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देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
६१८श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १७

अथ सप्तदशोऽध्यायः

महिषासुरका देवीको मन्दोदरी नामक राजकुमारीका आख्यान सुनाना

व्यास उवाचव्यासजी बोले—
इति श्रुत्वा वचस्तस्य देवी पप्रच्छ दानवम्।<br>का सा मन्दोदरी नारी कोऽसौ त्यक्तो नृपस्तया ॥ १[हे महाराज!] उसका यह वचन सुनकर भगवतीने उस दानवसे पूछा—वह स्त्री मन्दोदरी कौन थी और वह राजा कौन था, जिसे उसने त्याग दिया था? ॥ १ ॥
शठः को वा नृपः पश्चात्तन्मे ब्रूहि कथानकम्।<br>विस्तरेण यथा प्राप्तं दुःखं वनितया पुनः ॥ २बादमें उसने जिसे पति बनाया, वह धूर्त राजा कौन था? उस स्त्रीको पुनः जिस प्रकार दुःख मिला हो, वह कथानक विस्तारपूर्वक बताओ ॥ २ ॥
महिष उवाचमहिषासुर बोला—
सिंहलो नाम देशोऽस्ति विख्यातः पृथिवीतले।<br>घनपादपसंयुक्तो धनधान्यसमृद्धिमान् ॥ ३पृथवीतलपर विख्यात सिंहल नामक एक देश है। उसमें बहुत ही घने-घने वृक्ष हैं और वह धन-धान्यसे समृद्ध है ॥ ३ ॥
चन्द्रसेनाभिधस्तत्र राजा धर्मपरायणः।<br>न्यायदण्डधरः शान्तः प्रजापालनतत्परः ॥ ४<br><br>सत्यवादी मृदुः शूरस्तितिक्षुर्नीतिसागरः।<br>शास्त्रवित्सर्वधर्मज्ञो धनुर्वेदेऽतिनिष्ठितः ॥ ५वहाँ चन्द्रसेन नामका राजा राज्य करता था, जो बड़ा धर्मात्मा, शान्तस्वभाव, प्रजापालनमें तत्पर, न्यायपूर्वक शासन-कार्य करनेवाला, सत्यवादी, मृदु स्वभाववाला, वीर, सहिष्णु, नीतिशास्त्रका सागर, शास्त्रवेत्ता, सब धर्मोंका ज्ञाता और धनुर्वेदमें अत्यन्त प्रवीण था ॥ ४-५ ॥
तस्य भार्या वरारोहा सुन्दरी सुभगा शुभा।<br>सदाचारातिसुमुखी पतिभक्तिपरायणा ॥ ६<br><br>नाम्ना गुणवती कान्ता सर्वलक्षणसंयुता।<br>सुषुवे प्रथमे गर्भे पुत्रीं सा चातिसुन्दरीम् ॥ ७उसकी भार्या भी रूपवती, सुन्दरी, सौभाग्यशालिनी, सद्गुणी, सदाचारिणी, अत्यन्त सुन्दर मुखवाली, पतिभक्तिमें लीन रहनेवाली, मनोहर और सभी उत्तम लक्षणोंसे सम्पन्न थी। उसका नाम गुणवती था। उसने प्रथम गर्भसे एक अति सुन्दर कन्याको जन्म दिया ॥ ६-७ ॥
पिता चातीव सन्तुष्टः पुत्रीं प्राप्य मनोरमाम्।<br>मन्दोदरीति नामास्याः पिता चक्रे मुदान्वितः ॥ ८उस मनोरम कन्याको पाकर पिता बहुत ही प्रसन्न हुए और उन्होंने बड़े हर्षके साथ उसका नाम मन्दोदरी रखा ॥ ८ ॥
इन्दोः कलेव चात्यर्थं ववृधे सा दिने दिने।<br>दशवर्षा यदा जाता कन्या चातिमनोहरा ॥ ९वह कन्या चन्द्रमाकी कलाके समान दिन-प्रतिदिन बढ़ने लगी। अत्यन्त मनोहारिणी वह कन्या जब दस वर्षकी हुई, तब उसके वरके लिये राजा चन्द्रसेन प्रतिदिन चिन्तित रहने लगे ॥ ९ ½ ॥
वरार्थं नृपतिश्चिन्तामवाप च दिने दिने।<br>मद्रदेशाधिपः शूरः सुधन्वा नाम पार्थिवः ॥ १०<br><br>तस्य पुत्रोऽतिमेधावी कम्बुग्रीवोऽतिविश्रुतः।<br>ब्राह्मणैः कथितो राज्ञे स युक्तोऽस्या वरः शुभः ॥ ११<br><br>सर्वलक्षणसम्पन्नः सर्वविद्यार्थपारगः।उस समय मद्रदेशके अधिपति सुधन्वा नामवाले एक पराक्रमी नरेश थे। कम्बुग्रीव नामसे अति विख्यात उनका एक पुत्र था, जो बहुत मेधावी था। ब्राह्मणोंने राजा चन्द्रसेनसे कहा कि कम्बुग्रीव उस कन्याके योग्य वर है। वह सुन्दर, सभी शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न तथा समस्त विद्याओंमें पारंगत है ॥ १०-११ ½ ॥

