देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 640, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 640
अ० १९] पञ्चम स्कन्ध ६३१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| चित्रं त्वमी यदसुभी रहिता न सन्ति<br>त्वच्चिन्तितेन दनुजाः प्रथितप्रभावाः।<br>येषां कृते जननि देहनिबन्धनं ते<br>क्रीडारसस्तव न चान्यतरोऽत्र हेतुः ॥ ११ | हे माता! बड़ी विलक्षण बात तो यह है कि विख्यात प्रभावोंवाले उन दैत्योंका संहार जो आपके संकल्पमात्रसे ही सम्भव था, इसके लिये आपको अवतार लेना पड़ा। यह शरीर धारण करके आप वास्तवमें इसीके सहारे लीला करती हैं; इसमें कोई दूसरा कारण नहीं है ॥ ११ ॥ |
| प्राप्ते कलावहह दुष्तरे च काले<br>न त्वां भजन्ति मनुजा ननु वञ्चितास्ते।<br>धूर्तैः पुराणचतुरैर्हरिशङ्कराणां<br>सेवापराश्च विहितास्तव निर्मितानाम् ॥ १२ | जो मनुष्य इस विकराल कलिके उपस्थित होनेपर भी आपकी आराधना नहीं करते, अपितु आपके ही द्वारा निर्मित विष्णु, शिव आदि देवताओंकी उपासनामें तत्पर रहते हैं, वे लोग पुराण-चतुर धूर्तजनोंके द्वारा निश्चित रूपसे ठग लिये गये हैं ॥ १२ ॥ |
| ज्ञात्वा सुरांस्तव वशानसुरादितांश्च<br>ये वै भजन्ति भुवि भावयुता विभग्नान्।<br>धृत्वा करे सुविमलं खलु दीपकं ते<br>कूपे पतन्ति मनुजा विजलेऽतिघोरे ॥ १३ | यह जानकर भी कि देवता आपके अधीन हैं तथा दैत्योंके द्वारा छिन्न-भिन्न और प्रताड़ित किये जाते हैं—जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक भूलोकमें अन्य देवताओंकी उपासना करते हैं, वे मानो हाथमें अत्यन्त प्रकाशमान दीपक लेकर भी किसी जलरहित भयानक कूपमें जा गिरते हैं ॥ १३ ॥ |
| विद्या त्वमेव सुखदाऽसुखदाप्यविद्या<br>मातस्त्वमेव जननार्तिहरा नराणाम्।<br>मोक्षार्थिभिस्तु कलिता किल मन्दधीभि-<br>र्नाराधिता जननि भोगपरैस्तथाज्ञैः ॥ १४ | हे माता! आप ही सुखदायिनी विद्या तथा दुःखदायिनी अविद्या हैं और आप ही मनुष्योंके जन्म-मृत्युका दुःख दूर करनेवाली हैं। हे जननि! मोक्षकी कामना करनेवाले लोग तो आपकी आराधना करते हैं, किंतु मन्दबुद्धि अज्ञानी तथा विषयभोगपरायण मनुष्य आपकी आराधना नहीं करते ॥ १४ ॥ |
| ब्रह्मा हरश्च हरिरप्यनिशं शरण्यं<br>पादाम्बुजं तव भजन्ति सुरास्तथान्ये।<br>तद्वै न येऽल्पमतयो मनसा भजन्ति<br>भ्रान्ताः पतन्ति सततं भवसागरे ते ॥ १५ | ब्रह्मा, विष्णु, महेश तथा अन्य देवतागण आपके शरणदायक चरणकमलकी निरन्तर उपासना करते हैं, किंतु जो अल्पबुद्धि मनुष्य भ्रमित होकर मनसे आपकी आराधना नहीं करते, वे संसार-सागरमें बार-बार गिरते हैं ॥ १५ ॥ |
| चण्डि त्वदङ्घ्रिजलजोत्थरजःप्रसादै-<br>र्ब्रह्मा करोति सकलं भुवनं भवादौ।<br>शौरिश्च पाति खलु संहरते हरस्तु<br>त्वां सेवते न मनुजस्त्विह दुर्भगोऽसौ ॥ १६ | हे चण्डिके! आपके चरण-कमलसे उत्पन्न हुई धूलिके प्रभावसे ही ब्रह्मा सृष्टिके प्रारम्भमें सम्पूर्ण भुवनकी रचना करते हैं, विष्णु पालन करते हैं और शिवजी संहार करते हैं। इस लोकमें जो मनुष्य आपकी उपासना नहीं करता, वह अभागा है ॥ १६ ॥ |
| वाग्देवता त्वमसि देवि सुरासुराणां<br>वक्तुं न तेऽमरवराः प्रभवन्ति शक्ताः।<br>त्वं चेन्मुखे वससि नैव यदैव तेषां<br>यस्माद्वदन्ति मनुजा न हि तद्विहीनाः ॥ १७ | हे देवि! आप ही देवताओं तथा दैत्योंकी वाग्देवता हैं। यदि आप मुखमें विराजमान न रहतीं, तो बड़े-बड़े देवता भी बोलनेमें समर्थ नहीं हो सकते थे। मुख होनेपर भी मनुष्य उस वाक्शक्तिके बिना बोल नहीं सकता ॥ १७ ॥ |