देवी भागवत महापुराण

देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
पृष्ठ 639, कुल 889 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 639
| ६३० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १९ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| विद्या क्षमा जगति कान्तरिपीह मेधा<br>सर्वं त्वमेव विदिता भुवनत्रयेऽस्मिन्।<br>आभिर्विना तव तु शक्तिभिराशु कर्तुं<br>को वा क्षमः सकललोकनिवासभूमे॥ ४ | विद्या, क्षमा, कान्ति और मेधा—ये सब शक्तियाँ आप ही हैं। इस त्रिलोकीमें आप विख्यात हैं। सम्पूर्ण जगत्को आश्रय देनेवाली हे देवि! आपकी इन शक्तियोंके बिना कौन व्यक्ति कुछ भी स्वयं कर सकनेमें समर्थ है?॥ ३-४॥ |
| त्वं धारणा ननु न चेदसि कूर्मनागौ<br>धर्तुं क्षमौ कथमिलामपि तौ भवेताम्।<br>पृथ्वी न चेत्त्वमसि वा गगने कथं स्था-<br>स्यत्येतदम्ब निखिलं बहुभारयुक्तम्॥ ५ | हे अम्ब! धारणा शक्ति भी निश्चितरूपसे आप ही हैं, अन्यथा कच्छप और शेषनाग इस पृथ्वीको धारण कर सकनेमें कैसे समर्थ हो पाते? पृथ्वी-शक्ति भी आप ही हैं। यदि आप इस रूपमें न होतीं तो प्रचुर भारसे सम्पन्न यह सम्पूर्ण जगत् आकाशमें कैसे ठहर सकता था॥ ५॥ |
| ये वा स्तुवन्ति मनुजा अमरान्विमूढा<br>मायागुणैस्तव चतुर्मुखविष्णुरुद्रान्।<br>शुभ्रांशुवह्लियमवायुगणेशमुख्यान्<br>किं त्वामृते जननि ते प्रभवन्ति कार्ये॥ ६ | हे जननि! जो मनुष्य मायाके गुणोंसे प्रभावित होकर ब्रह्मा, विष्णु, महेश, चन्द्रमा, अग्नि, यम, वायु, गणेश आदि प्रमुख देवताओंकी स्तुति करते हैं, वे अज्ञानी ही हैं; क्योंकि क्या वे देवता भी आपकी कृपाशक्तिके बिना उन मनुष्योंको कार्य-फल प्रदान करनेमें समर्थ हो सकते हैं?॥ ६॥ |
| ये जुह्वति प्रविततेऽल्पधियोऽम्ब यज्ञे<br>वह्लौ सुरान्समधिकृत्य हविः समृद्धम्।<br>स्वाहा न चेत्त्वमसि ते कथमापुरुद्धा<br>त्वामेव किं न हि यजन्ति ततो हि मूढाः॥ ७ | हे अम्ब! जो लोग सुविस्तृत यज्ञमें देवताओंको अधिकृत करके अग्निमें पुष्कल आहुति देते हैं, वे मन्दमति हैं; क्योंकि यदि स्वाहाके रूपमें आप न होतीं, तो वे देवता हविर्द्रव्यको कैसे पाते? तब फिर वे मूढ़ आपका ही यजन क्यों नहीं करते?॥ ७॥ |
| भोगप्रदासि भवतीह चराचराणां<br>स्वांशैर्ददासि खलु जीवनमेव नित्यम्।<br>स्वीयान्सुराञ्जननि पोषयसीह यद्व-<br>त्तद्वत्परानपि च पालयसीति हेतोः॥ ८ | आप जगत्के चराचर प्राणियोंको भोग प्रदान करती हैं और अपने अंशोंसे उन्हें नित्य जीवन देती हैं। हे जननि! जिस प्रकार आप अपने प्रिय देवताओंका पोषण करती हैं, उसी प्रकार अपने शत्रुओंका भी पालन करती हैं॥ ८॥ |
| मातः स्वयं विरचितान्विपिने विनोदा-<br>द्वन्ध्यान्पलाशलहितांश्च कटूंश्च वृक्षान्।<br>नोच्छेदयन्ति पुरुषा निपुणाः कथञ्चि-<br>त्तस्मात्त्वमप्यतितरां परिपासि दैत्यान्॥ ९ | हे माता! बुद्धिमान् पुरुष विनोदके लिये उद्यानमें लगाये गये वृक्षोंमेंसे कुछ वृक्षोंके फल और पत्तोंसे रहित हो जाने अथवा उन वृक्षोंका रस कडुवा निकल जानेपर भी उन्हें कभी भी नहीं काटते, उसी प्रकार आप भी [अपने ही बनाये हुए] दैत्योंकी भलीभाँति रक्षा करती हैं॥ ९॥ |
| यत्त्वं तु हंसि रणमूर्धिन शरैरराती-<br>न्देवाङ्गनासुरतकेलिमतीन्विदित्वा ।<br>देहान्तरेऽपि करुणारसमाददाना<br>तत्ते चरित्रमिदमीप्सितपूरणाय॥ १० | करुणारससे ओत-प्रोत हृदयवाली आप रणभूमिमें बाणोंद्वारा शत्रुओंका जो संहार करती हैं, वह भी उनका मनोरथ पूर्ण करनेके लिये ही होता है; क्योंकि दूसरे जन्ममें देवांगनाओंके साथ क्रीड़ा-विहार करनेकी इच्छावाला उन्हें जानकर ही आपके द्वारा ऐसा किया जाता है; ऐसा आपका अद्भुत चरित्र है॥ १०॥ |