अ० १७] पञ्चम स्कन्ध ६१९

अ० १७] पञ्चम स्कन्ध ६१९


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
राज्ञा पृष्टा तदा राज्ञी नाम्ना गुणवती प्रिया ॥ १२<br>कम्बुग्रीवाय कन्यां स्वां दास्यामि वरवर्णिनीम् ।तब राजाने गुणवती नामवाली अपनी प्रिय रानीसे पूछा—[मेरा विचार है कि] मैं अपनी सुन्दर पुत्री मन्दोदरीको कम्बुग्रीवको सौंप दूँ ॥ १२ १/२ ॥
सा तु पत्युर्वचः श्रुत्वा पुत्रीं पप्रच्छ सादरम् ॥ १३<br>विवाहं ते पिता कर्तुं कम्बुग्रीवेण वाञ्छति ।पतिकी यह बात सुनकर उस रानीने अपनी पुत्रीसे आदरपूर्वक पूछा—तुम्हारे पिता कम्बुग्रीवके साथ तुम्हारा विवाह करना चाहते हैं ॥ १३ १/२ ॥
तच्छ्रुत्वा मातरं प्राह वाक्यं मन्दोदरी तदा ॥ १४<br>नाहं पतिं करिष्यामि नेच्छा मेऽस्ति परिग्रहे ।<br>कौमारं व्रतमास्थाय कालं नेष्यामि सर्वथा ॥ १५<br><br>स्वातन्र्येण चरिष्यामि तपस्तीव्रं सदैव हि ।<br>पारतन्त्र्यं परं दुःखं मातः संसारसागरे ॥ १६<br><br>स्वातन्त्र्यान्मोक्षमित्याहुः पण्डिताः शास्त्रकोविदाः ।<br>तस्मान्मुक्ता भविष्यामि पत्या मे न प्रयोजनम् ॥ १७तब यह सुनकर मन्दोदरीने मातासे यह वचन कहा—मैं पति नहीं बनाऊँगी, विवाह करनेमें मेरी अभिरुचि नहीं है। मैं सदा कौमार्यव्रतका आश्रय लेकर अपना जीवन व्यतीत करूँगी। मैं स्वतन्त्रतापूर्वक सदा कठोर तप करूँगी। हे माता! संसारसागरमें परतन्त्रता परम दुःख है। स्वतन्त्रतासे ही मोक्षकी प्राप्ति होती है—ऐसा शास्त्रोंके ज्ञाता पण्डितजनोंने कहा है, अतएव मैं बन्धनसे मुक्त रहूँगी, मुझे पतिसे कोई भी प्रयोजन नहीं है ॥ १४—१७ ॥
विवाहे वर्तमाने तु पावकस्य च सन्निधौ ।<br>वक्तव्यं वचनं सम्यक्त्वदधीनास्मि सर्वदा ॥ १८<br><br>श्वश्रूदेवरवर्गाणां दासीत्वं श्वशुरालये ।<br>पतिचित्तानुवर्तित्वं दुःखार्दुःखतरं स्मृतम् ॥ १९विवाह होते समय अग्निके साक्ष्यमें [प्रतिज्ञा-रूपमें] यह वचन कहना पड़ता है—'[हे पतिदेव!] अब मैं सदाके लिये पूर्णरूपसे आपके अधीन हो चुकी हूँ।' इसके अतिरिक्त ससुरालमें सास तथा देवर आदि लोगोंकी दासी बनकर रहना तथा सदा पतिके अनुकूल रहना अत्यन्त दुःखदायक बताया गया है ॥ १८-१९ ॥
कदाचित्पतिरन्यां वा कामिनीं च भजेद्यदि ।<br>तदा महत्तरं दुःखं सपत्नीसम्भवं भवेत् ॥ २०<br><br>तदेर्ष्या जायते पत्यौ क्लेशश्चापि भवेदथ ।<br>संसारे क्व सुखं मातर्नारीणां च विशेषतः ॥ २१<br><br>स्वभावात्परतन्त्राणां संसारे स्वप्नधर्मिणि ।कहीं यदि पतिने अन्य स्त्रीके साथ विवाह कर लिया तब तो सौतसे मिलनेवाला महान् दुःख उपस्थित हो जाता है। उस समय पतिके प्रति ईर्ष्याभाव उत्पन्न हो जाता है, कलह भी होने लगता है। हे माता! संसारमें सुख कहाँ है ? और विशेष करके स्वभावसे ही परतन्त्र नारियोंके लिये इस स्वप्नधर्मा संसारमें सुख है ही नहीं ॥ २०-२१ १/२ ॥
श्रुतं मया पुरा मातरुत्तानचरणात्मजः ॥ २२<br><br>उत्तमः सर्वधर्मज्ञो ध्रुवादवरजो नृपः ।<br>पत्नीं धर्मपरां साध्वीं पतिभक्तिपरायणाम् ॥ २३<br>अपराधं विना कान्तां त्यक्तवान्विपिने प्रियाम् ।हे माता! मैंने सुना है कि प्राचीनकालमें राजा उत्तानपादके एक 'उत्तम' नामक पुत्र थे, जो समस्त धर्मोंके ज्ञाता एवं ध्रुवके कनिष्ठ भ्राता थे। उन्होंने अपनी धर्मनिष्ठ, पतिव्रता, पतिके प्रति भक्तिभाव रखनेवाली, प्रिय तथा सुन्दर पत्नीको बिना किसी अपराधके ही वनमें छोड़ दिया था ॥ २२-२३ १/२ ॥
६२०श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
एवंविधानि दुःखानि विद्यमाने तु भर्तरि ॥ २४<br><br>कालयोगान्मृते तस्मिन्नारी स्याद्दुःखभाजनम् ।<br>वैधव्यं परमं दुःखं शोकसंत्तापकारकम् ॥ २५<br><br>पोषितपतित्वेऽपि दुःखं स्यादधिकं गृहे ।<br>मदनाग्निविदग्धायाः किं सुखं पतिसङ्गजम् ॥ २६<br><br>तस्मात्पतिर्न कर्तव्यः सर्वथेति मतिर्मम ।<br>एवं प्रोक्ता तदा माता पतिं प्राह नृपात्मजा ॥ २७पतिके रहते हुए भी इस प्रकारके अनेक दुःख स्त्रीको सहने पड़ते हैं। दैवयोगसे उसकी मृत्यु हो जानेपर स्त्रीको [विधवा बनकर] दुःख उठाना पड़ता है; क्योंकि वैधव्य परम दुःखमय होता है तथा नानाविध शोक एवं संताप उत्पन्न करता रहता है। पतिके परदेश चले जानेपर कामदेवकी अग्निमें जलती हुई स्त्रीको घरमें अत्यधिक दुःख सहना पड़ता है, तो फिर उसे पतिसंगजनित क्या सुख प्राप्त हुआ? अतएव मेरा तो यही मत है कि स्त्रियोंको विवाह कभी नहीं करना चाहिये ॥ २४–२६\frac{१}{२} ॥
न च वाञ्छति भर्तारं कौमारव्रतधारिणी ।<br>व्रतजाप्यपरा नित्यं संसाराद्विमुखी सदा ॥ २८<br><br>न काङ्क्षति पतिं कर्तुं बहुदोषविचक्षणा ।<br>भार्यया भाषितं श्रुत्वा तथैव संस्थितो नृपः ॥ २९[पुत्रीके] ऐसा कहनेपर उसकी माताने अपने पतिसे कहा—कौमारव्रत धारण करनेकी इच्छावाली वह राजकुमारी पतिकी कामना नहीं करती है। संसारसे विरक्त रहकर वह सदा व्रत और जपमें तत्पर रहना चाहती है। [पतिसंगजनित] अनेक दोषोंको जाननेवाली वह कन्या विवाह नहीं करना चाहती ॥ २७–२८\frac{१}{२} ॥
विवाहो न कृतः पुत्र्या ज्ञात्वा भावविवर्जिताम् ।<br>वर्तमाना गृहेष्वेव पित्रा मात्रा च रक्षिता ॥ ३०<br><br>यौवनस्याङ्कुरा जाता नारीणां कामदीपकाः ।<br>तथापि सा वयस्याभिः प्रेरितापि पुनः पुनः ॥ ३१<br><br>चकमे न पतिं कर्तुं ज्ञानार्थपदभाषिणी ।<br>एकदोद्यानदेशे सा विहर्तुं बहुपादपे ॥ ३२अपनी भार्याकी बात सुनकर राजा चन्द्रसेन भी चुप रह गये। अपनी पुत्रीको विवाहकी इच्छासे रहित भाववाली जानकर राजाने भी उसका विवाह नहीं किया। वह मन्दोदरी भी माता-पिताके द्वारा भलीभाँति रक्षित होती हुई घरपर ही रहने लगी। कुछ समय पश्चात् नारियोंमें कामोत्तेजना उत्पन्न करनेवाले यौवन-सम्बन्धी लक्षण उसमें विकसित होने लगे। उस समय उसकी सखियोंने विवाहके लिये उसे बार-बार प्रेरित किया, फिर भी ज्ञान-तत्त्वकी बातें कहकर वह मन्दोदरी पति बनानेके लिये तैयार न हुई ॥ २९–३१\frac{१}{२} ॥
जगाम सुमुखी प्रेम्णा सैरन्ध्रीगणसेविता ।<br>रेमे कृशोदरी तत्रापश्यत्कुसुमिता लताः ॥ ३३<br><br>पुष्पाणि चिन्वती रम्या वयस्याभिः समावृता ।<br>कोसलाधिपतिस्तत्र मार्गे दैववशात्तदा ॥ ३४एक दिन सुन्दर मुखवाली वह कन्या अपनी दासियोंके साथ बहुत-से वृक्षोंसे सुशोभित उद्यानमें आनन्दपूर्वक विहार करनेके लिये गयी। उस कृशोदरीने वहाँ पुष्पित लताओंको देखा और अपनी सखियोंके साथ पुष्प चुनती हुई वह वहींपर क्रीडाविहार करने लगी ॥ ३२–३३\frac{१}{२} ॥
आजगाम महावीरो वीरसेनोऽतिविश्रुतः ।<br>एकाकी रथमारूढः कतिचित्सेवकैर्वृतः ॥ ३५<br>सैन्यं च पृष्ठतस्तस्य समायाति शनैः शनैः ।उसी समय उस मार्गसे संयोगवश कोसलनरेश वीरसेन आ गये। वे महान् शूरवीर तथा बहुत विख्यात थे। वे रथपर अकेले ही आरूढ़ थे तथा उनके साथ कुछ सेवक भी थे और सेना उनके पीछे धीरे-धीरे चली आ रही थी ॥ ३४–३५\frac{१}{२} ॥
अ० १७ ]पञ्चम स्कन्ध६२१
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
दृष्टस्तस्या वयस्याभिर्दूरतः पार्थिवस्तदा ॥ ३६<br>मन्दोदर्यै तथा प्रोक्तं समायाति नरः पथि।<br>रथारूढो महाबाहू रूपवान्मदनोऽपरः ॥ ३७तभी उसकी सखियोंने दूरसे ही राजाको देख लिया और [उनमेंसे किसी युवतीने] मन्दोदरीसे कहा—विशाल भुजाओंवाला, रूपवान् तथा दूसरे कामदेवके समान एक पुरुष रथपर सवार होकर इस मार्गसे चला आ रहा है। मैं तो यह मानती हूँ कि यहाँ भाग्यवश कोई राजा ही आ गया है॥ ३६-३७ १/२ ॥
मन्येऽहं नृपतिः कश्चित्प्राप्तो भाग्यवशादिह।<br>एवं ब्रुवत्यां तत्रासौ कोसलेन्द्रः समागतः ॥ ३८<br>दृष्ट्वा तामसितापाङ्गीं विस्मयं प्राप भूपतिः।<br>उत्तीर्य स रथात्तूर्णं पप्रच्छ परिचारिकाम् ॥ ३९वह युवती ऐसा कह रही थी कि इतनेमें कोसल-नरेश वीरसेन वहाँ आ गये। उस श्याम कटाक्षोंवाली मन्दोदरीको देखकर राजा विस्मयमें पड़ गये। रथसे तुरंत उतरकर उन्होंने दासीसे पूछा—विशाल नेत्रोंवाली यह युवती कौन है और किसकी पुत्री है? मुझे शीघ्र बताओ॥ ३८-३९ १/२ ॥
केयं बाला विशालाक्षी कस्य पुत्री वदाशु मे।<br>एवं पृष्टा तु सैरन्ध्री तमुवाच शुचिस्मिता ॥ ४०<br>प्रथमं ब्रूहि मे वीर पृच्छामि त्वां सुलोचन।<br>कोऽसि त्वं किमिहायातः किं कार्यं वद साम्प्रतम् ॥ ४१इस प्रकार पूछे जानेपर मधुर मुसकानवाली दासीने उनसे कहा—सुन्दर नेत्रोंवाले हे वीर! पहले आप मुझे बतायें, मैं आपसे पूछ रही हूँ कि आप कौन हैं? यहाँ किसलिये आये हैं और यहाँ आपका कौन-सा कार्य है? [यह सब] अभी बतानेकी कृपा करें॥ ४०-४१॥
इति पृष्टस्तु सैरन्ध्र्या तामुवाच महीपतिः।<br>कोसलो नाम देशोऽस्ति पृथिव्यां परमाद्भुतः ॥ ४२<br>तस्य पालयिता चाहं वीरसेनाभिधः प्रिये।<br>वाहिनी पृष्ठतः कामं समायाति चतुर्विधा ॥ ४३<br>मार्गभ्रमादिह प्राप्तं विद्धि मां कोसलाधिपम्।दासीके यह पूछनेपर राजाने उससे कहा—पृथ्‍वीपर अत्यन्त अद्भुत कोसल नामक एक देश है। हे प्रिये! वीरसेन नामवाला मैं उसी देशका शासक हूँ। मेरी विशाल चतुरंगिणी सेना पीछे-पीछे आ रही है। मार्ग भूल जानेके कारण यहाँ आये हुए मुझको तुम कोसलदेशका राजा समझो॥ ४२-४३ १/२ ॥
सैरन्ध्र्युवाच<br>चन्द्रसेनसुता राजन्नाम्ना मन्दोदरी किल ॥ ४४<br>उद्याने रन्तुकामेयं प्राप्ता कमललोचना।**सैरन्ध्री बोली—**हे राजन्! यह महाराज चन्द्रसेनकी पुत्री है और इसका नाम मन्दोदरी है। कमलसदृश नेत्रोंवाली यह राजकुमारी विहार करनेकी इच्छासे इस उपवनमें आयी है॥ ४४ १/२ ॥
श्रुत्वा तद्भाषितं राजा प्रत्युवाच प्रसाधिकाम् ॥ ४५<br>सैरन्ध्रि चतुरासि त्वं राजपुत्रीं प्रबोधय।<br>ककुत्स्थवंशजश्चाहं राजास्मि चारुलोचने ॥ ४६<br>गान्धर्वेण विवाहेन पतिं मां कुरु कामिनि।<br>न मे भार्यास्ति सुश्रोणि वयसोऽद्भुतयौवनाम् ॥ ४७<br>वाञ्छामि रूपसम्पन्नां सुकुलां कामिनीं किल।<br>अथवा ते पिता मह्यं विधिना दातुमर्हति ॥ ४८<br>अनुकूलः पतिश्चाहं भविष्यामि न संशयः।उसकी बात सुनकर राजाने उस सैरन्ध्रीसे कहा—हे सैरन्ध्रि! तुम चतुर हो, अतः राजकुमारीको समझा दो। ‘हे सुनयने! मैं ककुत्स्थवंशमें उत्पन्न एक राजा हूँ। अतः हे कामिनि! तुम गान्धर्व-विवाहके द्वारा मुझे पति बना लो। हे सुश्रोणि! मेरी कोई भार्या नहीं है। मैं भी अद्भुत यौवनावस्थासे सम्पन्न, रूपवती और कुलीन युवतीकी आकांक्षा रखता हूँ। अथवा [यदि गान्धर्व-विवाह पसन्द न हो तो] तुम्हारे पिता विधि-विधानसे तुमको मुझे सौंप दें। मैं सर्वथा तुम्हारे अनुकूल पति होऊँगा; इसमें सन्देह नहीं है’॥ ४५-४८ १/२ ॥
श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १७ ]
६२२
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
महिष उवाच<br>इत्याकर्ण्य वचस्तस्य सैरन्ध्री प्राह तां तदा ॥ ४९<br>प्रहस्य मधुरं वाक्यं कामशास्त्रविशारदा।<br>मन्दोदरि नृपः प्राप्तः सूर्यवंशसमुद्भवः ॥ ५०<br>रूपवान्बलवान्कान्तो वयसा त्वत्समः पुनः।<br>प्रीतिमान्नृपतिर्जातस्त्वयि सुन्दरि सर्वथा ॥ ५१महिष बोला—तब वीरसेनका वचन सुनकर कामशास्त्रमें प्रवीण सैरन्ध्रीने हँसकर उस मन्दोदरीसे मधुर वाणीमें कहा—हे मन्दोदरि! सूर्यवंशमें उत्पन्न ये राजा यहाँ आये हैं। ये रूपवान्, बलवान् तथा आयुमें तुम्हारे ही तुल्य हैं। हे सुन्दरि! ये राजा सम्यक् प्रकारसे तुझमें प्रेमासक्त हो गये हैं॥ ४९—५१॥
पितापि ते विशालाक्षि परितप्यति सर्वथा।<br>विवाहकालं ते ज्ञात्वा त्वां च वैराग्यसंयुताम् ॥ ५२<br>इत्याहास्मान् नृपतिर्निःश्वस्य पुनः पुनः।<br>पुत्रीं प्रबोधयन्त्वेतां सैरन्ध्रयः सेवने रताः ॥ ५३<br>वक्तुं शक्ता वयं न त्वां हठधर्मरतां पुनः।<br>भर्तुः शुश्रूषणं स्त्रीणां परो धर्मोऽब्रवीन्मनुः ॥ ५४<br>भर्तारं सेवमाना वै नारी स्वर्गमवाप्नुयात्।<br>तस्मात्कुरु विशालाक्षि विवाहं विधिपूर्वकम् ॥ ५५हे विशाल नयनोंवाली! तुम्हारी विवाहयोग्य अवस्था हो गयी है और तुम वैराग्यभावसे युक्त रहती हो—यह जानकर तुम्हारे पिता भी सदा चिन्तित रहते हैं। उन महाराजने बार-बार लंबी साँस लेकर हमलोगोंसे यह कहा था—'हे दासियो! तुमलोग सदा उसकी सेवामें संलग्न रहती हो, अतः तुम्हीं लोग मेरी इस पुत्रीको समझाओ।' किंतु हमलोग तुझ हठधर्मपरायणासे कुछ भी कहनेमें समर्थ नहीं हैं। [फिर भी हम तुम्हें बता देना चाहती हैं कि] पतिकी सेवा ही स्त्रियोंके लिये परम धर्म है—ऐसा मनुने कहा है। पतिकी सेवा करनेवाली स्त्री स्वर्ग प्राप्त कर लेती है। अतएव हे विशाल नेत्रोंवाली! तुम विधिपूर्वक विवाह कर लो॥ ५२—५५॥
मन्दोदर्युवाच<br>नाहं पतिं करिष्यामि चरिष्ये तप अद्भुतम्।<br>निवारय नृपं बाले किं मां पश्यति निस्त्रपः ॥ ५६मन्दोदरी बोली—मैं पति नहीं बनाऊँगी; मैं अद्भुत तप करूँगी। हे बाले! तुम इस राजाको मना कर दो; यह निर्लज्ज मेरी ओर क्यों देख रहा है?॥ ५६॥
सैरन्ध्र्युवाच<br>दुर्जयो देवि कामोऽसौ कालोऽसौ दुरतिक्रमः।<br>तस्मान्मे वचनं पथ्यं कर्तुमर्हसि सुन्दरि ॥ ५७<br>अन्यथा व्यसनं नूनमापतेदिति निश्चयः।सैरन्ध्री बोली—हे देवि! यह कामदेव अजेय है तथा कालका अतिक्रमण भी अत्यन्त कठिन है। अतएव हे सुन्दरि! तुम मेरे इस कल्याणकारी वचनको मान लेनेकी कृपा करो। अन्यथा [तुम्हारे ऊपर कभी-न-कभी] संकट अवश्य पड़ेगा; यह मेरा दृढ़ विश्वास है॥ ५७ १/२॥
इति तस्या वचः श्रुत्वा कन्योवाचाथ तां सखीम् ॥ ५८<br>यद्यद्भवॆत्तद्भवतु दैवयोगादसंशयम्।<br>न विवाहं करिष्येऽहं सर्वथा परिचारिके ॥ ५९उसकी यह बात सुनकर राजकुमारीने उस सखीसे कहा—हे परिचारिके! दैवयोगसे जो भी होनेवाला है वह हो, किंतु मैं विवाह बिलकुल नहीं करूँगी; इसमें सन्देह नहीं है॥ ५८-५९॥
महिष उवाच<br>इति तस्यास्तु निर्बन्धं ज्ञात्वा प्राह नृपं पुनः।<br>गच्छ राजन् यथाकामं नेयमिच्छति सत्पतिम् ॥ ६०महिष बोला—उस राजकुमारीका निश्चित विचार जानकर सैरन्ध्रीने राजासे पुनः कहा—हे राजन्! आप इच्छानुसार यहाँसे जा सकते हैं। यह राजकुमारी उत्तम पति बनाना नहीं चाहती॥ ६०॥
अ० १८ ]पञ्चम स्कन्ध६२३
संस्कृतहिन्दी
नृपस्तु तद्वचः श्रुत्वा निर्गतः सह सेनया।<br>कोसलान्विमना भूत्वा कामिनीं प्रति निःस्पृहः॥ ६१उसकी बात सुनकर राजा वीरसेन उदास हो गये और उस राजकुमारीके प्रति आसक्तिरहित होकर अपनी सेनाके साथ कोसलदेशके लिये प्रस्थित हो गये॥ ६१॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे देवीमहिषसंवादे राजपुत्रीमन्दोदरीवृत्तवर्णनं नाम सप्तदशोऽध्यायः॥ १७॥


