भारतकोश
देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

पृष्ठ 627, कुल 889 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 627
६१८श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १७

अथ सप्तदशोऽध्यायः

महिषासुरका देवीको मन्दोदरी नामक राजकुमारीका आख्यान सुनाना

व्यास उवाचव्यासजी बोले—
इति श्रुत्वा वचस्तस्य देवी पप्रच्छ दानवम्।<br>का सा मन्दोदरी नारी कोऽसौ त्यक्तो नृपस्तया ॥ १[हे महाराज!] उसका यह वचन सुनकर भगवतीने उस दानवसे पूछा—वह स्त्री मन्दोदरी कौन थी और वह राजा कौन था, जिसे उसने त्याग दिया था? ॥ १ ॥
शठः को वा नृपः पश्चात्तन्मे ब्रूहि कथानकम्।<br>विस्तरेण यथा प्राप्तं दुःखं वनितया पुनः ॥ २बादमें उसने जिसे पति बनाया, वह धूर्त राजा कौन था? उस स्त्रीको पुनः जिस प्रकार दुःख मिला हो, वह कथानक विस्तारपूर्वक बताओ ॥ २ ॥
महिष उवाचमहिषासुर बोला—
सिंहलो नाम देशोऽस्ति विख्यातः पृथिवीतले।<br>घनपादपसंयुक्तो धनधान्यसमृद्धिमान् ॥ ३पृथवीतलपर विख्यात सिंहल नामक एक देश है। उसमें बहुत ही घने-घने वृक्ष हैं और वह धन-धान्यसे समृद्ध है ॥ ३ ॥
चन्द्रसेनाभिधस्तत्र राजा धर्मपरायणः।<br>न्यायदण्डधरः शान्तः प्रजापालनतत्परः ॥ ४<br><br>सत्यवादी मृदुः शूरस्तितिक्षुर्नीतिसागरः।<br>शास्त्रवित्सर्वधर्मज्ञो धनुर्वेदेऽतिनिष्ठितः ॥ ५वहाँ चन्द्रसेन नामका राजा राज्य करता था, जो बड़ा धर्मात्मा, शान्तस्वभाव, प्रजापालनमें तत्पर, न्यायपूर्वक शासन-कार्य करनेवाला, सत्यवादी, मृदु स्वभाववाला, वीर, सहिष्णु, नीतिशास्त्रका सागर, शास्त्रवेत्ता, सब धर्मोंका ज्ञाता और धनुर्वेदमें अत्यन्त प्रवीण था ॥ ४-५ ॥
तस्य भार्या वरारोहा सुन्दरी सुभगा शुभा।<br>सदाचारातिसुमुखी पतिभक्तिपरायणा ॥ ६<br><br>नाम्ना गुणवती कान्ता सर्वलक्षणसंयुता।<br>सुषुवे प्रथमे गर्भे पुत्रीं सा चातिसुन्दरीम् ॥ ७उसकी भार्या भी रूपवती, सुन्दरी, सौभाग्यशालिनी, सद्गुणी, सदाचारिणी, अत्यन्त सुन्दर मुखवाली, पतिभक्तिमें लीन रहनेवाली, मनोहर और सभी उत्तम लक्षणोंसे सम्पन्न थी। उसका नाम गुणवती था। उसने प्रथम गर्भसे एक अति सुन्दर कन्याको जन्म दिया ॥ ६-७ ॥
पिता चातीव सन्तुष्टः पुत्रीं प्राप्य मनोरमाम्।<br>मन्दोदरीति नामास्याः पिता चक्रे मुदान्वितः ॥ ८उस मनोरम कन्याको पाकर पिता बहुत ही प्रसन्न हुए और उन्होंने बड़े हर्षके साथ उसका नाम मन्दोदरी रखा ॥ ८ ॥
इन्दोः कलेव चात्यर्थं ववृधे सा दिने दिने।<br>दशवर्षा यदा जाता कन्या चातिमनोहरा ॥ ९वह कन्या चन्द्रमाकी कलाके समान दिन-प्रतिदिन बढ़ने लगी। अत्यन्त मनोहारिणी वह कन्या जब दस वर्षकी हुई, तब उसके वरके लिये राजा चन्द्रसेन प्रतिदिन चिन्तित रहने लगे ॥ ९ ½ ॥
वरार्थं नृपतिश्चिन्तामवाप च दिने दिने।<br>मद्रदेशाधिपः शूरः सुधन्वा नाम पार्थिवः ॥ १०<br><br>तस्य पुत्रोऽतिमेधावी कम्बुग्रीवोऽतिविश्रुतः।<br>ब्राह्मणैः कथितो राज्ञे स युक्तोऽस्या वरः शुभः ॥ ११<br><br>सर्वलक्षणसम्पन्नः सर्वविद्यार्थपारगः।उस समय मद्रदेशके अधिपति सुधन्वा नामवाले एक पराक्रमी नरेश थे। कम्बुग्रीव नामसे अति विख्यात उनका एक पुत्र था, जो बहुत मेधावी था। ब्राह्मणोंने राजा चन्द्रसेनसे कहा कि कम्बुग्रीव उस कन्याके योग्य वर है। वह सुन्दर, सभी शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न तथा समस्त विद्याओंमें पारंगत है ॥ १०-११ ½ ॥