॥ १४<br>नाहं पतिं करिष्यामि नेच्छा मेऽस्ति परिग्रहे ।<br>कौमारं व्रतमास्थाय कालं नेष्यामि सर्वथा ॥ १५<br><br>स्वातन्र्येण चरिष्यामि तपस्तीव्रं सदैव हि ।<br>पारतन्त्र्यं परं दुःखं मातः संसारसागरे ॥ १६<br><br>स्वातन्त्र्यान्मोक्षमित्याहुः पण्डिताः शास्त्रकोविदाः ।<br>तस्मान्मुक्ता भविष्यामि पत्या मे न प्रयोजनम् ॥ १७तब यह सुनकर मन्दोदरीने मातासे यह वचन कहा—मैं पति नहीं बनाऊँगी, विवाह करनेमें मेरी अभिरुचि नहीं है। मैं सदा कौमार्यव्रतका आश्रय लेकर अपना जीवन व्यतीत करूँगी। मैं स्वतन्त्रतापूर्वक सदा कठोर तप करूँगी। हे माता! संसारसागरमें परतन्त्रता परम दुःख है। स्वतन्त्रतासे ही मोक्षकी प्राप्ति होती है—ऐसा शास्त्रोंके ज्ञाता पण्डितजनोंने कहा है, अतएव मैं बन्धनसे मुक्त रहूँगी, मुझे पतिसे कोई भी प्रयोजन नहीं है ॥ १४—१७ ॥
विवाहे वर्तमाने तु पावकस्य च सन्निधौ ।<br>वक्तव्यं वचनं सम्यक्त्वदधीनास्मि सर्वदा ॥ १८<br><br>श्वश्रूदेवरवर्गाणां दासीत्वं श्वशुरालये ।<br>पतिचित्तानुवर्तित्वं दुःखार्दुःखतरं स्मृतम् ॥ १९विवाह होते समय अग्निके साक्ष्यमें [प्रतिज्ञा-रूपमें] यह वचन कहना पड़ता है—'[हे पतिदेव!] अब मैं सदाके लिये पूर्णरूपसे आपके अधीन हो चुकी हूँ।' इसके अतिरिक्त ससुरालमें सास तथा देवर आदि लोगोंकी दासी बनकर रहना तथा सदा पतिके अनुकूल रहना अत्यन्त दुःखदायक बताया गया है ॥ १८-१९ ॥
कदाचित्पतिरन्यां वा कामिनीं च भजेद्यदि ।<br>तदा महत्तरं दुःखं सपत्नीसम्भवं भवेत् ॥ २०<br><br>तदेर्ष्या जायते पत्यौ क्लेशश्चापि भवेदथ ।<br>संसारे क्व सुखं मातर्नारीणां च विशेषतः ॥ २१<br><br>स्वभावात्परतन्त्राणां संसारे स्वप्नधर्मिणि ।कहीं यदि पतिने अन्य स्त्रीके साथ विवाह कर लिया तब तो सौतसे मिलनेवाला महान् दुःख उपस्थित हो जाता है। उस समय पतिके प्रति ईर्ष्याभाव उत्पन्न हो जाता है, कलह भी होने लगता है। हे माता! संसारमें सुख कहाँ है ? और विशेष करके स्वभावसे ही परतन्त्र नारियोंके लिये इस स्वप्नधर्मा संसारमें सुख है ही नहीं ॥ २०-२१ १/२ ॥
श्रुतं मया पुरा मातरुत्तानचरणात्मजः ॥ २२<br><br>उत्तमः सर्वधर्मज्ञो ध्रुवादवरजो नृपः ।<br>पत्नीं धर्मपरां साध्वीं पतिभक्तिपरायणाम् ॥ २३<br>अपराधं विना कान्तां त्यक्तवान्विपिने प्रियाम् ।हे माता! मैंने सुना है कि प्राचीनकालमें राजा उत्तानपादके एक 'उत्तम' नामक पुत्र थे, जो समस्त धर्मोंके ज्ञाता एवं ध्रुवके कनिष्ठ भ्राता थे। उन्होंने अपनी धर्मनिष्ठ, पतिव्रता, पतिके प्रति भक्तिभाव रखनेवाली, प्रिय तथा सुन्दर पत्नीको बिना किसी अपराधके ही वनमें छोड़ दिया था ॥ २२-२३ १/२ ॥