अथाष्टादशोऽध्यायः

दुर्धर, त्रिनेत्र, अन्धक और महिषासुरका वध

महिष उवाचमहिष बोला—
तस्यास्तु भगिनी कन्या नाम्ना चेन्दुमती शुभा।<br>विवाहयोग्या सञ्जाता सुरूपावरजा यदा॥ १<br><br>तस्या विवाहः संवृत्तः सञ्जातश्च स्वयंवरः।<br>राजानो बहुदेशीयाः सङ्गतास्तत्र मण्डपे॥ २उस मन्दोदरीकी इन्दुमती नामकी एक छोटी बहन थी, जो समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न तथा अत्यन्त रूपवती थी। जब वह विवाहके योग्य हुई, तब उसके विवाहकी तैयारी होने लगी। उसका स्वयंवर रचाया गया, स्वयंवरके मण्डपमें अनेक देशोंके राजा एकत्रित हुए॥ १-२॥
तया वृत्तो नृपः कश्चिद् बलवान् रूपसंयुतः।<br>कुलशीलसमायुक्तः सर्वलक्षणसंयुतः॥ ३इन्दुमतीने उनमेंसे एक बलशाली, रूपवान्, कुलीन, शीलवान् तथा समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न राजाका वरण कर लिया॥ ३॥
तदा कामातुरा जाता विटं वीक्ष्य नृपं तु सा।<br>चकमे दैवयोगात्तु शठं चातुर्यभूषितम्॥ ४उसी समय वह मन्दोदरी दैवयोगसे एक धूर्त, शठ तथा चातुर्यसम्पन्न राजाको देखकर कामातुर हो उठी और उसपर मोहित हो गयी॥ ४॥
पितरं प्राह तन्वङ्गी विवाहं कुरु मे पितः।<br>इच्छा मेऽद्य समुद्भूता दृष्ट्वा मद्राधिपं त्विह॥ ५उस कोमलांगीने अपने पितासे कहा—हे पिताजी! अब आप मेरा भी विवाह कर दीजिये। मद्रदेशके राजाको यहाँ देखकर अब मेरी भी विवाह करनेकी इच्छा हो गयी है॥ ५॥
चन्द्रसेनोऽपि तच्छ्रुत्वा पुत्र्या यद्भाषितं रहः।<br>प्रसन्नेन च मनसा तत्कार्ये तत्परोऽभवत्॥ ६पुत्रीने एकान्तमें अपने पितासे जो कुछ कहा था, उसे सुनकर राजा चन्द्रसेन प्रसन्नमनसे उसके भी विवाहकार्यकी व्यवस्थामें संलग्न हो गये॥ ६॥
तमाहूय नृपं गेहे विवाहविधिना ददौ।<br>कन्यां मन्दोदरीं तस्मै पारिबर्हं तथा बहु॥ ७तत्पश्चात् मद्रदेशके उन राजाको अपने घर बुलाकर उन्होंने वैवाहिक विधिके अनुसार उन्हें अपनी कन्या मन्दोदरी सौंप दी और बहुत-सा वैवाहिक उपहार प्रदान किया॥ ७॥
चारुदेष्णोऽपि तां प्राप्य सुन्दरीं मुदितोऽभवत्।<br>जगाम स्वगृहं तुष्टो राजापि सहितः स्त्रिया॥ ८मद्रनरेश चारुदेष्ण भी उस सुन्दरीको पाकर बहुत प्रसन्न हुआ और सन्तुष्ट होकर स्त्रीके साथ अपने घर चला गया॥ ८॥

६२४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १८

६२४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० १८

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
रेमे नृपतिशार्दूलः कामिन्या बहुवासरान्।<br>कदाचिद्दासपत्न्या स रममाणो रहः किल॥ ९<br><br>सैरन्ध्र्या कथितं तस्यै तया दृष्टः पतिस्तथा।<br>उपालम्भं ददौ तस्मै स्मितपूर्वं रुषान्विता॥ १०राजाओंमें श्रेष्ठ वह चारुदेष्ण बहुत दिनोंतक उस कामिनीके साथ रमण करता रहा। एक दिन वह किसी दासीके साथ एकान्तमें रमण कर रहा था। सैरन्ध्रीने यह बात मन्दोदरीको बता दी और उसने स्वयं जाकर पतिको [उस स्थितिमें] देख लिया। तब उसने मुसकराकर क्रोधके साथ राजाको बहुत उपालम्भ दिया॥ ९-१०॥
कदाचिदपि सामान्यां रहो रूपवतीं नृपः।<br>क्रीडयँल्लालयन्दृष्टः खेदं प्राप तदैव सा॥ ११इसके बाद पुनः किसी दिन मन्दोदरीने राजाको एक रूपवती दासीके साथ एकान्तमें क्रीड़ाविहार करते हुए देख लिया। [यह देखकर] उस समय उसे महान् कष्ट हुआ॥ ११॥
न ज्ञातोऽयं शठः पूर्वं यदा दृष्टः स्वयंवरे।<br>किं कृतं तु मया मोहाद्वञ्चिताहं नृपेण ह॥ १२वह सोचने लगी कि जब मैंने इसे स्वयंवरमें देखा था, तब मैं इस शठके विषयमें ऐसा नहीं समझ पायी थी। मैंने मोहवश यह क्या कर डाला? इस राजाने तो मुझे ठग लिया॥ १२॥
किं करोम्यद्य सन्तापं निर्लज्जे निर्घृणे शठे।<br>का प्रीतीरीदृशे पत्यौ धिगद्य मम जीवितम्॥ १३अब मैं क्या करूँ; केवल सन्ताप ही मिला। ऐसे निर्लज्ज, निर्दयी और धूर्त पतिके प्रति प्रेम कैसे हो सकता है! अब मेरे जीवनको धिक्कार है॥ १३॥
अद्यप्रभृति संसारे सुखं त्यक्तं मया खलु।<br>पतिसम्भोगजं सर्वं सन्तोषोऽद्य मया कृतः॥ १४आजसे मैं संसारमें पतिके साथ सहवाससे प्राप्त होनेवाले सारे सुखका त्याग कर रही हूँ; अब मैंने सन्तोष कर लिया॥ १४॥
अकर्तव्यं कृतं कार्यं तज्जातं दुःखदं मम।<br>देहत्यागः क्रियते चेद्गत्यातीव दुरत्यया॥ १५<br><br>पितृगेहं व्रजाम्याशु तत्रापि न सुखं भवेत्।<br>हास्ययोग्या सखीनां तु भवेयं नात्र संशयः॥ १६<br><br>तस्मादत्रैव संवासो वैराग्ययुतया मया।<br>कर्तव्यः कालयोगेन त्यक्त्वा कामसुखं पुनः॥ १७मैंने वह काम कर डाला, जिसे मुझे नहीं करना चाहिये था, इसीलिये वह मेरे लिये कष्टदायक सिद्ध हुआ। अब यदि मैं देहत्याग करती हूँ तो वह दुस्तर आत्महत्याके समान होगा। यदि पिताके घर चली जाऊँ तो वहाँ भी सुख नहीं मिलेगा और वहाँपर मैं अपनी सखियोंकी हँसीका पात्र बनी रहूँगी; इसमें कोई संशय नहीं है। अतः वैराग्ययुक्त होकर भोगविलासके सुखका परित्याग करके कालयोगसे मुझे यहींपर निवास करना चाहिये॥ १५–१७॥
महिष उवाच<br>इति सञ्चिन्त्य सा नारी दुःखशोकपरायणा।<br>स्थिता पतिगृहं त्यक्त्वा सुखं संसारजं ततः॥ १८महिष बोला— ऐसा विचार करके वह नारी सांसारिक सुखका परित्याग करके दुःख तथा शोकसे सन्तप्त रहती हुई अपने पतिके घरपर ही रह गयी॥ १८॥
तस्मात्त्वमपि कल्याणि मामनादृत्य भूपतिम्।<br>अन्यं कापुरुषं मन्दं कामार्ता संश्रयिष्यसि॥ १९अतः हे कल्याणि! उसी प्रकार तुम भी मुझ राज पतिका अनादर करके पुनः कामातुर होनेपर किसी अन्य मूर्ख तथा कायर पुरुषका आश्रय ग्रहण करोगी॥ १९।

| अ० १८ ] | पञ्चम स्कन्ध | ६२५ | | :--- | :--- |

| वचनं कुरु मे तथ्यं नारीणां परमं हितम्।<br>अकृत्वा परमं शोकं लप्स्यसे नात्र संशयः॥ २० | अतः स्त्रियोंके लिये परम हितकारी तथा सच्ची मेरी यह बात मान लो। इसे न मानकर तुम बहुत कष्ट उठाओगी; इसमें सन्देह नहीं है॥ २०॥ | | देव्युवाच<br>मन्दात्मन् गच्छ पातालं युद्धं वा कुरु साम्प्रतम्।<br>हत्वा त्वामसुरान्सर्वानामिष्यामि यथासुखम्॥ २१ | देवी बोलीं—हे मन्दबुद्धि! अब तुम पाताललोक भाग जाओ अथवा मेरे साथ युद्ध करो। मैं तुम्हें तथा सभी असुरोंको मारकर सुखपूर्वक यहाँसे चली जाऊँगी॥ २१॥ | | यदा यदा हि साधूनां दुःखं भवति दानव।<br>तदा तेषां च रक्षार्थं देहं सन्धारयाम्यहम्॥ २२ | हे दानव! जब-जब साधु पुरुषोंपर संकट आता है, तब-तब उनकी रक्षाके लिये मैं देह धारण करती हूँ॥ २२॥ | | अरूपायाश्च मे रूपमजन्मायाश्च जन्म च।<br>सुराणां रक्षणार्थाय विद्धि दैत्य विनिश्चितम्॥ २३ | हे दैत्य! वास्तवमें मैं निराकार और अजन्मा हूँ, तथापि देवताओंकी रक्षा करनेके लिये रूप और जन्म धारण करती हूँ; यह तुम निश्चित समझ लो॥ २३॥ | | सत्यं ब्रवीमि जानीहि प्रार्थिताहं सुरैः किल।<br>त्वद्वधार्थं हयारे त्वां हत्वा स्थास्यामि निश्चला॥ २४ | मैं सत्य कहती हूँ कि देवताओंने तुम्हारा वध करनेके लिये मुझसे प्रार्थना की थी। हे महिष! तुझे मारकर मैं सर्वथा निश्चिन्त हो जाऊँगी॥ २४॥ | | तस्माद्युध्यस्व वा गच्छ पातालमसुरालयम्।<br>सर्वथा त्वां हनिष्यामि सत्यमेतद् ब्रवीम्यहम्॥ २५ | अतएव अब तुम मेरे साथ युद्ध करो अथवा असुरोंकी निवासभूमि पाताललोकको चले जाओ। अब मैं तुम्हें निश्चय ही मार डालूँगी, मैं यह बिलकुल सच कह रही हूँ॥ २५॥ | | व्यास उवाच<br>इत्युक्तः स तया देव्या धनुरदाय दानवः।<br>युद्धकामः स्थितस्तत्र संग्रामाङ्गणभूमिषु॥ २६ | व्यासजी बोले—देवीके ऐसा कहनेपर महिषासुर धनुष लेकर युद्ध करनेकी इच्छासे संग्रामभूमिमें डट गया॥ २६॥ | | मुमोच तरसा बाणान्कर्णाकृष्टञ्छिलाशितान्।<br>देवी चिच्छेद तान्बाणैः क्रोधान्मुक्तैरयोमुखैः॥ २७ | वह पत्थरपर घिसकर नुकीले बनाये गये बाणोंको कानतक खींचकर बड़े वेगसे छोड़ने लगा। तब भगवतीने कुपित होकर अपने लौहमुख बाणोंसे उसके बाणोंको काट डाला॥ २७॥ | | तयोः परस्परं युद्धं सम्बभूव भयप्रदम्।<br>देवानां दानवानाञ्च परस्परजयैषिणाम्॥ २८ | अब देवी और दानव महिषमें भीषण संग्राम होने लगा। वह युद्ध अपनी-अपनी विजय चाहनेवाले देवताओं और दानवोंके लिये बड़ा भयदायक था॥ २८॥ | | मध्ये दुर्धर आगत्य मुमोच च शिलीमुखान्।<br>देवीं प्रति विषासक्तान्कोपयन्नतिदारुणान्॥ २९ | उसी समय दुर्धर नामक दैत्य बीचमें आकर भगवतीको कुपित करता हुआ उनपर अतिशय दारुण और विषैले बाणोंकी वर्षा करने लगा॥ २९॥ | | ततो भगवती क्रुद्धा तं जघान शितैः शरैः।<br>दुर्धरस्तु पपातोर्व्यां गतासुर्गिरिशृङ्गवत्॥ ३० | तब भगवतीने क्रोधित होकर उसपर तीक्ष्ण बाणोंके द्वारा प्रहार किया, जिससे दुर्धर प्राणहीन होकर पर्वतशिखरकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़ा॥ ३०॥ |

६२६ श्रीमद्देवीभागवत [अ० १८]

६२६ श्रीमद्देवीभागवत [अ० १८]


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तं तथा निहतं दृष्ट्वा त्रिनेत्रः परमास्त्रवित्।<br>आगत्य सप्तभिर्बाणैर्जघान परमेश्वरीम्॥ ३१दुर्धरको मृत देखकर शस्त्रोंका महान् ज्ञाता त्रिनेत्र रणभूमिमें आकर सात बाणोंसे भगवती परमेश्वरीपर आघात करने लगा॥ ३१॥
अनागतांस्तु चिच्छेद देवी तान्विशिखैः शरान्।<br>त्रिशूलेन त्रिनेत्रं तु जघान जगदम्बिका॥ ३२वे बाण देवीके पास पहुँच भी नहीं पाये थे कि बीचहीमें उन्होंने अपने बाणोंसे उन बाणोंको काट दिया। तत्पश्चात् जगदम्बाने अपने त्रिशूलसे त्रिनेत्रको मार डाला॥ ३२॥
अन्धकस्त्वाजगामाशु हतं दृष्ट्वा त्रिलोचनम्।<br>गदया लोहमय्याशु सिंहं विव्याध मस्तके॥ ३३<br><br>सिंहस्तु नखघातेन तं हत्वा बलवत्तरम्।<br>चखाद तरसा मांसमन्धकस्य रुषान्वितः॥ ३४तब त्रिनेत्रको मारा गया देखकर तुरंत अन्धक आ गया और उसने अपनी लौहमयी गदासे सिंहके मस्तकपर प्रहार कर दिया, किंतु सिंह क्रोधमें भरकर अपने तीक्ष्ण नखोंके प्रहारसे उस महान् बलशाली दानवका वध करके उसका मांस खाने लगा॥ ३३-३४॥
तान् रणे निहतान्वीक्ष्य दानवो विस्मयं गतः।<br>चिक्षेप तरसा बाणानतितीक्ष्णाञ्छिलाशितान्॥ ३५उन्हें रणमें मारा गया देखकर महिषासुरको बहुत आश्चर्य हुआ। अतएव वह और भी वेगके साथ अति तीक्ष्ण और पत्थरकी सानपर चढ़ाकर तीक्ष्ण किये हुए बाणोंको छोड़ने लगा॥ ३५॥
द्विधा चक्रे शरान्देवी तानप्राप्ताञ्छिलीमुखैः।<br>गदया ताडयामास दैत्यं वक्षसि चाम्बिका॥ ३६किंतु भगवतीने उन बाणोंको अपने पास पहुँचनेके पहले ही अपने बाणोंसे काटकर उनके दो टुकड़े कर दिये। इसी समय जगदम्बाने महिषासुरके वक्षपर अपनी गदासे आघात किया॥ ३६॥
स गदाभिहतो मूर्च्छामवापामरबाधकः।<br>विषह्य पीडां पापात्मा पुनरागत्य सत्वरः॥ ३७<br><br>जघान गदया सिंहं मूर्ध्नि क्रोधसमन्वितः।<br>सिंहोऽपि नखघातेन तं ददार महासुरम्॥ ३८देवताओंको दुःख देनेवाला महिष गदासे घायल होकर मूर्च्छित हो गया। किंतु उस वेदनाको सहन करके वह पापी उठ खड़ा हुआ और पुनः तुरंत आकर उसने कोपाविष्ट होकर अपनी गदासे सिंहके मस्तकपर प्रहार कर दिया। तब सिंह भी नखोंके आघातसे उस महान् असुरको विदीर्ण करने लगा॥ ३७-३८॥
विहाय पौरुषं रूपं सोऽपि सिंहो बभूव ह।<br>नखैर्विदारयामास देवीसिंहं मदोत्कटम्॥ ३९तब महिषासुरने मानवरूप त्यागकर सिंहका रूप धारण कर लिया और वह अपने नखोंसे भगवतीके मतवाले सिंहको चीरने लगा॥ ३९॥
तञ्च केसरिणं वीक्ष्य देवी क्रुद्धा हयायोमुखैः।<br>शरैर्वाकिरत्तीक्ष्णैः क्रूरैराशीविषैरिव॥ ४०उसे सिंहरूपमें देखकर भगवती क्रोधित हो उठीं और अपने लौहमुख, तीक्ष्ण, क्रूर एवं सर्पसदृश बाणोंसे उसे बींधने लगीं॥ ४०॥
त्यक्त्वा स हरिरूपं तु गजो भूत्वा मदस्रवः।<br>शैलशृङ्गं करे कृत्वा चिक्षेप चण्डिकां प्रति॥ ४१तदनन्तर सिंहरूप त्यागकर महिषासुरने मद बहाते हुए हाथीका रूप धारण करके अपनी सूँडसे एक विशाल शैलशिखर उठाकर चण्डिकापर फेंका॥ ४१॥
अ० १८ ]पञ्चम स्कन्ध६२७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
आगच्छन्तं गिरेः शृङ्गं देवी बाणैः शिलाशितैः।<br>चकार तिलशः खण्डाञ्जहास जगदम्बिका ॥ ४२उस पर्वतशिखरको आते देखकर भगवती जगदम्बाने पत्थरपर घिसकर तेज किये गये बाणोंसे उसे तिल-तिल करके काट डाला और वे बड़ी जोरसे अट्टहास करने लगीं ॥ ४२ ॥
उत्पत्य च तदा सिंहस्तस्य मूर्ध्नि व्यवस्थितः।<br>नखैर्विदारयामास महिषं गजरूपिणम् ॥ ४३उस समय देवीका सिंह उछलकर उसके मस्तकपर चढ़ बैठा और अपने तीक्ष्ण नखोंसे उस गजरूपधारी महिषको विदीर्ण करने लगा ॥ ४३ ॥
विहाय गजरूपं च बभूवाष्टापदी तथा।<br>हन्तुकामो हरिं कोपाद्दारुणो बलवत्तरः ॥ ४४अब महिषने क्रोधपूर्वक उस सिंहको मारनेके विचारसे हाथीका रूप त्यागकर अत्यन्त भीषण और बलवान् आठ पैरोंवाले शरभका रूप धारण कर लिया ॥ ४४ ॥
तं वीक्ष्य शरभं देवी खड्गेन सा रुषान्विता।<br>उत्तमाङ्गे जघानाशु सोऽपि तां प्राहरत्तदा ॥ ४५उस शरभको देखकर जगदम्बाने अतिशय क्रोधमें भरकर उसके मस्तकपर खड्गसे आघात किया। तब उसने भी भगवतीपर प्रहार किया ॥ ४५ ॥
तयोः परस्परं युद्धं बभूवातिभयप्रदम्।<br>माहिषं रूपमास्थाय शृङ्गाभ्यां प्राहरत्तदा ॥ ४६अब उन दोनोंमें महाभयंकर युद्ध होने लगा। उसी समय उसने महिषरूप धारण करके अपनी सींगोंसे देवीके ऊपर आघात किया ॥ ४६ ॥
पुच्छप्रभ्रमणेनाशु शृङ्गाघातैर्महासुरः।<br>ताडयामास तन्वङ्गीं घोररूपो भयानकः ॥ ४७विकराल रूपवाला तथा भयानक वह महान् असुर अपनी पूँछके घुमाने तथा सींगोंसे कोमल अंगोंवाली देवीपर प्रहार करने लगा ॥ ४७ ॥
पुच्छेन पर्वताञ्छृङ्गे गृहीत्वा भ्रामयन्बलात्।<br>प्रेषयामास पापात्मा प्रहसन्यरया मुदा ॥ ४८वह पापी अपनी पूँछसे पर्वतोंको सींगपर रखकर बड़े वेगसे घुमाता हुआ हँसकर अति प्रसन्नतापूर्वक भगवतीके ऊपर फेंकने लगा ॥ ४८ ॥
तामुवाच बलोन्मत्तस्तिष्ठ देवि रणाङ्गणे।<br>अद्याहं त्वां हनिष्यामि रूपयौवनभूषिताम् ॥ ४९बलसे उन्मत्त उस दानवने भगवतीसे कहा—हे देवि! ठहरो। रूप और यौवनसे सम्पन्न तुमको मैं आज मार डालूँगा ॥ ४९ ॥
मूर्खासि मदमत्ताद्य यन्मया सह सङ्गरम्।<br>करोषि मोहितातीव मृषा बलवती खरा ॥ ५०तुम मूर्ख हो जो कि मदमत्त हो मेरे साथ युद्ध कर रही हो। तुम अज्ञानवश अपनेको व्यर्थ ही बलवती समझकर मुखर हो रही हो ॥ ५० ॥
हत्वा त्वां निहनिष्यामि देवान्कपटपण्डितान्।<br>ये नारीं पुरतः कृत्वा जेतुमिच्छन्ति मां शठाः ॥ ५१तुम्हें मारनेके बाद मैं उन सब कपटपण्डित देवताओंको मार डालूँगा, जो शठ देवतागण एक स्त्रीको आगे करके मुझे जीतना चाहते हैं ॥ ५१ ॥
देव्युवाच<br>मा गर्वं कुरु मन्दात्मंस्तिष्ठ तिष्ठ रणाङ्गणे।<br>करिष्यामि निरातङ्कान्हत्वा त्वां सुरसत्तमान् ॥ ५२देवी बोलीं—अरे मूर्ख! व्यर्थ अभिमान मत करो, रणभूमिमें ठहर जाओ, ठहर जाओ। तुम्हें मारकर मैं देवताओंको निर्भय बना दूँगी ॥ ५२ ॥
पीत्वाद्य माधवीं मिष्टां शातयामि रणेऽधम।<br>देवानां दुःखदं पापं मुनीनां भयकारकम् ॥ ५३अरे अधम! मैं अभी मधुर मद्य पीकर देवताओंके लिये दुःखदायी और मुनियोंको भयभीत करनेवाले तुझ पापीको रणमें काट डालूँगी ॥ ५३ ॥

| ६२८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १८ | | :--- | :--- |

व्यास उवाचव्यासजी बोले—
इत्युक्त्वा चषकं हैमं गृहीत्वा सुरया युतम्।<br>पपौ पुनः पुनः क्रोधाद्धन्तुकामा महासुरम्॥ ५४ऐसा कहकर क्रोधपूर्वक उस दैत्यको मार डालनेके विचारसे भगवती मद्यपूर्ण सोनेका पात्र लेकर बारम्बार उसे पीने लगीं॥ ५४॥
पीत्वा द्राक्षासवं मिष्टं शूलमादाय सत्वरा।<br>दुद्राव दानवं देवी हर्षयन्देवतागणान्॥ ५५उस मीठे द्राक्षारसको पीकर भगवती बड़े वेगसे अपना त्रिशूल उठाकर देवताओंको हर्षित करती हुई उस दानवपर झपटीं॥ ५५॥
देवास्तां तुष्टुवुः प्रेम्णा चक्रुः कुसुमवर्षणम्।<br>जय जीवेति ते प्रोचुर्दुन्दुभीनाञ्च निःस्वनैः॥ ५६उस समय देवता प्रेमपूर्वक उनकी स्तुति करने लगे और पुष्पवर्षा करने लगे। वे दुन्दुभियोंकी ध्वनिके साथ देवीकी जय हो—ऐसा बार-बार कहने लगे॥ ५६॥
ऋषयः सिद्धगन्धर्वाः पिशाचोरगचारणाः।<br>किन्नराः प्रेक्ष्य संग्रामं मुदिता गगने स्थिताः॥ ५७सभी ऋषि, सिद्ध, गन्धर्व, पिशाच, नाग, चारण और किन्नरगण आकाशमण्डलमें स्थित होकर उस युद्धको देखकर आनन्दित हो रहे थे॥ ५७॥
सोऽपि नानाविधान्देहान्कृत्वा कृत्वा पुनः पुनः।<br>मायामयाञ्जघानाजौ देवीं कपटपण्डितः॥ ५८कपटकार्यमें प्रवीण वह महिषासुर रणभूमिमें बार-बार विविध प्रकारके मायामय शरीर धारण करके भगवतीपर प्रहार करने लगा॥ ५८॥
चण्डिकापि च तं पापं त्रिशूलेन बलाद्हृदि।<br>ताडयामास तीक्ष्णेन क्रोधादारुणलोचना॥ ५९तब क्रोधसे लाल नेत्र करके चण्डिकाने अपने तीक्ष्ण त्रिशूलसे उस पापीके हृदयदेशपर बलपूर्वक आघात किया॥ ५९॥
ताडितोऽसौ पपातोर्व्यां मूर्च्छामान मुहूर्तकम्।<br>पुनरुत्थाय चामुण्डां पद्भ्यां वेगादताडयत्॥ ६०<br><br>विनिहत्य पदाघातैर्जहास च मुहुर्मुहुः।<br>रुराव दारुणं शब्दं देवानां भयकारकम्॥ ६१उससे आहत होकर महिषासुर भूमिपर गिर पड़ा और मूर्च्छित हो गया, किंतु मुहूर्तभर बाद पुनः उठकर अपने पैरोंसे वेगपूर्वक देवी चामुण्डाको मारने लगा। इस प्रकार पदप्रहारोंसे देवीको चोट पहुँचाकर वह बारम्बार हँसने लगा और देवताओंको भयभीत कर देनेवाली भीषण ध्वनि करके चिल्लाने लगा॥ ६०-६१॥
ततो देवी सहस्रारं सुनाभं चक्रमत्तमम्।<br>करे कृत्वा जगादोच्चैः संस्थितं महिषासुरम्॥ ६२<br><br>पश्य चक्रं मदान्धाद्य तव कण्ठनिकृन्तनम्।<br>क्षणमात्रं स्थिरो भूत्वा यमलोकं व्रजाधुना॥ ६३तदनन्तर भगवतीने हजार अरों और सुन्दर नाभिवाला एक उत्कृष्ट चक्र हाथमें लेकर अपने समक्ष खड़े महिषासुरसे उच्च स्वरमें कहा—अरे मदान्ध! तुम्हारे गलेको काट डालनेवाले इस चक्रकी ओर देखो। तनिक देर और ठहरकर अब तुम यमलोकके लिये प्रस्थान कर दो॥ ६२-६३॥
इत्युक्त्वा दारुणं चक्रं मुमोच जगदम्बिका।<br>शिरश्छिन्नं रथाङ्गेन दानवस्य तदा रणे॥ ६४<br><br>सस्राव रुधिरं चोष्णं कण्ठनालाद् गिरेर्यथा।<br>गैरिकाद्यरुणं प्रौढं प्रवाहभिव नैर्झरम्॥ ६५ऐसा कहकर जगदम्बाने युद्धभूमिमें उस दारुण चक्रको चला दिया। तब चक्रसे उस दानवका सिर कट गया। उस समय उसके कण्ठकी नलीसे इस प्रकार उष्ण रक्त बहने लगा, जैसे गेरू आदिसे युक्त लाल पानीका झरना बड़े वेगके साथ पर्वतसे गिर रहा हो। [मस्तक कट जानेपर] उस दानवका

अ० १९] पञ्चम स्कन्ध ६२९

अ० १९] पञ्चम स्कन्ध ६२९

कबन्धस्तस्य दैत्यस्य भ्रमन्वै पतितः क्षितौ।<br>जयशब्दश्च देवानां बभूव सुखवर्धनः॥ ६६धड़ घूमता हुआ भूमिपर गिर पड़ा। उस समय देवताओंके [मुखसे] सुखकी वृद्धि करनेवाला विजयघोष होने लगा॥ ६४–६६॥
सिंहस्त्वतिबलस्तत्र पलायनपरानथ।<br>दानवान्भक्षयामास क्षुधार्त इव सङ्गरे॥ ६७अब भगवतीका महाबली सिंह मानो भूखसे व्याकुल होकर रणभूमिमें भागते हुए दानवोंको खाने लगा॥ ६७॥
मृते च महिषे क्रूरे दानवा भयपीडिताः।<br>मृतशेषाश्च ये केचित्पातालं ते ययुर्नृप॥ ६८हे नृप! क्रूर महिषासुरके मर जानेपर जो कोई दानव मरनेसे शेष बच गये थे, वे भयसे सन्त्रस्त होकर पाताल चले गये॥ ६८॥
आनन्दं परमं जग्मुर्देवास्तस्मिन्निपातिते।<br>मुनयो मानवाश्चैव ये चान्ये साधवः क्षितौ॥ ६९उसके मर जानेपर भूमण्डलपर जो भी देवता, मुनिगण, मनुष्य और साधुजन थे, वे परम आनन्दित हो गये॥ ६९॥
चण्डिकापि रणं त्यक्त्वा शुभे देशेऽथ संस्थिता।<br>देवास्तत्राययुः शीघ्रं स्तोतुकामाः सुखप्रदाम्॥ ७०भगवती चण्डिका भी रणभूमि छोड़कर एक पवित्र स्थानमें विराजमान हो गयीं। देवता भी उन सुख प्रदान करनेवाली भगवतीकी स्तुति करनेकी इच्छासे शीघ्र ही वहाँ आ पहुँचे॥ ७०॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे महिषासुरवधो नामाष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥


अथैकोनविंशोऽध्यायः

देवताओंद्वारा भगवतीकी स्तुति

व्यास उवाच<br>अथ प्रमुदिताः सर्वे देवा इन्द्रपुरोगमाः।<br>महिषं निहतं दृष्ट्वा तुष्टुवुर्जगदम्बिकाम्॥ १व्यासजी बोले—महिषासुरका संहार देखकर इन्द्र आदि प्रधान देवता परम प्रसन्न हुए और वे जगदम्बाकी स्तुति करने लगे॥ १॥
देवा ऊचुः<br>ब्रह्मा सृजत्यवति विष्णुरिदं महेशः<br>शक्त्या तवैव हरते ननु चान्तकाले।<br>ईशा न तेऽपि च भवन्ति तया विहीना-<br>स्तस्मात्त्वमेव जगतः स्थितिनाशकर्त्री॥ २देवता बोले—हे देवि! आपकी ही शक्तिसे ब्रह्मा इस जगत्का सृजन करते हैं, भगवान् विष्णु पालन करते हैं और शिवजी प्रलयकालमें संहार करते हैं। आपकी शक्तिसे रहित हो जानेपर वे कुछ भी करनेमें समर्थ नहीं हो सकते। अतः जगत्का सृजन, पालन और संहार करनेवाली आप ही हैं॥ २॥
कीर्तिर्मतिः स्मृतिगती करुणा दया त्वं<br>श्रद्धा धृतिश्च वसुधा कमलाजपा च।<br>पुष्टिः कलाथ विजया गिरिजा जया त्वं<br>तुष्टिः प्रमा त्वमसि बुद्धिरुमा रमा च॥ ३इस संसारमें कीर्ति, मति, स्मृति, गति, करुणा, दया, श्रद्धा, धृति, वसुधा, कमला, अजपा, पुष्टि, कला, विजया, गिरिजा, जया, तुष्टि, प्रमा, बुद्धि, उमा, रमा,
६३०श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १९
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
विद्या क्षमा जगति कान्तरिपीह मेधा<br>सर्वं त्वमेव विदिता भुवनत्रयेऽस्मिन्।<br>आभिर्विना तव तु शक्तिभिराशु कर्तुं<br>को वा क्षमः सकललोकनिवासभूमे॥ ४विद्या, क्षमा, कान्ति और मेधा—ये सब शक्तियाँ आप ही हैं। इस त्रिलोकीमें आप विख्यात हैं। सम्पूर्ण जगत्‌को आश्रय देनेवाली हे देवि! आपकी इन शक्तियोंके बिना कौन व्यक्ति कुछ भी स्वयं कर सकनेमें समर्थ है?॥ ३-४॥
त्वं धारणा ननु न चेदसि कूर्मनागौ<br>धर्तुं क्षमौ कथमिलामपि तौ भवेताम्।<br>पृथ्वी न चेत्त्वमसि वा गगने कथं स्था-<br>स्यत्येतदम्ब निखिलं बहुभारयुक्तम्॥ ५हे अम्ब! धारणा शक्ति भी निश्चितरूपसे आप ही हैं, अन्यथा कच्छप और शेषनाग इस पृथ्वीको धारण कर सकनेमें कैसे समर्थ हो पाते? पृथ्वी-शक्ति भी आप ही हैं। यदि आप इस रूपमें न होतीं तो प्रचुर भारसे सम्पन्न यह सम्पूर्ण जगत् आकाशमें कैसे ठहर सकता था॥ ५॥
ये वा स्तुवन्ति मनुजा अमरान्विमूढा<br>मायागुणैस्तव चतुर्मुखविष्णुरुद्रान्।<br>शुभ्रांशुवह्लियमवायुगणेशमुख्यान्<br>किं त्वामृते जननि ते प्रभवन्ति कार्ये॥ ६हे जननि! जो मनुष्य मायाके गुणोंसे प्रभावित होकर ब्रह्मा, विष्णु, महेश, चन्द्रमा, अग्नि, यम, वायु, गणेश आदि प्रमुख देवताओंकी स्तुति करते हैं, वे अज्ञानी ही हैं; क्योंकि क्या वे देवता भी आपकी कृपाशक्तिके बिना उन मनुष्योंको कार्य-फल प्रदान करनेमें समर्थ हो सकते हैं?॥ ६॥
ये जुह्वति प्रविततेऽल्पधियोऽम्ब यज्ञे<br>वह्लौ सुरान्समधिकृत्य हविः समृद्धम्।<br>स्वाहा न चेत्त्वमसि ते कथमापुरुद्धा<br>त्वामेव किं न हि यजन्ति ततो हि मूढाः॥ ७हे अम्ब! जो लोग सुविस्तृत यज्ञमें देवताओंको अधिकृत करके अग्निमें पुष्कल आहुति देते हैं, वे मन्दमति हैं; क्योंकि यदि स्वाहाके रूपमें आप न होतीं, तो वे देवता हविर्द्रव्यको कैसे पाते? तब फिर वे मूढ़ आपका ही यजन क्यों नहीं करते?॥ ७॥
भोगप्रदासि भवतीह चराचराणां<br>स्वांशैर्ददासि खलु जीवनमेव नित्यम्।<br>स्वीयान्सुराञ्जननि पोषयसीह यद्व-<br>त्तद्वत्परानपि च पालयसीति हेतोः॥ ८आप जगत्के चराचर प्राणियोंको भोग प्रदान करती हैं और अपने अंशोंसे उन्हें नित्य जीवन देती हैं। हे जननि! जिस प्रकार आप अपने प्रिय देवताओंका पोषण करती हैं, उसी प्रकार अपने शत्रुओंका भी पालन करती हैं॥ ८॥
मातः स्वयं विरचितान्विपिने विनोदा-<br>द्वन्ध्यान्पलाशलहितांश्च कटूंश्च वृक्षान्।<br>नोच्छेदयन्ति पुरुषा निपुणाः कथञ्चि-<br>त्तस्मात्त्वमप्यतितरां परिपासि दैत्यान्॥ ९हे माता! बुद्धिमान् पुरुष विनोदके लिये उद्यानमें लगाये गये वृक्षोंमेंसे कुछ वृक्षोंके फल और पत्तोंसे रहित हो जाने अथवा उन वृक्षोंका रस कडुवा निकल जानेपर भी उन्हें कभी भी नहीं काटते, उसी प्रकार आप भी [अपने ही बनाये हुए] दैत्योंकी भलीभाँति रक्षा करती हैं॥ ९॥
यत्त्वं तु हंसि रणमूर्धिन शरैरराती-<br>न्देवाङ्गनासुरतकेलिमतीन्विदित्वा ।<br>देहान्तरेऽपि करुणारसमाददाना<br>तत्ते चरित्रमिदमीप्सितपूरणाय॥ १०करुणारससे ओत-प्रोत हृदयवाली आप रणभूमिमें बाणोंद्वारा शत्रुओंका जो संहार करती हैं, वह भी उनका मनोरथ पूर्ण करनेके लिये ही होता है; क्योंकि दूसरे जन्ममें देवांगनाओंके साथ क्रीड़ा-विहार करनेकी इच्छावाला उन्हें जानकर ही आपके द्वारा ऐसा किया जाता है; ऐसा आपका अद्भुत चरित्र है॥ १०॥

अ० १९] पञ्चम स्कन्ध ६३१

अ० १९] पञ्चम स्कन्ध ६३१


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
चित्रं त्वमी यदसुभी रहिता न सन्ति<br>त्वच्चिन्तितेन दनुजाः प्रथितप्रभावाः।<br>येषां कृते जननि देहनिबन्धनं ते<br>क्रीडारसस्तव न चान्यतरोऽत्र हेतुः ॥ ११हे माता! बड़ी विलक्षण बात तो यह है कि विख्यात प्रभावोंवाले उन दैत्योंका संहार जो आपके संकल्पमात्रसे ही सम्भव था, इसके लिये आपको अवतार लेना पड़ा। यह शरीर धारण करके आप वास्तवमें इसीके सहारे लीला करती हैं; इसमें कोई दूसरा कारण नहीं है ॥ ११ ॥
प्राप्ते कलावहह दुष्तरे च काले<br>न त्वां भजन्ति मनुजा ननु वञ्चितास्ते।<br>धूर्तैः पुराणचतुरैर्हरिशङ्कराणां<br>सेवापराश्च विहितास्तव निर्मितानाम् ॥ १२जो मनुष्य इस विकराल कलिके उपस्थित होनेपर भी आपकी आराधना नहीं करते, अपितु आपके ही द्वारा निर्मित विष्णु, शिव आदि देवताओंकी उपासनामें तत्पर रहते हैं, वे लोग पुराण-चतुर धूर्तजनोंके द्वारा निश्चित रूपसे ठग लिये गये हैं ॥ १२ ॥
ज्ञात्वा सुरांस्तव वशानसुरादितांश्च<br>ये वै भजन्ति भुवि भावयुता विभग्नान्।<br>धृत्वा करे सुविमलं खलु दीपकं ते<br>कूपे पतन्ति मनुजा विजलेऽतिघोरे ॥ १३यह जानकर भी कि देवता आपके अधीन हैं तथा दैत्योंके द्वारा छिन्न-भिन्न और प्रताड़ित किये जाते हैं—जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक भूलोकमें अन्य देवताओंकी उपासना करते हैं, वे मानो हाथमें अत्यन्त प्रकाशमान दीपक लेकर भी किसी जलरहित भयानक कूपमें जा गिरते हैं ॥ १३ ॥
विद्या त्वमेव सुखदाऽसुखदाप्यविद्या<br>मातस्त्वमेव जननार्तिहरा नराणाम्।<br>मोक्षार्थिभिस्तु कलिता किल मन्दधीभि-<br>र्नाराधिता जननि भोगपरैस्तथाज्ञैः ॥ १४हे माता! आप ही सुखदायिनी विद्या तथा दुःखदायिनी अविद्या हैं और आप ही मनुष्योंके जन्म-मृत्युका दुःख दूर करनेवाली हैं। हे जननि! मोक्षकी कामना करनेवाले लोग तो आपकी आराधना करते हैं, किंतु मन्दबुद्धि अज्ञानी तथा विषयभोगपरायण मनुष्य आपकी आराधना नहीं करते ॥ १४ ॥
ब्रह्मा हरश्च हरिरप्यनिशं शरण्यं<br>पादाम्बुजं तव भजन्ति सुरास्तथान्ये।<br>तद्वै न येऽल्पमतयो मनसा भजन्ति<br>भ्रान्ताः पतन्ति सततं भवसागरे ते ॥ १५ब्रह्मा, विष्णु, महेश तथा अन्य देवतागण आपके शरणदायक चरणकमलकी निरन्तर उपासना करते हैं, किंतु जो अल्पबुद्धि मनुष्य भ्रमित होकर मनसे आपकी आराधना नहीं करते, वे संसार-सागरमें बार-बार गिरते हैं ॥ १५ ॥
चण्डि त्वदङ्घ्रिजलजोत्थरजःप्रसादै-<br>र्ब्रह्मा करोति सकलं भुवनं भवादौ।<br>शौरिश्च पाति खलु संहरते हरस्तु<br>त्वां सेवते न मनुजस्त्विह दुर्भगोऽसौ ॥ १६हे चण्डिके! आपके चरण-कमलसे उत्पन्न हुई धूलिके प्रभावसे ही ब्रह्मा सृष्टिके प्रारम्भमें सम्पूर्ण भुवनकी रचना करते हैं, विष्णु पालन करते हैं और शिवजी संहार करते हैं। इस लोकमें जो मनुष्य आपकी उपासना नहीं करता, वह अभागा है ॥ १६ ॥
वाग्देवता त्वमसि देवि सुरासुराणां<br>वक्तुं न तेऽमरवराः प्रभवन्ति शक्ताः।<br>त्वं चेन्मुखे वससि नैव यदैव तेषां<br>यस्माद्वदन्ति मनुजा न हि तद्विहीनाः ॥ १७हे देवि! आप ही देवताओं तथा दैत्योंकी वाग्देवता हैं। यदि आप मुखमें विराजमान न रहतीं, तो बड़े-बड़े देवता भी बोलनेमें समर्थ नहीं हो सकते थे। मुख होनेपर भी मनुष्य उस वाक्शक्तिके बिना बोल नहीं सकता ॥ १७ ॥
६३२श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १९
श्लोकअर्थ
शप्तो हरिस्तु भृगुणा कुपितेन कामं<br>मीनो बभूव कमठः खलु सूकरस्तु।<br>पश्चान्नृसिंह इति यश्छलकृद्धरायां<br>तान्सेवतां जननि मृत्युभयं न किं स्यात्॥ १८हे जननि! महर्षि भृगुने कुपित होकर भगवान् विष्णुको शाप दे दिया, जिससे उन्हें पृथ्वीपर बारम्बार मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह और छली वामनका अवतार लेना पड़ा। तो फिर [एक ऋषिके शापसे अपनी रक्षा न कर पानेवाले ऐसे विष्णु आदि] उन देवताओंकी उपासना करनेवाले लोगोंको मृत्युका भय क्यों नहीं बना रहेगा?॥ १८॥
शम्भोः पपात भुवि लिङ्गमिदं प्रसिद्धं<br>शापेन तेन च भृगोर्विपिने गतस्य।<br>तं ये नरा भुवि भजन्ति कपालिनं तु<br>तेषां सुखं कथमहापि परत्र मातः॥ १९हे माता! सम्पूर्ण संसारमें यह बात प्रसिद्ध है कि भृगुमुनिके काननमें गये हुए भगवान् शिवका लिंग मुनिके शापके कारण कटकर पृथ्वीपर गिर पड़ा था। अतः जो मनुष्य पृथ्वीपर उन कापालिक शिवको ही भजते हैं, उन्हें इस लोक तथा परलोकमें भी सुख कैसे प्राप्त हो सकता है?॥ १९॥
योऽभूद् गजाननगणाधिपतिर्महेशा-<br>त्तं ये भजन्ति मनुजा वितथप्रपन्नाः।<br>जानन्ति ते न सकलार्थफलप्रदात्रीं<br>त्वां देवि विश्वजननीं सुखसेवनीयाम्॥ २०शिवसे जो गणोंके अधिपति गणेश उत्पन्न हुए हैं—उन गणेशको जो लोग भजते हैं, उनकी यह शरणागति व्यर्थ है। हे देवि! वे लोग सभी प्रकारके अभीष्ट फल प्रदान करनेवाली तथा सुखपूर्वक आराधनीय आप जगज्जननीको नहीं जानते हैं॥ २०॥
चित्रं त्वयारिजनतापि दयार्द्रभावा-<br>द्धत्वा रणे शितशरैर्गमिता द्युलोकम्।<br>नोचेत्स्वकर्मनिचिते निरये नितान्तं<br>दुःखातिदुःखगतिमापदमापतेत्सा ॥ २१यह बड़ी विचित्र बात है कि आपने अपने शत्रु-दैत्योंपर भी दया करके उन्हें तीक्ष्ण बाणोंसे रणमें मारकर स्वर्गलोक भेज दिया। यदि आप ऐसा न करतीं तो वे अपने कर्मोंके परिणामस्वरूप प्राप्त होनेवाले घोर नरकमें बड़े-से-बड़े दुःख और विपत्तिमें पड़ जाते॥ २१॥
ब्रह्मा हरश्च हरिरप्युत गर्वभावा-<br>ज्जानन्ति तेऽपि विबुधा न तव प्रभावम्।<br>केऽन्ये भवन्ति मनुजा विदितुं समर्थाः<br>सम्मोहितास्तव गुणैरमितप्रभावैः॥ २२जब ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि देवता भी अहंकारके कारण आपकी महिमा नहीं जानते, तब आपके अमित प्रभाववाले गुणोंसे मोहित तुच्छ मनुष्य आपकी महिमाको कैसे जान सकेंगे?॥ २२॥
क्लिश्यन्ति तेऽपि मुनयस्तव दुर्विभाव्यं<br>पादाम्बुजं न हि भजन्ति विमूढचित्ताः।<br>सूर्याग्निसेवनपराः परमार्थतत्त्वं<br>ज्ञातं न तैः श्रुतिशतैरपि वेदसारम्॥ २३जो मुनिगण आपके स्वरूपको बड़ी कठिनतासे ध्यानमें आनेवाला समझकर आपके चरणकमलकी उपासना नहीं करते; अपितु सूर्य, अग्नि आदिकी उपासनामें लगे रहते हैं, वे मूढ़बुद्धि अनेकविध कष्ट पाते हैं। समस्त श्रुतियोंके द्वारा प्रतिपादित वेदसारस्वरूप परमार्थतत्त्वको वे नहीं जान पाते॥ २३॥

* इस पुराणमें जगदम्बा पराशक्तिकी विशिष्टता प्रदर्शित करनेके लिये ही अन्य देवोंकी उपासनासे विरत रहनेकी बात कही गयी है। वैसे तो भगवती एवं ब्रह्मा-विष्णु-महेश आदि देवगण भी परमात्मप्रभुके ही स्वरूप हैं; उनमें कोई भेद नहीं है।

अ० १९ ]पञ्चम स्कन्ध६३३

| मन्ये गुणास्तव भुवि प्रथितप्रभावाः<br>कुर्वन्ति ये हि विमुखान्ननु भक्तिभावात्।<br>लोकान्स्वबुद्धिरचितैर्विविधागमैश्च<br>विष्ण्वीशभास्करगणेशपरान्विधाय ॥ २४ | मैं तो यही समझता हूँ कि अद्भुत प्रभावोंवाले जो आपके सत्त्व, रज और तम गुण हैं, वे ही मनुष्योंको उन्हींकी अपनी ही बुद्धिद्वारा विरचित अनेक प्रकारके शास्त्रोंमें उलझाकर उन्हें विष्णु, शिव, सूर्य, गणेश आदिका उपासक बनाकर आपके भक्तिभावसे सर्वथा विमुख कर देते हैं॥ २४॥ | | कुर्वन्ति ये तव पदाद्विमुखान्नराग्या-<br>न्स्वोक्तागमैर्हरिहरार्चनभक्तियोगैः ।<br>तेषां न कुप्यसि दयां कुरुषेऽम्बिके त्वं<br>तान्मोहमन्त्रनिपुणान्प्रथयस्यलं च॥ २५ | हे अम्बिके! जो लोग विष्णु तथा शिवकी पूजा और भक्तिसे परिपूर्ण शास्त्रोंके उपदेशद्वारा ब्राह्मणोंको आपके चरणोंसे विमुख कर देते हैं, उनके ऊपर भी आप क्रोध नहीं करती हैं, बल्कि दया ही करती हैं और इसके अतिरिक्त मोहन आदि मन्त्रोंके ज्ञाताओंको भी आप संसारमें बहुत प्रसिद्ध बना देती हैं॥ २५॥ | | तुर्ये युगे भवति चातिबलं गुणस्य<br>तुर्यस्य तेन मथितान्यसदागमानि।<br>त्वां गोपयन्ति निपुणाः कवयः कलौ वै<br>त्वत्कल्पितान्सुरगणानपि संस्तुवन्ति॥ २६ | सत्ययुगमें सत्त्वगुणकी प्रबलता रहती है, अतः उस युगमें असत्-शास्त्रोंपर आस्था नहीं हो पाती। किंतु कलिमें तो कवित्वके अभिमानी लोग आपकी उपेक्षा करते हैं और आपहीके द्वारा बनाये गये देवताओंकी स्तुति करते हैं॥ २६॥ | | ध्यायन्ति मुक्तिफलदां भुवि योगसिद्धां<br>विद्यां पराञ्च मुनयोऽतिविशुद्धसत्त्वाः।<br>ते नाप्नुवन्ति जननीजठरे तु दुःखं<br>धन्यास्त एव मनुजास्त्वयि ये विलीनाः॥ २७ | इस पृथवीतलपर अत्यन्त शुद्ध अन्तःकरणवाले जो सात्त्विक मुनिगण मुक्ति-फल प्रदान करनेवाली योगसिद्धा एवं पराविद्यास्वरूपिणी आप भगवतीका ध्यान करते हैं, वे पुनः माताके गर्भमें आकर कष्ट नहीं पाते। जो मनुष्य आपमें ध्यानमग्न हैं, वे धन्य हैं॥ २७॥ | | चिच्छक्तिरस्ति परमात्मनि येन सोऽपि<br>व्यक्तो जगत्सु विदितो भवकृत्यकर्ता।<br>कोऽन्यस्त्वया विरहितः प्रभवत्यमुष्मिन्<br>कर्तुं विहर्तुमपि सञ्चलितुं स्वशक्त्या॥ २८ | आप चित्-शक्ति हैं और वही चित्-शक्ति परमात्मामें विद्यमान है, जिसके कारण वे भी [नाम और रूपसे] अभिव्यक्त होकर इस जगत्के सृजन, पालन एवं संहाररूपी कार्योंके कर्ताके रूपमें लोकोंमें प्रसिद्ध होते हैं। उन परमात्माके अतिरिक्त दूसरा कौन है, जो आपसे रहित होकर अपनी शक्तिसे इस जगत्का सृजन, पालन और संहार करनेमें समर्थ हो सकता है?॥ २८॥ | | तत्त्वानि चिद्विरहितानि जगद्विधातुं<br>किं वा क्षमाणि जगदम्ब यतो जडानि।<br>किं चेन्द्रियाणि गुणकर्मयुतानि सन्ति<br>देवि त्वया विरहितानि फलं प्रदातुम्॥ २९ | हे जगदम्बे! क्या चित्-शून्य तत्त्व जगत्की रचना करनेमें समर्थ हो सकते हैं? चूंकि तत्त्व जड़ हैं, अतः वे जगत्की रचनामें समर्थ नहीं हैं। हे देवि! यद्यपि इन्द्रियाँ गुण तथा कर्मसे युक्त हैं, फिर भी आपसे रहित होकर क्या वे फल प्रदान कर सकती हैं?॥ २९॥ |

६३४श्रीमद्देवीभागवत[ अ० १९

| देवा मखेष्वपि हुतं मुनिभिः स्वभागं<br>गृहीयुरम्ब विधिवत्प्रतिपादितं किम्।<br>स्वाहा न चेत्त्वमसि तत्र निमित्तभूता<br>तस्मात्त्वमेव ननु पालयसीव विश्वम्॥ ३० | हे माता! यदि आप यज्ञोंमें 'स्वाहा' के रूपमें निमित्त न बनतीं तो क्या देवगण उन यज्ञोंमें मुनियोंके द्वारा विधिवत् प्रदत्त आहुति-रूप यज्ञभाग प्राप्त करते? अतः यह निश्चय हो गया कि आप ही विश्वका पालन करती हैं॥ ३०॥ | | सर्वं त्वयेदमखिलं विहितं भवादौ<br>त्वं पासि वै हरिहरप्रमुखान्दिगीशान्।<br>कालेऽत्सि विश्वमपि ते चरितं भवाद्यं<br>जानन्ति नैव मनुजाः क्व नु मन्दभाग्याः॥ ३१ | सृष्टिके प्रारम्भमें इस सम्पूर्ण जगत्की रचना आपने ही की है, आप ही विष्णु-शिव आदि प्रमुख देवताओं तथा दिक्पालोंकी रक्षा करती हैं और प्रलयकालमें आप ही सम्पूर्ण विश्वको अपनेमें विलीन कर लेती हैं। [हे देवि!] जब ब्रह्मा आदि देवता भी आपके आद्य चरित्रको नहीं जान पाते, तब मन्दभाग्य हम देवता उसे कैसे जान सकते हैं?॥ ३१॥ | | हत्वासुरं महिषरूपधरं महोग्रं<br>मातस्त्वया सुरगणः किल रक्षितोऽयम्।<br>कां ते स्तुतिं जननि मन्दधियो विदामो<br>वेदा गतिं तव यथार्थतया न जग्मुः॥ ३२ | हे माता! आपने महिषका रूप धारण करनेवाले अत्यन्त उग्र असुरका वध करके इस देवसमुदायकी रक्षा की है। हे जननि! जब वेद भी यथार्थरूपसे आपकी गतिको नहीं जान पाये, तब हम मन्दबुद्धि देवता उसे कैसे जान सकते हैं, हम कैसे आपकी स्तुति करें?॥ ३२॥ | | कार्यं कृतं जगति नो यदसौ दुरात्मा<br>वैरी हतो भुवनकण्टकदुर्विभाव्यः।<br>कीर्तिः कृता ननु जगत्सु कृपा विधेया-<br>प्यस्मांश्च पाहि जननि प्रथितप्रभावे॥ ३३ | विख्यात प्रभाववाली हे जननि! आपने जगत्में महान् कार्य किया है जो कि आपने संसारके अचिन्त्य कण्टकस्वरूप हमारे शत्रु दुरात्मा महिषासुरका वध कर दिया। ऐसा करके आपने सम्पूर्ण लोकोंमें अपनी कीर्ति स्थापित कर दी है, अब आप सारे संसारपर अनुग्रह करें और हमारी रक्षा करें॥ ३३॥ | | व्यास उवाच<br>एवं स्तुता सुरैर्देवी तानुवाच मृदुस्वरा।<br>अन्यत्कार्यं च दुःसाध्यं ब्रुवन्तु सुरसत्तमाः॥ ३४<br><br>यदा यदा हि देवानां कार्यं स्यादतिदुर्घटम्।<br>स्मर्तव्याहं तदा शीघ्रं नाशयिष्यामि चापदम्॥ ३५ | व्यासजी बोले— इस प्रकार देवताओंके स्तुति करनेपर देवीने मधुर स्वरमें उनसे कहा—हे श्रेष्ठ देवतागण! इसके अतिरिक्त भी कोई दुःसाध्य कार्य हो तो उसे आपलोग बता दीजिये। जब-जब आप देवताओंके सामने कोई महान् दुःसाध्य कार्य उपस्थित हो, तब-तब आपलोग मेरा स्मरण कीजियेगा; मैं उस संकटको शीघ्र ही दूर कर दूँगी॥ ३४-३५॥ | | देवा ऊचुः<br>सर्वं कृतं त्वया देवि कार्यं नः खलु साम्प्रतम्।<br>यदयं निहतः शत्रुरस्माकं महिषासुरः॥ ३६ | देवता बोले— हे देवि! इस समय आपने हमारा सारा कार्य पूर्ण कर दिया है जो कि आपके द्वारा हमारा शत्रु यह महिषासुर मार डाला गया॥ ३६॥ |

अ० २० ]पञ्चम स्कन्ध६३५
स्मरिष्यामो यथा तेऽम्ब सदैव पदपङ्कजम्।<br>तथा कुरु जगन्मातर्भक्तिं त्वय्यप्यचञ्चलाम्॥ ३७हे अम्ब! हे जगज्जननि! अब आप हमारे मनमें अपने प्रति ऐसी अविचल भक्ति स्थापित कीजिये कि हम सदा आपके चरण-कमलका स्मरण करते रहें॥ ३७॥
अपराधसहस्राणि मातैव सहते सदा।<br>इति ज्ञात्वा जगद्योनिं न भजन्ते कुतो जनाः॥ ३८माता ही [अपनी सन्तानके] हजारों अपराध सह सकती है—ऐसा समझकर लोग जगत्‌की उत्पत्तिस्वरूपा भगवतीकी उपासना क्यों नहीं करते?॥ ३८॥
द्वौ सुपर्णौ तु देहेऽस्मिंस्तयोः सख्यं निरन्तरम्।<br>नान्यः सखा तृतीयोऽस्ति योऽपराधं सहेत हि॥ ३९<br><br>तस्माज्जीवः सखायं त्वां हित्वा किं नु करिष्यति।<br>पापात्मा मन्दभाग्योऽसौ सुरमानुषयोनिषु॥ ४०<br><br>प्राप्य देहं सुदुष्प्रापं न स्मरेत्त्वां नराधमः।<br>मनसा कर्मणा वाचा ब्रूमः सत्यं पुनः पुनः॥ ४१इस देहरूपी वृक्षपर जीवात्मा और परमात्मारूपी दो पक्षी रहते हैं। उन दोनोंमें सर्वदा मित्रता बनी रहती है, किंतु उनका तीसरा सखा ऐसा कोई भी नहीं है, जो अपराधको सह सके। अतएव यह जीव आप-जैसे मित्रको त्यागकर क्या करेगा? देवताओं और मानवोंकी योनिमें वह प्राणी पापी, मन्दभागी और अधम है, जो अत्यन्त दुर्लभ देह पाकर भी आपका स्मरण नहीं करता॥ ३९-४० १/२॥
सुखे वाप्यथवा दुःखे त्वं नः शरणमद्भुतम्।<br>पाहि नः सततं देवि सर्वैस्तव वरायुधैः॥ ४२<br><br>अन्यथा शरणं नास्ति त्वत्पादाम्बुजरेणुतः।हम मन, वाणी और कर्मसे बार-बार यह सत्य कह रहे हैं कि सुख अथवा दुःख—प्रत्येक परिस्थितिमें एकमात्र आप ही हमारे लिये अद्भुत शरण हैं। हे देवि! आप अपने समस्त श्रेष्ठ आयुधोंद्वारा हमारी निरन्तर रक्षा करें। आपके चरणकमलोंकी धूलिको छोड़कर हमारे लिये कोई दूसरा शरण नहीं है॥ ४१-४२ १/२॥
व्यास उवाच<br>एवं स्तुता सुरैर्देवी तत्रैवान्तरधीयत।<br>विस्मयं परमं जग्मुर्देवास्तां वीक्ष्य निर्गताम्॥ ४३व्यासजी बोले— इस प्रकार देवताओंके स्तुति करनेपर भगवती जगदम्बा वहीं अन्तर्धान हो गयीं। तब उन्हें अन्तर्हित देखकर देवता बड़े विस्मयमें पड़ गये॥ ४३॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे देवीसान्त्वनं नामैकोनविंशोऽध्यायः॥ १९॥


अथ विंशोऽध्यायः

देवीका मणिद्वीप पधारना तथा राजा शत्रुघ्नका भूमण्डलाधिपति बनना

जनमेजय उवाच<br>अथाद्भुतं वीक्ष्य मुने प्रभावं<br>देव्या जगच्छान्तिकरं परञ्च।<br>न तृप्तिरस्ति द्विजवर्य शृण्वतः<br>कथामृतं ते मुखपद्मजातम्॥ १जनमेजय बोले— हे मुने! अब मैंने भगवतीके अत्यन्त अद्भुत तथा जगत्‌को शान्ति प्रदान करनेवाले प्रभावको तो देख लिया, फिर भी हे द्विजवर! आपके मुखारविन्दसे निकली हुई सुधामयी कथाको बार-बार

६३६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २०

६३६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २०

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अन्तर्हितायां च तदा भवान्यां<br>चक्रुश्च किं देवपुरोगमास्ते।<br>देव्याश्चरित्रं परमं पवित्रं<br>दुरापमेवाल्पपुण्यैर्नराणाम् ॥ २सुनते हुए भी मुझे तृप्ति नहीं हो रही है। [अब आप बतायें] भगवतीके अन्तर्धान हो जानेपर उन प्रधान देवताओंने क्या किया? देवीका यह परम पावन चरित्र मनुष्योंके अल्प पुण्योंसे प्राप्त हो सकना सर्वथा दुर्लभ ही है॥ १-२॥
कस्तृप्तिमाप्नोति कथामृतेन<br>भिन्नोऽल्पभाग्यात्पटुकर्णरन्ध्रः।<br>पीतेन येनामरतां प्रयाति<br>धिक्तान्नरान् ये न पिबन्ति सादरम्॥ ३अल्पभाग्यवाले मनुष्यको छोड़कर भगवतीके कथाश्रवणमें सदा तत्पर कर्णपुटवाला ऐसा कौन होगा जो देवीके कथामृतसे तृप्ति प्राप्त कर लेता है? जिस कथामृतका पान करनेसे मनुष्य अमरत्व प्राप्त कर लेता है, उसे जो आदरपूर्वक नहीं पीते, उन मनुष्योंको धिक्कार है॥ ३॥
लीलाचरित्रं जगदम्बिकाया<br>रक्षान्वितं देवमहामुनीनाम्।<br>संसारवार्धेस्तरणं नराणां<br>कथं कृतज्ञा हि परित्यजेयुः॥ ४भगवती जगदम्बाका लीलाचरित्र देवताओं और बड़े-बड़े मुनियोंके लिये भी रक्षाका परम साधन है। [यह लीलाचरित्र] मनुष्योंको संसारसागरसे पार करनेके लिये एक नौका है। कृतज्ञजन उस चरित्रको भला कैसे त्याग सकते हैं?॥ ४॥
मुक्ताश्च ये चैव मुमुक्षवश्च<br>संसारिणो रोगयुताश्च केचित्।<br>तेषां सदा श्रोत्रपुटैश्च पेयं<br>सर्वार्थदं वेदविदो वदन्ति॥ ५<br><br>तथा विशेषेण मुने नृपाणां<br>धर्मार्थकामेषु सदा रतानाम्।<br>मुक्ताश्च यस्मात्खलु तत्पिबन्ति<br>कथं न पेयं रहितैश्च तेभ्यः॥ ६जीवन्मुक्त तथा मोक्षकी कामना करनेवाले अथवा रोगग्रस्त जो कोई भी सांसारिक प्राणी हों, उन सबको चाहिये कि वे अपने कर्णपुटसे भगवतीके इस सर्वार्थदायक कथामृतका पान करते रहें—ऐसा वेदवेत्ता कहते हैं। हे मुने! धर्म, अर्थ और काममें तत्पर राजाओंको तो विशेष रूपसे कथामृतका पान करना चाहिये। जब मुक्त प्राणीतक उस कथामृतका पान करते हैं, तब मुक्तिसे वंचित जन इसका पान क्यों न करें!॥ ५-६॥
यैः पूजिता पूर्वभवे भवानी<br>सत्कुन्दपुष्पैरथ चम्पकैश्च।<br>बैल्वैर्दलैस्ते भुवि भोगयुक्ता<br>नृपा भवन्तीत्यनुमेयमेवम्॥ ७यह अनुमान करना चाहिये कि जिन लोगोंने अपने पूर्वजन्ममें सुन्दर कुन्दपुष्पों, चम्पाके पुष्पों तथा बिल्वपत्रोंसे भगवतीका पूजन किया है, वे ही इस जन्ममें भूतलपर भोग तथा ऐश्वर्यसे सम्पन्न राजा होते हैं॥ ७॥
ये भक्तिहीनाः समवाप्य देहं<br>तं मानुषं भारतभूमिभागे।<br>यैरार्चिता ते धनधान्यहीना<br>रोगान्विताः सन्ततिवर्जिताश्च॥ ८जो मनुष्य [पवित्र] भारत-भूभागमें यह मानवशरीर पाकर भी भगवतीकी भक्तिसे रहित हैं तथा जिन्होंने उनकी आराधना नहीं की, वे सदा धन-धान्यसे हीन, रोगग्रस्त और निःसन्तान रहते हैं; साध्
अ० २० ]पञ्चम स्कन्ध६३७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
भ्रमन्ति नित्यं किल दासभूता<br>आज्ञाकराः केवलभारवाहाः।<br>दिवानिशं स्वार्थपराः कदापि<br>नैवाप्नुवन्त्योदरपूर्तिमात्रम् ॥ ९ही वे लोग दूसरोंके दास बनकर निरन्तर घूमते रहते हैं और आज्ञाकारी होकर दूसरोंका भार ढोया करते हैं। वे दिन-रात स्वार्थसाधनमें लगे रहते हैं, फिर भी उन्हें अपना पेट भरनेतकके लिये अन्न कभी नहीं मिलता॥ ८-९॥
अन्धाश्च मूका बधिराश्च खञ्जाः<br>कुष्ठान्विता ये भुवि दुःखभाजः।<br>तत्रानुमानं कविभिर्विधेयं<br>नाराधिता तैः सततं भवानी॥ १०इस संसारमें जो लोग अन्धे, गूँगे, बहरे, लूले और कोढ़ीके रूपमें कष्ट भोग रहे हैं, उनके विषयमें विद्वानोंको यह अनुमान कर लेना चाहिये कि उन्होंने भगवतीकी निरन्तर आराधना नहीं की है॥ १०॥
ये राजभोगान्वितऋद्धिपूर्णाः<br>संसेव्यमाना बहुभिर्मनुष्यैः।<br>दृश्यन्ति ये वा विभवैः समेता-<br>स्तैः पूजिताम्बेत्यनुमेयमेव॥ ११जो लोग राजोचित भोगसे युक्त, ऐश्वर्यसे सम्पन्न, अनेक मनुष्योंसे सेवित और वैभवशाली दिखायी पड़ते हैं, उनके विषयमें यह अनुमान लगाना चाहिये कि उन्होंने अवश्य ही जगदम्बाकी उपासना की है॥ ११॥
तस्मात्सत्यवतीसूनो देव्याश्चरितमुत्तमम्।<br>कथयस्व कृपां कृत्वा दयावानसि साम्प्रतम्॥ १२अतएव हे सत्यवतीनन्दन! अब आप कृपा करके भगवतीके उत्तम चरित्रका वर्णन कीजिये; आप बड़े दयालु हैं॥ १२॥
हत्वा तं महिषं पापं स्तुता सम्पूजिता सुरैः।<br>क्व गता सा महालक्ष्मीः सर्वतेजःसमुद्भवा॥ १३उस पापी महिषासुरका वध करनेके पश्चात् देवताओंसे भलीभाँति पूजित होकर सभी देवताओंके तेजसे प्रादुर्भूत वे भगवती महालक्ष्मी कहाँ चली गयीं?॥ १३॥
कथितं ते महाभाग गतान्तर्धानमाशु सा।<br>स्वर्गे वा मृत्युलोके वा संस्थिता भुवनेश्वरी॥ १४<br><br>लयं गता वा तत्रैव वैकुण्ठे वा समाश्रिता।<br>अथवा हेमशैले सा तत्त्वतो मे वदाधुना॥ १५हे महाभाग! आपने अभी कहा है कि वे तुरंत अन्तर्धान हो गयीं। स्वर्गलोक अथवा मृत्युलोक किस जगह वे भगवती भुवनेश्वरी प्रतिष्ठित हुईं? वे वहींपर विलीन हो गयीं या वैकुण्ठधाममें विराजने लगीं अथवा वे सुमेरुपर्वतपर विराजमान हुईं, अब आप मुझे यह सब यथार्थरूपमें बतायें॥ १४-१५॥
व्यास उवाच<br>पूर्वं मया ते कथितं मणिद्वीपं मनोहरम्।<br>क्रीडास्थानं सदा देव्या वल्लभं परमं स्मृतम्॥ १६<br><br>यत्र ब्रह्मा हरिः स्थाणुः स्त्रीभावं ते प्रपेदिरे।<br>पुरुषत्वं पुनः प्राप्य स्वानि कार्याणि चक्रिरे॥ १७<br><br>यः सुधासिन्धुमध्येऽस्ति द्वीपः परमशोभनः।<br>नानारूपैः सदा तत्र विहारं कुरुतेऽम्बिका॥ १८व्यासजी बोले—[हे राजन्!] इसके पहले मैं आपसे रमणीय मणिद्वीपका वर्णन कर चुका हूँ। वह भगवतीका क्रीडास्थल है तथा उनके लिये सदा परम प्रिय बतलाया गया है। जहाँ ब्रह्मा, विष्णु और महेश स्त्रीरूपमें परिणत हो गये थे और पुनः पुरुषत्व पाकर वे अपने-अपने कार्योंमें संलग्न हो गये। वह परम सुन्दर द्वीप सुधासागरके मध्यमें विराजमान है। भगवती जगदम्बा वहाँ अनेक रूपोंमें सदा विहार करती रहती हैं॥ १६-१८॥